Iran Israel War के बीच एक बार फिर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) पर संकट गहरा गया है। ईरान और इजराइल के बीच भीषण युद्ध के चलते यह दुनिया का सबसे अहम तेल मार्ग पूरी तरह से बंद कर दिया गया है। लेकिन इसके बावजूद दुनिया की तेल सप्लाई पूरी तरह नहीं रुकी है। इसकी सबसे बड़ी वजह है सऊदी अरब की 1200 किलोमीटर लंबी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन, जिसे करीब 45 साल पहले ठीक ऐसे ही संकट के दौर में बनाया गया था।
45 साल पहले भी था ऐसा ही खतरा: जब ईरान ने दी थी तेल सप्लाई बंद करने की धमकी
Iran Israel War का आज का संकट नया नहीं है। इतिहास के पन्ने पलटें तो 1980 से 1988 के बीच ईरान-इराक युद्ध के दौरान भी ठीक ऐसा ही माहौल था। उस दौर में ईरान फारस की खाड़ी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले तेल टैंकरों पर लगातार हमले कर रहा था।
ईरान बार-बार खुली धमकी दे रहा था कि अगर कोई भी देश इराक का साथ देता है या अमेरिका युद्ध में हस्तक्षेप करता है, तो वह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पूरी तरह बंद कर देगा। यानी दुनिया की तेल सप्लाई रोकने की खुलेआम धमकी दी जा रही थी। उस दौर में सऊदी अरब का ज्यादातर कच्चा तेल होर्मुज से होकर ही गुजरता था, जिससे सऊदी की अर्थव्यवस्था पर तबाही का खतरा मंडराने लगा था।
सऊदी अरब का बड़ा फैसला: होर्मुज को बायपास करने की ऐतिहासिक योजना
Iran Israel War जैसे तनाव की ऐतिहासिक जड़ें उस दौर में ही दिखती हैं। युद्ध के खतरे को भांपते हुए सऊदी सरकार ने 1981 में एक ऐतिहासिक फैसला लिया। सऊदी ने तय किया कि एक ऐसी लैंड पाइपलाइन बनाई जाए जो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पूरी तरह से बायपास कर दे। मकसद साफ था कि चाहे होर्मुज बंद हो या खुला, सऊदी का तेल निर्यात बिना रुके चलता रहे।
इस फैसले के पीछे सबसे बड़ा उद्देश्य ईरान की दादागिरी को खत्म करना था। सऊदी अरब नहीं चाहता था कि उसकी पूरी अर्थव्यवस्था सिर्फ एक समुद्री रास्ते पर निर्भर रहे, जिसे कोई भी दुश्मन देश कभी भी बंद कर सकता था।
1200 KM लंबी पेट्रोलाइन: कैसे बनी यह ऐतिहासिक पाइपलाइन
सऊदी अरब ने अपने देश के लगभग बीचोंबीच एक विशाल पाइपलाइन की लकीर खींच दी। तय किया गया कि पूर्वी राज्य अबकीक से कच्चे तेल को 1200 किलोमीटर दूर लाल सागर (Red Sea) के तट यंबू तक पाइप से ले जाया जाएगा। वहां से तेल को टैंकरों में लोड करके यूरोप, अफ्रीका और एशिया भेजा जाएगा।
सऊदी ने अबकीक शहर को इसलिए चुना क्योंकि उसका ज्यादातर कच्चा तेल अबकीक और घवार जैसे पूर्वी प्रांत के ऑयल फील्ड्स में ही निकलता है। इसके अलावा अबकीक के बगल में ही कतर और बहरीन मौजूद हैं, जिससे इस शहर का रणनीतिक महत्व और भी ज्यादा बढ़ जाता है।
युद्ध स्तर पर हुआ निर्माण: सिर्फ एक साल में तैयार हुई पाइपलाइन
इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट की शुरुआत 1981 में हुई। इस पाइपलाइन को पेट्रोलाइन (Petroline) या ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के नाम से जाना जाता है। इसे बनाने वाली कंपनी पेट्रोमीन थी, लेकिन बाद में इसे सऊदी की सरकारी तेल कंपनी अरामको (Saudi Aramco) ने खरीद लिया।
सऊदी ने युद्ध स्तर पर इस पाइपलाइन का निर्माण कराया और 1981 में शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट 1982 में पूरा कर लिया गया। सिर्फ एक साल के अंदर 1200 किलोमीटर लंबी यह पाइपलाइन तैयार हो गई, जो उस दौर के सबसे बड़े इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट्स में से एक थी।
₹850 करोड़ की लागत और दो पाइपलाइन का कमाल
Iran Israel War के मौजूदा संकट में जो पाइपलाइन सबसे अहम भूमिका निभा रही है, उसके निर्माण की लागत 1981 में लगभग 2.5 बिलियन डॉलर थी। आज 2026 के हिसाब से यह राशि लगभग ₹850 करोड़ बनती है।
दिलचस्प बात यह है कि 1200 किलोमीटर लंबी यह पाइपलाइन असल में एक नहीं बल्कि दो पाइपलाइन है। एक पाइप की गोलाई 56 इंच है और दूसरे की 48 इंच। शुरुआत में 56 इंच वाले पाइप से मुख्य रूप से कच्चा तेल और 48 इंच वाले पाइप से एलपीजी सप्लाई की जाती थी। लेकिन 2014 के बाद दोनों पाइपलाइनों को कच्चे तेल के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा।
शुरू में इस पाइपलाइन की क्षमता कम थी, लेकिन बाद में इसे बढ़ाकर 50 लाख बैरल प्रतिदिन (5 Million Barrels Per Day) कर दिया गया। इस क्षमता ने सऊदी अरब को दुनिया का सबसे विश्वसनीय तेल सप्लायर बना दिया।
पाइपलाइन ने कैसे बदली दुनिया की तेल की जंग
Iran Israel War के इस दौर में यह पाइपलाइन और भी ज्यादा अहम हो गई है। इस पाइपलाइन को बनाकर सऊदी अरब ने दुनिया में एक अलग पहचान स्थापित की। सऊदी ने दुनिया को भरोसा दिलाया कि चाहे युद्ध हो या बंदिश, सऊदी के तेल की सप्लाई बंद नहीं होने वाली है।
इसके साथ ही सऊदी अरब ने अपनी एनर्जी सिक्योरिटी को भी जबरदस्त तरीके से मजबूत किया। पिछले चार दशकों में इस पाइपलाइन की बदौलत सऊदी दुनिया का सबसे भरोसेमंद तेल सप्लायर बन गया है। आज जब होर्मुज बंद है, तब भी तेल की सप्लाई जारी है, और इसका श्रेय इसी ऐतिहासिक पाइपलाइन को जाता है।
बाब अल-मंदेब: सऊदी की सबसे बड़ी कमजोरी
लेकिन Iran Israel War के इस संकट में एक और बड़ा खतरा सामने आया है। ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन से तेल भरकर जहाजों को बाब अल-मंदेब स्ट्रेट (Bab el-Mandeb) से गुजरना होता है। यह स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री पॉइंट्स में से एक है, जो लाल सागर को अदन की खाड़ी और आगे हिंद महासागर से जोड़ता है। इस रास्ते से दुनिया का लगभग 12% समुद्री तेल गुजरता है।
सऊदी अरब के लिए यहां से तेल भेजना आसान नहीं है, क्योंकि बाब अल-मंदेब के मुहाने पर ही सऊदी के दुश्मन हूती विद्रोही (Houthi) बैठे हुए हैं। यमन के पश्चिमी तट और पेरिम द्वीप पर काबिज हूती विद्रोही ड्रोन, बैलिस्टिक मिसाइल, क्रूज मिसाइल और विस्फोटकों से यहां से गुजरने वाले ऑयल टैंकरों पर हमला करते हैं।
2019 में भी बंद हुआ था यह रूट
2019 में हूती विद्रोहियों के हमलों की वजह से यह रूट पूरी तरह से बंद हो गया था। हूतियों ने एंटी-शिप मिसाइल और ड्रोन का इस्तेमाल कर रेड सी में टैंकरों को टारगेट किया था, जिससे सऊदी का तेल निर्यात रोकना पड़ा। इसके बाद 2022 में सऊदी-हूती शांति समझौता हुआ और उसके बाद से इस रास्ते पर ट्रैफिक सामान्य हो सका।
यानी सऊदी अरब ने पाइपलाइन बनाकर होर्मुज का तोड़ तो निकाल लिया, लेकिन बाब अल-मंदेब अब भी उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बना हुआ है। हूती विद्रोहियों की मौजूदगी इस रूट को हर वक्त खतरे में रखती है।
क्या आ सकता है नया ऑयल क्राइसिस: दुनिया के सामने दोहरा खतरा
Iran Israel War ने दुनिया के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। दुनिया की तेल सप्लाई अब सिर्फ एक स्ट्रेट पर निर्भर नहीं रह गई है, बल्कि कई नए जोखिमों में बंट गई है। एक तरफ स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद है और दूसरी तरफ बाब अल-मंदेब पर हूती विद्रोहियों का खतरा मंडरा रहा है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर यह दोनों पॉइंट्स एक साथ प्रभावित हुए, तो क्या दुनिया में एक नए ऑयल क्राइसिस का खतरा बढ़ सकता है? भारत जैसे देश के लिए यह और भी चिंता की बात है, क्योंकि भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा मध्य-पूर्व से आयात करता है। अगर दोनों समुद्री रास्ते एक साथ बंद होते हैं, तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है और आम आदमी की जेब पर सीधा असर पड़ सकता है।
जानें पूरा मामला
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया का सबसे अहम तेल मार्ग है, जहां से रोजाना करीब 2 करोड़ बैरल तेल गुजरता है। ईरान हमेशा से इस स्ट्रेट को अपना सबसे बड़ा हथियार मानता रहा है। जब भी ईरान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ता है, वह होर्मुज बंद करने की धमकी देता है। 1980-88 के ईरान-इराक युद्ध में पहली बार इस खतरे ने ठोस रूप लिया था, जिसके बाद सऊदी अरब ने ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन बनाकर इस समस्या का स्थायी समाधान निकाला। आज Iran Israel War के दौर में यही पाइपलाइन दुनिया की तेल सप्लाई को बचाने में अहम भूमिका निभा रही है।
मुख्य बातें (Key Points)
- Iran Israel War के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह बंद, लेकिन सऊदी की 1200 KM ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन (पेट्रोलाइन) से तेल सप्लाई जारी है।
- यह पाइपलाइन 1981 में ईरान-इराक युद्ध के दौरान बनाई गई थी, जिसकी क्षमता आज 50 लाख बैरल प्रतिदिन है।
- बाब अल-मंदेब स्ट्रेट पर हूती विद्रोहियों का खतरा सऊदी की सबसे बड़ी कमजोरी बना हुआ है।
- अगर होर्मुज और बाब अल-मंदेब दोनों एक साथ प्रभावित हुए, तो दुनिया में नए ऑयल क्राइसिस का खतरा बढ़ सकता है।
FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न








