Harish Rana Euthanasia Case: एक मां जो अपने ही बेटे के लिए मौत की गुहार लगा रही है। सुनने में यह बात जितनी क्रूर लगती है, हकीकत उससे कहीं ज्यादा दर्दनाक है। पिछले 11 सालों से बिस्तर पर पड़े हरीश राणा न खुद खा सकते हैं, न बोल सकते हैं, न चल सकते हैं और न ही अपनी कोई जरूरत बता सकते हैं। उनकी मां ने अब कोर्ट का दरवाजा खटखटाकर बेटे को इस असहनीय पीड़ा से मुक्ति दिलाने की मांग की है। यह मामला भारत में इच्छामृत्यु (Euthanasia) की बहस को एक बार फिर से जिंदा कर गया है।
11 साल से बिस्तर पर पड़े हैं हरीश राणा, मां अकेली कर रही देखभाल
हरीश राणा की मां की आवाज में दर्द और थकान दोनों साफ झलकती है। उन्होंने बताया कि हरीश पिछले 11 सालों से पूरी तरह बिस्तर पर हैं। उनके हाथ-पैर पूरी तरह टेढ़े हो चुके हैं, शरीर बिल्कुल कमजोर पड़ चुका है और पीठ पर बेडसोर (Bedsore) हो गए हैं जिनसे भयंकर बदबू आती है। मां ने बताया कि सुबह जब वे हरीश को उठाती हैं तो ऐसी बदबू आती है जैसे कोई सड़ा हुआ चूहा हो। नर्स से बात करने पर सलाह दी गई कि जख्म को खुला छोड़ दें, बंद न करें। तो अब वे सफाई करके घाव को खुला ही छोड़ देती हैं।
हरीश न कभी बोलते हैं कि उन्हें भूख लगी है, न कभी बताते हैं कि बिस्तर गीला हो गया है। मां ने कहा कि चाहे पूरा दिन खाना न दो, वे कभी नहीं बोलेंगे कि भूख लगी है। सब कुछ मां को अपनी मर्जी से करना पड़ता है। खाना देना, साफ करना, कपड़े बदलना, पाइप लगाना, सब कुछ।
अकेलेपन और बढ़ती उम्र ने तोड़ दिया है मां का हौसला
Harish Rana Euthanasia Case में सबसे दिल दहला देने वाला पहलू यह है कि मां खुद भी शारीरिक रूप से कमजोर हो चुकी हैं। उनके एक हाथ का ऑपरेशन हुआ है जिसकी वजह से वह हाथ ठीक से उठता नहीं है, और दूसरे हाथ में भी दर्द रहने लगा है। घर के बाकी सदस्य बाहर चले जाते हैं और कई बार मां बिल्कुल अकेली रह जाती हैं। ऐसे में हरीश को संभालना उनके लिए शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से असंभव होता जा रहा है।
मां ने बताया कि कल भी दो बार हरीश की पाइप छूट गई तो उन्हें अकेले ही बदलनी पड़ी। बड़ी मुश्किल होती है लेकिन मां हैं तो कर रही हैं। पर सवाल यह है कि कल को अगर वे खुद नहीं रहीं तो हरीश की देखभाल कौन करेगा। उनका एक और बेटा है जो जवान है और जिसकी शादी भी करनी है। पूरे परिवार का जीवन इस एक त्रासदी में बंधकर रह गया है।
मां की कोर्ट से गुहार: ठीक नहीं कर सकते तो मुक्त कर दो
मां की बात सुनकर कलेजा मुंह को आ जाता है। उन्होंने कहा कि हमने इन 11 सालों में कुछ नहीं छोड़ा। हर तरह का इलाज करवाया, हर तरह की सेवा की। लेकिन अब हालत सुधरने की कोई उम्मीद नहीं बची है। हरीश का शरीर दिन-प्रतिदिन और गिरता जा रहा है। मां ने कहा कि हम यह नहीं बोल रहे कि ठीक कर दो, बस इतना कह रहे हैं कि मुक्त कर दो इसको। क्योंकि अब इसकी तकलीफें देखी नहीं जातीं।
उनकी आंखों में आंसू थे जब उन्होंने कहा कि भगवान इतनी कष्ट थोड़ी देता। 11 साल हो गए हैं। अब तो बस यही लगता है कि भगवान अपने आप मुक्ति दे दे। उनका अपने पति से भी इस बात को लेकर कई बार झगड़ा हो चुका है क्योंकि उनका भरोसा अब उठ चुका है कि कोई चमत्कार होगा।
भारत में Euthanasia को लेकर क्या कहता है कानून
Harish Rana Euthanasia Case ने भारत में इच्छामृत्यु (Euthanasia) और गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार (Right to Die with Dignity) पर बहस को एक बार फिर तेज कर दिया है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 में ऐतिहासिक कॉमन कॉज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) को कुछ शर्तों के साथ मान्यता दी थी। इसके तहत अगर कोई मरीज स्थायी वनस्पति अवस्था (Persistent Vegetative State) में है और ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं है, तो लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने की अनुमति दी जा सकती है। हालांकि, इसके लिए एक जटिल कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है जिसमें मेडिकल बोर्ड की राय और हाई कोर्ट की मंजूरी जरूरी होती है।
सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia) यानी जानबूझकर किसी की जान लेना भारत में अभी भी पूरी तरह गैरकानूनी है। ऐसे में हरीश राणा की मां की गुहार कानूनी रूप से कितनी सफल हो पाएगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है। लेकिन यह मामला समाज से एक बड़ा सवाल जरूर पूछता है कि जब किसी इंसान की जिंदगी सिर्फ तकलीफ बनकर रह जाए तो गरिमा का क्या मतलब रह जाता है।
एक मां की लड़ाई जो सिस्टम से नहीं, किस्मत से है
इस पूरे मामले में सबसे मार्मिक बात यह है कि यह कोई ऐसी मां नहीं है जिसने अपने बेटे को छोड़ दिया हो। 11 साल तक उन्होंने दिन-रात एक करके हरीश की सेवा की है। अपने बीमार शरीर के बावजूद, अकेलेपन के बावजूद, आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी। लेकिन अब जब शरीर साथ छोड़ रहा है और बेटे की हालत बिगड़ती ही जा रही है, तो उनके पास कोर्ट के दरवाजे के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। यह मामला हमारे स्वास्थ्य तंत्र, सामाजिक सुरक्षा जाल और गंभीर रूप से बीमार मरीजों के परिवारों को मिलने वाली सहायता पर भी गंभीर सवाल खड़ा करता है। जब एक मां अपने बेटे के लिए मौत मांगे तो समझ लीजिए कि सिस्टम कहीं न कहीं बुरी तरह नाकाम हुआ है।
मुख्य बातें (Key Points)
- हरीश राणा पिछले 11 सालों से पूरी तरह बिस्तर पर हैं, न बोल सकते हैं, न खा सकते हैं, न चल सकते हैं। उनके शरीर पर बेडसोर हो चुके हैं और हाथ-पैर पूरी तरह टेढ़े हो गए हैं।
- मां ने कोर्ट से गुहार लगाई है कि बेटे को इस तकलीफ से मुक्त कर दिया जाए, क्योंकि 11 साल की सेवा के बावजूद हालत सुधरने की कोई उम्मीद नहीं बची है और मां खुद भी बीमार और कमजोर हो चुकी हैं।
- भारत में 2018 के सुप्रीम कोर्ट फैसले के बाद निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) सशर्त मान्य है, लेकिन इसकी कानूनी प्रक्रिया बेहद जटिल है और सक्रिय इच्छामृत्यु अभी भी पूरी तरह गैरकानूनी है।
- यह मामला भारत में गंभीर रोगियों की देखभाल, सामाजिक सुरक्षा और गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार पर बड़ी बहस को जन्म दे रहा है।








