Petrol diesel price increase risk ने एक बार फिर आम आदमी की चिंता बढ़ा दी है। मिडिल ईस्ट में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव सिर्फ युद्ध की खबर नहीं है, बल्कि यह दुनिया की अर्थव्यवस्था, खासकर ऑयल मार्केट और महंगाई के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर हालात बिगड़ते हैं और तेल सप्लाई प्रभावित होती है, तो कच्चे तेल की कीमत मौजूदा 60 डॉलर (करीब 5,434 रुपये) प्रति बैरल से उछलकर 108 डॉलर (करीब 9,782 रुपये) प्रति बैरल तक जा सकती है। ऐसा हुआ तो दुनिया भर में महंगाई तेज होगी, ब्याज दरें बढ़ेंगी और आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ सकती है।
60 डॉलर से 108 डॉलर तक का सफर, कैसे बढ़ेगी कीमत?
फिलहाल कच्चे तेल की कीमत 60 डॉलर प्रति बैरल के आसपास स्थिर है। लेकिन मिडिल ईस्ट के हालात बिगड़ने की सूरत में यह सीधा उछलकर 108 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती है। यानी करीब 80% की बढ़ोतरी। इसका सीधा असर दुनिया भर के उन देशों पर पड़ेगा जो तेल आयात पर निर्भर हैं। भारत इनमें सबसे आगे है।
अगर कच्चा तेल 108 डॉलर प्रति बैरल पहुंचता है, तो भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें 80 रुपये प्रति लीटर से ऊपर जा सकती हैं। मौजूदा समय में दिल्ली में पेट्रोल करीब 96 रुपये और डीजल करीब 87 रुपये प्रति लीटर है। इसके और बढ़ने का सीधा मतलब है कि आम आदमी की जेब पर भारी बोझ पड़ेगा।
जब दुनिया के एक कोने में जलती आग, दूसरे कोने में झुलसे आम आदमी
1970 के दशक में तेल संकट ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को बुरी तरह हिला कर रख दिया था। आज हालात थोड़े अलग हैं, लेकिन जोखिम अभी भी उतना ही जिंदा है। मिडिल ईस्ट में हो रहा संघर्ष सिर्फ उस क्षेत्र तक सीमित नहीं है। यहां की हर छोटी घटना का असर दुनिया के हर उस शख्स पर पड़ता है जो अपनी गाड़ी में पेट्रोल डलवाता है, जो सब्जी खरीदता है (क्योंकि ट्रांसपोर्टेशन महंगा हो जाता है), जो हर महीने घर का बजट बनाता है। यह सिर्फ तेल की कीमत नहीं है, यह रोटी, कपड़ा और मकान की कीमत है।
मिडिल ईस्ट: ऊर्जा की धुरी और वैश्विक पूंजी का केंद्र
मिडिल ईस्ट आज भी दुनिया की ऊर्जा की धुरी है। यह क्षेत्र दुनिया के कुल तेल उत्पादन का लगभग एक तिहाई (33%) और प्राकृतिक गैस का करीब 20% हिस्सा पैदा करता है। नवीकरणीय ऊर्जा के बढ़ते उपयोग के बावजूद, वैश्विक ऊर्जा जरूरतों का लगभग 15% हिस्सा अभी भी इसी इलाके से आता है।
सिर्फ तेल ही नहीं, यह इलाका वैश्विक पूंजी का भी बड़ा स्रोत है। खाड़ी देशों के सरकारी निवेश फंड दुनिया भर की टेक कंपनियों, रियल एस्टेट, स्पोर्ट्स क्लब और बैंकों में पैसा लगा रहे हैं। अगर यहां अस्थिरता बढ़ी तो इन निवेशों पर भी संकट के बादल छा सकते हैं।
हॉर्मुज और स्वेज: दुनिया की लाइफलाइन दांव पर
सबसे अहम बात यह है कि इस क्षेत्र से दुनिया के कुछ सबसे व्यस्त व्यापारिक रास्ते गुजरते हैं। हॉर्मुज की खाड़ी से दुनिया के करीब 20% तेल टैंकर गुजरते हैं। वहीं लाल सागर और स्वेज नहर एशिया और यूरोप के बीच व्यापार की लाइफलाइन है।
अगर यहां तनाव बढ़ा और तेल के कुएं, रिफाइनरी या समुद्री रास्ते निशाने पर आ गए, तो तस्वीर तेजी से बदल सकती है। फिलहाल बाजार और केंद्रीय बैंक मिडिल ईस्ट के संघर्ष को निगरानी लायक खतरा मान रहे हैं, न कि तुरंत आर्थिक आपदा। लेकिन अगर ऐसा हुआ, तो असर सिर्फ स्थानीय नहीं, बल्कि वैश्विक होगा।
भारत पर क्या होगा असर?
भारत अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इससे न सिर्फ पेट्रोल-डीजल महंगा होता है, बल्कि महंगाई भी बढ़ती है। ट्रांसपोर्टेशन महंगा होने से हर चीज की कीमत बढ़ जाती है- सब्जी से लेकर कपड़े तक।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर कच्चा तेल 108 डॉलर प्रति बैरल पहुंचता है, तो भारत में पेट्रोल की कीमत 100 रुपये के पार जा सकती है और डीजल भी 90 रुपये के ऊपर पहुंच सकता है। इससे महंगाई दर में 1-2% की बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे आम आदमी का बजट पूरी तरह बिगड़ जाएगा।
‘जानें पूरा मामला’
दरअसल, मिडिल ईस्ट में पिछले कुछ समय से भू-राजनीतिक तनाव लगातार बढ़ रहा है। ईरान और इजराइल के बीच बढ़ती दुश्मनी, यमन में हूती विद्रोहियों के हमले और अमेरिका-ईरान के बीच तनाव ने पूरे क्षेत्र को संकट में डाल दिया है। इसी के चलते तेल की सप्लाई चेन पर खतरा मंडरा रहा है। 1970 के दशक में भी जब अरब देशों ने तेल पर प्रतिबंध लगाया था, तो दुनिया भर में महंगाई आसमान छू गई थी और आर्थिक मंदी आ गई थी। इतिहास खुद को दोहरा सकता है, यही सबसे बड़ा डर है।
मुख्य बातें (Key Points)
मिडिल ईस्ट के तनाव से कच्चा तेल 60 डॉलर से उछलकर 108 डॉलर प्रति बैरल हो सकता है।
भारत में पेट्रोल-डीजल 80 रुपये प्रति लीटर तक महंगा होने का अनुमान।
मिडिल ईस्ट दुनिया के एक तिहाई तेल उत्पादन और 20% गैस उत्पादन का केंद्र है।
हॉर्मुज की खाड़ी से दुनिया का 20% तेल गुजरता है, यहां तनाव बढ़ा तो सप्लाई प्रभावित होगी।
महंगाई बढ़ने से ब्याज दरें बढ़ सकती हैं और आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ सकती है।








