Punjab Elections 2027 Moga Rally: पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 में अब एक साल से भी कम का वक्त बचा है और एक बार फिर सभी राजनीतिक दलों की नजरें पंजाब के दिल — मोगा जिले पर टिक गई हैं। 16 फरवरी को सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (AAP) मोगा के किल्ली चहलां में ‘युद्ध नशेयां विरुद्ध’ अभियान के तहत एक विशाल नशा विरोधी रैली का आयोजन करने जा रही है, जिसे AAP के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल संबोधित करेंगे। इसके ठीक बाद मार्च की शुरुआत में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह भी मोगा में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की रैली के जरिए पंजाब में चुनावी बिगुल बजाएंगे।
यह कोई संयोग नहीं है कि दोनों पार्टियों ने अपनी चुनावी शुरुआत के लिए मोगा को ही चुना। दशकों से पंजाब की राजनीति में मोगा एक ऐसा जिला रहा है जहां से चुनावी अभियान शुरू करने वाली पार्टियां अक्सर सत्ता तक पहुंची हैं। शिरोमणि अकाली दल (SAD) से लेकर कांग्रेस तक — सबके लिए मोगा एक ‘लकी चार्म’ बना हुआ है।
मोगा क्यों है पंजाब की राजनीति का केंद्र?
मोगा की खासियत इसकी भौगोलिक स्थिति में छिपी है। यह पंजाब के मालवा क्षेत्र में बिल्कुल बीचोबीच स्थित है। पंजाब के तीनों प्रमुख क्षेत्रों — माझा, मालवा और दोआबा — से पार्टी कार्यकर्ता लगभग बराबर सफर तय करके मोगा पहुंच सकते हैं। यही कारण है कि जब भी कोई पार्टी बड़ी रैली या अभियान शुरू करती है, तो मोगा उसकी पहली पसंद बनता है।
इसके अलावा मोगा किसान आंदोलनों और किसान यूनियनों की गतिविधियों का गढ़ रहा है। पंजाब में सबसे बड़ी किसान आबादी वाले जिलों में से एक होने के कारण यहां से चुनावी अभियान शुरू करना किसानों को सीधा संदेश देने जैसा माना जाता है।
किल्ली चहलां — पंजाब की राजनीतिक रैलियों का मक्का
मोगा में किल्ली चहलां गांव का नाम पंजाब की राजनीति में किसी परिचय का मोहताज नहीं है। दशकों से यह जगह हर पार्टी की बड़ी रैलियों का केंद्र रही है। यहां जिस जमीन पर रैलियां होती हैं, वह निजी स्वामित्व वाली है और जब भी कोई रैली आयोजित होती है तो इसे किराए पर लिया जाता है। खेतों को साफ करके रैली के लिए तैयार किया जाता है।
इस जगह की एक और खासियत है — यहां गाड़ियों की पार्किंग के लिए भरपूर जगह मिलती है। रैली स्थल के ठीक सामने एक गुरुद्वारा स्थित है, जहां राजनीतिक नेता रैली से पहले अरदास (प्रार्थना) करते हैं। अकाली दल के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि यह परंपरा दशकों पुरानी है।
अकाली दल का ‘लकी चार्म’ — मोगा से शुरू हुई हर जीत
100 साल से भी पुरानी पार्टी शिरोमणि अकाली दल के लिए मोगा का विशेष महत्व है। 1996 में अकाली दल का 75वां वार्षिक सम्मेलन, जिसे ‘मोगा कन्वेंशन’ के नाम से जाना जाता है, पार्टी के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। इस सम्मेलन में अकाली दल ने अपना दायरा बढ़ाते हुए खुद को सिर्फ सिखों और ‘पंथ’ की पार्टी से बदलकर पंजाब के सभी समुदायों की पार्टी के रूप में पेश किया।
कट्टरवाद से उदारवाद की ओर बढ़ते हुए पार्टी ने खालिस्तान उग्रवाद के वर्षों के बाद हिंदू और अन्य समुदायों को आकर्षित करने के लिए खुद को नया रूप दिया। इस सम्मेलन से जो नारा निकला वह था — “पंजाब, पंजाबी और पंजाबीयत”। इसका नतीजा यह हुआ कि 1997 में अकाली दल-भाजपा गठबंधन ने पंजाब में जबरदस्त जीत दर्ज की और दिवंगत प्रकाश सिंह बादल मुख्यमंत्री बने।
2006 और 2011 — मोगा से शुरू, सत्ता तक पहुंचे
मोगा का ‘लकी चार्म’ यहीं नहीं रुका। 2006 में अकाली दल ने 2007 के चुनावों के लिए मोगा से ही अपना चुनावी अभियान शुरू किया और सत्ता में आए। 2011 में भी यही दोहराया गया — 18 दिसंबर 2011 को किल्ली चहलां में ‘महा विकास’ रैली का आयोजन किया गया और अकाली दल-भाजपा ने लगातार दूसरी बार सत्ता हासिल की। यह पंजाब के इतिहास में अभूतपूर्व था।
2015-2017 — जब मोगा का जादू नहीं चला
हालांकि, मोगा का लकी चार्म 2017 में काम नहीं आया। बेअदबी कांड और नशे के मुद्दे पर बादल परिवार के खिलाफ भारी जनाक्रोश था। इसे शांत करने के लिए अकाली दल ने 28 नवंबर 2015 को मोगा की दाना मंडी में ‘सद्भावना रैली’ का आयोजन किया, जिसका उद्देश्य राज्य में “सांप्रदायिक सौहार्द और शांति को बढ़ावा देना” बताया गया।
इसके बाद प्रकाश सिंह बादल के 89वें जन्मदिन पर 8 दिसंबर 2016 को किल्ली चहलां में ‘पानी बचाओ, पंजाब बचाओ’ रैली का आयोजन किया गया। यह SYL नहर के मुद्दे पर थी, जब हरियाणा के साथ पानी का विवाद चरम पर था। इस रैली में बादल को ‘पंजाब के पानी के रक्षक’ के रूप में पेश किया गया। मोगा को इसलिए चुना गया क्योंकि यहां सबसे बड़ी किसान आबादी है।
लेकिन 2017 में अकाली दल-भाजपा को कांग्रेस के सामने करारी हार का सामना करना पड़ा। हार इतनी बड़ी थी कि अकाली दल मुख्य विपक्ष भी नहीं बन सका — AAP को उससे ज्यादा सीटें मिलीं।
2021 — 100 साल का जश्न, फिर भी सिर्फ 3 सीटें
भाजपा से गठबंधन टूटने के बाद अपनी राजनीतिक किस्मत को फिर से चमकाने के लिए अकाली दल ने दिसंबर 2021 में एक बार फिर किल्ली चहलां का रुख किया। 14 दिसंबर 2021 को पार्टी के 100 साल पूरे होने पर एक विशाल रैली का आयोजन किया गया, जिसे पार्टी के सबसे बड़े नेता और पांच बार के मुख्यमंत्री दिवंगत प्रकाश सिंह बादल ने संबोधित किया।
लेकिन इस बार भी मोगा का जादू नहीं चला। 2022 के विधानसभा चुनाव में 117 सीटों वाली पंजाब विधानसभा में अकाली दल सिर्फ 3 सीटें ही जीत सका — यह उसका अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन था।
कांग्रेस और AAP के लिए भी मोगा क्यों खास?
मोगा सिर्फ अकाली दल का गढ़ नहीं है। कांग्रेस और AAP दोनों ने भी बार-बार मोगा को अपने चुनावी अभियानों का शुरुआती बिंदु बनाया है।
AAP — मोगा से किया था महिलाओं को 1,000 रुपये का वादा
AAP ने 2022 में भारी बहुमत से पंजाब में सत्ता हासिल की थी। इसकी नींव मोगा में रखी गई थी। 22 नवंबर 2021 को ‘मिशन पंजाब’ दौरे के दौरान केजरीवाल ने मोगा में अपनी “तीसरी गारंटी” का ऐलान किया था — सत्ता में आने पर महिलाओं को हर महीने 1,000 रुपये भत्ता। यह वादा AAP की 2022 की ऐतिहासिक जीत में महिला वोटरों को आकर्षित करने में अहम रहा, हालांकि यह वादा अभी तक पूरा नहीं हुआ है।
21 मार्च 2021 को AAP ने बाघापुराना (मोगा) में ‘किसान महा सम्मेलन’ का आयोजन करके 2022 के चुनावों का बिगुल बजाया था। इस रैली में केजरीवाल ने कहा था कि वह “पंजाब के किसानों को सलाम करने आए हैं जिन्होंने भाजपा नीत केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ सबसे पहले आवाज उठाई।”
कांग्रेस — राहुल गांधी की खेती बचाओ यात्रा से लेकर मिशन 13 तक
कांग्रेस ने भी मोगा को अपने अभियानों का प्रमुख केंद्र बनाया है। 2020 में जब पंजाब के किसानों ने तीन विवादित कृषि कानूनों के खिलाफ बड़ा आंदोलन शुरू किया, तो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने 4 अक्टूबर 2020 को तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ बधनी कलां में ‘खेती बचाओ यात्रा’ निकाली। उन्होंने किसानों से बातचीत की, ट्रैक्टर राइड की और रैली को संबोधित किया।
2019 के लोकसभा चुनावों से पहले कांग्रेस ने अपने संसदीय चुनाव अभियान की शुरुआत भी मोगा से की थी। राहुल गांधी ने किल्ली चहलां में ‘मिशन 13’ रैली को संबोधित किया था। पहले इस रैली का नाम पुलवामा शहीदों को श्रद्धांजलि के तौर पर ‘जय जवान, जय किसान’ रखा गया था, जिसे बाद में ‘मिशन 13’ कर दिया गया। कांग्रेस ने पंजाब की 13 में से 8 लोकसभा सीटें जीतीं।
2017 — ‘कैप्टन लिआओ, पंजाब बचाओ’ रैली
2017 के पंजाब चुनावों से पहले जब कांग्रेस के अंदर तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष प्रताप सिंह बाजवा के खिलाफ विद्रोह हो रहा था और कैप्टन अमरिंदर सिंह को अध्यक्ष बनाने की मांग जोर पकड़ रही थी, तब बाघापुराना (मोगा) में ‘कैप्टन लिआओ, पंजाब बचाओ’ रैली का आयोजन किया गया।
इस रैली में तत्कालीन विधानसभा में विपक्ष के नेता सुनील जाखड़ ने कहा था — “दीवार पर लिखा साफ है और कैप्टन अमरिंदर सिंह अगले मुख्यमंत्री होने वाले हैं। वह पंजाब के पानी के रक्षक हैं, अब उन्हें पूरे पंजाब का रक्षक बनना है।” 2017 में कांग्रेस सत्ता में आई और कैप्टन मुख्यमंत्री बने। आज कैप्टन अमरिंदर सिंह भाजपा के साथ हैं।
11 सितंबर 2016 को तब की नई पार्टी AAP ने भी बाघापुराना को ही चुना अपना ‘किसान मेनिफेस्टो’ जारी करने के लिए। केजरीवाल ने किसान रैली को संबोधित किया। इसके बाद कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अक्टूबर में अपनी ‘किसान यात्रा’ शुरू की।
2025 — एक बार फिर मोगा ही क्यों?
अब 2027 के चुनावों की तैयारी शुरू हो चुकी है और एक बार फिर सभी दलों की नजरें मोगा पर हैं। AAP की 16 फरवरी की ‘नशा विरोधी रैली’ और भाजपा की मार्च में अमित शाह की रैली — दोनों मोगा में ही होने जा रही हैं। भाजपा 2020 में अकाली दल से गठबंधन टूटने के बाद पंजाब में अपनी जमीन तलाश रही है और मोगा से अभियान शुरू करके किसानों और ग्रामीण पंजाब तक अपनी पहुंच बनाना चाहती है।
दिलचस्प बात यह है कि राहुल गांधी जनवरी 2022 में भी किल्ली चहलां से कांग्रेस का अभियान शुरू करने वाले थे, लेकिन कोविड-19 प्रतिबंधों और भारतीय चुनाव आयोग (ECI) द्वारा राजनीतिक जमावड़ों पर प्रतिबंध लगाने के कारण यह रैली रद्द हो गई।
विश्लेषण: मोगा — पंजाब की राजनीति का बैरोमीटर
मोगा की राजनीतिक यात्रा का इतिहास बताता है कि यह जिला सिर्फ एक रैली स्थल नहीं है — यह पंजाब की राजनीतिक हवा का बैरोमीटर है। यहां से जो पार्टी अपना अभियान शुरू करती है, उसे अक्सर सत्ता मिली है। लेकिन 2017 और 2022 में मोगा का ‘लकी चार्म’ अकाली दल के काम नहीं आया — जो यह बताता है कि आखिरकार जनता का गुस्सा किसी भी लकी चार्म से बड़ा होता है।
2027 के चुनाव में AAP को अपने अधूरे वादों (जैसे महिलाओं को 1,000 रुपये भत्ता) का जवाब देना होगा, भाजपा को किसानों का भरोसा जीतना होगा, और अकाली दल को अपनी प्रासंगिकता साबित करनी होगी। मोगा से जो संदेश निकलेगा, वह पूरे पंजाब की राजनीतिक दिशा तय करेगा। आम पंजाबी के लिए यह देखना दिलचस्प होगा कि इस बार मोगा का जादू किसके सिर चढ़कर बोलता है।
मुख्य बातें (Key Points)
- AAP 16 फरवरी को मोगा के किल्ली चहलां में ‘नशा विरोधी रैली’ करेगी, जिसे केजरीवाल संबोधित करेंगे
- BJP मार्च की शुरुआत में अमित शाह की रैली से पंजाब में चुनावी बिगुल बजाएगी — यह भी मोगा में होगी
- अकाली दल ने 1996 से लेकर 2021 तक बार-बार मोगा से अभियान शुरू किए — 1997, 2007 और 2012 में सत्ता हासिल की, लेकिन 2017 और 2022 में हार मिली
- मोगा की केंद्रीय भौगोलिक स्थिति, किसान गढ़ होना और किल्ली चहलां की रैली परंपरा इसे पंजाब की राजनीति का सबसे अहम जिला बनाती है
- कांग्रेस और AAP ने भी 2017, 2019, 2020 और 2022 के चुनावों से पहले मोगा से ही अभियान शुरू किए








