नाकाम चेहरे बनाम अनजान चेहरे, चेहरा बदल, चुनाव पलट


Sandeep-Pandit
पंडित संदीप

बीजेपी से विजय की विदाई हो गई है, चुनाव से ठीक पहले रूपाणी का रूप बदल बीजेपी ने सियासत का वही दांव खेला है जिसे खेलना उसकी मजबूरी है, महारत है, मनसा मनोकामना या मनमानी है मायने कुछ भी निकाले जा सकते हैं, पर मूल यही है कि “चेहरा बदल, चुनाव पलट” बीजेपी की तरकश का वो तीर है जो चुनाव से पहले चलाना बीजेपी का विपक्ष पर आखिरी वार और जनता की आँखों में धूल झोंक फूल खिलाने की कामयाबी की प्राचीन जन्मजात परंपरा बनी हुई है। जो आज भी ब्रह्मास्त्र बन बीजेपी की चुनाव से पहले चुनाव की राह आसान कर रही है, चुनाव से ठीक पहले चुनावी रण में चेहरा बदल नए महारथी की सारथी बन बीजेपी उसे सबसे शानदार, साफ स्वच्छ, सौम्य, सरल, ईमानदार छवि का गढ़ चुनावी बिगुल फूंक देती है, किसी अनजान व्यक्ति को चुनावी रण में हारी हुई बाजी जीतने का खेला कुर्सी फिर से कब जाने की बीजेपी की ये जन्मजात चाल है, जिसके जाल में विपक्ष बार-बार फंसती, उलझती, घिरती, हारती नजर आती है। जोर शोर से जिस नेता को चुनाव में भुनाती है बीजेपी उसी नेता को नाकाम, नाकारा, हारा, दागदार, मान बीजेपी हटाकर नए चेहरे पर दांव लगा बाजी पलट देती है। चुनाव खेला की माहिर बीजेपी फिर उस अनजान चेहरे को चमकाने में इस कदर धन वैभव चैनल के पर्दे खोल देती है, उसके प्रचार-प्रसार की आंधी इस कदर चलाती है कि दुत्कार, फटकार कर हटाए गए पुराने नकारा नेता का नाम भी जनता के जहन से मिट जाता है। कार्यकर्ता नए रूप के धूप में फूल को सींचने में जी जान से जुट जाते हैं पुराने चेहरे की मुक्ति पा नए चेहरे के पोस्टर चिपक जाते हैं, थके, पके, चुके पुराने नेता से मुक्ति पा कामयाबी की युक्ति मान बीजेपी चेहरा बदल कुर्सी कब्जा सत्ता का सिंहासन पा लेती है। पर सवाल उठता है एक ही चाल कब तक? एक ही कमाल कब तक?
चेहरा बदल चुनाव चमकाने वाली बीजेपी की आँखें चेहरों की चमक से चौंधिया गई मालूम होती है, ये वाला नहीं वो वाला अरे नहीं वो वाला ताश के पत्तों की तरह मुख्यमंत्रियों के चेहरे फेंके, बदले, पलटे, दांव पर लगाए जा रहे हैं। उत्तराखंड में तो हद हो गई त्रिवेंद्र रावत से कुर्सी छीन तीरथ रावत को शान से बिठाने वाली बीजेपी उनके ठीक से बैठने से पहले ही उठाकर दरबार से बाहर का दरवाजा दिखा महज छ महीने के भीतर ही तीसरे चेहरे के रूप में पुष्कर को खुश कर देवभूमि के सिंहासन पर सजा सबको हैरान ओर आपने ही नेताओं को परेशान करती रहती है।
9 नवंबर 2000 को जन्में उत्तराखंड में बीजेपी के चेहरे चुनाव आने से पहले बदले ही जाते रहे हैं। उत्तराखंड के पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी साल भर भी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान नहीं रह पाए। 2002 के चुनाव से पहले भगत सिंह कोश्यारी को बीजेपी ने कमान सौंपी चुनाव में कोश्यारी की होशियारी काम ना आई बीजेपी हार गई। कांग्रेस की सरकार एनडी तिवारी के नेतृत्व में 5 साल चली। साल 2007 के चुनावी समर में भुवन चंद खंडूरी पर बीजेपी ने दांव खेला सत्ता में बीजेपी की वापसी हुई, पहाड़ में कमल खिला पर आदतन मजबूर ईरादतन लाचार कमल दल ने दो साल बाद ही सन् 2009 में खंडूरी की छुट्टी कर रमेश पोखरियाल को सत्ताधीश बना दिया, चुनाव आने से पहले ही बीजेपी की चेहरा बदल बीमारी जाग गई और हताश रमेश को हटा बीजेपी फिर खंडूरी के शरण में आ गई, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी, यह चुनाव इतना आसान नहीं था 2012 के चुनाव में बीजेपी के सेनापति खंडूरी के खुद की जीत खंड खंड हो गई, बीजेपी की चेहरा बदल चुनाव जीतने की नीति देवभूमि में दूसरी बार धराशाई हो गई। विजय बहुगुणा कांग्रेस के नेता बन मुख्यमंत्री के रूप में सामने आए उनसे हरीश रावत में सत्ता छीन ली। सन् 2017 के चुनाव में बीजेपी ने कांग्रेस से फिर कुर्सी कब्जा ली और पहाड़ी राज्य में मुख्यमंत्री बदल योजना की मानो बाढ़ आ गई, जिसमे 6 महीने में तीन चेहरे डूबे, तरे और तरते नज़र आए।
गुजरात की कहानी भी देवभूमि से ज्यादा जुदा नहीं है, 1960 में बंबई से बिछड़ जन्मे गुजरात में तीस साल बाद केशुभाई और चमनभाई पटेल के गठजोड़ से सत्ता का पहला स्वाद बीजेपी ने चखा। 1995 में सत्ता की में बीजेपी की वापसी कराने वाले केशुभाई अपना कार्यकाल पूरा ना कर पाए और बीजेपी छोड़ने को मजबूर हो बीजेपी के ही खिलाफ एक नया दल बना पूरे बल से चुनावी मैदान लड़े भिड़े भी पर लड़ाका बन जीत ना सके। फिर 2001 में मोदी युग की शुरुआत हुई मोदी ने खुद की राजनीतिक चतुराई से अपनी छवि के समान और सामने किसी शख्स को टिकने ही नहीं दिया। 13 साल तीन कार्यकाल बिना एमएलए के सीएम बने मोदी पहली बार एमपी बनते हैं पीएम बन दिल्ली दरबार संभालने तक गुजरात की कुर्सी पर काबिज रहे और अपनी मर्जी से आनंदीबेन पटेल को गुजरात की पहली महिला मुख्यमंत्री होने का गौरव प्रदान कर अपना उत्तराधिकारी बना दिया। बात सन् 2014 की है, आनंदी का आनंद भी ज्यादा दिन कायम नहीं रह सका। 1 अगस्त 2016 को भारी विरोध, निष्क्रियता, नाकामयाबी की वजह से उम्र का बहाना बना आनंदीबेन से इस्तीफा लिखवा लिया गया। गुजरात बीजेपी ने फिर एक नए अनजान चेहरे विजय को कमान सौंपी विजय ने बीजेपी को बड़ी विजय भी दिलाई किंतु रुपाणी के रूप में अब वो दम नहीं बचा, विजय की हार वाली छवि देख बीजेपी ने पल में रुपाणी को राह दिखा पहली बार एमएलए बने भूपेंद्र को सीएम की कुर्सी पर बिठा नए चेहरे के साथ पुराना खेला शुरू कर दिया।
बीजेपी में चौंकाने, भौचक्का करने आश्चर्य में डालने का जो सस्पेंस गेम है वह मीडिया के कंधे पर बंदूक रख लड़ा जाता है। टीवी के पदों का खेला बनाया जाता है, नाकाम, नकारा, हटाए गए चेहरे की चर्चा इस खेल में छुप जाती है और अनजान चेहरे की परतें खुलने लगती हैं। लोग पुराने को भूल नए में मशगूल हो जाते हैं और बीजेपी चेहरा बदल चुनाव पलट की रणनीति में कामयाब हो जाती है उत्तराखंड में तीन कर्नाटक और गुजरात में एक एक पुराने चेहरे बदल बीजेपी अब हरियाणा पर वार कर मनोहर मुक्त होगी यह कयास लगाए जा रहे हैं। वैसे बीजेपी का पुरजोर प्रयास तो यूपी को योगी मुक्त करना भी था, पर शाह को मात दे बाबा अडिग कुर्सी कब्जाए जमे खड़े हैं लेकिन कब तक कहना संभव कहाँ है?
नरेंद्र मोदी की तरह ही यूपी में भी योगी को सीएम पहले एमएलए बाद में बनाया गया। भूपेंद्र पहली बार एमएलए बन गुजरता के सीएम बने। मनोहर लाल खट्टर, देवेंद्र फडणवीस, सर्वानंद सोनवाल, पेमा खांडू, जयराम ठाकुर, वीएस बोमई, विमल कुमार देव विप्लव कुमार देव त्रिवेंद्र रावत, तीरथ रावत, पुष्कर धामी यह सब चौंकानेवाले चेहरे बन चकते रहे हैं पर ये चमक चुनाव से पहले गुम कर दी जाती हैं, ज्यादातर तो कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पाए। बीजेपी अपने ही चेहरों को पीछे धकेल नया महारथी बना यह चुनाव से ठीक पहले मान ही लेती है कि जनता बदलाव चाहती है, कि इस चुनावी चाल के जाल में विपक्ष भी फंस जाता है और जनता पुराने नेता के पाप को भूल नए वाले को फूल थमा देती हैं। हारे हुए चेहरे को बदलने नए चेहरे से चुनाव जीतती आ रही बीजेपी की कलई अब खुल गई है, क्षेत्र के छत्रपो को धराशाई कर बीजेपी अनजाने चेहरों के दम पर जो बिसात बिछाती आ रही है उस खेल भनक अब विपक्ष को हो गई है। सवाल उठने लगे हैं नाकाम चेहरों को बदल अनजान चेहरे देने वाली बीजेपी पार्टी कैसे पाक साफ हो जाती हैं। बीजेपी का यह चेहरा बदल चुनाव का खेला पुराना हो गया है। नाकाम बनाम अंजान चेहरे की दौड़ में जनता को बहका कर बीजेपी के नेताओं के दम पर नैया पार होगी अब इतना भी आसान नहीं। कारण विपक्ष उफान पर है, नाव में भीतरघात का छेद है, स्थानीय नेताओं का विरोध है, मुद्दों का जोर, जुमले का शोर, मोदी की लोकप्रियता में भारी गिरावट, महंगाई में उछाल, बीजेपी में बौखलाहट है। चेहरा बदल योजना जीत की संभावना बनी रहेगी अब इतना आसान नहीं।


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