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Space Data Center पर भारत की बड़ी तैयारी, Elon Musk से होगी टक्कर

भारतीय स्टार्टअप नीव क्लाउड इस साल के आखिर तक स्पेस में डेटा सेंटर का प्रोटोटाइप भेजेगा, अग्निकुल के साथ मिलकर बनाई गई योजना

The News Air Team by The News Air Team
शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026
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Space Data Center
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India Space Data Center Launch: भारत अंतरिक्ष में डेटा सेंटर लगाने की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रहा है। AI Impact Summit के दौरान भारतीय स्टार्टअप नीव क्लाउड (Neev Cloud) ने ऐलान किया कि वह इस साल के आखिर तक स्पेस में डेटा सेंटर का प्रोटोटाइप भेजेगा। इसके लिए चेन्नई की प्राइवेट स्पेस कंपनी अग्निकुल (Agnikul) के साथ पार्टनरशिप की गई है। दूसरी तरफ एलन मस्क (Elon Musk) भी दावा कर रहे हैं कि इसी साल स्पेस में डेटा सेंटर खोला जाएगा। यानी अंतरिक्ष में डेटा सेंटर की दौड़ शुरू हो चुकी है और भारत इसमें पीछे नहीं रहना चाहता।


क्या है पूरी योजना — भारत का पहला स्पेस AI डेटा सेंटर

नीव क्लाउड की पैरेंट कंपनी नेटला (Netla) के चीफ AI ऑफिसर विजय कुमार ने AI Impact Summit में इस पूरी योजना को विस्तार से समझाया। उन्होंने बताया कि नीव क्लाउड “इंडियाज फर्स्ट AI डेटा सेंटर इन स्पेस” बनाने पर काम कर रहा है।

इसके लिए कंपनी ने अग्निकुल के साथ पार्टनरशिप की है। अग्निकुल एक प्राइवेट स्पेस लॉन्च व्हीकल कंपनी है जो चेन्नई से काम करती है, जबकि नीव क्लाउड का हेडक्वार्टर बैंगलोर और इंदौर में है। अग्निकुल रॉकेट के जरिए पेलोड (डेटा सेंटर उपकरण) को अंतरिक्ष में ले जाएगा और वहां लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में डिप्लॉय कर देगा।

विजय कुमार ने बताया कि यह पेलोड कंप्यूट, स्टोरेज और नेटवर्क — तीनों क्षमताओं से लैस होगा। एक बार अंतरिक्ष में पहुंचने के बाद यह पूरी तरह ऑटोमेटिक तरीके से काम करेगा। किसी इंसान को वहां जाकर सेटअप करने की जरूरत नहीं होगी।


स्पेस में डेटा सेंटर क्यों? — जमीन पर क्या दिक्कत है?

यह सवाल स्वाभाविक है कि जब जमीन पर इतने सारे रिसोर्सेज उपलब्ध हैं, तो अंतरिक्ष में डेटा सेंटर खोलने की क्या जरूरत है? इसका जवाब दो शब्दों में है — पावर और कूलिंग।

आज दुनिया भर में डेटा सेंटर चलाने की सबसे बड़ी चुनौती ऊर्जा की खपत और कूलिंग है। हजारों सर्वर लगातार चलते हैं, भारी मात्रा में बिजली खर्च होती है और ओवरहीटिंग से बचने के लिए विशाल कूलिंग सिस्टम लगाने पड़ते हैं। AI के इस दौर में यह समस्या और भी विकराल हो गई है — AI मॉडल्स को ट्रेन करने और चलाने में बेहिसाब बिजली लगती है।

विजय कुमार ने बताया कि अंतरिक्ष में ये दोनों समस्याएं खत्म हो जाती हैं। स्पेस में सोलर एनर्जी मुफ्त में उपलब्ध है और अंतरिक्ष का प्राकृतिक वातावरण इतना ठंडा है कि कूलिंग की कोई जरूरत ही नहीं पड़ती। यानी जमीन पर जो दो सबसे बड़ी लागतें हैं — बिजली और कूलिंग — वे स्पेस में लगभग शून्य हो जाती हैं।

इसके अलावा जमीन पर डेटा सेंटर के लिए पानी की भी भारी खपत होती है कूलिंग के लिए, जो पानी की कमी वाले इलाकों में एक बड़ी समस्या है। अंतरिक्ष में यह चुनौती भी नहीं रहती।


डिफेंस में कैसे काम आएगा — 10-15 मिलीसेकंड में फैसला

स्पेस डेटा सेंटर का सबसे बड़ा फायदा अल्ट्रा लो लेटेंसी नेटवर्क है। विजय कुमार ने डिफेंस का उदाहरण देते हुए समझाया कि अगर हजारों ड्रोन एक साथ किसी बॉर्डर पर आ रहे हैं, तो उनकी इमेजेस को तुरंत प्रोसेस करके बेस स्टेशन तक भेजना होगा ताकि काउंटर अटैक किया जा सके।

यह पूरी प्रक्रिया सिर्फ 10 से 15 मिलीसेकंड में होनी चाहिए। इतनी तेज प्रोसेसिंग के लिए डेटा सेंटर का अंतरिक्ष में LEO ऑर्बिट में होना बड़ा फायदेमंद है, क्योंकि वहां से डेटा ट्रांसफर कम लेटेंसी और ज्यादा स्पीड के साथ होता है।

यही वजह है कि एलन मस्क के स्टारलिंक (Starlink) सैटेलाइट भी LEO ऑर्बिट में हैं — ताकि फास्ट और कंसिस्टेंट इंटरनेट स्पीड मिल सके। नीव क्लाउड का कॉन्सेप्ट भी बिल्कुल इसी तरह का है, बस फर्क यह है कि यहां इंटरनेट की जगह पूरा डेटा सेंटर अंतरिक्ष में होगा।


अगर GPU क्रैश हो गया तो? — सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन है जवाब

सबसे बड़ा सवाल जो हर किसी के मन में आता है — अगर स्पेस में GPU क्रैश हो गया या कोई खराबी आ गई तो कौन जाएगा ठीक करने? विजय कुमार ने इसका जवाब बड़े दिलचस्प तरीके से दिया।

उन्होंने बताया कि यह एक अकेला सैटेलाइट नहीं होगा, बल्कि सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन (सैटेलाइट्स का समूह) बनाया जाएगा। कई सैटेलाइट्स एक नोड की तरह मिलकर काम करेंगे। अगर एक सैटेलाइट फेल हो जाता है, तो उसका डेटा तुरंत दूसरे सैटेलाइट में ट्रांसफर कर दिया जाएगा और खराब सैटेलाइट को ऑर्बिट से डीऑर्बिट (बाहर) कर दिया जाएगा।

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यानी वहां जाकर रिपेयर करने की जरूरत नहीं होगी। पूरा सिस्टम इस तरह डिजाइन किया जाएगा कि वह सस्टेनेबल और रिलायबल हो।


सैम ऑल्टमैन ने कहा “बकवास” — नीव क्लाउड ने दिया जवाब

दिलचस्प बात यह है कि OpenAI के सीईओ सैम ऑल्टमैन (Sam Altman) ने हाल ही में कहा था कि “स्पेस में डेटा सेंटर खोलना बकवास (rubbish) है।” ऑल्टमैन का तर्क था कि अगर वहां GPU क्रैश हो गया तो कौन जाएगा ठीक करने।

लेकिन नीव क्लाउड के विजय कुमार ने इसका पुरजोर खंडन किया। उन्होंने कहा कि उनकी कंपनी जमीन पर भी डेटा सेंटर बना रही है — इंदौर और रायपुर में 1 गीगावॉट (GW) का डेटा सेंटर कैंपस बन रहा है। वे जमीनी चुनौतियों को अच्छी तरह जानते हैं — बिजली की कमी, कूलिंग की दिक्कत, पानी की किल्लत — ये सारी समस्याएं जमीन पर हैं, लेकिन अंतरिक्ष में नहीं।

यहां एक बात समझने लायक है — सैम ऑल्टमैन और एलन मस्क के बीच एक पुरानी प्रतिद्वंद्विता (rivalry) चलती रहती है। मस्क हमेशा से कहते रहे हैं कि स्पेस में डेटा सेंटर खोलने से भारी ऊर्जा बचेगी और कूलिंग की समस्या खत्म होगी। वहीं ऑल्टमैन इसे अव्यावहारिक मानते हैं। भारतीय स्टार्टअप का रुख मस्क की सोच से ज्यादा मिलता-जुलता है।


माइक्रोसॉफ्ट ने भी किया था प्रयोग — पानी के अंदर डेटा सेंटर

कूलिंग की समस्या कोई नई नहीं है। माइक्रोसॉफ्ट (Microsoft) ने भी इस चुनौती से निपटने के लिए अंडरवॉटर डेटा सेंटर का प्रयोग किया था — यानी समुद्र के पानी के अंदर सर्वर रखे ताकि प्राकृतिक कूलिंग मिल सके। इससे साबित होता है कि दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियां भी कूलिंग की समस्या से जूझ रही हैं।

अब जब गूगल (Google) ने भी भारत में गीगावॉट डेटा सेंटर का ऐलान किया है, तो एनर्जी कंजम्पशन का मुद्दा और बड़ा हो गया है। गीगावॉट का मतलब है कि इतनी बिजली से एक पूरा शहर रोशन हो सकता है — और यह सब सिर्फ डेटा प्रोसेसिंग के लिए खर्च होगा।

ऐसे में अंतरिक्ष में डेटा सेंटर का आइडिया इसलिए आकर्षक है क्योंकि वहां सोलर पावर अनलिमिटेड है और कूलिंग प्राकृतिक रूप से उपलब्ध है।


इस साल प्रोटोटाइप, मास डिप्लॉयमेंट कब?

विजय कुमार ने बताया कि इस साल के आखिर तक एक छोटा प्रोटोटाइप अंतरिक्ष में भेजा जाएगा — डेटा सेंटर का एक छोटा हिस्सा। इससे यह पता चलेगा कि यह कॉन्सेप्ट व्यावहारिक रूप से काम करता है या नहीं।

हालांकि मास डिप्लॉयमेंट — यानी बड़े पैमाने पर कई डेटा सेंटर अंतरिक्ष में भेजना — कब होगा, इसकी कोई टाइमलाइन अभी तय नहीं है। विजय कुमार ने इस सवाल पर कहा कि अभी इस बारे में टिप्पणी करना जल्दबाजी होगी।

अग्निकुल की टैगलाइन है — “Launch Anywhere, Anytime, Affordably” — यानी कहीं भी, कभी भी, सस्ते में लॉन्च करो। अगर यह सच में संभव हुआ, तो भारत अंतरिक्ष में डेटा सेंटर लगाने वाले पहले देशों में शामिल हो सकता है।


आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?

अगर अंतरिक्ष में डेटा सेंटर सफलतापूर्वक काम करने लगे, तो इसका सीधा असर आम लोगों पर भी पड़ेगा। AI सेवाएं सस्ती हो सकती हैं क्योंकि ऊर्जा की लागत घटेगी। इंटरनेट की स्पीड और भी तेज हो सकती है। डिफेंस सिस्टम मजबूत होगा। और सबसे बड़ी बात — पर्यावरण पर बोझ कम होगा क्योंकि जमीन पर बिजली और पानी की खपत घटेगी।

लेकिन यह सब अभी भविष्य की बात है। पहले प्रोटोटाइप सफल होना जरूरी है, फिर मास डिप्लॉयमेंट का रास्ता खुलेगा।


भारत की स्पेस टेक्नोलॉजी में बढ़ता दमखम

यह पूरा प्रोजेक्ट भारत के प्राइवेट स्पेस सेक्टर की बढ़ती ताकत का प्रतीक है। कुछ साल पहले तक भारत में स्पेस लॉन्च सिर्फ इसरो (ISRO) का काम माना जाता था। लेकिन अब अग्निकुल जैसी प्राइवेट कंपनियां अपने रॉकेट बना रही हैं और नीव क्लाउड जैसे स्टार्टअप अंतरिक्ष में डेटा सेंटर का सपना देख रहे हैं।

एलन मस्क की स्पेसएक्स (SpaceX) ने स्टारलिंक सैटेलाइट्स के जरिए LEO ऑर्बिट का कॉन्सेप्ट दुनिया भर में लोकप्रिय बनाया। अब भारतीय कंपनियां उसी LEO ऑर्बिट का इस्तेमाल डेटा सेंटर के लिए करने की कोशिश कर रही हैं। यह “मेड इन इंडिया डीप टेक” की दिशा में एक महत्वाकांक्षी कदम है।


मुख्य बातें (Key Points)
  • भारतीय स्टार्टअप नीव क्लाउड अग्निकुल के साथ मिलकर भारत का पहला स्पेस AI डेटा सेंटर बनाने जा रहा है — इस साल के आखिर तक प्रोटोटाइप अंतरिक्ष में भेजने की योजना है।
  • स्पेस में डेटा सेंटर के दो बड़े फायदे — सोलर एनर्जी मुफ्त मिलेगी और प्राकृतिक कूलिंग उपलब्ध होगी, जिससे जमीन पर आने वाली दो सबसे बड़ी लागतें खत्म हो जाएंगी।
  • डिफेंस में बड़ा फायदा — LEO ऑर्बिट से अल्ट्रा लो लेटेंसी नेटवर्क मिलेगा, जिससे ड्रोन अटैक जैसी स्थितियों में 10-15 मिलीसेकंड में डेटा प्रोसेस हो सकेगा।
  • सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन मॉडल अपनाया जाएगा — अगर एक सैटेलाइट फेल हो तो डेटा दूसरे में ट्रांसफर हो जाएगा, रिपेयर के लिए स्पेस में जाने की जरूरत नहीं होगी।
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