Harish Rana Last Rites की खबर ने आज पूरे देश को भावुक कर दिया है। गाजियाबाद के हरीश राणा, जो पिछले 13 सालों से कोमा में थे, उनका 25 मार्च को दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को एक ऐतिहासिक फैसले में हरीश के लिए इच्छा मृत्यु (Passive Euthanasia) की मंजूरी दी थी, जिसके बाद 14 मार्च को उन्हें AIIMS दिल्ली में भर्ती कराया गया था। 24 मार्च को शाम 4:10 बजे AIIMS के डॉक्टरों ने हरीश को मृत घोषित कर दिया और अगले दिन सुबह उनकी अंतिम विदाई हुई।
कैसे शुरू हुई Harish Rana की 13 साल की पीड़ा
साल 2013 में हरीश राणा पंजाब में बीटेक की पढ़ाई करने गए थे। वहां एक दुर्भाग्यपूर्ण हादसे में वे चौथी मंजिल की बालकनी से गिर गए। सिर में गंभीर चोट लगने के कारण हरीश कोमा में चले गए।
उसके बाद जो सिलसिला शुरू हुआ, वह 13 लंबे सालों तक चला। हरीश का दिमाग तो काम कर रहा था, लेकिन उनका शरीर पूरी तरह से बेजान हो चुका था। पाइप के जरिए उनके शरीर को जिंदा रखने के लिए प्रोटीन और जरूरी डोज दिए जाते थे। यह दर्द सिर्फ हरीश का नहीं, बल्कि उनके पूरे परिवार: माता-पिता, भाई-बहन, सभी का था।
पिता अशोक राणा ने सुप्रीम कोर्ट में लगाई गुहार
13 सालों तक हरीश के परिवार ने उनकी सेहत के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन जब उन्हें यह समझ आया कि परिवार की पीड़ा से कहीं ज्यादा हरीश की अपनी पीड़ा है, तो उनके पिता अशोक राणा ने एक बेहद कठिन फैसला लिया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में हरीश की इच्छा मृत्यु के लिए अपील दायर की।
मानवता के नाते सुप्रीम कोर्ट ने हरीश के केस का गहन अध्ययन किया। 11 मार्च को कोर्ट ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया कि हरीश की जो हालत है, वे इच्छा मृत्यु के हकदार हैं। कोर्ट ने कहा कि जो पीड़ा हरीश सह रहे हैं, उससे उन्हें निजात मिलनी चाहिए। भारत में किसी कोर्ट द्वारा इच्छा मृत्यु के लिए दिया गया यह पहला और सबसे अहम फैसला माना जा रहा है।
AIIMS में 10 दिनों तक चली Passive Euthanasia की प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 14 मार्च को हरीश को AIIMS अस्पताल में लाया गया। डॉक्टरों ने बेहद संवेदनशीलता के साथ उनके शरीर से जुड़े इंसुलिन और लाइफ सपोर्ट सिस्टम को धीरे-धीरे हटाना शुरू किया। पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ी प्राथमिकता यही थी कि हरीश को किसी भी तरह के दर्द का एहसास न हो।
कोर्ट ने इस बात का विशेष ध्यान रखा था कि भले ही हरीश का शरीर बेजान है, लेकिन उनके अंदर जान थी और मानवता के नाते उन्हें कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए। AIIMS के डॉक्टरों ने इसका पूरा ख्याल रखा। 14 मार्च से लेकर 10 दिनों तक यह प्रक्रिया चलती रही और आखिरकार 24 मार्च को शाम 4:10 बजे AIIMS के डॉक्टरों ने हरीश को मृत घोषित कर दिया।
जाते-जाते भी कई जिंदगियां बचा गए हरीश: Organ Donation की मिसाल
हरीश और उनके परिवार की इच्छा थी कि मृत्यु के बाद उनके शरीर का अंगदान किया जाए। परिवार ने इस इच्छा को पूरा किया और हरीश के अंगों का दान कर दिया गया। इस तरह हरीश जाते-जाते भी कई लोगों की जिंदगी बचा गए। जिनकी जानें खतरे में थीं, उन्हें हरीश के अंगदान से नई जिंदगी मिली। यह बात इस पूरी कहानी को और भी मार्मिक और प्रेरणादायक बना देती है।
ग्रीन पार्क श्मशान घाट पर भावुक माहौल में हुआ Harish Rana Last Rites
25 मार्च को सुबह 9 बजे का समय अंतिम संस्कार के लिए तय किया गया था। AIIMS अस्पताल से एंबुलेंस में हरीश के शव को ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया, जो AIIMS के पास ही स्थित है।
श्मशान घाट पर सबसे पहले हरीश के शव को विश्राम स्थल पर रखा गया। वहां परिजनों, रिश्तेदारों, पड़ोसियों और करीबियों ने उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि दी। सभी की आंखें नम थीं। एक छोटा बच्चा भी किसी की गोद में था जो बार-बार रो रहा था और चिल्ला रहा था। माहौल बेहद भावुक था, लेकिन सबके चेहरे पर एक राहत भी झलक रही थी कि 13 साल का वह असहनीय दर्द अब खत्म हो गया।
हरीश के पिता अशोक राणा सफेद कपड़ों में थे और मास्क लगाए हुए थे, क्योंकि वे लगातार अस्पताल में रहे थे।
फूलों की पंखुड़ियों से सजाई गई चिता: एक मुक्ति की विदाई
जब हरीश के शव को चिता के पास ले जाया गया तो वहां का नजारा बेहद खास था। चिता के चारों ओर के चबूतरे को फूलों की पंखुड़ियों से सजाया गया था। यह विदाई किसी साधारण अंतिम संस्कार जैसी नहीं, बल्कि एक मुक्ति का उत्सव थी। “राम नाम सत्य है” के मंत्रोच्चार के बीच विश्राम स्थल से चिता तक की यात्रा पूरी हुई।
हरीश का पूरा अंतिम संस्कार सनातनी पद्धति के अनुसार किया गया। उनके छोटे भाई आशीष ने मुखाग्नि दी और सारी विधि-विधान पूरे किए। सभी परिजनों ने अपने-अपने हिस्से की लकड़ी, धूप और अन्य सामग्री अर्पित की।
ब्रह्मा कुमारी की बहनों ने दिया आध्यात्मिक सहारा
इस पूरी प्रक्रिया में ब्रह्मा कुमारी समाज की बहनें भी मौजूद रहीं। ब्रह्मा कुमारी का मानना है कि आत्मा अमर होती है, बस शरीर नश्वर होता है। इससे पहले भी उनका एक वीडियो सामने आया था जिसमें वे हरीश से बात कर रहीं थीं और उन्हें समझा रहीं थीं कि शरीर खत्म होता है लेकिन आत्मा कभी नहीं मरती। उनकी उपस्थिति ने परिवार को इस कठिन समय में आध्यात्मिक सहारा दिया।
UP Congress अध्यक्ष अजय राय ने भी दी श्रद्धांजलि
अंतिम संस्कार के दौरान उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष अजय राय भी श्मशान घाट पहुंचे और हरीश को श्रद्धांजलि दी। चूंकि हरीश का परिवार गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश में रहता है, अजय राय इस परिवार की 13 साल की पीड़ा से परिचित थे। उनकी उपस्थिति ने दिखाया कि यह मामला सिर्फ एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरे समाज की संवेदना का विषय बन चुका है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला क्यों बदलेगा भारत की दिशा
हरीश राणा का मामला भारतीय न्यायिक इतिहास में एक मील का पत्थर बनकर उभरा है। यह पहली बार था जब सुप्रीम कोर्ट ने किसी व्यक्ति के लिए इच्छा मृत्यु की मंजूरी दी। इस फैसले ने उन तमाम परिवारों के लिए एक राह खोल दी है जो अपने किसी अपने को सालों से बेजान शरीर में तड़पते देख रहे हैं। कोर्ट ने जिस संवेदनशीलता और मानवीयता के साथ यह निर्णय लिया, उसे पूरे देश ने सराहा है।
लगभग एक-दो घंटे बाद हरीश का शव पंचतत्व में विलीन हो गया। सभी की आंखों में नमी थी, लेकिन दिलों में एक शांति भी थी कि 13 साल का वो अंतहीन दर्द अब खत्म हो गया। हरीश की आत्मा को शांति मिली और वे इस दुनिया से मुक्त हो गए।
मुख्य बातें (Key Points)
- हरीश राणा 2013 से 13 साल तक कोमा में रहे, उनका 25 मार्च को ग्रीन पार्क श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार किया गया।
- सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को ऐतिहासिक फैसले में इच्छा मृत्यु की मंजूरी दी, 24 मार्च को AIIMS में उन्हें मृत घोषित किया गया।
- हरीश के अंगदान से कई लोगों की जिंदगी बची, छोटे भाई आशीष ने सनातनी पद्धति से मुखाग्नि दी।
- यह भारत का पहला Passive Euthanasia केस माना जा रहा है, जिसने देशभर में बहस और संवेदना दोनों को जन्म दिया।








