Parvinder Jhota Case एक बार फिर सुर्खियों में है। पंजाब के गुलजार सिंह और परविंदर सिंह झोटा के परिवारों को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने ‘X’ श्रेणी की सुरक्षा देने को मंजूरी दे दी है। सुरक्षा कर्मियों के आज ही दोनों परिवारों तक पहुंचने की उम्मीद जताई जा रही है। और यहीं से शुरू होती है एक ऐसी कहानी, जो सिर्फ सुरक्षा की खबर नहीं, बल्कि पूरे पंजाब की सियासत को हिला देने वाला मुद्दा बन चुकी है।
देखा जाए तो यह फैसला अचानक नहीं आया। इसके पीछे महीनों की चिंता, दो मौतें और लगातार बढ़ता जन-आक्रोश छिपा है। दिलचस्प बात यह है कि यह सुरक्षा उसी वक्त आई है, जब मानसा की सड़कों पर गुस्सा चरम पर है।
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कौन हैं गुलजार सिंह और परविंदर झोटा
जिक्र करना जरूरी है कि गुलजार सिंह ने पंजाब के मंत्री हरपाल चीमा से हुई एक मीटिंग में नशे के मुद्दे पर खुलकर चिंता जताई थी। बस एक दिन बाद ही उनकी मौत हो गई। सवाल यहीं से उठना शुरू हुआ।
वहीं नशा विरोधी कार्यकर्ता परविंदर झोटा की मानसा में दिन-दिहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। समझने वाली बात है कि दोनों ही नशे के खिलाफ आवाज उठा रहे थे, और दोनों की मौत कुछ ही समय के अंतराल में हुई। यही संयोग अब पूरे पंजाब में सवाल खड़े कर रहा है।
अमित शाह ने दिया इंसाफ का भरोसा
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पीड़ित परिवारों को इंसाफ दिलाने का भरोसा दिया है। अगर गौर करें तो गृह मंत्रालय ने हाल ही में पंजाब के मुख्य सचिव से गुलजार सिंह, झोटा और गुरदासपुर के बिक्रमजीत सिंह की मौत से जुड़े हालात की पूरी रिपोर्ट मांगी थी।
अमित शाह ने अपने पंजाब दौरे के दौरान इन परिवारों से सीधे मुलाकात भी की। इससे साफ होता है कि केंद्र सरकार इस मामले को हल्के में नहीं ले रही।
मानसा में अब भी तनाव, पोस्टमार्टम पर गतिरोध
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि झोटा की मौत के 14 दिन बाद भी पोस्टमार्टम नहीं हो पाया है। इसी बीच एक और मौत ने हालात और बिगाड़ दिए। दलजीत नाम के एक व्यक्ति की मौत हो गई, और परिवार ने इसे नशे के ओवरडोज़ से जोड़ते हुए शव को झोटा के इंसाफ वाले धरने तक पहुंचा दिया।
चिंता का विषय यह है कि पुलिस शव को अपने कब्जे में लेकर चली गई, जिसके बाद पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच सीधी झड़प हो गई। फिलहाल दलजीत का शव बठिंडा एम्स में रखा हुआ है। परिवार का आरोप है कि पुलिस उन पर जबरन पोस्टमार्टम कराने का दबाव बना रही है।
वहीं झोटा के पिता भीम सिंह ने इंसाफ कमेटी के धरने में ज्यादा से ज्यादा लोगों से शामिल होने की अपील की है। समझने वाली बात है कि यह अब सिर्फ एक परिवार का दर्द नहीं रहा, बल्कि पूरे इलाके का आंदोलन बन चुका है।
टाइमलाइन: कब क्या हुआ
| तारीख/घटनाक्रम | विवरण |
|---|---|
| मीटिंग के अगले दिन | हरपाल चीमा से मुलाकात के बाद गुलजार सिंह की मौत |
| उसी दौर में | मानसा में परविंदर झोटा की गोली मारकर हत्या |
| 14 दिन बाद भी | झोटा का पोस्टमार्टम अब तक नहीं हुआ |
| हाल ही में | दलजीत की संदिग्ध मौत, शव धरने पर लाया गया |
| इसके बाद | पुलिस-प्रदर्शनकारी झड़प, शव बठिंडा एम्स में |
| अब | गृह मंत्रालय से X श्रेणी सुरक्षा को मंजूरी |
2027 विधानसभा चुनाव पर क्या होगा असर
अब सवाल उठता है कि क्या यह मुद्दा 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव को प्रभावित करेगा? विशेषज्ञों की मानें तो मालवा बेल्ट, जहां 67 विधानसभा सीटें आती हैं, नशे की समस्या से सबसे ज्यादा प्रभावित इलाका है। मानसा, बठिंडा, बरनाला और संगरूर जैसी सीटें इसी बेल्ट में आती हैं।
दिलचस्प बात यह है कि 2015-16 के बरगाड़ी-बहबल कलां कांड की तरह ही इस बार भी विपक्षी दल इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने में जुटे हैं। अकाली दल, कांग्रेस और भाजपा तीनों ही इस मंच पर पहुंच चुके हैं। वहीं भगवंत मान सरकार अब आक्रामक नहीं, बल्कि बचाव की मुद्रा में नजर आ रही है।
यह दर्शाता है कि नशे का मुद्दा अब सिर्फ सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि सियासी हथियार बन चुका है। किसान संगठन, जैसे बीकेयू उगराहां, भी इस आंदोलन में शामिल हो चुके हैं, जो मालवा बेल्ट में मजबूत पकड़ रखते हैं।
आम आदमी पर क्या असर पड़ेगा
राहत की बात यह है कि पीड़ित परिवारों को सुरक्षा मिलने से कुछ हद तक भरोसा बहाल हुआ है। लेकिन दूसरी ओर, जिस तरह से पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव बढ़ रहा है, उससे आम लोगों में डर और अविश्वास दोनों बढ़ सकते हैं। खासकर मालवा इलाके के परिवार, जिन्होंने पहले ही नशे के कारण अपने बच्चे खो दिए हैं, वे अब न्याय व्यवस्था पर भी सवाल उठाने लगे हैं।
विशेषज्ञ विश्लेषण
अगर गौर करें तो यह मामला सिर्फ दो मौतों का नहीं है, बल्कि पंजाब में दशकों से पनप रही नशा-व्यवस्था और पुलिस-माफिया गठजोड़ की कहानी है। जब तक प्रशासनिक जवाबदेही तय नहीं होती और पोस्टमार्टम जैसी बुनियादी प्रक्रिया में भी देरी होती रहेगी, तब तक जनता का गुस्सा शांत होना मुश्किल है। X श्रेणी सुरक्षा देना एक सांकेतिक कदम जरूर है, लेकिन असली चुनौती है नशा तस्करी के नेटवर्क को तोड़ना, जिसमें कथित तौर पर पुलिस के बड़े अधिकारी भी शामिल बताए जा रहे हैं। यही वजह है कि यह मुद्दा अब 2027 चुनाव से पहले पंजाब की राजनीति का केंद्र बिंदु बनता जा रहा है।
‘जानें पूरा मामला’
पंजाब में नशे के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले कार्यकर्ताओं और उनके परिवारों पर खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। गुलजार सिंह और परविंदर झोटा दोनों ही इसी लड़ाई का हिस्सा थे, और दोनों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत के बाद सरकार पर दबाव बढ़ता गया। गृह मंत्रालय का हस्तक्षेप और अमित शाह का सीधा दौरा इस बात का संकेत है कि मामला राज्य से निकलकर राष्ट्रीय स्तर की राजनीति तक पहुंच चुका है।
मुख्य बातें (Key Points)
- गुलजार सिंह और परविंदर झोटा के परिवारों को गृह मंत्रालय ने X श्रेणी सुरक्षा दी
- झोटा का 14 दिन बाद भी पोस्टमार्टम नहीं हुआ, दलजीत की मौत से बढ़ा तनाव
- अमित शाह ने पंजाब दौरे पर परिवारों से मिलकर इंसाफ का भरोसा दिया
- मालवा बेल्ट की 67 सीटों पर नशे का मुद्दा 2027 चुनाव में बड़ा असर डाल सकता है













