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The News Air - Breaking News - PM Compromised: क्या America ने पकड़ ली Modi की नब्ज़?

PM Compromised: क्या America ने पकड़ ली Modi की नब्ज़?

राहुल गांधी के गंभीर आरोप के बाद संसद में हंगामा, Trade Deal को लेकर उठे सवाल

The News Air Team by The News Air Team
मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, अंतरराष्ट्रीय, सियासत
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PM Compromised
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India-US Trade Deal: भारत-अमेरिका के बीच हुई ताजा व्यापारिक डील को लेकर विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर ‘कॉम्प्रोमाइज्ड’ होने का गंभीर आरोप लगाया है। संसद परिसर में पत्रकारों से बात करते हुए राहुल ने दावा किया कि पीएम मोदी पर भयंकर दबाव है और उन्होंने किसानों के हितों को दांव पर लगा दिया है।

विवाद तब शुरू हुआ जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर भारत के साथ हुई टेरिफ डील का एकतरफा ऐलान कर दिया। ट्रंप ने लिखा कि प्रधानमंत्री मोदी ने रूस से तेल की खरीद बंद करने पर सहमति जताई है और भारत अब अमेरिका से ज्यादा तेल खरीदेगा। इतना ही नहीं, भारत अमेरिका से 500 बिलियन डॉलर (करीब 45-46 लाख करोड़ रुपये) के सामान की खरीदारी करेगा, जिसमें ऊर्जा, टेक्नोलॉजी, एग्रीकल्चर और कोयला शामिल है।

संसद में हंगामा, राहुल को बोलने नहीं दिया गया

बीते दो दिनों से लोकसभा में राहुल गांधी जो कुछ कहना चाह रहे थे, वो कह नहीं पाए। कल प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की मौजूदगी के बावजूद उन्हें एक शब्द भी बोलने नहीं दिया गया। आज तो प्रधानमंत्री और गृह मंत्री लोकसभा में पहुंचे ही नहीं। स्पीकर ने भी पल्ला झाड़ लिया।

राहुल गांधी चीन के साथ भारत के संबंधों और सीमा पर सुरक्षा को लेकर जनरल नारवणे की किताब से कुछ पढ़ना चाहते थे। उन्होंने दस्तावेज़ की पहचान भी करवा दी, लेकिन फिर भी उन्हें पढ़ने नहीं दिया गया। इतिहास में पहली बार विपक्ष के नेता को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बोलने नहीं दिया गया।

ट्रंप का ट्वीट और भारत की चुप्पी

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, “आज सुबह भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात करना मेरे लिए सम्मान की बात थी। हमने रूस-यूक्रेन युद्ध सहित कई मुद्दों पर चर्चा की और मोदी ने रूस से तेल की खरीद बंद करने पर सहमति जताई। भारत अब अमेरिका से ज्यादा तेल खरीदेगा।”

ट्रंप ने आगे लिखा कि प्रधानमंत्री मोदी की दोस्ती, सम्मान और उनके अनुरोध पर अमेरिका ने भारत पर लगने वाला रेसिप्रोकल टैरिफ 25% से घटाकर 18% कर दिया है। वहीं, भारत अमेरिकी सामानों पर अपने टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं को घटाकर शून्य करने की दिशा में आगे बढ़ेगा।

हैरानी की बात यह है कि इस पूरे ऐलान की जानकारी भारत के प्रधानमंत्री के जरिए नहीं, बल्कि दिल्ली में मौजूद अमेरिकी राजदूत ने दी। अमेरिका की तरफ से पहले घोषणा हुई, फिर भारत ने पुष्टि की।

Modi का जवाब: ‘बहुत-बहुत धन्यवाद’

प्रधानमंत्री मोदी ने ट्विटर पर जवाब देते हुए लिखा, “मेरे प्रिय दोस्त राष्ट्रपति ट्रंप से बात करके मुझे बहुत खुशी हुई। यह जानकर हम खुश हैं कि मेड इन इंडिया उत्पादों पर अब 18% टैरिफ लगेगा। इस शानदार घोषणा के लिए भारत के 140 करोड़ लोगों की ओर से राष्ट्रपति ट्रंप का बहुत-बहुत धन्यवाद।”

लेकिन सवाल यह है कि जब भारतीय सामानों पर इससे पहले औसतन 2 से 4% टैरिफ लगता था, तो अब 18% हो जाने पर ‘बहुत-बहुत धन्यवाद’ क्यों? और जब अमेरिकी सामानों पर भारत में 20 से 70% तक टैरिफ लगता था, वो अब 0% हो जाएगा, तो इसे ‘शानदार घोषणा’ कैसे कहा जा सकता है?

कृषि क्षेत्र में अमेरिकी घुसपैठ

सबसे बड़ा विवाद एग्रीकल्चर सेक्टर को लेकर है। अमेरिका के कृषि मंत्री ब्रुक रोलिंस ने कहा कि अब अमेरिकी किसानों के उत्पाद भारत के बाजार में जाना शुरू हो जाएंगे और इससे अमेरिका के ग्रामीण इलाकों में पैसा आएगा।

यह वही प्रधानमंत्री मोदी हैं जिन्होंने कुछ दिन पहले किसानों के बीच कहा था, “भारत अपने किसानों के, पशुपालकों के और मछुआरे भाई-बहनों के हितों के साथ कभी भी समझौता नहीं करेगा। और मैं जानता हूं, व्यक्तिगत रूप से मुझे बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। लेकिन मैं इसके लिए तैयार हूं।”

अब वही प्रधानमंत्री अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए भारतीय बाजार खोलने पर सहमत हो गए हैं। अब तक केवल बादाम, काजू, अखरोट और पिस्ता की बात होती थी, लेकिन अब पूरे एग्रीकल्चर प्रोडक्ट्स का रास्ता खुल गया है।

500 बिलियन डॉलर का खेल

ट्रंप ने दावा किया कि भारत अमेरिका से 500 बिलियन डॉलर (करीब 45-46 लाख करोड़ रुपये) का सामान खरीदेगा। यह रकम भारत के कुल बजट (53 लाख करोड़ रुपये) के लगभग बराबर है।

2024 के आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत ने अमेरिका से 41.75 बिलियन डॉलर (करीब 3.77 लाख करोड़ रुपये) का सामान खरीदा था। वहीं, भारत ने अमेरिका को 85.3 बिलियन डॉलर (करीब 7.69 लाख करोड़ रुपये) का माल भेजा था। यानी व्यापार में भारत को करीब 4 लाख करोड़ रुपये का फायदा हुआ था।

लेकिन अब अगर भारत को अमेरिका से 45-46 लाख करोड़ रुपये का सामान खरीदना है, तो यह मौजूदा आयात से करीब 12 गुना ज्यादा है। यह कैसे संभव होगा?

रूस से तेल पर रोक, संप्रभुता पर सवाल

ट्रंप ने साफ-साफ कहा कि मोदी ने रूस से तेल की खरीद बंद करने पर सहमति जताई है। यह भारत की विदेश नीति और संप्रभुता पर सीधा सवाल है।

रूस भारत का परमानेंट और ग्रेटेस्ट फ्रेंड रहा है। दशकों पुराने रिश्ते हैं। लेकिन अमेरिका के कहने पर भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद करने की सहमति दे दी। ट्रंप ने यह भी कहा कि भारत वेनेजुएला से तेल खरीद सकता है। यानी भारत कहां से तेल खरीदेगा, यह भी अमेरिका तय करेगा?

Operation Sindoor की याद

यह परिस्थिति पहलगाम हमले के बाद हुए Operation Sindoor की याद दिलाती है। तब भी सीजफायर की घोषणा सबसे पहले अमेरिका की तरफ से हुई थी। शाम 5 बजे अमेरिका ने जानकारी दी, 5:30 बजे पाकिस्तान ने पुष्टि की और 6:30 बजे भारत के विदेश मंत्रालय ने ऐलान किया।

आज भी वही खेल दोहराया गया। पहले अमेरिकी राजदूत ने जानकारी दी, फिर ट्रंप ने ट्वीट किया और बाद में भारत ने पुष्टि की। क्या यह भारत की संप्रभुता का मजाक नहीं है?

टैरिफ की तुलना: भारत बनाम दूसरे देश

भारत पर 18% टैरिफ लगेगा और भारत अमेरिकी सामानों पर 0% टैरिफ लगाएगा। इंडोनेशिया भी अमेरिकी सामानों पर 0% टैरिफ लगा रहा है, लेकिन वहां पर भारत से सिर्फ 1% ज्यादा यानी 19% टैरिफ लिया जा रहा है। वियतनाम पर 20% टैरिफ है और वहां भी अमेरिकी सामानों पर 0% टैरिफ है।

लेकिन बांग्लादेश और चीन ने मजबूती दिखाई। बांग्लादेश पर 20% टैरिफ है तो बांग्लादेश ने अमेरिकी सामानों पर 28% टैरिफ लगाया है। चीन पर 34% टैरिफ है तो चीन ने अमेरिकी सामानों पर 32% टैरिफ लगाया है।

भारत ने 18% बर्दाश्त कर लिया और अमेरिकी सामानों को 0% पर आने दिया। यह किस तरह की डील है?

टेक्सटाइल और डायमंड की मजबूरी

माना जा रहा है कि टेक्सटाइल और डायमंड सेक्टर में आए संकट की वजह से भारत को यह डील करनी पड़ी। टेक्सटाइल से जुड़े हजारों मजदूर बेरोजगार हो रहे थे। सूरत की डायमंड इंडस्ट्री पूरी तरह बैठने को थी।

18% पर सहमति जताकर टेक्सटाइल और डायमंड के रास्ते को बचाया गया। लेकिन इसकी कीमत पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था को चुकानी पड़ेगी। जब अमेरिकी सामान 0% टैरिफ पर भारत आएंगे, तो भारतीय उद्योग कैसे टिकेंगे?

मेक इन इंडिया पर ब्रेक

सरकार मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को रिवाइव करने की बात कर रही है। बजट में भी इसका जिक्र किया गया। लेकिन जब दुनिया से सामान 0% टैरिफ पर भारत आएगा, तो मेक इन इंडिया कैसे सफल होगी?

कोयले का उदाहरण लीजिए। भारत में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कोयला भंडार है। लेकिन हमारा कोयला निकालना इतना महंगा पड़ता है कि इंडोनेशिया, मलेशिया या ऑस्ट्रेलिया से मंगाना सस्ता है। इसलिए भारत के पावर प्रोजेक्ट बाहर से कोयला लाते हैं।

अब यही हाल खेती का होगा। यही हाल हर प्रोडक्ट का होगा। भारतीय उद्योग बंद होंगे, बेरोजगारी बढ़ेगी और आयात बढ़ता जाएगा।

राहुल का आरोप: दो प्रेशर पॉइंट्स

राहुल गांधी ने संसद परिसर में पत्रकारों से कहा, “नरेंद्र मोदी जी ने कल शाम उस डील को साइन कर दिया। नरेंद्र मोदी जी पर प्रेशर है, भयंकर प्रेशर है। मेन बात यह है कि हमारे प्रधानमंत्री को कंप्रोमाइज कर दिया गया है। किसने किया है, कैसे किया है, यह हिंदुस्तान की जनता को सोचना है।”

जब पत्रकारों ने पूछा कि प्रधानमंत्री कॉम्प्रोमाइज्ड कैसे हो गए, तो राहुल ने दो कारण बताए:

पहला – अडानी पर अमेरिका में चल रहा केस। राहुल ने कहा, “एक अडानी जी पर केस है। यूनाइटेड स्टेट्स में वो अडानी जी को टारगेट नहीं कर रहा है। वो नरेंद्र मोदी के फाइनेंशियल स्ट्रक्चर को टारगेट कर रहा है। वो बीजेपी का फाइनेंशियल स्ट्रक्चर है, मोदी जी का फाइनेंशियल स्ट्रक्चर है।”

दूसरा – एप्सटीन फाइल्स। राहुल ने कहा, “एप्सटीन फाइल्स में अभी और माल है। वो अभी रिलीज नहीं हुआ है। जो पूरा देश जानना चाहता है मगर अभी अमेरिका ने रिलीज नहीं किया है।”

अडानी कनेक्शन का इतिहास

अडानी और मोदी के रिश्ते किसी से छुपे नहीं हैं। 2013 में जब मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बने, तो वे देश भर में प्रचार के लिए अडानी के चार्टर्ड प्लेन में घूमे।

2014 के बाद अडानी की इंडस्ट्री और नेटवर्थ ने जो रफ्तार पकड़ी, वो आज तक किसी ने नहीं रोकी। एक वक्त तो दुनिया के पहले दो-तीन सबसे अमीर लोगों में उनकी गिनती होने लगी।

बीच में हिंडनबर्ग रिपोर्ट ने चीजें डगमगा दीं। अब अमेरिका में करप्शन की फाइल खुल गई है और मामला अदालत में पहुंच गया है। करीब 75,000 करोड़ रुपये के जुर्माने की बात हो रही है।

राहुल का सवाल है – क्या अडानी का पूरा साम्राज्य बीजेपी के फाइनेंशियल स्ट्रक्चर या प्रधानमंत्री मोदी के पॉलिटिकल फाइनेंशियल स्ट्रक्चर से जुड़ा है? क्या इस स्ट्रक्चर के ढहने का डर है, इसलिए कॉम्प्रोमाइज है?

इलेक्टोरल बॉन्ड और कॉर्पोरेट फंडिंग

2014 से भारत में राजनीति करना, चुनाव जीतना, सरकार गिराना, सरकार बनाना, विधायकों की खरीद-फरोख्त, सांसदों की खरीद-फरोख्त, पार्टियों को तोड़ना – यह सब खुले तौर पर पैसे के सहारे चलता रहा है। यह किसी से छुपा नहीं है।

इलेक्टोरल बॉन्ड का पूरा खेल हुआ। कॉर्पोरेट की पॉलिटिकल फंडिंग बीजेपी के हक में होती रही। ट्रस्ट के जरिए भी पैसा बीजेपी के पक्ष में आता रहा। यह सारी चीजें सामने हैं।

क्या इस पूरे फाइनेंशियल स्ट्रक्चर के ढहने का डर है? क्या इसीलिए कॉम्प्रोमाइज है?

एप्सटीन फाइल्स का सस्पेंस

एप्सटीन फाइल्स में प्रधानमंत्री मोदी का नाम एक जगह आया था। बीजेपी और सरकार ने इसे खारिज कर दिया। विदेश मंत्रालय ने खुलकर कहा कि हां, वो इजरायल गए जरूर थे, लेकिन उसके अलावा जो कुछ भी लिखा गया है, वह सब बकवास है।

कांग्रेस ने सवाल खड़े किए। फैक्ट्स के साथ रखे। दुनिया भर के तमाम बड़े लोगों के नाम उस फाइल में हैं।

लेकिन अभी भी बहुत सारे पेपर, बहुत सारी तस्वीरें आनी बाकी हैं। क्या इस वजह से कॉम्प्रोमाइज्ड है कि आने वाले वक्त में वो नाम, वो तस्वीर ना आ पाए?

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जब राज्यसभा में स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा से यह सवाल पूछा गया, तो उन्होंने कहा, “सरकार की तरफ से आपको यह आश्वस्त करना चाहता हूं कि सरकार पूरी ट्रेड के बारे में, ऑल माइन्यू डिटेल्स के बारे में सरकार आएगी और आपको बताएगी और कंसर्न मंत्री उसके बारे में चर्चा करेंगे। बहुत जल्द सरकार सुओ मोटो स्टेटमेंट देने वाली है और इस ट्रेड डील के बारे में भी विस्तृत रूप से चर्चा करेंगे।”

जेपी नड्डा कल तक बीजेपी के अध्यक्ष थे। फरवरी 2025 में जब प्रधानमंत्री मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के साथ मिशन 500 पर हस्ताक्षर करके आए थे, तब बीजेपी ने बताया था कि कैसे अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंध अब ट्रैक टू की दिशा में जाएंगे। यानी पहले दौर में ट्रंप के साथ दोस्ती और दूसरे दौर में महादोस्ती।

लेकिन इस महादोस्ती का असर इतना व्यापक और इस तर्ज पर होगा, इसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी।

फरवरी 2025 का मिशन 500

फरवरी 2025 में अमेरिकी राष्ट्रपति की शपथ के बाद प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका पहुंचे थे। वाशिंगटन डीसी में व्हाइट हाउस के भीतर बैठकर अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ जो डील की गई थी, वह मिशन 500 के तौर पर हुई थी।

मिशन 500 के तहत 2030 तक दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापारिक संबंध 500 बिलियन डॉलर तक पहुंच जाएंगे। लेकिन यह 2030 तक का लक्ष्य था और उसमें एग्रीकल्चर का जिक्र नहीं था।

अब ट्रंप ने कहा है कि भारत अभी से खरीदना शुरू कर देगा। अगले साल से शुरुआत होगी। एग्रीकल्चर के क्षेत्र में भी आ जाएगा। तेल जहां से अमेरिका बोलेगा, वहां से खरीदेगा।

NDA बैठक में जश्न, संसद में सन्नाटा

प्रधानमंत्री मोदी जब आज एनडीए की बैठक में पहुंचे, तो जोरों-शोरों से उनका स्वागत हो रहा था। ‘वंदे मातरम’ की जय के नारे लग रहे थे।

लेकिन संसद चल नहीं पा रही थी। विपक्ष के नेता कुछ कहना चाह रहे थे, लेकिन उन्हें बोलने नहीं दिया जा रहा था। रूस और चीन को लेकर, ईरान को लेकर जियोपॉलिटिकल सिचुएशन में अमेरिका और भारत के बीच कैसे सहमति बनेगी, यह भी उलझन है।

सवाल बरकरार

क्या वाकई प्रधानमंत्री मोदी कॉम्प्रोमाइज्ड हो गए हैं? वो कौन सी नब्ज़ है जिसको अमेरिका ने दबा लिया है? क्या अडानी केस और एप्सटीन फाइल्स के दबाव में यह डील हुई? क्या भारत की संप्रभुता और स्वाभिमान को दरकिनार करते हुए यह समझौता किया गया?

प्रधानमंत्री को अपने आप को इस तरीके से पेश करना जरूरी है कि हर सौदा, हर डील को लेकर कोई भी बातचीत में वो झुके नहीं। यह उन्हें कहना पड़ेगा, जो आज उन्होंने कहा भी।

लेकिन हकीकत यह है कि भारतीय सामानों पर 18% टैरिफ लगेगा और अमेरिकी सामानों पर 0% टैरिफ। भारत 500 बिलियन डॉलर का सामान अमेरिका से खरीदेगा। रूस से तेल खरीदना बंद करेगा। एग्रीकल्चर सेक्टर अमेरिकी उत्पादों के लिए खुल जाएगा।

यह परिस्थिति इससे पहले भारत की राजनीति में, संसद के भीतर, भारत की अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और बनने वाली आर्थिक नीतियों को लेकर कभी नहीं थी। क्या बात अब सिर्फ कॉर्पोरेट के साथ नेक्सस की नहीं है? क्या बात अब इंटरनेशनल रिलेशन में भारत के उस इकोनॉमिक नेक्सस की आकर खड़ी हो गई है जिसके दायरे में भारत के प्रधानमंत्री हैं?

जानें पूरा मामला

यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब ट्रंप ने टैरिफ वॉर छेड़ा। भारत समेत कई देशों पर भारी टैरिफ लगाए गए। पहले 50% फिर 25% और अब 18% पर आकर खड़े हुए। भारत ने इसे जीत बताया। लेकिन असल में भारत पहले 2-4% औसत टैरिफ देता था, अब 18% देगा।

दूसरी तरफ, भारत अमेरिकी सामानों पर 20-70% तक टैरिफ लगाता था। अब वो 0% हो जाएगा। यह कैसी जीत है?

यूरोपीय यूनियन के साथ भारत के फ्री ट्रेड एग्रीमेंट से अमेरिका पर दबाव था। ब्रिक्स में चीन और रूस के करीब जाने से भी दबाव था। लेकिन भारत का रुख इतना मजबूत था कि कोई उम्मीद नहीं थी कि भारत झुकेगा।

फिर क्या हुआ कि भारत झुक गया? राहुल गांधी कह रहे हैं – अडानी केस और एप्सटीन फाइल्स। सरकार कह रही है – जल्द स्पष्टीकरण देंगे। लेकिन डील तो हो चुकी है।


मुख्य बातें (Key Points)

  • राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी पर ‘कॉम्प्रोमाइज्ड’ होने का गंभीर आरोप लगाया है
  • अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने एकतरफा तरीके से भारत के साथ ट्रेड डील का ऐलान किया, जिसमें भारत 500 बिलियन डॉलर का सामान अमेरिका से खरीदेगा
  • भारतीय सामानों पर टैरिफ 2-4% से बढ़कर 18% हो गया, जबकि अमेरिकी सामानों पर टैरिफ 0% हो जाएगा
  • प्रधानमंत्री मोदी ने रूस से तेल खरीदना बंद करने पर सहमति जताई है, जो भारत की संप्रभुता पर सवाल खड़ा करता है
  • एग्रीकल्चर सेक्टर अमेरिकी उत्पादों के लिए खुल गया, जबकि मोदी ने किसानों से वादा किया था कि वो कृषि क्षेत्र में समझौता नहीं करेंगे
  • राहुल ने दो प्रेशर पॉइंट्स बताए – अडानी पर अमेरिका में केस और एप्सटीन फाइल्स में मोदी का नाम
  • संसद में लगातार दो दिन राहुल को बोलने नहीं दिया गया, जो इतिहास में पहली बार हुआ है
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