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The News Air - Breaking News - Pashupati Seal शिव की नहीं बल्कि Elamite God की है? जानें पूरा सच

Pashupati Seal शिव की नहीं बल्कि Elamite God की है? जानें पूरा सच

सिंधु घाटी सभ्यता की प्रसिद्ध पशुपति मोहर को लेकर फिर छिड़ा विवाद, अमेरिकी इतिहासकार ने कहा यह शिव नहीं बल्कि एलामाइट देवता है, जानें क्या है असली सच्चाई।

Ajay Kumar by Ajay Kumar
शनिवार, 30 मई 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, धर्म
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Pashupati Seal
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Pashupati Seal Controversy: इतिहास के पन्नों में दर्ज सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे प्रसिद्ध पशुपति मोहर (Pashupati Seal) को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। मई 2025 में जब भारत के संस्कृति मंत्रालय ने इस मोहर की तस्वीर शेयर करते हुए इसे भारतीय सभ्यता और संस्कृति की निरंतरता का प्रमाण बताया, तो अमेरिकी इतिहासकार ऑड्रे ट्रस्की (Audrey Truschke) ने तुरंत इसका विरोध कर दिया। उनका दावा है कि यह मोहर शिव की नहीं बल्कि एलामाइट देवता (Elamite God) की है जो यूरेशियन परंपरा से जुड़ी है।

देखा जाए तो यह विवाद पहली बार नहीं उठा है। बचपन से हम सभी ने अपनी इतिहास की किताबों में पढ़ा है कि यह मोहर आदि शिव या पशुपति की है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि पिछले कई दशकों से अनेक विद्वान इस व्याख्या पर सवाल उठाते रहे हैं। अब सवाल यह उठता है कि आखिर सच्चाई क्या है? क्या यह सचमुच शिव की मोहर है या कोई और देवता? आइए इस पूरे विवाद को गहराई से समझते हैं।

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क्या है पशुपति मोहर? कब और कहां मिली थी?

यह मोहर 1928-29 के दौरान मोहनजोदड़ो की खुदाई से मिली थी। प्रसिद्ध पुरातत्वविद् सर जॉन मार्शल (Sir John Marshall) ने 1931 में अपनी पुस्तक “Mohenjo-daro and the Indus Valley Civilization” में पहली बार इसे ‘Proto-Shiva’ यानी आदि शिव का रूप बताया था।

यह मोहर लगभग 3 सेंटीमीटर के आकार की है और इसका समय काल 2350 से 2000 ईसा पूर्व माना जाता है – यानी सिंधु घाटी सभ्यता का चरम काल। वर्तमान में यह मोहर नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में सुरक्षित रखी हुई है। समझने वाली बात यह है कि यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर की सूची में भी शामिल किया हुआ है।

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मोहर पर बना है क्या? जानें पूरा विवरण

अगर गौर करें तो इस मोहर पर कई महत्वपूर्ण प्रतीक उकेरे गए हैं:

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बीच में: एक योग मुद्रा में बैठी मानव आकृति है जो सींगदार मुकुट पहने हुए है। कुछ विद्वानों का मानना है कि यह त्रिमुखी (तीन मुख वाली) आकृति है।

दाईं ओर: भैंसा और गैंडा बने हुए हैं।

बाईं ओर: हाथी और बाघ की आकृतियां हैं।

नीचे: दो हिरण बैठे हुए हैं।

ऊपर: सिंधु लिपि के सात अक्षर उकेरे गए हैं जो अभी तक पढ़े नहीं जा सके।

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सर जॉन मार्शल ने क्यों कहा था इसे शिव?

जॉन मार्शल ने तीन मुख्य आधारों पर इसे शिव माना था:

पहला, मोहर पर बैठी आकृति मूलबंधासन में दिखाई दे रही है जो भारतीय योग परंपरा की प्राचीनतम मुद्रा है। यह कोई आकस्मिक मुद्रा नहीं बल्कि एक साधना और योग से जुड़ी मुद्रा है।

दूसरा, यह आकृति चारों ओर से विभिन्न पशुओं से घिरी हुई है। ऋग्वेद में शिव को रुद्र और पशुपति (पशुओं का स्वामी) कहा गया है। यह मोहर उसी अवधारणा को दर्शाती है।

तीसरा, आकृति पर सींगयुक्त मुकुट है जो देवत्व और आदिम शक्ति का प्रतीक है। शिव को त्र्यंबक (तीन नेत्रों वाला) भी कहा जाता है और मार्शल ने इस आकृति को त्रिमुखी माना। साथ ही सिर पर बना चिह्न गंगाधर शिव की तरह दिखता है।

लेकिन हर किसी ने इसे माना नहीं: पहले भी हुआ है विरोध

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि ऑड्रे ट्रस्की पहली विद्वान नहीं हैं जिन्होंने इस व्याख्या का विरोध किया हो। पिछले कई दशकों से अनेक इतिहासकारों और पुरातत्वविदों ने सर जॉन मार्शल की इस व्याख्या पर सवाल उठाए हैं।

डोरिस श्रीनिवासन (Doris Srinivasan) ने कहा कि:
• यह त्रिमुखी होने का कोई पुख्ता प्रमाण नहीं है
• यह योग मुद्रा नहीं बल्कि बैठने का एक सामान्य तरीका हो सकता है
• इसे सीधे शिव से जोड़ना जल्दबाजी है क्योंकि हड़प्पा और शिव के बीच कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं मिलता
• सिंधु सभ्यता में शिवलिंग की पूजा के प्रमाण नहीं मिलते जबकि शिव आमतौर पर लिंग रूप में पूजे जाते हैं

हार्वर्ड सुमन का तर्क था कि:
• यह किसी पुरुष की आकृति है यह भी पक्का नहीं – यह महिला देवता भी हो सकती है
• सिंधु सभ्यता में मातृ देवी की पूजा प्रचलित थी जबकि शिव की कोई केंद्रीय भूमिका नहीं दिखती

माइकल विट्जेल (Michael Witzel) ने कहा:
• पूरी दुनिया की प्राचीन सभ्यताओं में “पशुओं के देवता” (Lord of Animals) की अवधारणा मिलती है – मेसोपोटामिया, मिस्र, ग्रीस, ईरान सभी जगह
• यह केवल भारत की अद्वितीय परंपरा नहीं है
• इसे शिव से जोड़ना “भारतीयकरण” (Indianization) की प्रवृत्ति है

एस्को पारपोला (Asko Parpola), जो फिनलैंड के सिंधु लिपि विशेषज्ञ हैं, ने इसे द्रविड़ परंपरा से जोड़ा और कहा कि यह दक्षिण भारतीय देवता मुरुगन हो सकते हैं।

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अब आया है एलामाइट सिद्धांत: क्या है यह?

ऑड्रे ट्रस्की का तर्क है कि यह मोहर यूरेशियन धार्मिक परंपरा का हिस्सा है। उनके अनुसार:

एलाम सभ्यता जो ईरान के दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्र में 3200 से 2700 ईसा पूर्व (प्राक् हड़प्पा काल) में फली-फूली थी, वहां से ऐसी ही मोहरें मिली हैं जिन पर:
• मानव-पशु मिश्रित आकृतियां हैं
• पशुओं के देवता (God of Animals) दिखाए गए हैं
• चारों ओर विभिन्न जानवर बने हैं

ट्रस्की का दावा है कि सूसा (Susa) और अशान जैसे केंद्रों से मिली एलामाइट मोहरों पर भी ऐसे ही प्रतीक हैं। गिलगमेश जैसे प्राचीन महाकाव्यों में भी ऐसे देवताओं का उल्लेख मिलता है।

एलामाइट सिद्धांत की आलोचना: भारतीय विद्वानों ने क्या कहा?

लेकिन इस सिद्धांत में एक बड़ी कमजोरी है जिसे भारतीय विद्वानों ने तुरंत पकड़ लिया। अमीश त्रिपाठी और अन्य विद्वानों का तर्क है:

हाथी, गैंडा और भैंसा जैसे जानवर एलाम क्षेत्र (दक्षिण-पश्चिमी ईरान) में कभी नहीं पाए गए। यह जीव केवल और केवल भारतीय उपमहाद्वीप के विशिष्ट पशु हैं।

जब सिकंदर और सेल्यूकस जैसे विदेशी आक्रमणकारी भारत आए तो उन्होंने पहली बार हाथी देखे थे। उससे पहले की किसी भी पश्चिमी या मध्य एशियाई परंपरा में हाथियों का कोई उल्लेख नहीं मिलता।

इसलिए यह मोहर पूरी तरह से भारतीय मूल की है और इसे विदेशी प्रभाव से जोड़ना गलत है।

असली समस्या क्या है? क्यों नहीं सुलझ पाया यह विवाद?

दरअसल, इस विवाद के पीछे एक बुनियादी समस्या है – सिंधु लिपि को अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है।

सिंधु सभ्यता में लगभग 400 से 600 तक चिह्न (प्रतीक) मिले हैं लेकिन ये अभी तक पठनीय नहीं हैं। रोसेटा स्टोन जैसा कोई द्विभाषी शिलालेख भी नहीं मिला जिससे इस लिपि को समझा जा सके।

इसलिए:
• देवता का असली नाम किसी को पता नहीं
• पूजा पद्धति के बारे में कोई धार्मिक ग्रंथ नहीं मिला
• मोहर पर लिखे सात अक्षरों का अर्थ अज्ञात है

ऐसे में पुरातात्विक स्रोतों की अपनी-अपनी व्याख्या होती है और हर इतिहासकार अपने दृष्टिकोण से इसे देखता है।

भारतीय संस्कृति मंत्रालय का पक्ष: निरंतरता का प्रमाण

भारत का संस्कृति मंत्रालय मानता है कि यह मोहर भारतीय सभ्यता की सांस्कृतिक निरंतरता को दर्शाती है:

• हड़प्पा काल (2350-2000 ईसा पूर्व) में योग मुद्रा और पशुपति की अवधारणा
• वैदिक काल में रुद्र-पशुपति की पूजा
• आधुनिक युग में शिव की पूजा

यह परंपरा लगातार चली आ रही है और यह भारतीय संस्कृति के गहरे जड़ों का सबूत है।

निष्कर्ष: सच क्या है?

अगर गौर करें तो दोनों ही अतिवादी निष्कर्षों से बचना चाहिए:

पहला, यह 100% निश्चित रूप से शिव है – यह कहना जल्दबाजी होगी क्योंकि सिंधु लिपि पढ़ी नहीं जा सकी।

दूसरा, यह एलामाइट देवता है – यह भी गलत है क्योंकि मोहर पर दिखाए गए जानवर केवल भारत में पाए जाते थे।

सबसे संतुलित दृष्टिकोण यह है कि यह मोहर भारतीय धार्मिक परंपरा का हिस्सा है जो आगे चलकर शिव पूजा में विकसित हुई। लेकिन सिंधु लिपि के बिना 100% निश्चितता से कुछ नहीं कहा जा सकता।

जब तक सिंधु लिपि नहीं पढ़ी जाती, यह बहस जारी रहेगी।

क्या है पूरा मामला?

सिंधु घाटी सभ्यता हमारी सबसे प्राचीन शहरी सभ्यताओं में से एक है। 1920 के दशक में जब इसकी खोज हुई तो हजारों मोहरें, मूर्तियां और अन्य पुरावशेष मिले। इनमें से अधिकांश की व्याख्या आज भी विवादित है।

पशुपति मोहर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारतीय धर्म और योग परंपरा की प्राचीनता को स्थापित करती है। अगर यह शिव है तो यह साबित होता है कि शैव परंपरा 4000 साल से भी पुरानी है।

लेकिन विदेशी विद्वान इसे भारत से बाहर की परंपरा से जोड़कर भारतीय सभ्यता की मौलिकता पर सवाल उठाना चाहते हैं। यही इस विवाद का असली मुद्दा है।


मुख्य बातें (Key Points)

• सिंधु घाटी की पशुपति मोहर 1928-29 में मोहनजोदड़ो से मिली थी

• सर जॉन मार्शल ने 1931 में इसे Proto-Shiva (आदि शिव) बताया था

• अमेरिकी इतिहासकार ऑड्रे ट्रस्की ने इसे एलामाइट देवता कहा है

• पहले भी डोरिस श्रीनिवासन, माइकल विट्जेल, एस्को पारपोला ने इसका विरोध किया था

• मोहर पर हाथी, गैंडा, भैंसा हैं जो केवल भारत में पाए जाते थे, एलाम में नहीं

• सिंधु लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी इसलिए 100% निश्चितता नहीं है

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: पशुपति मोहर कहां और कब मिली थी?

उत्तर: पशुपति मोहर 1928-29 में पाकिस्तान के सिंध प्रांत में स्थित मोहनजोदड़ो की खुदाई से मिली थी। इसकी खोज के बाद सर जॉन मार्शल ने 1931 में इसे Proto-Shiva (आदि शिव) की संज्ञा दी थी। वर्तमान में यह नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में सुरक्षित है।

प्रश्न 2: एलामाइट सिद्धांत क्या है और यह क्यों गलत माना जा रहा है?

उत्तर: अमेरिकी इतिहासकार ऑड्रे ट्रस्की का दावा है कि यह मोहर ईरान की एलाम सभ्यता के God of Animals की है। लेकिन यह सिद्धांत इसलिए गलत माना जा रहा है क्योंकि मोहर पर दिखाए गए हाथी, गैंडा और भैंसा जैसे जानवर कभी एलाम क्षेत्र (दक्षिण-पश्चिमी ईरान) में नहीं पाए गए। ये केवल भारतीय उपमहाद्वीप के विशिष्ट पशु हैं।

प्रश्न 3: क्या सिंधु सभ्यता में शिव की पूजा होती थी?

उत्तर: यह विवादित प्रश्न है। सर जॉन मार्शल और कई भारतीय विद्वानों का मानना है कि पशुपति मोहर शिव (रुद्र-पशुपति) की प्राचीन अवधारणा को दर्शाती है। लेकिन सिंधु लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है इसलिए 100% निश्चितता से कुछ नहीं कहा जा सकता। हां, भारतीय परंपरा और पुरातात्विक साक्ष्य इस ओर संकेत जरूर करते हैं कि यह भारतीय धार्मिक परंपरा का हिस्सा है जो बाद में शैव परंपरा के रूप में विकसित हुई।

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पत्रकारिता में एक दशक से अधिक का ठोस अनुभव रखने वाले अजय कुमार 'शोर से ज़्यादा सार' की पत्रकारिता पर दृढ़ विश्वास करते हैं। वर्तमान में वे The News Air में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं, जहां वे समाचारों की रणनीति, लेखन, तथ्य-सत्यापन (Fact-Checking) और सटीक प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं।पत्रकारिता का सफर और अनुभव - अजय कुमार का करियर ग्राउंड ज़ीरो की रिपोर्टिंग से लेकर न्यूज़ डेस्क के कुशल प्रबंधन तक विस्तृत है। The News Air में पिछले 3 वर्षों से नेतृत्व करने से पहले, उन्होंने 'दैनिक जागरण' और 'सिटी न्यूज़' जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। पत्रकारिता में उनकी मजबूत शैक्षणिक पृष्ठभूमि ने उनके काम करने के तरीके को बेहद व्यावहारिक और तथ्य-आधारित बनाया है।विशेषज्ञता और कार्यक्षेत्र (Expertise & Beats) - वे जटिल राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को सरल भाषा, स्पष्ट तथ्यों और निष्पक्ष तरीके से पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं। उनकी पत्रकारिता की मुख्य विशेषज्ञता इन क्षेत्रों में है:राजनीतिक कवरेज: लोकसभा चुनावों और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की ग्राउंड और डेस्क रिपोर्टिंग।कानूनी और संसदीय खबरें: संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों की नियमित और रियल-टाइम कवरेज।खोजी पत्रकारिता: ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ रिपोर्टिंग के जरिए अंदरूनी खबरों की पड़ताल।विश्वसनीयता और डिजिटल योगदान (Trust & Authority) - सटीक और प्रामाणिक ख़बरों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें पाठकों के बीच एक विश्वसनीय पत्रकार बनाती है। डिजिटल न्यूज़ इकोसिस्टम को बेहतर बनाने और फेक न्यूज़ से लड़ने की दिशा में, अजय कुमार गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

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