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The News Air - Breaking News - Global EV Retreat: Honda-Ford-GM ने $70 Billion के EV Plans क्यों किए बंद?

Global EV Retreat: Honda-Ford-GM ने $70 Billion के EV Plans क्यों किए बंद?

Battery की ऊंची लागत, China निर्भरता और कमजोर Infrastructure ने खींचा EV का प्लग; Toyota पहले से था सही राह पर, BYD अकेली आगे

The News Air Team by The News Air Team
शुक्रवार, 20 मार्च 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, टेक्नोलॉजी
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Global EV Retreat
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Global EV Retreat Honda Ford GM Volkswagen: दुनिया की सबसे बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनियों ने इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) से हाथ खींचना शुरू कर दिया है। Honda, Ford, General Motors, Stellantis और Volkswagen जैसी दिग्गज कंपनियों ने मिलकर $70 बिलियन यानी लगभग ₹6.5 लाख करोड़ के EV प्रोजेक्ट को राइट-डाउन किया है। यानी इस रकम को बट्टे खाते में डाल दिया है। ये सभी कंपनियां अब वापस हाइब्रिड और पेट्रोल-डीजल इंजन की तरफ लौट रही हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ईवी की बैटरी चार्ज होने से पहले ही डिस्चार्ज हो जाएगी?


Honda: 70 साल में पहली बार घाटे की आशंका

Honda ने 16 मार्च को भारत में अपनी EV का प्रोडक्शन जरूर शुरू किया है। कंपनी अपने ‘O Alpha EV’ को राजस्थान में बनाने वाली है। लेकिन ग्लोबल स्तर पर कंपनी ने कई EV मॉडल कैंसिल कर दिए हैं।

इस रणनीतिक बदलाव के लिए Honda को 15.7 बिलियन डॉलर यानी तकरीबन ₹1.5 लाख करोड़ का नुकसान उठाना पड़ेगा। और यह सिर्फ ईवी की बात नहीं है। कंपनी की आर्थिक हालत भी ठीक नहीं है। 70 साल के इतिहास में पहली बार Honda को मुनाफा न होने की आशंका है और आने वाले कुछ सालों में 2.5 ट्रिलियन येन के घाटे का अनुमान लगाया जा रहा है।

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Ford, GM, Stellantis, Volkswagen: चारों तरफ EV को झटका

Honda अकेली नहीं है। Ford ने पौने दो लाख करोड़ रुपये के EV प्रोजेक्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। General Motors ने भी अपने बड़े EV प्रोजेक्ट से हाथ खींच लिए हैं। Stellantis ने ₹70,000 करोड़ के EV प्लान का फ्यूज उड़ा दिया है।

Volkswagen को EV की तरफ जाने के चक्कर में 5.1 बिलियन यूरो का भारी झटका लगने वाला है। यह सारी कंपनियां फिर से हाइब्रिड और पेट्रोल इंजन की तरफ लौट रही हैं।


Toyota: जब सब गलत थे, तब यह अकेली सही थी

इस पूरी कहानी में सबसे दिलचस्प किरदार Toyota का है। जब दुनिया की हर कार कंपनी इलेक्ट्रिक कार में अपना भविष्य ढूंढ रही थी, तब दुनिया की सबसे बड़ी ऑटो कंपनी को इसमें कोई खास ‘स्पार्क’ नजर नहीं आया।

FS की रिपोर्ट के मुताबिक Toyota के पूर्व CEO अकियो टोयोडा ने साल 2021 में ही साफ कर दिया था कि इलेक्ट्रिक कारें कंपनी के भविष्य का असली हिस्सा नहीं हैं। उन्होंने बैटरी की ऊंची लागत और बैटरी बनाते वक्त होने वाले कार्बन उत्सर्जन पर गंभीर सवाल उठाए थे। Toyota आज भी उस रुख पर कायम है और हाइब्रिड कारों पर अपना पूरा दांव लगाए है।


EV की असली समस्या: Lithium-Ion Battery और China का जाल

EV में दिक्कत खुद EV से नहीं, बल्कि उसमें लगने वाली Lithium-Ion Battery की कीमत से है। किसी भी EV की कुल कीमत का कम से कम 60 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ बैटरी का होता है। यानी एक लाख की EV में 60,000 रुपये तो बैटरी में ही चले जाते हैं।

दुनियाभर में सिर्फ चार-पांच कंपनियां ही Lithium-Ion बैटरी सेल बनाती हैं। भारत में यह बैटरी बनती भी नहीं। इसलिए ‘Made in India’ इलेक्ट्रिक कारों और स्कूटर्स के लिए इन्हें इंपोर्ट करना पड़ता है, जिससे कीमत और भी बढ़ जाती है।

सबसे बड़ी समस्या यह है कि Lithium-Ion Battery के लिए पूरी दुनिया चीन पर निर्भर है। इसी निर्भरता की वजह से जापान को नुकसान उठाना पड़ा। जापान ने काफी साल पहले ही इलेक्ट्रिक गाड़ियां बना ली थीं, लेकिन बैटरी सप्लाई चेन पर चीन की पकड़ ने उसे पीछे धकेल दिया।


Infrastructure और रख-रखाव: दूर की कौड़ी

EV की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होतीं। EV के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर यानी चार्जिंग स्टेशन भारत जैसे बड़े देश में बनने में सालों लगेंगे। सर्विस सेंटर पर EV ठीक करने वाले टेक्निशियन भी नहीं हैं।

यूजर से लेकर कंपनियों तक को अभी यह नहीं पता कि इस्तेमाल हो चुकी बैटरी को सही तरीके से डिस्पोज कैसे किया जाए। बैटरी बनाने की प्रक्रिया में होने वाले प्रदूषण का मुद्दा भी अभी तक ठीक से सुलझा नहीं है।


भारत में EV की रफ्तार और ‘Technology Dumping’ का खतरा

भारत में EV ने ठीक-ठाक रफ्तार पकड़ी है, खासकर शहरों में। MG, Hyundai और Tata Motors लगातार नए इलेक्ट्रिक वाहन लॉन्च कर रहे हैं। Maruti Suzuki ने भी Maruti Suzuki E Vitara लॉन्च कर दी है।

लेकिन यहां एक बड़ा खतरा है। भारत अतीत में कई पुरानी और अप्रचलित तकनीकों का डंपिंग यार्ड रहा है। जब वैश्विक कंपनियां किसी तकनीक से हाथ खींचती हैं, तो वह तकनीक अक्सर विकासशील देशों में धकेल दी जाती है। भारत को इस罗圈 से सावधान रहना होगा।


BYD: एकमात्र उम्मीद की किरण

इस निराशाजनक तस्वीर में एकमात्र उम्मीद BYD है। चीन की यह कंपनी सस्ती और तेज चार्ज होने वाली बैटरी पर तेजी से काम कर रही है। अगर BYD इसमें सफल होती है, तो शायद EV की कहानी एक बार फिर नई दिशा ले सकती है।

लेकिन अभी के लिए जो तस्वीर है वह यह है कि Honda, Ford, GM, Stellantis और Volkswagen जैसी दिग्गजों का एक साथ EV से पीछे हटना खतरे की घंटी है।


मुख्य बातें (Key Points)
  • Honda, Ford, GM, Stellantis और Volkswagen ने मिलकर $70 बिलियन (₹6.5 लाख करोड़ से अधिक) के EV प्रोजेक्ट राइट-डाउन किए हैं, और सभी हाइब्रिड व पेट्रोल इंजन पर लौट रही हैं।
  • Honda पर सबसे भारी मार: ₹1.5 लाख करोड़ का नुकसान, 70 साल में पहली बार मुनाफे की गुंजाइश नहीं; Ford का ₹1.75 लाख करोड़ और Stellantis का ₹70,000 करोड़ EV प्लान ठंडे बस्ते में।
  • असली समस्या Lithium-Ion Battery की ऊंची लागत (कार की कुल कीमत का 60%), चीन पर निर्भरता, Charging Infrastructure की कमी और Battery disposal का अनसुलझा मुद्दा है।
  • Toyota के पूर्व CEO अकियो टोयोडा ने 2021 में ही EV को लेकर संशय जताया था और Hybrid पर फोकस जारी रखा, जो आज सही साबित हो रहा है; BYD सस्ती और तेज-चार्ज बैटरी पर काम कर रही है।

FAQ: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Q1. बड़ी ऑटो कंपनियां EV से क्यों पीछे हट रही हैं?

मुख्य कारण Lithium-Ion Battery की ऊंची लागत है जो कार की कुल कीमत का 60% तक होती है। इसके अलावा बैटरी सप्लाई के लिए चीन पर अत्यधिक निर्भरता, EV Charging Infrastructure की कमी, सर्विस सेंटर की अनुपलब्धता और बैटरी निर्माण से होने वाला प्रदूषण भी बड़े कारण हैं।

Q2. Toyota ने EV पर क्यों दांव नहीं लगाया और क्या यह सही था?

Toyota के पूर्व CEO अकियो टोयोडा ने 2021 में ही कहा था कि EV कंपनी के भविष्य का असली हिस्सा नहीं हैं। उन्होंने Battery लागत और बैटरी बनाने से होने वाले Carbon emission को लेकर चेतावनी दी थी। आज जब बाकी कंपनियां EV से पीछे हट रही हैं, Toyota का Hybrid strategy सही साबित होता दिख रहा है।

Q3. भारत में EV की क्या स्थिति है और कोई खतरा है?

भारत में MG, Hyundai, Tata और Maruti Suzuki जैसी कंपनियां EV लॉन्च कर रही हैं और शहरों में मांग भी है। लेकिन भारत अतीत में पुरानी तकनीकों का ‘Dumping Yard’ रहा है। जब बड़ी ग्लोबल कंपनियां किसी तकनीक से हाथ खींचती हैं, तो वह अक्सर विकासशील बाजारों में धकेली जाती है।

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