Iran Army Power को लेकर पूरी दुनिया में चर्चा तेज हो गई है। अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच छिड़े युद्ध में जब अयातुल्ला अली खामेनई की मौत की खबर सामने आई तो एक सवाल ने हर जेहन को झकझोर दिया — आखिर वह कौन सी सेना है जो अब भी मोर्चे पर डटी है और बदले की आग में जल रही है? जवाब है — ईरान की न एक, बल्कि दो समानांतर सेनाएं। दोनों अलग-अलग मकसद से बनी हैं, अलग-अलग आदेश मानती हैं, लेकिन एक ही झंडे तले लड़ती हैं।
आर्टेश — ईरान की पारंपरिक राष्ट्रीय सेना
आर्टेश ईरान की वह रेगुलर मिलिट्री है जिसे दुनिया के किसी भी दूसरे देश की सेना की तरह समझा जा सकता है। इसकी भूमिका एकदम स्पष्ट है — देश की सीमाओं, आसमान और समुद्री रास्तों की रक्षा करना। इसमें अलग-अलग आर्मी, नेवी और एयरफोर्स ब्रांच हैं और यह ईरान की रक्षा मंत्रालय के अधीन काम करती है।
पारंपरिक सैन्य भूमिका पर केंद्रित यह सेना राजनीति से दूर रहती है। इसका काम विदेशी हमलों से मुल्क को बचाना है, न कि सियासी फैसलों में दखल देना।
आर्टेश की नींव कब और कैसे पड़ी?
ईरान की आधुनिक सेना की जड़ें 1920 के दशक में जाती हैं जब रजा शाह पहलवी सत्ता में आए। उनका सपना था कि ईरान मध्य पूर्व की सबसे बड़ी सैन्य ताकत बने। इसके लिए हजारों ईरानी सैन्य अधिकारियों को यूरोप और पश्चिमी देशों की अकादमियों में भेजा गया और विदेशी सैन्य विशेषज्ञों को ईरान बुलाया गया। यही वह दौर था जब ईरान ने अपनी आधुनिक एयरफोर्स और नेवी खड़ी की।
कोल्ड वॉर के दौरान ईरान अमेरिका का एक बड़ा रणनीतिक साझेदार बन गया। इस दौरान ईरानी सेना ने ओमान के सुल्तान की रक्षा में और दोफर क्षेत्र में वामपंथी विद्रोह को कुचलने में भी अहम भूमिका निभाई। 1970 के दशक तक ईरान मध्य पूर्व की सबसे शक्तिशाली सैन्य ताकत बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा था।
ईरान-इराक युद्ध ने बदल दी तस्वीर
1980 से 1988 तक चले ईरान-इराक युद्ध ने आर्टेश की असली परीक्षा ली। जहां दुनिया के कई बड़े देश सद्दाम हुसैन के साथ खड़े थे, वहीं ईरान लगभग अकेला इन सबसे लोहा ले रहा था। इस 8 साल के युद्ध ने आर्टेश को कमजोर किया और उसकी सैन्य रणनीति को नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया।
1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों ने एक और बड़ा झटका दिया। पश्चिमी देशों से हथियार मिलना बंद हो गए और ईरान को रूस, चीन और उत्तर कोरिया पर निर्भर होना पड़ा। साथ ही अपना घरेलू रक्षा उद्योग खड़ा करना भी मजबूरी बन गई।
नई रणनीति — हमला नहीं, बचाव
इन सभी घटनाओं ने ईरान की सैन्य सोच को पूरी तरह बदल दिया। ईरान ने यह स्वीकार कर लिया कि वह अमेरिका या इजराइल जैसी ताकतों से सीधे पारंपरिक युद्ध में नहीं जीत सकता। इसलिए एक नया ‘डिफेंसिव डॉक्ट्रिन’ अपनाया गया — दुश्मन को डराकर हमला रोको, मिसाइल ताकत बढ़ाओ और सीधी टकराहट से बचो।
संख्या के लिहाज से ईरान की आर्टेश मध्य पूर्व की सबसे बड़ी सेनाओं में से एक है, लेकिन आधुनिक हथियार सीमित हैं, सैन्य बजट पड़ोसियों से कम है और बड़े आक्रमण की क्षमता भी सीमित मानी जाती है। यानी आर्टेश का मकसद युद्ध शुरू करना नहीं, युद्ध को रोकना है।
IRGC — विचारधारा की रक्षा करने वाली दूसरी ताकत
इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) एक साधारण सेना नहीं है। यह ईरान की इस्लामिक क्रांति और शासन की वैचारिक रक्षा के लिए बनाई गई एक अलग किस्म की सैन्य ताकत है। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद नई सरकार को पुरानी सेना की वफादारी पर संदेह था, इसलिए IRGC का गठन किया गया।
धीरे-धीरे IRGC को ज्यादा फंड, ज्यादा हथियार और ज्यादा राजनीतिक शक्ति मिलती गई। यह सीधे सुप्रीम लीडर को रिपोर्ट करती है और रक्षा मंत्रालय से इसका कोई नाता नहीं। इसका अपना कमांड ढांचा है, अपनी ग्राउंड, नेवल और एयर ब्रांच है।
IRGC के अंदर कौन-कौन सी खास इकाइयां हैं?
IRGC की सबसे खतरनाक इकाई है कुद्स फोर्स जो विदेश में गुप्त ऑपरेशन चलाती है और दूसरे देशों में ईरान समर्थक गुटों को प्रशिक्षण व हथियार देती है। इसके अलावा बासीज एक बड़ी स्वयंसेवी मिलिशिया है जिसका इस्तेमाल देश के भीतर सुरक्षा और विरोध-प्रदर्शनों को दबाने के लिए किया जाता है।
IRGC का मिशन पारंपरिक युद्ध से कहीं आगे जाता है — यह सरकार की वैचारिक सुरक्षा, आंतरिक नियंत्रण और अपरंपरागत युद्ध तक फैला हुआ है। ईरान की अर्थव्यवस्था और राजनीति में भी इसकी गहरी जड़ें हैं।
आर्टेश और IRGC में फर्क क्या है?
आर्टेश का मकसद राष्ट्रीय रक्षा और सीमा सुरक्षा है जबकि IRGC को इस्लामिक क्रांति और शासन की रक्षा के लिए बनाया गया था। आर्टेश रक्षा मंत्रालय को रिपोर्ट करती है जबकि IRGC सीधे सुप्रीम लीडर के अधीन है। आर्टेश के पास पारंपरिक आर्मी, नेवी और एयरफोर्स हैं जबकि IRGC के पास इन सबके अलावा कुद्स फोर्स और बासीज भी हैं।
आर्टेश पारंपरिक युद्ध पर ध्यान देती है तो IRGC वैचारिक, अपरंपरागत और आंतरिक सुरक्षा संभालती है। राज्य की राजनीति में आर्टेश की भूमिका सीमित है जबकि IRGC ईरान की अर्थव्यवस्था और राजनीति दोनों में भारी असर रखती है।
2007 में दोनों सेनाओं के बीच नौसैनिक जिम्मेदारियां भी बांटी गईं — फारस की खाड़ी की सुरक्षा IRGC नेवी को सौंपी गई जबकि अंतरराष्ट्रीय समुद्री ऑपरेशन आर्टेश नेवी के हिस्से में रहे।
युद्ध की असली कमान किसके हाथ में?
यह सवाल आज सबसे अहम है। जब तक सुप्रीम लीडर थे, IRGC सीधे उनके आदेश पर चलती थी और यही ईरान की असली सैन्य धुरी थी। आर्टेश पारंपरिक मोर्चों पर डटी थी तो IRGC विदेशी ऑपरेशन, प्रॉक्सी युद्ध और आंतरिक सत्ता का केंद्र थी। सुप्रीम लीडर की मौत के बाद यह कमांड ढांचा किस तरह पुनर्गठित होगा, यह अभी भी दुनिया के रणनीतिकारों के लिए सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है।
मुख्य बातें (Key Points)
- ईरान के पास दो समानांतर सेनाएं हैं — आर्टेश (पारंपरिक राष्ट्रीय सेना) और IRGC (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स)।
- आर्टेश रक्षा मंत्रालय के अधीन काम करती है जबकि IRGC सीधे सुप्रीम लीडर को रिपोर्ट करती थी।
- IRGC के पास कुद्स फोर्स (विदेशी ऑपरेशन) और बासीज (आंतरिक मिलिशिया) जैसी खास इकाइयां हैं।
- 2007 में फारस की खाड़ी IRGC नेवी को और अंतरराष्ट्रीय समुद्री ऑपरेशन आर्टेश नेवी को सौंपे गए।
- ईरान की नई रणनीति ‘हमला नहीं, बचाव’ पर आधारित है — दुश्मन को डराकर युद्ध रोकना।








