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The News Air - Breaking News - बड़ा खुलासा! Same गोत्र Marriage से बच्चों को Thalassemia का खतरा?

बड़ा खुलासा! Same गोत्र Marriage से बच्चों को Thalassemia का खतरा?

International Thalassemia Day पर डॉक्टरों ने किया चौंकाने वाला खुलासा, एक गोत्र में शादी और थैलेसीमिया का कनेक्शन, शादी से पहले ब्लड टेस्ट क्यों जरूरी

The News Air Team by The News Air Team
शुक्रवार, 8 मई 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, काम की बातें, लाइफस्टाइल
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International Thalassemia Day
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Same गोत्र Marriage और थैलेसीमिया के बीच एक चौंकाने वाला कनेक्शन सामने आया है। 8 मई को दुनियाभर में International Thalassemia Day मनाया जा रहा है और इसी मौके पर डॉक्टरों ने एक ऐसी बात कही है जो भारतीय समाज की पारंपरिक सोच को पूरी तरह से चुनौती दे रही है। अब सवाल सिर्फ कुंडली मिलाने का नहीं, बल्कि ब्लड टेस्ट का भी है।

भारत में शादी तय करते समय परिवार देखा जाता है, जाति पूछी जाती है, कमाई का हिसाब होता है और कुंडली तक मिलाई जाती है। लेकिन जब बात जेनेटिक बीमारियों की आती है तो अक्सर लोग चुप्पी साध लेते हैं। यही चुप्पी कई परिवारों के लिए जिंदगीभर का दर्द बन जाती है।

कुंडली से ज्यादा जरूरी है ब्लड टेस्ट

भारत में आज भी शादी तय करते वक्त लड़के-लड़की की नौकरी, परिवार, समाज और आर्थिक स्थिति को सबसे ज्यादा महत्व दिया जाता है। कई परिवारों में कुंडली के बिना रिश्ता आगे बढ़ता ही नहीं। लेकिन स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर बातें, खासकर Thalassemia जैसी जेनेटिक बीमारी अब तक चर्चा से दूर रही है।

देखा जाए तो इसकी सबसे बड़ी वजह है डर, शर्म और समाज में फैली गलतफहमियां। लोगों को लगता है कि अगर किसी को जेनेटिक बीमारी की जानकारी हो गई तो रिश्ता टूट जाएगा। लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि अब इस सोच में धीरे-धीरे बदलाव आने लगा है।

बेंगलुरु के नारायण हेल्थ सिटी अस्पताल के वरिष्ठ विशेषज्ञ डॉक्टर शरद दामोदर का कहना है कि बड़े शहरों के साथ-साथ छोटे शहरों में भी डॉक्टर अब शादी से पहले प्रीमैरिटल ब्लड स्क्रीनिंग की सलाह दे रहे हैं। इसका मकसद सिर्फ इतना जानना होता है कि कहीं होने वाले दूल्हा-दुल्हन थैलेसीमिया कैरियर तो नहीं हैं।

एक गोत्र में शादी और थैलेसीमिया का खतरनाक कनेक्शन

हैरान करने वाली बात यह है कि एसजीपीजीआई मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विभाग के डॉक्टर नीरज यादव ने बताया है कि थैलेसीमिया की बीमारी बच्चों को अपने माता-पिता से मिलती है। जिन पति-पत्नी में थैलेसीमिया के वाहक होते हैं, उनके बच्चों में थैलेसीमिया की बीमारी होने का खतरा रहता है।

अगर गौर करें तो डॉक्टर नीरज यादव ने एक और चौंकाने वाला खुलासा किया। उन्होंने कहा, “ऐसा एक गोत्र में शादी करने के कारण ज्यादा होता है। इसलिए आपको ध्यान देना बहुत जरूरी है। एक गोत्र में शादी नहीं करनी चाहिए।”

यह दर्शाता है कि हमारी पुरानी परंपराएं कोई अंधविश्वास नहीं थीं। एक गोत्र में शादी न करने की परंपरा का एक वैज्ञानिक आधार भी है। जब करीबी रक्त संबंधियों में शादी होती है तो जेनेटिक बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

शादी से पहले ब्लड टेस्ट जरूरी, डॉक्टरों की सलाह

डॉक्टर नीरज यादव ने साफ शब्दों में कहा, “शादी से पहले युवक और युवती को खून की जांच जरूर करा लेनी चाहिए। अगर दोनों में थैलेसीमिया के वाहक हैं तो शादी नहीं करें।”

यह सुनने में भले ही कठोर लगे, लेकिन समझने वाली बात यह है कि इससे एक मासूम बच्चे को जिंदगीभर की तकलीफ से बचाया जा सकता है। एक छोटा सा ब्लड टेस्ट किसी बच्चे की पूरी जिंदगी बचा सकता है।

सुनने में यह एक साधारण मेडिकल टेस्ट लग सकता है, लेकिन इसका असर आने वाली पूरी पीढ़ी की जिंदगी पर पड़ सकता है।

थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों की जिंदगी कैसी होती है?

डॉक्टर नीरज यादव ने बताया कि थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों में 15 से 20 दिन में लाल रक्त कोशिकाएं खत्म हो जाती हैं। खून में आयरन की मात्रा बढ़ने लगती है। बच्चों को एक से दो महीने के अंतराल पर खून चढ़ाया जाता है और आयरन का स्तर ना बढ़े इसके लिए दवा भी दी जाती है।

कल्पना कीजिए एक मासूम बच्चे को हर महीने अस्पताल जाना पड़े। खून चढ़ाना पड़े। इंजेक्शन, टेस्ट, दवाइयां – यही उसकी जिंदगी का हिस्सा बन जाएं। कई बच्चों का बचपन अस्पताल के चक्कर लगाते हुए गुजर जाता है। पूरा परिवार मानसिक, आर्थिक और भावनात्मक दबाव में जीता है।

थैलेसीमिया क्या है? समझें पूरी बात

थैलेसीमिया एक गंभीर जेनेटिक ब्लड डिसऑर्डर है। यह कोई छुआछूत की बीमारी नहीं, न ही किसी संक्रमण से फैलती है। यह बीमारी माता-पिता से बच्चों में डिफेक्टिव जीन के जरिए पहुंचती है।

हमारे शरीर में हीमोग्लोबिन नाम का एक प्रोटीन होता है जो रेड ब्लड सेल में पाया जाता है और पूरे शरीर तक ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करता है। लेकिन थैलेसीमिया होने पर शरीर सही मात्रा में हीमोग्लोबिन नहीं बना पाता। इसका असर सीधे रेड ब्लड सेल्स पर पड़ता है और वे सामान्य से जल्दी खत्म होने लगते हैं। नतीजा – शरीर में खून की कमी यानी एनीमिया।

सबसे खतरनाक: कैरियर दिखते हैं पूरी तरह सामान्य

दिलचस्प बात यह है कि थैलेसीमिया कैरियर व्यक्ति पूरी तरह सामान्य दिखाई देता है। उसकी रोजमर्रा की जिंदगी आम लोगों जैसी होती है। उसे कोई बड़ी परेशानी महसूस नहीं होती। लेकिन खतरा तब पैदा होता है जब दो कैरियर आपस में शादी कर लेते हैं।

ऐसे कपल के बच्चों को थैलेसीमिया मेजर होने का लगभग 25% खतरा हो जाता है। यानी हर चार बच्चे में से एक बच्चा गंभीर बीमारी के साथ जन्म ले सकता है। और बस यहीं से शुरू होती है असली मुसीबत।

थैलेसीमिया मेजर: जिंदगीभर की लड़ाई

थैलेसीमिया मेजर सिर्फ एक बीमारी नहीं बल्कि जिंदगीभर चलने वाली मेडिकल लड़ाई है। ऐसे बच्चों को हर कुछ हफ्ते में खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है। अस्पताल, इंजेक्शन, टेस्ट, दवाइयां – यही उनकी जिंदगी का हिस्सा बन जाते हैं।

यही वजह है कि डॉक्टर शादी से पहले ब्लड स्क्रीनिंग को बेहद जरूरी मानते हैं। एक साधारण सा टेस्ट पूरी जिंदगी बदल सकता है।

भारत में बदलाव की शुरुआत, नई पीढ़ी आगे आ रही

अब भारत में धीरे-धीरे एक नया ट्रेंड भी देखने को मिल रहा है। जिन समुदायों में थैलेसीमिया के मामले ज्यादा हैं, वहां परिवार अब कुंडली और डिग्री के साथ-साथ मेडिकल रिपोर्ट भी मांगने लगे हैं।

युवा पीढ़ी इसे शक की नजर से नहीं बल्कि जिम्मेदारी के तौर पर देख रही है। हेल्थ संस्थाएं भी शादी के सीजन से पहले जागरूकता अभियान चला रही हैं ताकि लोग समय रहते टेस्ट करा सकें।

राहत की बात यह है कि यह टेस्ट बहुत महंगा नहीं होता। एक साधारण ब्लड टेस्ट से पता लगाया जा सकता है कि कोई व्यक्ति थैलेसीमिया कैरियर है या नहीं। लेकिन असली चुनौती टेस्ट नहीं बल्कि समाज की सोच है।

समाज की सोच सबसे बड़ी बाधा

आज भी बहुत से लोग ‘कैरियर’ शब्द सुनते ही घबरा जाते हैं। उन्हें लगता है कि इसका मतलब गंभीर बीमारी है। जबकि डॉक्टर साफ कहते हैं कि थैलेसीमिया कैरियर व्यक्ति पूरी तरह सामान्य जिंदगी जी सकता है। वह शादी कर सकता है, माता-पिता बन सकता है और एक स्वस्थ जीवन जी सकता है।

लेकिन जानकारी की कमी लोगों को डर और भेदभाव की तरफ धकेल देती है। इसी डर की वजह से कई लोग अपनी रिपोर्ट छिपा लेते हैं। उन्हें लगता है कि अगर सच सामने आ गया तो रिश्ता टूट सकता है।

और इस पूरी स्थिति में सबसे ज्यादा दबाव महिलाओं पर पड़ता है। कई बार ससुराल पक्ष लड़की को ही जिम्मेदार ठहराने लगते हैं। उसकी मां बनने की क्षमता पर सवाल उठाए जाते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि यह बीमारी किसी एक व्यक्ति की वजह से नहीं बल्कि दोनों के जेनेटिक कॉम्बिनेशन से जुड़ी होती है।

पुरानी पीढ़ी vs नई पीढ़ी की सोच

पुरानी पीढ़ी का एक वर्ग आज भी इन मेडिकल टेस्ट को परंपराओं में रुकावट मानता है। कुछ लोगों को लगता है कि ऐसे टेस्ट रिश्तों में अविश्वास पैदा करते हैं।

लेकिन नई पीढ़ी इस सोच को बदल रही है। अब कई लोग अपनी मैट्रिमोनियल प्रोफाइल में ब्लड ग्रुप और हेल्थ स्टेटस तक साझा करने लगे हैं। क्योंकि अब शादी सिर्फ सामाजिक रिश्ता नहीं बल्कि आने वाले भविष्य की जिम्मेदारी भी बन चुकी है।

दुनिया के अन्य देशों ने कैसे नियंत्रण पाया?

दुनिया के कई देशों ने समय रहते इस बीमारी पर काफी हद तक नियंत्रण पा लिया है। साइप्रस और ईरान जैसे देशों में शादी से पहले स्क्रीनिंग और काउंसलिंग को बढ़ावा दिया गया और इसके बाद थैलेसीमिया मेजर के मामलों में भारी कमी भी आई।

भारत में भी अब उसी दिशा में बदलाव दिखाई देने लगा है। सरकार और स्वास्थ्य संगठन जागरूकता फैला रहे हैं। लेकिन अभी भी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।

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थैलेसीमिया के लक्षण जो हर माता-पिता को पता होने चाहिए

थैलेसीमिया के लक्षण हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकते हैं। कुछ बच्चों में जन्म के साथ ही इसके संकेत दिखाई देने लगते हैं, जबकि कुछ में शुरुआत के दो वर्षों के दौरान बीमारी सामने आती है।

गंभीर मामलों में मरीज को लगातार थकान महसूस होने लगती है। शरीर में कमजोरी बनी रहती है। त्वचा पीली पड़ सकती है। आंखों में पीलिया के लक्षण दिखाई दे सकते हैं। कुछ बच्चों में चेहरे की हड्डियों की बनावट तक प्रभावित हो जाती है।

शारीरिक विकास धीमा पड़ सकता है। पेट में सूजन, गहरे रंग का पेशाब और भूख कम लगना भी इसके संकेत हो सकते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि समय रहते पहचान हो जाए तो सही मेडिकल सलाह और बेहतर प्लानिंग संभव हो सकती है।

आने वाली पीढ़ी का भविष्य आपके हाथ में

भारत तेजी से बदल रहा है। लोग अब रिश्तों में सिर्फ परंपरा नहीं, पारदर्शिता भी तलाश रहे हैं। और शायद यही बदलाव आने वाले समय में हजारों बच्चों को दर्द भरी जिंदगी से बचा सकता है।

क्योंकि शादी सिर्फ दो लोगों का साथ नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ी का भविष्य भी तय करती है। तो सवाल यह है – क्या हम अब भी सिर्फ कुंडली देखकर फैसला करेंगे या फिर विज्ञान और जागरूकता को भी रिश्तों का हिस्सा बनाएंगे?

उम्मीद की किरण यह है कि प्रीमैरिटल स्क्रीनिंग को अब सिर्फ मेडिकल प्रक्रिया नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी माना जा रहा है। और यही जागरूकता किसी मासूम की जिंदगी बचा सकती है।


मुख्य बातें (Key Points)

• International Thalassemia Day पर डॉक्टरों ने बताया कि Same Gotra Marriage से थैलेसीमिया का खतरा बढ़ता है

• शादी से पहले युवक-युवती को ब्लड टेस्ट जरूर कराना चाहिए – दोनों कैरियर हों तो शादी से बचें

• थैलेसीमिया मेजर वाले बच्चों को हर 15-20 दिन में खून चढ़ाना पड़ता है, जिंदगीभर का संघर्ष

• थैलेसीमिया कैरियर सामान्य जीवन जीते हैं लेकिन दो कैरियर की शादी से बच्चों को 25% खतरा

• साइप्रस और ईरान ने प्रीमैरिटल स्क्रीनिंग से थैलेसीमिया मामलों में भारी कमी की, भारत भी बदलाव की ओर


FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: क्या थैलेसीमिया छूने से फैलता है?

उत्तर: नहीं, थैलेसीमिया कोई संक्रामक बीमारी नहीं है। यह एक जेनेटिक डिसऑर्डर है जो माता-पिता से बच्चों में जीन के माध्यम से पहुंचता है। यह छूने, साथ रहने या किसी संपर्क से नहीं फैलता।

प्रश्न 2: अगर एक ही कैरियर हो तो क्या शादी कर सकते हैं?

उत्तर: हां, अगर सिर्फ एक व्यक्ति थैलेसीमिया कैरियर है तो शादी में कोई समस्या नहीं। खतरा तब होता है जब दोनों पार्टनर कैरियर हों। ऐसे में उनके बच्चे को थैलेसीमिया मेजर होने का 25% खतरा होता है।

प्रश्न 3: शादी से पहले कौन सा टेस्ट कराना चाहिए?

उत्तर: शादी से पहले Complete Blood Count (CBC) और Hemoglobin Electrophoresis टेस्ट कराना चाहिए। ये टेस्ट बताते हैं कि आप थैलेसीमिया कैरियर हैं या नहीं। यह टेस्ट सस्ता और आसान है।

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