Fear Management Tips, Metabolic Surgery for Diabetes, Curd in Winter : डर का असर सिर्फ दिमाग पर नहीं पड़ता, यह पूरे शरीर को हिलाकर रख देता है। वहीं भारत में 10 करोड़ से ज्यादा लोग डायबिटीज से जूझ रहे हैं और जब दवाइयां काम नहीं करतीं, तो Metabolic Surgery एक विकल्प बनकर उभरी है। साथ ही सर्दियों में दही खाने को लेकर भी लोगों के मन में कई सवाल हैं। आज हम तीनों अहम सेहत मुद्दों पर एक्सपर्ट्स की राय जानेंगे।
जब डर लगता है तो शरीर में क्या होता है?
रात को अचानक बुरा सपना आया और आप भड़भड़ाकर उठ गए। स्टोर रूम में लाइट गई और घुप अंधेरा देखकर दिल धड़कने लगा। या फिर कोई भूतिया मूवी देखी और दो-चार दिन अजीब से डर में बीते। ये सब आम बातें हैं जो हम सभी के साथ होती हैं। एग्जाम से पहले डर लगना, रिजल्ट देखने से पहले घबराहट होना या बॉस के बुलाने पर तनाव महसूस करना—यह भी बहुत सामान्य है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब हम डरते हैं तब दिमाग में क्या हो रहा होता है और शरीर कैसे रिएक्ट करता है?
Rocket Health की सुपरवाइजिंग काउंसलिंग साइकोलॉजिस्ट नंदिता कालरा बताती हैं कि जब हमें डर लगता है तो शरीर तुरंत “सर्वाइवल मोड” में चला जाता है। इस दौरान दिल तेजी से धड़कता है, सांसें तेज हो जाती हैं, मांसपेशियां सख्त पड़ जाती हैं और पसीना आने लगता है। दिमाग में एमिग्डला नाम का हिस्सा अलार्म बजाता है जबकि सोचने-समझने वाला हिस्सा यानी प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स पीछे चला जाता है। इसीलिए डर में हम ठीक से सोच नहीं पाते और अक्सर गलत रिएक्शन दे बैठते हैं। यह सब शरीर का हमें बचाने का तरीका है, लेकिन खतरा असली न भी हो तब भी शरीर वही प्रतिक्रिया देता है।
लंबे समय तक डर बना रहे तो क्या नुकसान होता है?
नंदिता कालरा आगे बताती हैं कि अगर डर या चिंता लंबे समय तक बनी रहे तो शरीर और दिमाग दोनों थकने लगते हैं। नींद खराब होती है, सिर दर्द और पेट की दिक्कतें बढ़ती हैं, थकान और चिड़चिड़ापन आता है। मानसिक स्तर पर एंग्जायटी, पैनिक अटैक, आत्मविश्वास में कमी और डिप्रेशन का खतरा बढ़ जाता है। लगातार डर में रहने से इम्यून सिस्टम भी कमजोर हो सकता है जिससे व्यक्ति को बार-बार बीमारियां हो सकती हैं। जब डर रोजमर्रा की जिंदगी को रोकने लगे तो यह सिर्फ एक भावना नहीं रहती बल्कि सेहत की गंभीर समस्या बन जाती है।
कौन सा डर नॉर्मल है और कब डॉक्टर को दिखाएं?
जब भी आप कोई नया काम करते हैं, परीक्षा देने जाते हैं, इंटरव्यू में जाते हैं या किसी अनजान स्थिति से पहली बार सामना करते हैं तो डर लगना बिल्कुल स्वाभाविक है। यह नॉर्मल है। लेकिन अगर डर बिना किसी वजह के आए, बहुत ज्यादा हो, महीनों या सालों तक बना रहे तो यह चिंता का विषय है। अगर डर की वजह से आप बाहर जाना, काम करना या लोगों से मिलना बंद कर दें तो समझ लीजिए कि यह सामान्य डर नहीं है।
पैनिक अटैक आना, सांस घुटने लगना, चक्कर आना या बहुत बेचैनी होना—ये सब संकेत हैं कि आपको प्रोफेशनल मदद की जरूरत है। ऐसी स्थिति में साइकोलॉजिस्ट या साइकेट्रिस्ट से मिलना समझदारी है, कमजोरी नहीं।
डर को मैनेज करने के आसान तरीके
नंदिता कालरा ने डर को मैनेज करने के कुछ आसान और कारगर तरीके बताए हैं। सबसे पहले अपने डर को नाम दीजिए और उसे दबाइए नहीं। धीमी और गहरी सांस लें। 4-6-8 ब्रीथिंग एक्सरसाइज बहुत कारगर है—चार सेकंड में सांस अंदर लें, छह सेकंड तक रोकें और आठ सेकंड में धीरे-धीरे छोड़ें।
अपने दिमाग को याद दिलाएं कि “मैं सुरक्षित हूं और यह भावना गुजर जाएगी।” अपनी डाइट से कैफीन और चीनी कम करें। नींद और रूटीन ठीक रखें। अगर इन सारे बदलावों के बाद भी डर बार-बार लौटता है तो किसी साइकोलॉजिस्ट या साइकेट्रिस्ट से बात करें। बात करने से डर कमजोर पड़ता है और मदद मिलती है।
भारत में Diabetes की भयावह तस्वीर
अब बात करते हैं एक और गंभीर सेहत समस्या की—डायबिटीज। हमारे देश को “Diabetes Capital of the World” कहा जाता है और इसकी वजह भी है। ICMR इंडिया बी 2023 की स्टडी के मुताबिक भारत में 10 करोड़ से ज्यादा लोगों को डायबिटीज है जबकि 14 करोड़ से ज्यादा लोग प्री-डायबिटिक हैं यानी डायबिटीज के खतरे में हैं।
पहले लोगों को लगता था कि डायबिटीज बुढ़ापे की बीमारी है लेकिन अब ऐसा नहीं है। युवाओं में भी यह तेजी से फैल रही है और बहुत सारे लोगों की डायबिटीज कंट्रोल से बाहर है।
Metabolic Surgery क्या है और यह कैसे मदद करती है?
AIIMS New Delhi के डिपार्टमेंट ऑफ सर्जरी में एडिशनल प्रोफेसर डॉ. मंजूनाथ मारुति पोल बताते हैं कि जब डायबिटीज लंबे समय तक कंट्रोल में नहीं रहती तो कई गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। इनमें किडनी फेलियर, हार्ट अटैक, स्ट्रोक, न्यूरोपैथी और रेटिनोपैथी जैसी समस्याएं शामिल हैं। जब लाइफस्टाइल सुधारने, अच्छी डाइट लेने और दवाइयां खाने के बाद भी किसी मरीज की डायबिटीज कंट्रोल में नहीं आती तब Metabolic Surgery एक विकल्प बनकर सामने आती है।
Manipal Hospital Ghaziabad के इंटरनल मेडिसिन कंसल्टेंट डॉ. अमन कुमार विस्तार से समझाते हैं कि Metabolic Surgery से मोटापा और टाइप-2 डायबिटीज जैसी मेटाबॉलिक बीमारियों को कंट्रोल करने में मदद मिल सकती है। इस सर्जरी का मकसद सिर्फ वजन घटाना नहीं है बल्कि यह शरीर के हॉर्मोन सिस्टम को सुधारती है ताकि ब्लड शुगर बेहतर तरीके से कंट्रोल हो सके।
Metabolic Surgery में क्या होता है?
डॉ. अमन कुमार बताते हैं कि इस सर्जरी में पेट और छोटी आंत की बनावट में बदलाव किया जाता है। सबसे पहले पेट का साइज छोटा कर दिया जाता है जिससे कम खाने से भी पेट भरा हुआ लगता है। शरीर में कम कैलोरी पहुंचती है और भूख बढ़ाने वाला हॉर्मोन ग्रेलिन कम बनता है।
पेट का साइज घटाने के बाद छोटी आंत के रास्ते को बदला जाता है जिससे खाना जल्दी आगे बढ़ता है। इन बदलावों से शरीर में GLP-1 यानी ग्लूकागन लाइक पेप्टाइड वन जैसे हॉर्मोन ज्यादा एक्टिव हो जाते हैं। यह एक इंक्रेटिन हॉर्मोन है जो खाने के बाद खून में शुगर लेवल कंट्रोल करने में मदद करता है और इंसुलिन के असर को भी बेहतर बनाता है। सर्जरी के बाद ज्यादातर मरीजों का ब्लड शुगर नॉर्मल होने लगता है और कभी-कभी डायबिटीज की दवाइयां भी कम या पूरी तरह बंद हो जाती हैं।
किसे कराना चाहिए Metabolic Surgery?
यह सर्जरी हर डायबिटिक पेशेंट के लिए नहीं है। डॉ. अमन कुमार बताते हैं कि यह सिर्फ उन्हीं के लिए है जिनकी डायबिटीज गंभीर रूप से अनकंट्रोल्ड है और दवाइयों, डाइट और लाइफस्टाइल बदलने से भी शुगर कंट्रोल में नहीं आ रही। जिनका वजन ज्यादा है, जिनका HbA1c लगातार हाई बना हुआ है और जिनमें डायबिटीज की वजह से दूसरे अंगों को नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ गया है—ऐसे लोगों को डॉक्टर Metabolic Surgery कराने की सलाह दे सकते हैं।
HbA1c एक ब्लड टेस्ट है जो पिछले तीन महीनों का औसत ब्लड शुगर लेवल बताता है। अगर यह लगातार हाई रहे तो यह संकेत है कि डायबिटीज कंट्रोल में नहीं है।
सर्दियों में दही खाना चाहिए या नहीं?
कई लोगों को लगता है कि सर्दियों में दही नहीं खाना चाहिए वरना जुकाम हो जाएगा या गला खराब हो जाएगा। लेकिन क्या वाकई ऐसा है? Artemis Hospitals की क्लीनिकल न्यूट्रिशन एंड डाइटेटिक्स टीम लीड डॉ. अंशुल सिंह इस बारे में स्पष्ट करती हैं।
उनके मुताबिक सर्दियों में दही खा सकते हैं लेकिन इसे किस वक्त खाना सही है यह जानना बहुत जरूरी है। सर्दियों में दही को दोपहर में ही खाना चाहिए। दोपहर 12 बजे से 3 बजे के बीच आप बिना किसी टेंशन के दही खा सकते हैं और इसे अपने लंच में शामिल कर सकते हैं।
दही खाने का सही तरीका
डॉ. अंशुल सिंह बताती हैं कि जब भी दही खाएं तो वह बहुत ज्यादा ठंडा न हो। दही रूम टेंपरेचर पर होना चाहिए—न तो ठंडा न गर्म। सर्दियों में सादा दही खाने के बजाय उसमें काली मिर्च, भुना जीरा और सेंधा नमक मिलाकर खाना बेहतर होता है।
सुबह-सुबह या रात में दही खाने से बचें। इससे सर्दी, जुकाम, गला खराब या खांसी हो सकती है। खासकर जिन्हें अस्थमा है या जिन्हें सर्दी बहुत जल्दी लग जाती है, उन्हें रात में दही बिल्कुल नहीं खाना चाहिए।
सर्दियों में दही खाने के फायदे
अगर आप सही वक्त पर सही तरीके से दही खाएंगे तो इसके खूब फायदे मिलेंगे। डॉ. अंशुल सिंह बताती हैं कि दही प्रोबायोटिक होता है यानी यह पाचन तंत्र में गुड बैक्टीरिया को बढ़ाता है। ये गुड बैक्टीरिया आपके दोस्त हैं जिनसे हाजमा सुधरता है और गैस, एसिडिटी, अपच और कब्ज जैसी दिक्कतें कम होती हैं।
प्रोबायोटिक से सिर्फ पेट की सेहत नहीं सुधरती बल्कि इम्यूनिटी भी मजबूत होती है। इम्यूनिटी मजबूत होगी तो शरीर बीमारियों और इनफेक्शन से बेहतर तरीके से लड़ पाएगा और सर्दियों में बीमार पड़ने का चांस कम होगा।
दही कैल्शियम और फॉस्फोरस का भी अच्छा सोर्स है। इनसे हड्डियां मजबूत होती हैं और सर्दियों में जोड़ों के दर्द में आराम मिलता है। दही में प्रोटीन भी खूब होता है और प्रोटीन को पचने में टाइम लगता है। इससे पेट देर तक भरा हुआ महसूस होता है, आप ओवर ईटिंग नहीं करते और वजन घटाने में मदद मिलती है। बस यह ध्यान रखें कि फुल फैट दही बहुत ज्यादा न खाएं। आप लो फैट या घर पर जमाया गया दही खा सकते हैं।
दही आपके दिल के लिए भी बहुत अच्छा है। इसमें मौजूद पोटेशियम ब्लड प्रेशर कंट्रोल करता है। पोटेशियम खाने से एक्स्ट्रा सोडियम पेशाब के जरिए शरीर से बाहर निकल जाता है और खून की नलियां रिलैक्स होती हैं। इससे खून का फ्लो सुधरता है और BP कंट्रोल में रहता है।
आम आदमी पर इसका क्या असर पड़ेगा?
यह जानकारी हर भारतीय परिवार के लिए महत्वपूर्ण है। डर को समझना और सही तरीके से मैनेज करना मानसिक सेहत के लिए बेहद जरूरी है। अगर डर आपकी रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर रहा है तो प्रोफेशनल मदद लेने में कोई शर्म नहीं होनी चाहिए।
डायबिटीज के बढ़ते मामलों में Metabolic Surgery एक नई उम्मीद है लेकिन यह सबके लिए नहीं है। सबसे पहले लाइफस्टाइल बदलें, सही डाइट लें और डॉक्टर की सलाह मानें। सर्दियों में सही तरीके से दही खाने से कई स्वास्थ्य लाभ मिल सकते हैं—बस सही समय और सही तरीका अपनाएं।
विश्लेषण: सेहत की तिहरी चुनौती
आज के दौर में भारतीय समाज तीन तरह की सेहत चुनौतियों से जूझ रहा है—मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं, जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां जैसे डायबिटीज और आहार संबंधी भ्रांतियां। डर को लेकर अभी भी समाज में एक चुप्पी है और लोग साइकोलॉजिस्ट के पास जाने में संकोच करते हैं जबकि समय पर मदद लेना ही समझदारी है।
डायबिटीज के मामले में भारत की स्थिति बेहद चिंताजनक है। 10 करोड़ मरीज और 14 करोड़ प्री-डायबिटिक—ये आंकड़े बताते हैं कि हमें अपनी जीवनशैली पर गंभीरता से ध्यान देना होगा। वहीं दही जैसे पारंपरिक खाद्य पदार्थों को लेकर भी सही जानकारी का अभाव है। सही समय और तरीके से खाया जाए तो दही सर्दियों में भी उतना ही फायदेमंद है जितना गर्मियों में।
मुख्य बातें (Key Points)
- डर के समय 4-6-8 ब्रीथिंग एक्सरसाइज करें—4 सेकंड में सांस लें, 6 सेकंड रोकें, 8 सेकंड में छोड़ें।
- भारत में 10 करोड़ से ज्यादा लोगों को डायबिटीज है और 14 करोड़ से ज्यादा प्री-डायबिटिक हैं।
- Metabolic Surgery उन्हीं के लिए है जिनकी डायबिटीज दवाइयों और लाइफस्टाइल बदलने से भी कंट्रोल नहीं हो रही।
- सर्दियों में दही दोपहर 12 से 3 बजे के बीच रूम टेंपरेचर पर, काली मिर्च और जीरा मिलाकर खाएं।
- डर बार-बार आए और रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो तो प्रोफेशनल मदद लेने में संकोच न करें।
FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न








