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The News Air - NEWS-TICKER - भारत में ट्रेन से उतारकर 15 से 70 साल के पुरुषों की जबरन नसबंदी,

भारत में ट्रेन से उतारकर 15 से 70 साल के पुरुषों की जबरन नसबंदी,

जापान में 9 साल के बच्चों को भी नहीं छोड़ा, क्या मिलेगा मुआवजा

The News Air Team by The News Air Team
मंगलवार, 9 जुलाई 2024
in NEWS-TICKER, राष्ट्रीय
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नई दिल्ली: जापान के सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में 1948 के एक कानून के तहत की गई जबरन नसबंदी को अवैध ठहरा दिया है। इस कानून के तहत जापान में छोटे से लेकर बड़ों तक की नसबंदी की गई थी। यह नसबंदी ठीक वैसे ही की गई थी, जैसा भारत में आपातकाल के दौरान हुआ था। यह मामला बाद में इतना उछला कि लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी सरकार को मुंह की खानी पड़ी थी। जापान के सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को पीड़ितों को 1.65 करोड़ येन और उनके परिजनों को 22 लाख येन बतौर मुआवजा देने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये कानून लोगों की गरिमा और उनके सम्मान के खिलाफ है। आइए जानते हैं कि आपातकाल के दौरान किस तरह और कैसे नसबंदी की गई थी। जापान में क्या था वह गैरकानूनी नियम, जिसके पीड़ितों को इंसाफ पाने में 75 साल लग गए।

भारत में जबरन नसबंदी के मास्टरमाइंड थे संजय गांधी

भारत में 25 जून, 1975 को तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने आपातकाल लगा दिया था। इमरजेंसी लगाने में इंदिरा के बेटे संजय गांधी की अहम भूमिका थी। उन्होंने 1976 में आबादी पर लगाम लगाने के लिए जबरन नसबंदी कराई थी। पांच सूत्री परिवार नियोजन का मकसद था आबादी पर लगाम लगाना। महज 19 महीने के ही दौरान करीब 83 लाख लोगों की नसबंदी कर दी गई थी। इसमें 15 साल के बच्चे से लेकर 70 साल तक के बूढ़ों की जबरन नसबंदी कर दी गई थी। नसबंदी में इतनी तानाशाही बरती गई कि कई जगहों पर जब भी ट्रेन रुकती तो परिवार नियोजन कैंपों के कर्मचारी यात्रियों को जबरन पकड़कर उनकी नसबंदी कर देते। दरअसल, उनको भी नसबंदी का टार्गेट मिला था। इस तानाशाही का नतीजा यह हुआ कि जब 1977 में आम चुनाव हुए तो इंदिरा गांधी हार गईं और जनता पार्टी सत्ता में आ गई।

पुलिस गांव घेर लेती और घरों से खींचकर की गई नसबंदी

दरअसल, 1975 में आपातकाल के दौरान नागरिक स्वतंत्रा अधिकारों को निलंबित कर दिया गया था। उस वक्त संजय गांधी ने इस अभियान को बेहद आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाया था। उस वक्त और बाद में इंदिरा पर ये आरोप लगे कि परिवार नियोजन के इस कार्यक्रम में सबसे अधिक निशाने पर गरीब आबादी रही। ऐसी भी रिपोर्ट थीं कि पुलिस ने गांवों को घेर लिया और पुरुषों को घरों से जबरन खींचकर उनकी नसबंदी की गई। इस अभियान को मशहूर उपन्यासकार सलमान रश्दी के उपन्यास ‘मिडनाइट चिल्ड्रन’ में भी जगह मिली।

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जापान में यूजेनिक्स लॉ, इस नियम से हुई नसबंदी

जापान में 1948 में यूजेनिक्स लॉ लाया गया, जिसके तहत अच्छी नस्ल के इंसानों की पैदाइश का फॉर्मूला अपनाया गया। नियम के अनुसार, अक्षम या विकलांग व्यक्तियों को बिना कोई कारण बताए नसबंदी कर दी जाती थी। यूजेनिक्स शब्द 1883 में ब्रिटिश यात्री और वैज्ञानिक फ्रांसिस गाल्टन ने ईजाद किया था। इसका मतलब यह था कि कुछ खास नस्ल को कुछ मनपसंद गुणों के साथ बढ़ावा देना। जैसे बुद्धिमान व्यक्तियों और सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित व्यक्तियों की नस्ल को आगे बढ़ाना ही यूजेनिक्स है।

जो गोरा नहीं उन्हें वंश बढ़ाने पर रोक

ऐसे में जो बीमार लोग हैं या जिनमें कोई आनुवांशिक विकार है, उन्हें अपनी संतान पैदा करने से रोकना है। जापान की साम्राज्यवादी सरकार ने तब जबरन यही कानून बनाकर लोगों की नसबंदी कर दी थी। इसमें गोरे लोगों के अलावा किसी भी रंग वाले लोगों, विकलांग और बीमार व्यक्तियों और एलजीबीटीक्यू के अपने वंश बढ़ाने पर रोक लगा दी गई थी।

क्या है कानून, कैसे अमल में लाया गया

जापान सरकार ने यूजेनिक्स प्रोटेक्शन कानून 1948 में लागू किया था। जब देश की तेजी से बढ़ती आबादी पर रोक लगाना भी इसका एक मकसद था। इस कानून को 1996 में खत्म किया गया। इस कानून में कहा गया था कि इसका मकसद मांओं की सेहत की सुरक्षा करना भी है। इस कानून के तहत किसी व्यक्ति के रिप्रोडक्टिव ग्लैंड्स को जबरन निकाल दिया जाता था। इसमें एक फिजिशियन इस ऑपरेशन को अंजाम देता था।

ऐसे व्यक्तियों का कानून के तहत नसबंदी

शीजोफ्रेनिया, एपिलेप्सी, डीफनेस, खराब हाथ या पैर, हीमोफीलिया से पीड़ित लोगों और अपराधियों की जबरन नसबंदी कर दी जाती थी। मेंटल डिसऑर्डर के नाम पर बहुतों के प्राइवेट पार्ट का ऑपरेशन कर दिया गया। यहां तक कि 9 साल के बच्चों का भी जबरन ऑपरेशन कर दिया जाता। माना जाता है कि देश में 16,500 लोग ऐसे थे, जिनके ऑपरेशन में उनकी सहमति नहीं ली गई थी। वहीं, 48 सालों के दौरान कम से कम 25 हजार लोगों की नसबंदी की गई थी।

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