General Naravane Book Controversy Rahul Gandhi : लोकसभा में आज एक अभूतपूर्ण हंगामा देखने को मिला। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को कैरवां पत्रिका की एक रिपोर्ट से महज चार-पांच पंक्तियां पढ़ने से रोक दिया गया। तरह-तरह के नियमों का हवाला देते हुए स्पीकर ने व्यवस्था दे दी। मामला था 2023 में सेनाध्यक्ष के पद से रिटायर हुए जनरल एमएम नरवणे के संस्मरण का, जो आज तक प्रकाशित नहीं हुआ है क्योंकि रक्षा मंत्रालय की एक कमेटी इसकी समीक्षा कर रही है।
दो साल में अपने ही जनरल की किताब को मंजूरी नहीं दी जाती है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह कह रहे हैं कि तथ्य सही नहीं होंगे तभी नहीं छपी, लेकिन सवाल उठता है कि क्या कमेटी ने अपनी रिपोर्ट दे दी है? इसी अप्रकाशित किताब की समीक्षा कैरवां पत्रिका ने छाप दी है, और इसी पर आज संसद में तूफान खड़ा हो गया।
“पुस्तक प्रकाशित ही नहीं है”
लोकसभा में जब राहुल गांधी ने कैरवां पत्रिका से पढ़ना शुरू किया, तो रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने तुरंत आपत्ति जताई। उन्होंने कहा, “मैं कॉन्फिडेंस के साथ कहना चाहता हूं, पुस्तक प्रकाशित ही नहीं हुई। लीडर ऑफ ऑपोजिशन अपनी तरफ से वो पुस्तक यहां प्रस्तुत कर दें। किस पुस्तक में लिखा है? वो मैं पुस्तक देखना चाहता हूं।”
इस पर राहुल गांधी ने जवाब दिया कि वे 100% ऑथेंटिक माध्यम से पूछना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि यह जनरल नरवणे का मेमॉयर है और वे इसी से कोट कर रहे हैं। लेकिन सत्ता पक्ष ने हंगामा खड़ा कर दिया।
जनरल नरवणे ने क्या लिखा है अपनी किताब में?
पूर्व सेनाध्यक्ष एमएम नरवणे ने अपनी अप्रकाशित किताब में 2020 के गलवान घाटी टकराव के समय प्रधानमंत्री मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। कैरवां पत्रिका में पत्रकार सुशांत सिंह ने 32 पन्नों की समीक्षा में इन आरोपों का विस्तृत ब्यौरा दिया है।
जनरल नरवणे लिखते हैं कि 31 अगस्त 2020 की रात सवा 5 बजे जब उन्हें जानकारी मिली कि पूर्वी लद्दाख में चीन के टैंक रेचिनला दर्रे पर आगे बढ़ रहे हैं, तो उन्होंने तुरंत रक्षा मंत्री को फोन किया और पूछा, “आप बताइए क्या करना है?”
“मेरे लिए क्या आर्डर है?”
उत्तरी कमांड से संदेश आया कि चीन के टैंक दर्रे से 1 किलोमीटर दूर भी नहीं हैं। जनरल नरवणे को बहुत तेजी से नेतृत्व का संदेश चाहिए था कि उन्हें क्या करना है। कमांड हमले के लिए तैयार था, लेकिन चीन की सेना से टकराव बहुत बड़ा हो सकता था। इसलिए उन्हें सरकार का आर्डर चाहिए था।
जनरल नरवणे लिखते हैं कि उन्होंने राजनाथ सिंह, अजीत डोबाल, दिवंगत जनरल बिपिन रावत, विदेश मंत्री एस जयशंकर सभी को फोन किया और पूछा, “मेरे लिए क्या आर्डर है?”
रक्षा मंत्री का जवाब चौंकाने वाला
रात 10:30 बजे राजनाथ सिंह ने जनरल नरवणे से फोन पर कहा, “मैं कुछ देर में बताता हूं।” देर होती जा रही थी। फिर राजनाथ सिंह ने उनसे फोन कर कहा, “मैंने प्रधानमंत्री से बात कर ली है। उन्होंने कहा है आप जो उचित समझिए वही कीजिए।”
यह पूरी तरह से सेना का फैसला बना दिया गया। सुशांत सिंह लिखते हैं कि प्रधानमंत्री से राय मांगी गई लेकिन उन्होंने कॉल नहीं लिया।
सेनाध्यक्ष पर आई पूरी जिम्मेदारी
अपनी किताब में जनरल नरवणे लिखते हैं, “मुझे एक विवादपूर्ण स्थिति मिली थी। अब इस आजादी के साथ सारी जिम्मेदारी मुझ पर थी। मैं आर्मी हाउस में था। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के नक्शे मेरे सामने थे। एक दीवार पर ईस्टर्न कमांड का नक्शा लटका हुआ था।”
वे आगे लिखते हैं, “मेरे दिमाग में 100 अलग-अलग ख्याल दौड़ रहे थे। देश कोविड की मार झेल रहा था। इकॉनमी कमजोर थी। ग्लोबल सप्लाई चेन बिखर गई थी। अगर यह टकराव लंबा हुआ तो क्या हम स्पेयर्स की सप्लाई सुनिश्चित कर पाएंगे? ग्लोबल एरीना में हमारे समर्थक कौन थे? और चीन-पाकिस्तान के साझा खतरे का क्या?”
युद्ध शुरू करना सिर्फ सेना का फैसला नहीं हो सकता
पत्रकार सुशांत सिंह अपनी रिपोर्ट में लिखते हैं कि युद्ध करना कभी भी सिर्फ सेना का फैसला नहीं हो सकता है। कारगिल युद्ध के समय हर फैसले पर कैबिनेट की सुरक्षा समिति की मोहर लगती थी, जिसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी हुआ करते थे।
इसी तरह 1971 के युद्ध के समय इंदिरा गांधी की सरकार फैसले लेकर सेना को आदेश देती थी। लेकिन जनरल नरवणे की किताब के अंश दिखा रहे हैं कि अगस्त 2020 के इस टकराव के समय वे अकेले पड़ गए थे। कुछ ही हफ्ते पहले 20 जवानों की कुर्बानी के बाद सरकार का रवैया यह था: “सेना जो ठीक समझे वो करे?”
भारत तैयार नहीं था
जनरल नरवणे अपनी किताब में इस बात का जिक्र करते हैं कि 2020 में हुए टकरावों के दौरान भारत तैयार नहीं था। वे लिखते हैं कि सीमा पर तैनात कमांडर बार-बार चीन के सामने मात खा रहे थे।
कई बार चीन के हेलीकॉप्टर आकर चेक कर जाते थे कि भारत की तरफ कैसा बिल्ड अप है, और भारत की सेना को उनके आने की कोई जानकारी नहीं होती थी। तैनात कमांडर बार-बार तैयारी में चूक रहे थे। यह अस्वीकार्य था। मामले को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था।
चीन को सीधा आर्डर, भारत को नहीं
जनरल नरवणे लिखते हैं कि चीन की तैयारी देखकर लगता था कि उन्हें अपने नेतृत्व के शीर्ष अधिकारियों से सीधा आदेश मिला हुआ था। लेकिन भारत के मामले में नरवणे पूछते रह गए, आर्डर आया ही नहीं।
यह वही समय था जब प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि “न कोई हमारी सीमा में घुसा है, न ही कोई घुसा हुआ है।” लेकिन जनरल नरवणे की किताब एक अलग तस्वीर पेश कर रही है।
2 साल से अटकी है किताब
2023 में रिटायरमेंट के बाद जनरल नरवणे ने अपना संस्मरण लिखा। किताब छपने वाली थी। उसका एक हिस्सा मीडिया में आ गया। फिर वह किताब आज तक नहीं छपी। 2 साल से किताब रक्षा मंत्रालय की कमेटी के पास है मंजूरी के लिए।
दिलचस्प बात यह है कि इस बीच पूर्व सेना अध्यक्ष की दूसरी किताब जरूर छप गई। “द कैंटोनमेंट कॉन्स्पिरेसी: अ मिलिट्री थ्रिलर” नामक यह फिक्शनल किताब मार्च 2025 में रिलीज हो रही है। जनरल नरवणे के ट्विटर हैंडल पर इस किताब की कई तस्वीरें मिल जाती हैं।
राम मंदिर उद्घाटन में बुलाए गए, किताब नहीं छपने दी
22 जनवरी 2024 को अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन में पूर्व सेना अध्यक्ष जनरल नरवणे को भी बुलाया गया था। वे गए भी। सवाल उठता है कि क्या ऐसे जनरल अपनी किताब में गलत लिख सकते हैं?
मंदिर के उद्घाटन में बुलाने के लिए जनरल ठीक हैं, लेकिन उनकी किताब छपने के लिए ठीक नहीं। यह विरोधाभास किसी से छिपा नहीं है।
रक्षा मंत्री का गंभीर आरोप
आज लोकसभा में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि जनरल नरवणे की किताब नहीं छपी क्योंकि उनके तथ्य सही नहीं होंगे। उन्होंने कहा, “यदि तथ्य सही होते तो निश्चित रूप से वह प्रकाशित होती। और यदि किसी ने प्रकाशन पर रोक लगा दी, ऐसा लगता था कि रोक गलत लगाई गई है, तो मिस्टर नरवणे कोर्ट से भी आदेश प्राप्त कर सकते थे।”
क्या भारत की सेना के प्रमुख रहे जनरल अपने संस्मरण में झूठ लिखेंगे? क्या रक्षा मंत्री अपने ही पूर्व जनरल पर गंभीर आरोप नहीं लगा रहे?
जनरल नरवणे का जवाब
अक्टूबर 2025 में खुशवंत सिंह लिटरेचर फेस्टिवल के कार्यक्रम में जनरल नरवणे से किसी ने सवाल किया कि अभी तक उनकी किताब प्रकाशित क्यों नहीं हुई। इस पर नरवणे ने जवाब दिया, “मेरा काम था किताब लिखना और उसे प्रकाशकों को दे देना। रक्षा मंत्रालय से अनुमति लेने का काम प्रकाशक का था। उन्होंने वह किताब मंत्रालय को दी। वह अभी तक रिव्यू में है।”
उन्होंने आगे कहा, “1 साल से अधिक समय बीत चुका है। प्रकाशक और रक्षा मंत्रालय एक-दूसरे के संपर्क में हैं। इसलिए इसका फॉलो अप करना मेरा काम नहीं। गेंद प्रकाशक और रक्षा मंत्रालय के पाले में है।”
सेनाध्यक्ष को भी चाहिए अनुमति
जिनके हर फैसले पर देश आंख मूंदकर भरोसा करता है, जिनके जवान जान देने से पीछे नहीं हटते, उनका यह जवाब ही अपने आप में आज के भारत के लिए शर्मिंदगी का कारण होना चाहिए।
जाहिर है, जनरल नरवणे जानते थे कि अगर इस मामले में सरकार पर पुस्तक न छापने देने के आरोप लगाएंगे तो सरकार के लिए अच्छा नहीं होगा। उन्होंने सरकार की मर्यादा की चिंता की, लेकिन क्या सरकार ने उनकी चिंता की?
लोकसभा में 40-45 मिनट हंगामा
राहुल गांधी इस समीक्षा से चार-पांच पंक्तियां सदन में पढ़ना चाहते थे, लेकिन सत्ता पक्ष ने हंगामा खड़ा कर दिया। राहुल गांधी को नियमों का हवाला देकर कई बार टोका गया। 40-45 मिनट तक पहली बार बहस हुई। सदन की कारवाई स्थगित कर दी गई।
राहुल गांधी कहते रहे कि उनकी पार्टी पर देशभक्ति से धोखा करने का आरोप लगा है, तो इस संदर्भ में वे चीन के आक्रमण के समय रक्षा मंत्री और प्रधानमंत्री मोदी के बारे में जनरल नरवणे ने क्या लिखा है, वह सदन में पढ़ना चाहते हैं।
“इसमें क्या चीज है जिससे ये घबरा रहे हैं?”
राहुल गांधी ने बार-बार सवाल उठाया, “मतलब इसमें क्या चीज है जिससे ये इतना घबरा रहे हैं कि मैं ये नहीं बोल पा रहा हूं? इसमें क्या लिखा है जिससे ये इतना घबरा रहे हैं कि मुझे ये पढ़ने नहीं दे रहे?”
उन्होंने स्पीकर से कहा, “इफ दे आर नॉट स्केयर्ड, दे शुड अलाउ मी टू रीड इट। व्हाई आर दे स्केयर्ड?”
नियमों की आड़ में रोका गया
लोकसभा स्पीकर ने कहा कि ऐसी पुस्तक और समाचार का उल्लेख सदन में नहीं होगा जिसका सभा की कारवाई से संबंध न हो। लेकिन यह तो अलग बात हो गई। राजनाथ सिंह और अमित शाह इस आधार पर आपत्ति कर रहे थे कि यह प्रकाशित नहीं है, इसलिए प्रमाणित नहीं है।
किताब का प्रकाशन तो रक्षा मंत्रालय की कमेटी के कारण रुका हुआ है। तब राजनाथ सिंह के इस दावे का क्या मतलब कि किताब प्रकाशित नहीं हुई?
अखिलेश यादव ने भी दिया साथ
राहुल गांधी के पक्ष में समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव ने भी कहा कि पत्रिका में जो छपा है उसे यहां पढ़ने देना चाहिए। उन्होंने कहा, “अध्यक्ष महोदय, चीन का सवाल बहुत सेंसिटिव है। अगर कोई सुझाव ऐसा है देश के हित में तो मैं समझता हूं लीडर ऑफ ऑपोजिशन को पढ़ देना चाहिए।”
उन्होंने याद दिलाया, “मुझे याद है डॉ. राम लोहिया, जॉर्ज फर्नांडीज नेता जी हमेशा यह बात कहते रहे कि हमें हमेशा चीन से सावधान रहना है।”
PM मोदी भी मौजूद थे
जिस वक्त यह हंगामा हो रहा था, लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मौजूद थे। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री अमित शाह, किरण रिजीजू और निशिकांत दुबे ने कई बार उठकर टोकना शुरू किया कि यह संस्मरण प्रकाशित नहीं है तो उसके हिस्से को सदन में कैसे पढ़ा जा सकता है।
इस पर कांग्रेस पक्ष ने कहा कि सदन में पहले भी पत्रिकाओं के हिस्से को पढ़ा गया है। राहुल गांधी कैरवां पत्रिका से पढ़ रहे थे।
जनरल ने कभी इनकार नहीं किया
पूर्व सेना अध्यक्ष एमएम नरवणे ने कभी नहीं कहा कि कैरवां पत्रिका में जिस किताब की समीक्षा छपी है वो किताब उन्होंने नहीं लिखी। लिखा तो उन्होंने ही है। फिर क्या इस आधार पर राहुल गांधी को रोका जा सकता है कि पुस्तक अप्रकाशित है, इसलिए प्रमाणित नहीं है?
पुस्तक का अप्रकाशित होना क्या मायने रखता है? जनरल का लिखना क्या कोई मायने नहीं रखता? अगर जनरल इंकार कर देते तो अलग बात होती।
क्या चीन पर कभी बहस नहीं होगी?
सवाल यह भी है कि क्या चीन के खतरे पर संसद में कभी कोई बहस नहीं होगी? किताब का प्रकाशन रक्षा मंत्रालय के अधीन है। आज तक अनुमति क्यों नहीं मिली?
ऑपरेशन सिंदूर के बाद विपक्ष ने बार-बार मांग की कि संसद का विशेष सत्र बुलाया जाए, त्वरित रूप से बहस हो, मगर नामंजूर कर दिया गया। 10 मई को भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध विराम की घोषणा पहले ट्रंप ने की। इसके ढाई महीने बाद जुलाई के अंत में जाकर ऑपरेशन सिंदूर को लेकर लोकसभा में बहस हुई।
गलवान के बाद कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं
गलवान के टकराव के बाद कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं हुई। संसद में कोई बहस नहीं हुई। सिर्फ विदेश मंत्री एस जयशंकर ने सदन में बयान दिया।
सेना के रिटायर्ड जनरल ने किताब में देश के हाल के इतिहास के सबसे बड़े सैन्य टकराव में से एक का ब्यौरा दिया, किताब छपने नहीं दी गई। क्या इस देश को यह जानने का भी अधिकार नहीं कि जिस सेना के दम पर सरकार चीन और पाकिस्तान को जवाब देने का दावा करती है, उस सेना ने किन हालात में चीन का सामना किया?
देश के प्रति निष्ठा का अपमान
क्या भारत की सेना के सेनाध्यक्ष रहे व्यक्ति की किताब को छपने से रोककर, तथ्यों के गलत होने के आरोप लगाकर, देश के प्रति उनकी निष्ठा और उनके सैनिक जीवन का अपमान नहीं है?
आज लोकसभा में राहुल गांधी को नहीं बोलने दिया गया। उनके साथ-साथ पूर्व सेना अध्यक्ष एमएम नरवणे को भी रोका गया और उन पर गंभीर आरोप भी लगा दिए गए।
जानें पूरा मामला
जून 2020 में गलवान घाटी में हुए टकराव में सेना के 20 अधिकारी और जवान शहीद हुए। इसके बाद अगस्त में फिर स्थिति बिगड़ने लगी। 31 अगस्त 2020 की रात जब चीन के टैंक कैलाश रेंज पर आगे बढ़े, तब सेनाध्यक्ष जनरल नरवणे ने सरकार से आर्डर मांगे। लेकिन उन्हें साफ निर्देश नहीं मिला। रक्षा मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री ने कहा है “आप जो उचित समझिए वही कीजिए।” जनरल नरवणे ने 2023 में रिटायरमेंट के बाद यह सब अपने संस्मरण में लिखा। किताब 2 साल से रक्षा मंत्रालय की कमेटी के पास पड़ी है। कैरवां पत्रिका ने इसकी समीक्षा छापी। आज जब राहुल गांधी ने इसे लोकसभा में पढ़ना चाहा तो सरकार ने रोक दिया।
मुख्य बातें (Key Points)
• पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे की किताब 2 साल से रक्षा मंत्रालय की कमेटी के पास पड़ी है और अभी तक प्रकाशित नहीं हुई
• किताब में जनरल ने लिखा है कि अगस्त 2020 में चीन के टैंक आगे बढ़ने पर उन्होंने सरकार से आर्डर मांगे लेकिन PM ने कहा “आप जो उचित समझें वही करें”
• लोकसभा में राहुल गांधी को कैरवां पत्रिका में छपी इस किताब की समीक्षा से चार-पांच पंक्तियां पढ़ने से रोका गया और 40-45 मिनट हंगामा हुआ
• रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि तथ्य सही नहीं होंगे इसलिए किताब नहीं छपी, जबकि जनरल ने कभी इनकार नहीं किया कि यह उनकी किताब नहीं है








