PM Modi Middle East Crisis Statement : नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में सोमवार, 2 मार्च 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के साथ संयुक्त बयान में पश्चिम एशिया की धधकती आग पर भारत का स्पष्ट रुख रखा। उन्होंने कहा कि मध्य पूर्व की मौजूदा स्थिति भारत के लिए “गहरी चिंता का विषय” है और भारत हमेशा से संवाद और कूटनीति के जरिए विवादों के समाधान का समर्थक रहा है।
जब अमेरिका और इजरायल की संयुक्त सैन्य कार्रवाई से ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो चुकी हो और पूरे मध्य पूर्व में तनाव चरम पर हो, तब भारत ने दुनिया को एक शांत लेकिन दृढ़ संदेश दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट किया कि भारत का रुख दुनिया की तमाम मौजूदा तनावपूर्ण स्थितियों में एकदम साफ है — शांति और स्थिरता बनाए रखना।
“हम हमेशा से शांति और स्थिरता बनाए रखने की अपील करते रहे हैं और जब दो लोकतंत्र एक साथ खड़े होते हैं, तो शांति की आवाज और भी मजबूत हो जाती है,” — PM मोदी।
‘भारत बात करेगा, लेकिन चुप नहीं रहेगा’
PM मोदी ने दो टूक कहा कि भारत हर संघर्ष का हल “बातचीत और कूटनीति” से निकालने के पक्ष में है। यह बयान ऐसे वक्त आया जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल की सेना ने ईरान की राजधानी तेहरान के कई ठिकानों पर हमला कर दिया था। इन हमलों में ईरानी शासन के शीर्ष नेताओं की मौत हुई और दशकों से चला आ रहा खामेनेई का शासन समाप्त हो गया।
मोदी ने यह भी कहा कि भारत क्षेत्र के देशों के साथ मिलकर काम करता रहेगा ताकि वहाँ रह रहे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। यह एक संवेदनशील मुद्दा है क्योंकि पश्चिम एशिया में लाखों भारतीय कामगार और प्रवासी रहते हैं।
कार्नी भारत में थे, जब छिड़ी जंग
कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी 27 फरवरी को मुंबई आए थे और 2 मार्च को नई दिल्ली में PM मोदी से मुलाकात हुई। इसी दौरे के बीच अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध जैसी स्थिति बन गई। कार्नी ने मुंबई में ही ईरान को “मध्य पूर्व में अस्थिरता का मुख्य स्रोत” बताते हुए अमेरिकी कार्रवाई का समर्थन किया, हालांकि उन्होंने सैन्य भागीदारी से इनकार किया।
दिल्ली में दोनों नेताओं ने एक बात पर एकमत दिखे — आतंकवाद और कट्टरपंथ “सिर्फ भारत और कनाडा के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए एक साझी और गंभीर चुनौती” हैं।
भारत की विदेश नीति — किसी का पिछलग्गू नहीं
जब कनाडा ने अमेरिकी कार्रवाई को समर्थन दिया और कई पश्चिमी देश ईरान के खिलाफ खड़े हो गए, तब भारत ने न तो एक तरफ झुकने की जल्दी की और न ही किसी के दबाव में आया। मोदी का यह बयान भारत की उस पारंपरिक कूटनीतिक नीति की याद दिलाता है जिसे “रणनीतिक स्वायत्तता” कहा जाता है — अपने हितों के आधार पर फैसला करना, न कि किसी के खेमे में जाकर।
यह रुख तब और अहम हो जाता है जब भारत के लाखों नागरिक खाड़ी देशों में काम करते हैं और कच्चे तेल की कीमतें इस संकट से सीधे प्रभावित हो सकती हैं।
आम भारतीय पर क्या असर पड़ेगा?
पश्चिम एशिया में भारत के करीब 90 लाख से ज्यादा प्रवासी हैं। युद्ध की यह आंच सीधे उन परिवारों तक पहुँचती है जो अपने कमाऊ बेटे या पति के संदेश का इंतजार कर रहे हैं। इसके अलावा ईरान-इजरायल संघर्ष की वजह से कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आ सकता है जिससे भारत में पेट्रोल-डीजल और घरेलू गैस महंगी हो सकती है।
‘जानें पूरा मामला’
अमेरिका और इजरायल ने संयुक्त सैन्य ऑपरेशन में ईरान के कई ठिकानों पर हमला किया जिसमें तेहरान के केंद्र में स्थित सुप्रीम लीडर के दफ्तर के पास भी हमला हुआ। इन हमलों में अयातुल्ला खामेनेई सहित ईरानी शासन के कई शीर्ष नेता मारे गए। ईरान ने जवाब में मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले किए। बहरीन, दुबई और दोहा तक तनाव फैल गया और खाड़ी देशों ने अपनी सुरक्षा की घोषणा की।
मुख्य बातें (Key Points)
- PM मोदी ने पश्चिम एशिया संकट को “गहरी चिंता का विषय” बताया और संवाद व कूटनीति का समर्थन किया।
- कनाडाई PM कार्नी की भारत यात्रा के दौरान दोनों नेताओं की दिल्ली में मुलाकात हुई।
- भारत ने पश्चिम एशिया में अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए क्षेत्रीय देशों से संपर्क जारी रखने की बात कही।
- दोनों नेता आतंकवाद और कट्टरपंथ को पूरी मानवता के लिए खतरा मानते हैं।








