वैज्ञानिकों का दावा इंसानों में मिला है कुत्तों का कोरोना वायरस, चिंता की बात नहीं

कैम्ब्रिज (यूके), 29 मई 

वैज्ञानिकों ने निमोनिया से पीड़ित कुछ लोगों में कुत्तों में पाये जाने वाले एक नयी तरह के कोरोना वायरस का पता लगाया है। यह कहने, सुनने में भले खतरनाक लग सकता है, लेकिन इसका विश्लेषण करने के बाद लगता है कि इसकी वजह से आपको परेशान होने की जरूरत नहीं है। मलेशिया के सरवाक के एक अस्पताल में 8 लोगों में कुत्तों का कोरोना वायरस पाए जाने के बारे में अत्यधिक सम्मानित अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों के एक समूह ने नैदानिक ​​​​संक्रामक रोगों से संबंधित विभाग को सूचित किया है। तो क्या इसका यह मतलब निकाला जाए कि कुत्ते इंसानों में कोरोना वायरस फैला सकते हैं?

सबसे पहले स्पष्ट करने वाली बात यह है कि कुत्तों का कोरोना वायरस क्या है। यह जान लेना महत्वपूर्ण होगा कि यह सार्स-कोवी-2, जो वायरस कोविड-19 का कारण बनता है, से काफी अलग है। कोरोना वायरस परिवार को वायरस के चार समूहों में विभाजित किया जा सकता है: अल्फा, बीटा, गामा और डेल्टा कोरोना वायरस।

सार्स-कोवी-2 बीटा कोरोना वायरस समूह में आता है, जबकि कुत्तों के कोरोना वायरस पूरी तरह से अलग अल्फ़ा कोरोना वायरस समूह से है। वैज्ञानिक लगभग 50 वर्षों से कुत्तों के कोरोना वायरस के बारे में जानते हैं। इस अवधि के अधिकांश समय में ये वायरस अपने एक अनजान अस्तित्व के साथ मौजूद रहे और केवल पशु चिकित्सक और कभी-कभी कुत्तों को पालने वाले लोग इनमें रुचि रखते थे। इस वायरस के इन्सानों को संक्रमित करने के बारे में पिछली कोई जानकारी नहीं है। लेकिन अब अचानक दुनिया में सब तरफ कोरोना वायरस पर सबकी नजर रहने से उन जगहों पर भी कोरोना वायरस की मौजूदगी के निशान मिल रहे हैं, जहां इन्हे पहले कभी नहीं देखा गया था। हाल ही में लोगों में पाया गया कुत्तों का कोरोना वायरस संक्रमण दरअसल इस दिशा में की जा रही गंभीर खोज का नतीजा था। जिन लोगों को इस खोज का हिस्सा बनाया गया था, वह काफी समय पहले ठीक हो चुके थे।

वैज्ञानिक विशेष रूप से सिर्फ कुत्तों के कोरोना वायरस की तलाश नहीं कर रहे थे, शोधकर्ता एक ऐसा परीक्षण विकसित करने की कोशिश कर रहे थे जो एक ही समय में सभी प्रकार के कोरोना वायरस का पता लगा सके -एक तथाकथित पैन-सीओवी परीक्षण।

इंसानों में संक्रमण के यह मामले दरअसल 2017 और 2018 के हैं। ऐसे में इस स्रोत से कुत्तों के कोरोना वायरस के प्रकोप की संभावना और भी कम हो जाती है क्योंकि बीच के तीन से चार वर्षों में इसके आगे फैलने का कोई सबूत नहीं है।

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