Kohrra Season 2 Review Netflix: पंजाब की धुंध भरी सर्दियों की एक सुबह, एक और खौफनाक कत्ल, और दो पुलिस अफसर जो अपनी निजी जिंदगी के राक्षसों से लड़ते हुए सच का पीछा करते हैं — Netflix की बहुप्रतीक्षित क्राइम थ्रिलर सीरीज कोहरा सीजन 2 आ गई है और इसने पहले सीजन की बेंचमार्क को न सिर्फ बरकरार रखा बल्कि कई मायनों में और ऊंचा उठा दिया है। मोना सिंह और बरुन सोबती की शानदार अदाकारी ने इस सीरीज को 4 में से 4 स्टार रेटिंग दिलाई है।
इस नए सीजन में बरुन सोबती असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर अमरपाल गरुंडी की भूमिका में लौटे हैं, जबकि मोना सिंह ने सब-इंस्पेक्टर धनवंत कौर का किरदार निभाया है। दोनों मिलकर पंजाब के एक छोटे शहर में हुए कत्ल की गुत्थी सुलझाने की कोशिश करते हैं, लेकिन असली कहानी सिर्फ मर्डर मिस्ट्री नहीं है — यह बंधुआ मजदूरी, क्षेत्रीय भेदभाव, स्टॉकहोम सिंड्रोम और पितृसत्ता जैसे गंभीर मुद्दों को बेबाकी से उघाड़ती है।
कहानी — NRI इन्फ्लुएंसर की हत्या से शुरू होता है रहस्य
कोहरा सीजन 2 की कहानी एक NRI महिला प्रीत बाजवा की हत्या से शुरू होती है। प्रीत एक सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर थी जो अपनी डांस रील्स के लिए मशहूर थी। सुबह की पहली किरण में उसकी लाश उसके भाई के घर के बार्न (अनाज भंडार) में मिलती है।
प्रीत एक जटिल किरदार थी — जिसने जिंदगी में कई सवालिया फैसले लिए, बिल्कुल किसी भी असली इंसान की तरह। उसके अपने परिवार और पति से भी रिश्ते अच्छे नहीं थे। संदिग्ध बहुत हैं, लेकिन सवाल यह है कि प्रीत को असल में किसने मारा और क्यों?
बंधुआ मजदूरी — जब जंजीरों में बंधे मिले चार मजदूरों के अवशेष
जांच और मुश्किल हो जाती है जब प्रीत मर्डर केस में लाशों का ढेर लगने लगता है। प्रीत के भाई बलजिंदर अटवाल के पोल्ट्री फार्म में उत्तर भारत से आए चार मजदूरों को जलाकर मार दिया जाता है। सबसे दिल दहलाने वाली बात यह है कि इन प्रवासी मजदूरों के अवशेष जंजीरों में बंधे मिलते हैं। वे सचमुच बंधुआ मजदूरी के शिकार थे — और यह कहानी का कोई साइड प्लॉट नहीं बल्कि मुख्य विषय है।
इसके समानांतर, झारखंड से आया एक प्रवासी मजदूर अपने पिता को ढूंढ रहा है जो 20 साल पहले काम के लिए पंजाब आया था और गायब हो गया। यह 20 साल का दुबला-पतला नौजवान एक चाइनीज फूड स्टॉल पर बर्तन खुरचते हुए काम करता है और ‘भैया’ कहकर किए जाने वाले भेदभाव से जूझता है। उसे बस इतना जानना है कि उसके पिता जिंदा हैं या नहीं, क्या उन्होंने दोबारा शादी कर ली, या मर गए।
इसके अलावा, माही वर्मा नाम की एक महिला जिसका प्रीत के भाई बलजिंदर से अफेयर है, पर एक अज्ञात व्यक्ति हमला करता है। मामला और उलझता जाता है।
मोना सिंह — ‘मां’ का सबसे अनोखा किरदार
मोना सिंह ने अपने करियर में कई बार मां का किरदार निभाया है, लेकिन धनवंत कौर किसी भी पहले वाली मां से बिल्कुल अलग है। सबसे अच्छी बात यह है कि इस शो में वह सिर्फ एक मां नहीं हैं — मातृत्व उनकी जिंदगी का एक पहलू है, पूरी पहचान नहीं।
हर रोज उनकी डरी-सहमी आंखें बस स्टॉप पर किसी का इंतजार करती हैं। लेकिन जिसका वो इंतजार करती हैं, वो कभी नहीं आता। उनका बेटा एक सड़क दुर्घटना में मारा गया था। वो अतीत के एक भूत का पीछा कर रही हैं, उनका दिल सालों से ढोए जा रहे इस नुकसान के बोझ से भारी है।
इस अपूरणीय नुकसान का बोझ उनके पति जगदीश सूद से रिश्ते पर भी पड़ता है। जगदीश, जो शहर में कपड़े और सिलाई की दुकान चलाता है, एक शराबी है जो खुद को नशे में डुबोए रखता है ताकि जिंदगी की कड़वी सच्चाई का सामना न करना पड़े। वह अपनी पत्नी से भी कमतर महसूस करता है क्योंकि धनवंत अक्सर अपनी पुलिस की हैसियत का इस्तेमाल करती है।
धनवंत अक्सर अपने शराबी पति को सड़क किनारे के ठेकों से उठाती है, उसकी तरफ नजर भी नहीं डालती, एक शब्द नहीं बोलती, और उसे घर ले जाती है। बीवी की तरह नहीं, बल्कि एक पुलिसवाली की तरह जो अपना फर्ज निभा रही है।
बरुन सोबती — अपराधबोध की छाया में जीता गरुंडी
बरुन सोबती ने गरुंडी के किरदार को एक नई गहराई दी है। नए सीजन में गरुंडी अपने परेशान करने वाले अतीत को अपने गृहनगर जगराना में पीछे छोड़कर दालेरपुरा (पंजाब का एक और काल्पनिक शहर) में नई जिंदगी शुरू कर चुका है। उसकी जिंदादिल पत्नी सिल्की एक ब्यूटीशियन है जो दालेरपुरा में अपना नेल बार खोलने को लेकर उत्साहित है।
लेकिन कुछ चीजें पीछा नहीं छोड़तीं। गरुंडी की जिंदगी और उलझ जाती है जब सिल्की उसकी गर्भवती भाभी को अपने घर रहने के लिए ले आती है, जबकि बड़ा भाई जंग बाहर गया हुआ है।
पहले सीजन से हमें पता है कि गरुंडी का अपनी भाभी से रिश्ता था। हनीमून पर सिल्की ने अपने अतीत के बारे में ‘सफाई’ दी थी, लेकिन गरुंडी ने चुप्पी साध ली। अपनी भाभी के साथ के अफेयर का अपराधबोध और शर्म उसकी आंखों में साफ दिखती है जब भी वह एक ही कमरे में भाभी और सिल्की के साथ होता है — और बरुन सोबती ने इस भावना को बखूबी निभाया है।
पहले सीजन से क्या बदला — महिला और पुरुष दोनों नायक
कोहरा के पहले सीजन में दो पुरुष पुलिस अफसर थे जो उम्र, अनुभव और रैंक में अलग-अलग थे। इस बार एक पुरुष और एक महिला नायक हैं। शुरुआत में गरुंडी को इस बात से थोड़ी खीझ होती है कि घर और दफ्तर दोनों जगह महिलाओं के आदेशों पर काम करना पड़ रहा है, लेकिन मर्डर केस के दौरान धनवंत अपनी काबिलियत से उसका सम्मान कमा लेती है।
छह एपिसोड के दौरान दोनों किरदार एक-दूसरे के साथ सहज होते जाते हैं। अगर गरुंडी धनवंत से किताबी तरीके से काम करने की अहमियत सीखता है, तो धनवंत गरुंडी की मौजूदगी में इतनी सुरक्षित महसूस करती है कि अपनी कमजोर साइड दिखा सके और मदद स्वीकार कर सके — जो उसके लिए आसान नहीं है।
पुलिसवाले नहीं सुपरहीरो — असली जिंदगी जैसे किरदार
कॉप ड्रामा आमतौर पर बंदूकें लहराने, स्टाइलिश एंट्री और बारीकी से प्लान किए गए कत्लों के साथ आते हैं। लेकिन कोहरा एक बार फिर पुलिसवालों को सुपरहीरो बनाने की इस पुरानी धारणा से पर्दा उठाता है।
ये पुलिस अफसर असली इंसान हैं — उलझी हुई जिंदगी और गंभीर निजी समस्याओं वाले, जो कटते-छिलते हैं, रात के अंधेरे में गुंडों की मार खाकर लंगड़ाते हुए लौटते हैं। लेकिन उनकी ड्यूटी के प्रति समर्पण उन्हें अगले ही दिन काम पर वापस ले आता है। और सभी कत्ल प्लान किए हुए नहीं होते — कुछ बस जुनून के अपराध (crimes of passion) होते हैं।
पंजाब के दो जख्म — नशा और उग्रवाद
अगर कोहरा सीजन 1 ने पंजाब में नशे की समस्या को छुआ था, तो सीजन 2 एक और मुद्दे पर अपनी नजर डालता है जो अभी भी राज्य को सताता है — 1990 के दशक की शुरुआत का उग्रवाद का दौर। सीरीज इसमें बहुत गहराई से नहीं जाती लेकिन इसे एक उपकरण (device) की तरह इस्तेमाल करती है यह समझाने के लिए कि लोग वो क्यों बन जाते हैं जो वे हैं।
पहले सीजन की तरह, कोहरा का यह नया अध्याय भी धनवंत और गरुंडी दोनों के लिए उम्मीद भरे नोट पर खत्म होता है।
क्यों देखें कोहरा सीजन 2 — एक नजर में
कोहरा सीजन 2 सिर्फ एक मर्डर मिस्ट्री नहीं है। यह पंजाब के ग्रामीण इलाकों की उन परतों को उघाड़ती है जिन पर बॉलीवुड और OTT शायद ही कभी रोशनी डालता है — बंधुआ मजदूरी, प्रवासी मजदूरों के साथ भेदभाव, परिवारों के अंदर छिपे राज, और वो घाव जो दशकों बाद भी नहीं भरते।
मोना सिंह का अभिनय इस सीजन की जान है। उन्होंने साबित किया है कि ‘मां’ का किरदार भी कितना पावरफुल, जटिल और बहुआयामी हो सकता है। बरुन सोबती ने गरुंडी के अपराधबोध और आंतरिक संघर्ष को आंखों से बोला है — शब्दों की जरूरत नहीं पड़ी।
अगर आप ऐसी सीरीज पसंद करते हैं जो दिमाग को सोचने पर मजबूर करे, दिल को छू जाए और पंजाब की असली मिट्टी की खुशबू हो, तो कोहरा सीजन 2 आपकी वॉचलिस्ट में सबसे ऊपर होनी चाहिए।
मुख्य बातें (Key Points)
- कोहरा सीजन 2 को 4/4 स्टार रेटिंग मिली — मोना सिंह और बरुन सोबती की शानदार अदाकारी ने सीरीज को बेहतरीन बनाया
- कहानी NRI इन्फ्लुएंसर की हत्या से शुरू होती है और बंधुआ मजदूरी, क्षेत्रीय भेदभाव, स्टॉकहोम सिंड्रोम और पितृसत्ता जैसे मुद्दों को उघाड़ती है
- मोना सिंह ने ‘मां’ का सबसे अनोखा किरदार निभाया — एक ऐसी पुलिस अफसर जो अपने बेटे की मौत का दर्द ढोती है
- बरुन सोबती ने भाभी के साथ अफेयर के अपराधबोध को सिर्फ आंखों से जिया — बेहतरीन अभिनय
- सीरीज पुलिसवालों को सुपरहीरो नहीं बल्कि असली इंसान दिखाती है — उलझी जिंदगी, निजी समस्याएं और फिर भी ड्यूटी के प्रति समर्पण








