Trump Iran Fail Russia China – न्यू वर्ल्ड ऑर्डर की लड़ाई अब न्यू वर्ल्ड इकोनॉमी की जंग में बदल गई है। अमेरिका नहीं चाहता कि ईरान इजराइल के समानांतर ताकतवर बने, रूस और चीन के खेमे में भारत खड़ा हो, या फिर टैरिफ वॉर के बाद कोई देश अमेरिकी इजाजत के बगैर अपनी इकोनॉमी संभाल पाए। लेकिन बीते 48 घंटों में चीन और रूस ने ईरान को जबरदस्त हथियार भेज दिए और ईरान ने पहली बार अमेरिकी नौसेना के सबसे बड़े एयरक्राफ्ट कैरियर अब्राहम लिंकन की दिशा में ड्रोन दाग दिया।
यह सिर्फ सामरिक दृष्टिकोण नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टिकोण है। और इस अर्थव्यवस्था के केंद्र में है क्रूड ऑयल। दुनिया के तमाम देश अब इस हकीकत को जानने लगे हैं कि दरअसल लड़ाई तो तेल को लेकर है। विश्व बाजार में तेल की कीमत क्या होगी, यही असली सवाल है।
ईरान ने दागा ड्रोन, अमेरिका के F-35 ने मार गिराया
3 फरवरी 2026 को ईरान ने अपना शाहिद-139 ड्रोन अमेरिकी नौसेना के अब्राहम लिंकन एयरक्राफ्ट कैरियर पर दागा। यह ड्रोन अरब सागर में तैनात अमेरिका के सबसे ताकतवर युद्धपोत के करीब पहुंचता, उससे पहले ही अमेरिकी F-35C सी फाइटर जेट से इस ड्रोन को नष्ट कर दिया गया।
यह कोई सामान्य परिस्थिति नहीं थी। यह 6 फरवरी को तुर्की में होने वाली बातचीत से पहले का एक संदेश था। ईरान ने यह साबित कर दिया कि रूस और चीन से मिले हथियारों के बल पर वह अमेरिका को चुनौती दे सकता है।
ईरान अपनी अबू महदी सबमरीन मिसाइल को सफलतापूर्वक डेवलप कर रहा है जो 2600 किलोमीटर की रेंज को नाप सकती है। यानी अमेरिका के अब्राहम लिंकन पर सीधे टारगेट लगाने की स्थिति में यह सबमरीन मिसाइल भी आ जाएगी।
6 फरवरी को तुर्की में अहम बैठक
दो दिन बाद यानी 6 फरवरी को तुर्की में एक बैठक होने वाली है जो बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इस बैठक में पूरा मिडिल ईस्ट मौजूद रहेगा। अमेरिका के प्रतिनिधि मौजूद रहेंगे। ईरान के विदेश मंत्री मौजूद रहेंगे।
इस बैठक में डोनाल्ड ट्रंप के दूत के तौर पर स्टीव वेटकॉफ, ट्रंप के दामाद और सलाहकार जेरेड कुशनर की मौजूदगी होगी। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची वहां पर पहुंचेंगे। कतर, तुर्की और मिस्र के वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी भी होगी।
बात सिर्फ इतनी नहीं है। इस बैठक में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), ओमान, यहां तक कि पाकिस्तान के प्रतिनिधियों को भी बुलाया गया है।
रूस और चीन ने भेजे जबरदस्त हथियार
बीते 48 घंटों के भीतर चीन और रूस की तरफ से जो हथियार ईरान भेज दिए गए, उससे ईरान ने अपने आप को ताकतवर समझते हुए पहली बार एक ड्रोन दाग दिया। यह सिर्फ हथियार नहीं, बल्कि मिसाइल, परमाणु उपक्रम और टेक्नोलॉजी के लिहाज से मजबूती थी।
रूस और चीन समझ रहे हैं कि अगर ईरान की सत्ता अमेरिकी इशारे पर चलने वाली बन गई तो जो वेंजुएला में हुआ है वही ईरान में होगा। और ईरान में होने का मतलब यह है कि एक झटके में चीन को जिस कच्चे तेल की जरूरत है, उसके लिए वह कहां जाएगा?
तेल पर कब्जे की असली जंग
दुनिया में बहुत सारे देशों के पास तेल है ही नहीं। वह चाहे कितने भी संपन्न क्यों ना हो। बाजार है, पैसा है, रेयर अर्थ है लेकिन तेल नहीं है। और उसमें पहला नाम चीन का आता है। चीन के पास तेल नहीं है। वह दुनिया के बाजार से तेल खरीदता है। भारत के पास तेल नहीं है। वह दुनिया के बाजार से तेल खरीदता है।
प्रतिबंध लगाकर रूस की घेराबंदी अमेरिका ने कर दी। उसका तेल अगर वाकई कोई नहीं खरीदे तो रूस के सामने मुश्किल हालात पैदा हो जाएंगे कि वह कैसे लड़ाई लड़े यूक्रेन के खिलाफ।
चीन का तेल समीकरण बदल गया
ध्यान दीजिए – चीन के पास कच्चा तेल नहीं है। वो वेंजुएला से भी तेल लेता था और बड़ी तादाद में लेता था। नवंबर के महीने में 6.6 लाख बैरल पर डे वो ले रहा था। उसके बाद जो परिस्थिति वेंजुएला के भीतर बनी, एक झटके में उसके तेल लेने में कमी आ गई और 4 लाख बैरल पर डे के हिसाब से वह लेने लगा। यानी तकरीबन 2 लाख बैरल कम हो गया।
आज की तारीख में वह पूरे तरीके से बंद हो गया क्योंकि वहां के राष्ट्रपति को अमेरिका उठाकर ले गया और अमेरिका ने कहा वेंजुएला से अब जो भी तेल खरीदेगा वह अमेरिका के माध्यम से ही खरीदेगा। उसी आदेश के तहत भारत को भी निर्देश दिया गया कि आप भी तेल हम ही से खरीदेंगे।
चीन ने इस दौर में ईरान से जो तेल ले रहे थे वह 1.46 मिलियन बैरल पर डे ले रहे थे। यानी तकरीबन 14 लाख बैरल पर डे से ज्यादा ले रहे थे। उसको बढ़ाकर जैसे ही वेंजुएला का दरवाजा बंद हुआ, चीन ने तेल लेना बढ़ा दिया ईरान से – 1.61 मिलियन बैरल कर दिया। यानी 14 लाख से बढ़कर 16 लाख बैरल प्रतिदिन पर वो आकर खड़ा हो गया।
रूस से चीन 25 लाख बैरल प्रतिदिन ले रहा
चीन वेंजुएला से 6.6 लाख बैरल पर डे खरीदता था। राष्ट्रपति को उठाने की प्रक्रिया या वेंजुएला पर काबिज होने की परिस्थितियों के बीच 2 लाख बैरल कम हो गया। 4.5 लाख बैरल पर आ गया और आज की तारीख में वह बंद हो गया।
चीन ईरान पर ज्यादा निर्भर हो गया। 1.46 मिलियन बैरल से बढ़कर वो 1.61 मिलियन बैरल तक पहुंच गया। लेकिन रूस से वो 2.2 मिलियन बैरल यानी 22 लाख बैरल पर डे लेता था जो आज की तारीख में 2.5 मिलियन यानी लगभग 25 लाख बैरल पर डे तक हो चुका है।
जो ईरान से तेल लिया जा रहा था, जो वेंजुएला से लिया जा रहा था, उसको जोड़ दीजिए तो उतना वह तेल रूस से ले रहा है। और रूस की इकोनॉमी में जो लोग तेल खरीद रहे हैं उनके अनुकूल रूस चल रहा है।
ईरान से तेल के बदले चीन देता है इंफ्रास्ट्रक्चर
यह इसलिए भी समझना जरूरी है क्योंकि ईरान से जो तेल चीन लेता है उसकी एवज में वह पैसा नहीं देता है या डॉलर नहीं देता है। वो ईरान के इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत होने वाले पूरे खर्चे को उठाता भी है और जिस-जिस इंफ्रास्ट्रक्चर को ईरान को मजबूत करना है उस दिशा में चीन काम भी करता है।
यूक्रेन को लेकर रूस इस बात को तो समझ गया कि दरअसल अमेरिका इसमें रास्ता निकालेगा और आने वाले वक्त में दोनों एक दूसरे पर हमला नहीं करेंगे। लेकिन जब ईरान का सवाल आया तो रूस के सामने भी यह संकट था कि अगर इस पूरे इलाके में सिर्फ और सिर्फ उसके तेल पर निर्भरता हर उस देश की रहेगी और उसके पास उतना तेल है नहीं।
तुर्की में बैठक क्यों महत्वपूर्ण?
तुर्की NATO कंट्रीज में शामिल है। यानी अमेरिका की पॉलिसी, अमेरिका के सामरिक युद्ध नीति के साथ वह खड़ा है। और उसी देश के भीतर बैठक होने वाली है। तुर्की भी रूस से तेल खरीदता है। इसीलिए तुर्की को एक कॉमन स्थान माना गया।
यह माना जा रहा है कि अब 6 फरवरी को जो बैठक होगी, उसमें युद्ध हो या नहीं हो, यह तय नहीं। मसला यह है कि दुनिया की अर्थव्यवस्था पर किसका राज चलेगा। और जिसका भी राज चलेगा वो आने वाले वक्त में सबसे बड़ी ताकत के साथ दुनिया को अपनी हथेली पर नचाए या ना नचाए, लेकिन अपने इशारे पर दुनिया के उन देशों को तो कर ही लेगा जिनकी कतार दुनिया भर के भीतर 100 से ज्यादा देशों की है जो गरीब और विकासशील देशों की श्रेणी में आते हैं।
भारत के सामने भी संकट
भारत और अमेरिका की डील के जरिए भारत की एंट्री इस पूरे कॉन्फ्लिक्ट के बीच में हो जाती है क्योंकि अमेरिका कह रहा है आप रूस से तेल मत खरीदें। सवाल है – पुतिन जब दिल्ली आए थे तो क्या करने आए थे? जाहिर है वह तेल बेचने ही आए थे।
जो सम्मान रूस में भारत के प्रधानमंत्री मोदी को दिया गया जो वहां का सबसे बड़ा सम्मान है, वो क्यों दिया गया? व्यापारिक संबंध बने रहे। और इस व्यापारिक संबंध का मतलब दो ही चीज होता है – एक तेल और दूसरा हथियार यानी डिफेंस और ऑयल।
भारत का व्यापारिक घाटा – चौंकाने वाले आंकड़े
चीन के साथ भारत का जो पिछले साल का व्यापार है, वह लगभग 14 लाख करोड़ का है। उस 14 लाख करोड़ में से जो भारत ने चाइना को माल दिया उसकी कीमत सिर्फ 1.78 लाख करोड़ है। यानी 2 लाख करोड़ से भी कम। टोटल व्यापार है 14 लाख करोड़ का और 1.78 लाख करोड़ भारत एक्सपोर्ट करता है।
चाइना 35.85 बिलियन डॉलर – रुपए में कन्वर्ट करेंगे तो लगभग 12 लाख करोड़ का माल वो भारत भेजता है। व्यापारिक घाटा क्या हुआ? चीन के साथ भारत का व्यापारिक घाटा 116 बिलियन डॉलर का है। यानी 10 लाख 48 हजार करोड़। यह है चीन के साथ भारत का घाटा।
रूस के साथ टोटल व्यापार भारत का 62,000 करोड़ का है। 68 बिलियन डॉलर। उसमें भारत जो माल देता है रूस को वह लगभग 44,000 करोड़ का माल भारत रूस को बेचता है। और रूस से जो भारत में माल आता है वो 63.8 बिलियन डॉलर यानी 5 लाख 76 हजार करोड़ का है। चीन के साथ घाटा 10 लाख करोड़ से ज्यादा, रूस के साथ घाटा 5 लाख 31 हजार करोड़ का – 58.9 बिलियन डॉलर।
ईरान के साथ भारत के जो व्यापारिक रिश्ते हैं पिछले साल के वो कुल मिलाकर 27,980 करोड़ के ही हुए। यानी 3.1 बिलियन के ही हुए। जिसमें भारत ने जो माल दिया वह 11,733 करोड़ का है। ईरान ने जो माल भारत को दिया वह लगभग 16,243 करोड़ का। यहां भी व्यापारिक घाटा लगभग 4,500 करोड़ का – ईरान के साथ भी 5 बिलियन डॉलर।
एकमात्र अमेरिका है जिसके साथ जो आखिरी एक्सपोर्ट इंपोर्ट हो रहा था उसमें भारत को लाभ जो था वह 3,400 करोड़ का था।
वेंजुएला से तेल भारत के लिए दोगुना महंगा
अब बड़ा सवाल यह है कि जब वेंजुएला के भीतर तेल निकालेगा कौन? कोई कंपनी तैयार नहीं है। लागत बहुत ज्यादा है। वह तेल वेंजुएला से भारत तक पहुंचते-पहुंचते जो टैरिफ रेट है वह भी बहुत बढ़ जाएगा।
जब दुनिया के बाजार में तेल महंगा था तब रूस तेल सस्ता दे रहा था। ईरान से तेल मिल जा रहा था। इन परिस्थितियों में भारत को लाभ हो रहा था। अब दुनिया के बाजार में भी तेल महंगा नहीं है। उस समय 100-90 डॉलर प्रति बैरल था। आज की तारीख में 58-59 डॉलर प्रति बैरल चल रहा है।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अगर वेंजुएला से भारत जो अभी तेल रूस और ईरान से ले रहा था, अगर उसको सीधे शिफ्ट कर दिया जाए वेंजुएला से तो भारत को जो तेल रूस से 58 या 60 डॉलर प्रति बैरल पड़ता है, वो वेंजुएला से आने में तमाम लागत के बाद 110 – यानी लगभग दोगुना हो जाएगा – $110 पर बैरल पड़ेगा। कौन देगा इतना पैसा?
रूस से सस्ते तेल का 80 हजार करोड़ का फायदा
अभी तक भारत की अपनी इकोनॉमी को संभालने के लिए जो रूस से सस्ता तेल – दुनिया की बाजार की तुलना में जो 30% सस्ता तेल मिल रहा था – अगर उसका भी एनालिसिस किया जाए तो वह भी तकरीबन 80 हजार करोड़ से ज्यादा का लाभ इस दौर में भारत को रूस से तेल लेने में हुआ।
लाभ जनता को नहीं मिला। लेकिन सरकार ने अपने तरीके से जो भी इकोनॉमी संभाली हो – गलत सही जो भी हो – एक झटके में अगर 80 हजार करोड़ का लाभ जो हो रहा था वो अगर हर महीने लगभग आपको एक झटके में 10 से 15,000 करोड़ के नुकसान पर लाकर खड़ा कर दे तो इकोनॉमी कहां जाएगी?
भारत की इकोनॉमी उलझ चुकी है
भारत की अपनी इकोनॉमी इस दौर में जिस तरीके से उलझ चुकी है इस न्यू टैरिफ वॉर के बाद की परिस्थितियों में, अमेरिका के साथ बनते रिश्तों में, उसमें भारत के इस भीतर का घमासान यह है कि यहां की इकोनॉमी संभाले तो कैसे संभालें।
मौजूदा वक्त की हकीकत तो यह भी है कि भारत में इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन और भारत पेट्रोलियम यानी BPCL अभी भी रूस से तेल ले रहे हैं। नया ऑर्डर वो देंगे या नहीं देंगे, इंतजार करना होगा। भारत की तरफ से HPCL, MRPL, HMEL – इन्होंने बंद कर दिया है रूस से तेल लेना।
अमेरिका की 500 बिलियन डॉलर की मांग
टोटल दोनों के देशों के बीच जो व्यापार हो रहा था 121 बिलियन डॉलर का था जिसको अमेरिका अब कह रहा है आप 500 बिलियन डॉलर तो हमसे खरीद लीजिए। इंपॉसिबल सी चीज है।
बहरहाल भारत ने अमेरिका को माल दिया लगभग 78,000 करोड़ का। अमेरिका ने भारत में माल भेजा 3 लाख 77 हजार करोड़ का। और व्यापारिक घाटा भारत का यहां घाटा नहीं हुआ, प्रॉफिट हो गया।
व्हाइट हाउस की प्रवक्ता खुले तौर पर समझा रही है कि भारत को अमेरिका के साथ इस डील में क्या-क्या गंवाना है और 500 बिलियन डॉलर का इन्वेस्टमेंट अमेरिका के भीतर कैसे करना है। कोई मियाद बताई नहीं गई। लेकिन मैसेज बहुत साफ है।
जो भारत के भीतर पार्लियामेंट में कहा जा रहा है उसके ठीक उलट अमेरिका में इस डील को लेकर उनके अपने लाभ को लेकर कहा जा रहा है।
BRICS को जीवित रखने की कोशिश
यही वह परिस्थिति है जिसके दायरे में अब ईरान को लेकर अमेरिका के सामने संकट है। इजराइल के अपनी साख का सवाल है। चीन और रूस साथ खड़े हो गए हैं। भारत जैसे देशों के सामने अब अपनी इकोनॉमी को संभालने के लिए ही उन्हीं रास्तों पर चलने की जरूरत है जो उसके अनुकूल हो।
रूस और चाइना एक साथ खड़े हैं और BRICS को जीवित करना चाहते हैं और चाहते हैं कि भारत भी उसमें हर हाल में शामिल रहे। उसके पीछे तेल की ही वह इकोनॉमी है।
जब उसकी इकोनॉमी के काउंटर में BRICS की इकोनॉमी मजबूत नजर आने लगे और इस पूरी परिस्थिति के भीतर अमेरिका और इजराइल के सामने संकट हो तो क्या होगा?
न्यू वर्ल्ड ऑर्डर में ताकत का मतलब – तेल पर कब्जा
इस पूरी प्रक्रिया के भीतर तीन सबसे बड़े सवाल हैं। पहला सवाल जो न्यू वर्ल्ड ऑर्डर की स्थिति है उसमें अब ताकत का मतलब तेल पर कब्जा करना है।
जिस लिहाज से ईरान पर अटैक हो या ना हो लेकिन ईरान ने अपने तौर पर पहला ड्रोन भेजा और अब दूसरा ड्रोन भेज दिया और यह मैसेज बड़ा हो गया कि अब 6 फरवरी की बैठक ही सबसे महत्वपूर्ण बैठक है।
यह संदेश अमेरिका और इजराइल के लिए भी है कि ताकत का इजहार टैरिफ डील के जरिए जो शुरू हुआ और दुनिया भर के भीतर की इकोनॉमी में उथल-पुथल मच गया, अब उसके बीच में अगर क्रूड ऑयल आकर खड़ा हो गया है तो यह लड़ाई उस पेट्रो डॉलर से आगे की होगी।
पेट्रो डॉलर से आगे – रूबल और युआन का दौर
क्योंकि इस दौर में महज पेट्रो डॉलर नहीं, अब तो रूबल भी है और युआन भी है। डिजिटल इकोनॉमी भी है। और इस बदलती हुई दुनिया में मिडिल ईस्ट देशों में जहां पर अमेरिका के अपने-अपने अड्डे भी हैं, वायुसैनिक अड्डे हैं, नौसैनिक अड्डे हैं, उन देशों के भीतर भी यह सवाल है कि इकोनॉमी को तो बचाना ही होगा।
इसीलिए ईरान जिस रास्ते पर है वह शायद अमेरिका के लिए कोई मुश्किल हालात हो या ना हो लेकिन इजराइल के लिए एक धमकी और चुनौती तो है। लेकिन सब कुछ 6 फरवरी की बैठक पर टिका है।
मुख्य बातें (Key Points)
- ईरान ने 3 फरवरी को अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर अब्राहम लिंकन पर शाहिद-139 ड्रोन से हमला किया, F-35C ने मार गिराया
- रूस और चीन ने बीते 48 घंटों में ईरान को जबरदस्त हथियार और मिसाइल टेक्नोलॉजी भेजी
- 6 फरवरी को तुर्की में अहम बैठक, ट्रंप के दूत, ईरान के विदेश मंत्री और पूरे मिडिल ईस्ट के प्रतिनिधि शामिल होंगे
- चीन ने वेंजुएला से तेल बंद होने के बाद ईरान से तेल 14 लाख से बढ़ाकर 16 लाख बैरल प्रतिदिन कर दिया
- रूस से चीन 25 लाख बैरल प्रतिदिन तेल ले रहा, ईरान को तेल के बदले इंफ्रास्ट्रक्चर दे रहा चीन
- भारत का चीन के साथ 10 लाख 48 हजार करोड़, रूस के साथ 5 लाख 31 हजार करोड़ का व्यापारिक घाटा
- रूस से सस्ते तेल से भारत को 80 हजार करोड़ का फायदा, वेंजुएला से तेल दोगुना महंगा पड़ेगा
- अमेरिका की 500 बिलियन डॉलर की मांग, भारत की इकोनॉमी न्यू टैरिफ वॉर में उलझी













