PM Modi Israel Knesset Speech — प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसराइल की संसद नेसेट (Knesset) में ऐतिहासिक भाषण दिया, जिसमें उन्होंने 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले की कड़ी निंदा की और कहा कि “भारत इसराइल के साथ खड़ा है।” लेकिन यह भाषण जिन बातों के लिए याद किया जाएगा, वे वो बातें हैं जो प्रधानमंत्री ने कही नहीं — ग़ज़ा में दो साल तक चले नरसंहार पर पूर्ण चुप्पी, अपनी ही सरकार के ऑपरेशन सिंदूर, ऑपरेशन बालाकोट और सर्जिकल स्ट्राइक का एक बार भी जिक्र न करना, और फिलिस्तीन का नाम सिर्फ एक बार — वह भी शांति प्रस्ताव के संदर्भ में।
ग़ज़ा का नरसंहार — 75,000 मौतें और प्रधानमंत्री की चुप्पी
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले को “बर्बर आतंकी हमला” बताया और कहा कि “कोई भी कारण नागरिकों की हत्या को जायज नहीं ठहरा सकता” और “आतंकवाद को किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता।” उन्होंने कहा कि भारत इसराइल के दर्द को महसूस करता है और “इंडिया स्टैंड्स विद इसराइल।”
लेकिन जो बात पूरी दुनिया देख रही थी, वह यह कि ग़ज़ा पर दो साल तक लगातार बमबारी हुई। 75,000 से अधिक लोग मारे गए। लाखों विस्थापित हुए। अस्पताल तक ध्वस्त कर दिए गए। लोग भूख और बीमारी से तड़पकर मरे। और इन सबके बावजूद, उसी देश की संसद में खड़े होकर प्रधानमंत्री मोदी ने इसका जिक्र तक नहीं किया। उन्होंने एक शब्द भी संवेदना का उन हजारों मासूम बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों के लिए नहीं कहा जो इसराइल की बमबारी में मारे गए।
2018 में फिलिस्तीन ने दिया था सर्वोच्च सम्मान — मोदी ने उसकी भी अनदेखी की
यहां एक और तथ्य है जो गहराई से सोचने पर मजबूर करता है। 2018 में फिलिस्तीन ने प्रधानमंत्री मोदी को अपना सर्वोच्च नागरिक सम्मान “ग्रैंड कॉलर ऑफ द स्टेट ऑफ पैलेस्टाइन” दिया था। जिस देश ने भारत के प्रधानमंत्री को अपना सबसे बड़ा सम्मान दिया, उस देश के लोगों के साथ जो बर्बरता हुई, उसके बारे में प्रधानमंत्री ने एक शब्द नहीं कहा। ना तो उस सम्मान का जिक्र किया, ना ही उस देश के लोगों के दर्द की बात की।
दूसरी तरफ, जिस इसराइल के साथ इतना मजबूत पक्ष लिया, उसने अपना सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार — “द इसराइली प्रेसिडेंशियल मेडल ऑफ ऑनर” — प्रधानमंत्री मोदी को नहीं दिया। यह पुरस्कार 2012 से दिया जा रहा है और अब तक अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा, जो बाइडन, पूर्व विदेश सचिव हेनरी किसिंजर, जर्मनी की पूर्व चांसलर एंजेला मर्केल और साइपरस के राष्ट्रपति को यह सम्मान मिल चुका है।
“मेडल ऑफ नेसेट” — एक ऐसा पुरस्कार जिसका पहले अस्तित्व ही नहीं था
प्रधानमंत्री मोदी को इसराइल की संसद के स्पीकर ने “मेडल ऑफ नेसेट” पहनाया। सुनने में बहुत बड़ा लगता है, लेकिन सच्चाई यह है कि इस मेडल का इससे पहले कोई अस्तित्व ही नहीं था। यह पहली बार बनाया गया और सीधे प्रधानमंत्री मोदी को दे दिया गया। आगे किसी को मिलेगा या नहीं — यह कोई नहीं जानता।
यह पहली बार नहीं है जब किसी नेता के लिए खास तौर पर नया पुरस्कार गढ़ा गया हो। पिछले साल जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को नोबेल पुरस्कार नहीं मिला, तो प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने उन्हें एक पुरस्कार देने की घोषणा कर दी। इसराइल ने ट्रंप के लिए एक नई कैटेगरी बनाई — “स्पेशल कंट्रीब्यूशन टू द ज्यूस पीपल” — और उन्हें सम्मानित किया। फुटबॉल संस्था फीफा ने भी ट्रंप के लिए खास अवार्ड की स्थापना की।
अमेरिकी न्यूज वेबसाइट द न्यू रिपब्लिक ने तब हेडलाइन बनाई थी — “Trump Gets Another Award Made Just For Him” — यानी ट्रंप को वह पुरस्कार मिला जो उन्हीं के लिए बनाया गया।
प्रधानमंत्री मोदी के पुरस्कारों की अलग ही कहानी
प्रधानमंत्री मोदी के पुरस्कारों का इतिहास अपने आप में दिलचस्प है। जनवरी 2019 में उन्हें पहला “फिलिप कोटलर प्रेसिडेंशियल अवार्ड” मिला। फिलिप कोटलर खुद को “फादर ऑफ मॉडर्न मार्केटिंग” कहते हैं। इस पुरस्कार को लेकर काफी मजाक भी उड़ा था। उनके बाद यह पुरस्कार किसे मिला — इसकी जानकारी आज तक स्पष्ट नहीं हो पाई है।
फ्रांस, रूस और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश प्रधानमंत्री मोदी को अपना सर्वोच्च नागरिक सम्मान दे चुके हैं। तो सवाल यह उठता है कि इसराइल ने अपना स्थापित सर्वोच्च सम्मान न देकर एक बिल्कुल नया मेडल क्यों बनाया? क्या इसलिए ताकि चर्चा मेडल पर रहे और इस बात पर न रहे कि प्रधानमंत्री ने ग़ज़ा के नरसंहार पर चुप्पी साध ली?
ऑपरेशन सिंदूर, बालाकोट, सर्जिकल स्ट्राइक — सब भूल गए?
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में आतंकवाद की बात करते हुए 2008 के मुंबई हमले का जिक्र किया। लेकिन हैरानी की बात यह है कि उन्होंने अपनी ही सरकार के कार्यकाल में हुए तीन बड़े आतंकी हमलों और उनके जवाब में की गई सैन्य कार्रवाइयों का नाम तक नहीं लिया।
2016 में उरी में आतंकी हमले में 19 सैनिक शहीद हुए — उसके बाद सर्जिकल स्ट्राइक हुई। फरवरी 2019 में पुलवामा में CRPF के 40 जवान शहीद हुए — उसके बाद ऑपरेशन बालाकोट हुआ। अप्रैल 2025 में पहलगाम में आतंकी हमले में 26 लोग मारे गए — उसके बाद ऑपरेशन सिंदूर हुआ। यह वही ऑपरेशन सिंदूर है जिसके बाद प्रधानमंत्री मोदी पटना की सड़कों पर रोड शो करने उतर गए थे। पूरे देश में विजय का जश्न मनाया गया था। मोदी सरकार इन तीनों कार्रवाइयों को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बताती है। उरी पर फिल्म तक बनी। ऑपरेशन सिंदूर के प्रचार के लिए दुनिया भर में सांसदों को भेजा गया।
लेकिन इसराइल की संसद में — जहां पूरी दुनिया देख रही थी — प्रधानमंत्री ने इनमें से किसी का भी जिक्र नहीं किया और 18 साल पुराने मुंबई हमले की याद दिलाई।
क्या ट्रंप का खौफ इतना गहरा है?
सवाल उठता है कि प्रधानमंत्री ने ऑपरेशन सिंदूर का नाम क्यों नहीं लिया? क्या इसलिए कि राष्ट्रपति ट्रंप ने सीजफायर को लेकर अलग दावा किया है? क्या उनके मन में यह आशंका थी कि पहलगाम हमले और ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करने पर ट्रंप की तरफ से कोई अलग बयान आ सकता है? अगर वे सिर्फ 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक और 2019 के बालाकोट का भी जिक्र कर देते तो सबकी नजर आसानी से ऑपरेशन सिंदूर पर चली जाती। शायद इसीलिए तीनों को साथ में छोड़ दिया गया।
भाषण लिखने में बहुत बारीकी से हिसाब लगाया जाता है। हर शब्द तोला जाता है। और तब भी ये चूकें इतनी बड़ी हैं कि कोई भी सजग पाठक या दर्शक तुरंत पकड़ लेता है।
नेसेट में विपक्ष का बहिष्कार — लोकतंत्र का दोहरा मापदंड
इसराइल की संसद में एक और दृश्य था जिसे भारत के संदर्भ में देखना जरूरी है। जैसे ही स्पीकर और प्रधानमंत्री नेतन्याहू का भाषण होने वाला था, विपक्ष के सांसद सदन से बाहर चले गए। कुर्सियां खाली हो गईं। शर्मिंदगी से बचने के लिए पूर्व सांसदों को बुलाकर कुर्सियां भरी गईं। इसराइल के अखबार जेरूसलम पोस्ट ने लिखा कि वे पूर्व सांसद “मोदी-मोदी” के नारे लगाने लगे — तो “मोदी-मोदी” की एक सच्चाई यह भी है।
विपक्ष का बहिष्कार इसलिए था क्योंकि नेसेट के स्पीकर ने सुप्रीम कोर्ट के प्रेसिडेंट को इस कार्यक्रम में नहीं बुलाया था। बाद में विपक्षी सांसद वापस आए और प्रधानमंत्री मोदी से कहा कि “हमारा विरोध आपसे नहीं था।”
लेकिन अगर यही दृश्य भारत में दिखता – अगर भारत के विपक्ष ने किसी विदेशी मेहमान के सामने ऐसा किया होता — तो क्या होता? बीजेपी और कुछ मीडिया चैनल मिलकर देश में तूफान मचा देते कि “भारत की छवि खराब हो गई।” दिल्ली में AI समिट के दौरान जब यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने टीशर्ट उतारकर प्रदर्शन किया, तो “भारत की छवि खराब” का शोर मच गया। गिरफ्तारियां हुईं, टीशर्ट बरामद किए गए। लेकिन इसराइल के विपक्ष ने जो किया – एक विदेशी मेहमान के सामने अपने ही प्रधानमंत्री के भाषण का बहिष्कार – उस पर ना कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई, ना कोई बयान आया।
इसराइल का अखबार जो कह रहा है, वो मोदी नहीं कह पाए
इसराइल के प्रमुख अखबार हारेत्ज़ (Haaretz) के संपादकीय पन्ने पर दो लेख छपे हैं जो खुलकर नरसंहार की बात करते हैं और उसकी निंदा भी करते हैं।
पहले लेख में नेटा आतुब ने लिखा कि “इसराइल का नया पेशा अब नरसंहार करना है।” उन्होंने लिखा कि ग़ज़ा में मरने वालों में 47% महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग थे – जिन्होंने इसराइली सेना से कोई लड़ाई नहीं की। वे पूरी तरह निर्दोष थे। “इस सदी में इसराइल ने दुनिया में सबसे ज्यादा निर्दोषों की हत्या की है” – यह बात इसराइल के अपने अखबार में छपी है।
दूसरे लेख में उदय बिशारत ने लिखा कि इसराइल के नेता अब खुलकर ग़ज़ा के लोगों को भूखा मारने की बात करते हैं। क्रूर दिखना अब इसराइल में नया ट्रेंड बन गया है – हिंसक बयान देना और दूसरे के दर्द की परवाह न करना। इसका कारण है “पावर का नशा” — इसराइल के पास अपार पैसा है, वह अपने प्रतिद्वंदियों के बेडरूम में घुसकर उन्हें मार सकता है, पेजर में बम डाल सकता है, और उसे पता है कि उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी क्योंकि “बड़ा भाई अमेरिका” हिफाजत कर रहा है।
जो बात इसराइल का अपना अखबार अपने पन्नों पर छाप रहा है, उसका एक अंश भी प्रधानमंत्री मोदी इसराइल के सामने नहीं कह पाए। दोस्ती में ऐसा नहीं होता – सच्चा दोस्त वही होता है जो गलत बात पर भी सामने बोले।
हथियारों की बड़ी डील — क्या यही असली मकसद था?
इसराइल के अखबार हारेत्ज़ ने अपने पहले पन्ने पर जो लिखा वह और भी चौंकाने वाला है। अखबार ने लिखा कि “प्रधानमंत्री मोदी इसराइल से हथियारों की डील करने आए हैं।” भारत के मीडिया में रिपोर्ट हो रही है कि भारत इसराइल से अरबों डॉलर का रक्षा सौदा करने आया है, जिसमें ड्रोन और मिसाइलें शामिल हैं। इसराइल की हथियार बनाने वाली कंपनियां इस मामले में पूरी तरह चुप हैं।
क्या मेडल और सेल्फी का शोर इसलिए मचाया गया ताकि असली सवालों पर ध्यान न जाए? क्या इसलिए ताकि यह बात न उठे कि प्रधानमंत्री ने फिलिस्तीन के नरसंहार पर चुप्पी साधी?
गांधी और नेहरू का रुख — जिसे मोदी भूल गए
कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने पंडित जवाहरलाल नेहरू और अल्बर्ट आइंस्टीन के बीच हुए पत्र-व्यवहार की तस्वीरें ट्वीट कीं। 13 जून 1947 को आइंस्टीन ने इसराइल की स्थापना के विषय पर नेहरू को पत्र लिखा और पूछा कि “यहूदियों की जरूरतें चाहे जितनी जरूरी हों, क्या उन्हें बिना दूसरों के अधिकारों के हनन के पूरा किया जा सकता है?”
नेहरू ने जवाब में यूरोप में यहूदियों के नरसंहार और नाजियों के अपराधों की कड़ी निंदा की। लेकिन साथ ही साफ कहा कि अरबों और यहूदियों के बीच के टकराव को हिंसा से नहीं सुलझाया जा सकता — अगर ऐसा किया गया तो वह समाधान अस्थायी होगा। नेहरू ने यह भी सवाल उठाया कि “अगर यहूदियों ने फिलिस्तीन में अच्छा काम किया है तो अरबों का विश्वास क्यों नहीं जीत पाए?”
महात्मा गांधी भी ज़ायनिज़्म (यहूदी राष्ट्रवाद) के उग्र और कॉलोनियल स्वरूप के खिलाफ थे। भारत ने 1992 तक इसराइल के साथ कूटनीतिक रिश्ते भी शुरू नहीं किए थे — यह नीति फिलिस्तीन के साथ खड़े रहने की थी।
जेरूसलम पोस्ट ने अपने विश्लेषण में लिखा कि “मोदी ने गांधी और नेहरू से अलग राय रखी और भारत की पुरानी लाइन से हटकर इसराइल के साथ खड़े हुए।”
“ग्लोबल साउथ” का नेता बनना है तो साफ बोलना होगा
प्रधानमंत्री मोदी अपने भाषण में “करेज” (साहस) और “ह्यूमैनिटी” (मानवता) की बात करते हैं। लेकिन यह भाषण कूटनीति के इतिहास में कभी भी साहसिक भाषण के लिए याद नहीं किया जाएगा। साहस तब दिखता जब वे फिलिस्तीन के लोगों के साथ हुए नरसंहार का सीधा जिक्र करते। रास्ता भी बताते। तो दुनिया उन्हें नेसेट के नए मेडल से कहीं बड़ा पुरस्कार दे देती।
स्पेन, दक्षिण अफ्रीका सहित दुनिया के अनेक देशों ने इसराइल के नरसंहार के खिलाफ खुलकर स्टैंड लिया। लेकिन जब संयुक्त राष्ट्र में इसराइल की निंदा के प्रस्ताव पर मतदान की बारी आई — भारत गैरहाजिर हो गया।
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने विश्व आर्थिक फोरम में ट्रंप की नीतियों के दुष्प्रभाव की खुलकर आलोचना की — उनका भाषण ऐतिहासिक माना गया। प्रधानमंत्री मोदी के पास इसराइल की संसद में ऐसा ही मौका था — ट्रंप की धमकी भरी नीतियों के बाद की दुनिया में अपना खाका खींचने का। लेकिन वे यह मौका चूक गए।
अगर भारत सचमुच “ग्लोबल साउथ” का नेतृत्व करना चाहता है, तो उसे बच-बचाकर नहीं — अमेरिका और पश्चिम की पैदा की हुई उलझनों के सामने साफ-साफ बोलना होगा। पार्क से लेकर एयरपोर्ट तक वीर सावरकर के नाम करने वाले प्रधानमंत्री कैसे भूल गए कि सावरकर की कहानी भी अंग्रेजों की औपनिवेशिक ताकतों से लड़ने के कारण बनती है? फिर आज का भारत इसराइल की कॉलोनियल नीतियों की आलोचना क्यों नहीं कर पाता?
संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव और हमास की भूमिका
प्रधानमंत्री मोदी ने भाषण में एक बार फिलिस्तीन का नाम लिया — वह भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा मंजूर किए गए ग़ज़ा शांति प्रस्ताव के संदर्भ में। उन्होंने कहा कि “यह प्रस्ताव एक रास्ता दिखाता है” और “भारत ने इस पहल का समर्थन किया है।” लेकिन ट्रंप के “बोर्ड ऑफ पीस” और उनकी योजना का कोई जिक्र नहीं किया — ना नाम लिया, ना आलोचना की।
एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि भारत ने हमास को आतंकवादी संगठन घोषित नहीं किया है। इसराइल ने भारत से इसकी मांग की है। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव से लेकर दुनिया के कई बड़े नेताओं ने कहा है कि “हमास का हमला शून्य में नहीं हुआ” — उनका इशारा उन परिस्थितियों की तरफ था जो इसराइल के कारण पैदा हुई थीं। ग़ज़ा के शांति समझौते में अमेरिका ने खुद हमास की भूमिका स्वीकार की। हमास ने 165 से अधिक बंधकों को जिंदा छोड़ा। ट्रंप भी कई बार कह चुके हैं कि ग़ज़ा में जो मौतें और विनाश हुआ, वह रुकना चाहिए।
प्रधानमंत्री मोदी भी यह सब कह सकते थे — आतंकवाद की निंदा के साथ यह भी कि हिंसा का चक्र दोनों तरफ के आम बेकसूर लोगों को मारता है।
‘रुटीन से ज्यादा कुछ नहीं’ — एक चूका हुआ ऐतिहासिक मौका
प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने मोदी के भाषण से पहले उनकी तारीफ करते हुए कहा कि “मोदी इसराइल के साथ नैतिक रूप से और बिना किसी अगर-मगर के खड़े रहे। आपने कभी डगमगाया नहीं, कभी पीछे नहीं हटे।” यह तारीफ दरअसल यह भी बताती है कि प्रधानमंत्री मोदी ने इसराइल को कभी कड़वी बात नहीं कही — चाहे ग़ज़ा में कुछ भी हुआ हो।
प्रधानमंत्री मोदी का भरोसा शायद इसी पर होता है कि हिंदी के अखबार और न्यूज चैनल इतने विस्तार से तो बताएंगे नहीं। जनता को पता चलेगा नहीं। चैनल यही दिखाते रहेंगे कि स्पीकर ने मेडल दिया, सांसदों ने सेल्फी खिंचाई। लेकिन एक जिम्मेदार नागरिक को यह समझना चाहिए कि इस दौरे के कवरेज में जानकारी ज्यादा है या वाहवाही ज्यादा।
यह भाषण एक बड़ा मौका था — एक ऐसा मौका जिसमें प्रधानमंत्री मोदी दुनिया को दिखा सकते थे कि भारत सिर्फ अपने हितों का नहीं, बल्कि मानवता के हितों का भी पैरोकार है। लेकिन वे यह मौका चूक गए। और इसीलिए यह भाषण, चाहे कितना भी बड़ा बना लिया जाए, रुटीन से ज्यादा कुछ नहीं है।
मुख्य बातें (Key Points)
- प्रधानमंत्री मोदी ने इसराइल की संसद नेसेट में भाषण दिया, जिसमें हमास के हमले की कड़ी निंदा की लेकिन ग़ज़ा में 75,000+ मौतों और नरसंहार पर एक शब्द नहीं बोले — 2018 में फिलिस्तीन द्वारा दिए गए सर्वोच्च सम्मान की भी अनदेखी की।
- ऑपरेशन सिंदूर, बालाकोट और सर्जिकल स्ट्राइक — अपनी सरकार की तीन सबसे बड़ी सैन्य कार्रवाइयों का जिक्र नहीं किया, सिर्फ 18 साल पुराने मुंबई हमले की याद दिलाई — संभावित कारण ट्रंप के सीजफायर दावों से बचने की कोशिश।
- “मेडल ऑफ नेसेट” पहली बार बनाया गया और सीधे मोदी को दिया गया — इसराइल का सर्वोच्च नागरिक सम्मान “प्रेसिडेंशियल मेडल ऑफ ऑनर” नहीं दिया गया, जो ओबामा, बाइडन और मर्केल को मिल चुका है।
- इसराइल के अपने अखबार हारेत्ज़ में ग़ज़ा को “नरसंहार” कहा जा रहा है और 47% मृतकों को निर्दोष बताया गया है — लेकिन प्रधानमंत्री मोदी इसका एक अंश भी नहीं कह पाए, जो गांधी-नेहरू की उपनिवेशवाद विरोधी विरासत से स्पष्ट विचलन है।
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