Mahashivratri 2026 dargah Shivling puja को लेकर कर्नाटक के कलबुर्गी जिले का आलंद कस्बा एक बार फिर सुर्खियों में है। 14वीं सदी के सूफी संत हजरत शेख अलाउद्दीन अंसारी (लाडले मशाइक) और 15वीं सदी के हिंदू संत राघव चैतन्य से जुड़ी इस दरगाह के अंदर मौजूद ‘राघव चैतन्य शिवलिंग’ पर पूजा को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है। इस बार महाशिवरात्रि के मौके पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने सीमित संख्या में श्रद्धालुओं को पूजा की अनुमति दे दी है, जबकि दरगाह कमेटी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया है।
क्या है पूरा मामला? सदियों पुरानी साझा परंपरा बनी विवाद की वजह
आलंद की यह दरगाह सदियों से सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक रही है। यहां हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग अपनी-अपनी आस्था के अनुसार दर्शन और प्रार्थना करते थे। परिसर के अंदर स्थित ‘राघव चैतन्य शिवलिंग’ पर लंबे समय से पूजा की परंपरा रही है। हालांकि, 2022 में कथित तौर पर कुछ असामाजिक तत्वों ने शिवलिंग को अपमानित करने की कोशिश की, जिसके बाद इलाके में तनाव बढ़ गया और यह साझा परंपरा विवाद में बदल गई।
इसके बाद से ही इस स्थल पर पूजा और धार्मिक गतिविधियों को लेकर अदालतों में याचिकाओं का सिलसिला शुरू हो गया।
कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला: सीमित पूजा की अनुमति
महाशिवरात्रि 2026 से पहले कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए साफ किया कि पिछले साल की तरह इस साल भी सीमित संख्या में हिंदू श्रद्धालुओं को शिवलिंग पर पूजा की अनुमति होगी। कोर्ट ने प्रशासन को सख्त सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने और किसी भी तरह की अव्यवस्था रोकने के निर्देश दिए हैं।
गौरतलब है कि फरवरी 2025 में भी इसी तरह कोर्ट ने केवल 15 श्रद्धालुओं को शिवरात्रि पूजा की अनुमति दी थी। उस समय भारी पुलिस सुरक्षा के बीच पूजा शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुई थी।
साझा विरासत या धार्मिक पहचान की लड़ाई? क्या कहता है इतिहास?
यह मामला सिर्फ अदालती आदेश तक सीमित नहीं है। यह उस ऐतिहासिक स्थल की कहानी है जहां सदियों से अलग-अलग आस्थाओं के लोग एक साथ आते रहे हैं। लेकिन 2022 की घटना ने माहौल बदल दिया। एक तरफ दरगाह कमेटी का तर्क है कि धार्मिक स्थलों के स्वरूप को बदलने की कोशिश हो रही है, वहीं हिंदू संगठनों का कहना है कि शिवलिंग पर पूजा की परंपरा बहुत पुरानी है और इसे जारी रखने की अनुमति मिलनी चाहिए। अदालत ने दोनों पक्षों के तर्कों को ध्यान में रखते हुए सीमित और नियंत्रित पूजा की इजाजत दी है ताकि धार्मिक भावनाओं और कानून व्यवस्था के बीच संतुलन बना रहे।
सुप्रीम कोर्ट ने ठुकराई दरगाह कमेटी की याचिका
दरगाह कमेटी ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और पूजा की अनुमति पर रोक लगाने की मांग की। हालांकि, सर्वोच्च अदालत की पीठ ने इस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि हर विवाद सीधे सुप्रीम कोर्ट में लाना न्यायिक व्यवस्था के संतुलन के लिहाज से सही नहीं होगा।
15 फरवरी को महाशिवरात्रि, प्रशासन अलर्ट
महाशिवरात्रि इस साल 15 फरवरी को मनाई जा रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि 15 फरवरी की शाम से शुरू होकर अगले दिन तक जारी रहेगी। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा का विशेष महत्व है।
प्रशासन ने पूरे इलाके में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं। अधिकारी लगातार स्थानीय लोगों और धार्मिक प्रतिनिधियों से संवाद कर रहे हैं ताकि शांति और सौहार्द बना रहे। पूजा प्रशासन और पुलिस की सख्त निगरानी में होगी।
‘जानें पूरा मामला’
आलंद की यह दरगाह 14वीं सदी के सूफी संत हजरत शेख अलाउद्दीन अंसारी (लाडले मशाइक) और 15वीं सदी के हिंदू संत राघव चैतन्य से जुड़ी मानी जाती है। माना जाता है कि दोनों संतों की स्मृतियां इसी स्थान से जुड़ी हैं। परिसर के अंदर ‘राघव चैतन्य शिवलिंग’ नामक संरचना मौजूद है। 2022 में कथित तौर पर शिवलिंग अपमान की कोशिश के बाद से यह स्थल विवादों में है। पिछले साल भी महाशिवरात्रि पर सीमित श्रद्धालुओं को पूजा की इजाजत दी गई थी, जो शांतिपूर्वक संपन्न हुई थी।
मुख्य बातें (Key Points)
कर्नाटक के कलबुर्गी में आलंद दरगाह परिसर स्थित शिवलिंग पर महाशिवरात्रि पर पूजा की अनुमति।
कर्नाटक हाईकोर्ट ने सीमित श्रद्धालुओं को पूजा की इजाजत दी, सुरक्षा के सख्त निर्देश।
दरगाह कमेटी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से किया इनकार।
2022 में शिवलिंग अपमान की कोशिश के बाद से विवाद चल रहा।
15 फरवरी को महाशिवरात्रि, प्रशासन ने किए सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम।








