Epstein Files India Israel Connection: जिस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विमान तेल अवीव के हवाई अड्डे पर उतर रहा था, ठीक उसी समय दिल्ली में कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा एक लंबी और विस्फोटक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे। उन्होंने ईमेल दर ईमेल तारीखों के साथ बताया कि कैसे 2017 में केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी, कुख्यात यौन तस्कर जेफरी एप्सटीन और उद्योगपति अनिल अंबानी के बीच ईमेल का ऐसा सिलसिला चला जिसमें प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका और इसराइल यात्रा, वाइट हाउस से संपर्क और भारत की विदेश नीति — सब कुछ तय हो रहा था।
ईमेल दर ईमेल — 2017 में क्या हुआ था? कांग्रेस ने रखी पूरी टाइमलाइन
पवन खेड़ा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में तारीख-दर-तारीख पूरी टाइमलाइन रखी जो चौंकाने वाली है। 4 जनवरी 2017 को हरदीप सिंह पुरी ने जेफरी एप्सटीन को ईमेल किया — “आपसे मिलना है।” 6 जनवरी 2017 को दोनों की मुलाकात हुई। इसके बाद एप्सटीन ने दीपक चोपड़ा को मेल करके अनिल अंबानी के बारे में तहकीकात की।
21 फरवरी 2017 को अनिल अंबानी और जेफरी एप्सटीन की मुलाकात हुई। 2 मार्च 2017 को अनिल अंबानी ने एप्सटीन को ईमेल भेजा कि “वाइट हाउस भारत के साथ संबंधों को लेकर आपका मार्गदर्शन चाहिए।” एप्सटीन ने जवाब में पूछा — “बदले में मुझे क्या मिलेगा?” अनिल अंबानी का जवाब था — “भारत का पूरा बाजार।”
इसके बाद एप्सटीन ने इसराइल के पूर्व प्रधानमंत्री एहुद बराक को ईमेल लिखा कि अमेरिका के रक्षा सौदों में भारत की क्या भूमिका हो सकती है।
“नेतृत्व को आपकी मदद चाहिए” — अनिल अंबानी ने एप्सटीन से क्या मांगा?
16 मार्च 2017 का ईमेल सबसे विस्फोटक है। अनिल अंबानी ने जेफरी एप्सटीन को लिखा — “हेलो, मैं दिल्ली में हूं। नेतृत्व (भारत सरकार) आपकी मदद चाहता है कि मैं (अनिल अंबानी) जेरेड कुशनर (डोनाल्ड ट्रंप के दामाद) और स्टीव बैनन (ट्रंप के पूर्व चीफ स्ट्रैटेजिस्ट) से तुरंत मिल पाऊं। प्रधानमंत्री शायद मई में वाशिंगटन जाएंगे डोनाल्ड ट्रंप से मिलेंगे — उसमें भी मुझे आपकी मदद चाहिए।”
पवन खेड़ा ने सवाल उठाया कि अनिल अंबानी किसकी तरफ से यह सब कर रहे थे? इसमें विदेश मंत्रालय की कोई भूमिका नहीं है, भारत के राजदूत दरकिनार बैठे हैं — कभी हरदीप पुरी, कभी अनिल अंबानी और एप्सटीन मिलकर भारत की विदेश नीति चला रहे हैं।
“इसराइल जा रहे हैं 5-6 जुलाई को” — एप्सटीन को पहले कैसे पता चला?
29 मार्च 2017 का ईमेल और भी चौंकाने वाला है। अनिल अंबानी ने एप्सटीन को लिखा — “वाइट हाउस ने कल घोषणा की है कि प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका आ रहे हैं। क्या आपको मालूम है डेट्स क्या हैं?” इसके बाद अनिल अंबानी ने एप्सटीन को बताया कि “प्राइम मिनिस्टर ऑफ इंडिया 5-6 जुलाई 2017 को इसराइल जा रहे हैं, 7-8 को हैम्बर्ग जहां G20 है जहां वो डोनाल्ड ट्रंप से मिलेंगे, और एक अलग मीटिंग की भी प्लानिंग हो रही है डीसी में।”
एप्सटीन का जवाब आया — “जो मुझे जानकारी मिली है वह यह है कि इसराइल को लेकर आपकी क्या स्ट्रैटेजी होगी — मोदी की डेट्स ये सब उसी पर निर्भर करती हैं।” यानी पूरी विजिट, पूरी मीटिंग्स, ट्रंप और मोदी की मुलाकात — सब कुछ भारत की इसराइल स्ट्रैटेजी पर फोकस्ड था। और यह सब एक कुख्यात यौन तस्कर के जरिए तय हो रहा था।
पवन खेड़ा ने कहा — “शर्म आती है ना? आ रही है। मुझे भी आ रही है। ये ऐसी विदेश नीति है हमारी कि 2014 से लेकर आज तक ये लोग हमारी विदेश नीति चला रहे हैं। खून नहीं खौलता आपका?”
भारत-इसराइल दोस्ती का शोर — असली सवाल कहां गुम हो जाते हैं?
प्रधानमंत्री मोदी दूसरी बार इसराइल गए हैं। 2017 में पहली बार गए थे — उसी यात्रा के बारे में एप्सटीन फाइल्स से चौंकाने वाली जानकारियां सामने आई हैं। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि भारत-इसराइल की दोस्ती में भारत को असल में क्या मिल रहा है?
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान यह बात कई बार सामने आई कि चीन ने पाकिस्तान की मदद की, उसकी टेक्नोलॉजी ने भारत की चुनौती बढ़ाई। लेकिन क्या किसी ने सुना कि इसराइल ने भारत की मदद की? गलवान से लेकर डोकलाम तक — क्या इसराइल ने चीन के खिलाफ किसी भी टकराव में भारत का साथ दिया? दोस्ती तो तब भी थी।
भारत और इसराइल की दोस्ती के नाम पर मिलता क्या है? मिलता है पेगासस — जिसके सॉफ्टवेयर से पत्रकारों और विपक्ष के नेताओं की जासूसी की गई। यूरोप में इसराइल के हथियार खरीदने को लेकर काफी बवाल मचता है, लेकिन भारत में दोस्ती के शोर में यह बहस ही गुम हो जाती है।
ईरान पर हमले की तैयारी के बीच मोदी इसराइल में — क्या संदेश जा रहा है?
प्रधानमंत्री मोदी की इस इसराइल यात्रा का समय बेहद संवेदनशील है। जिनेवा में ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत चल रही है। अमेरिका ने ईरान को 48 घंटे की चेतावनी दी है कि अपने परमाणु कार्यक्रमों के बारे में लिखित प्रस्ताव भेजे। सबको पता है कि अमेरिका ईरान का कोई प्रस्ताव मानेगा नहीं और बातचीत नाकाम ही होनी है।
2 मार्च को इसराइल में प्यूरिम का त्यौहार है — जो फारसी लोगों के यहूदियों पर नाकाम हमले के जश्न का त्यौहार है। अगर ईरान का ऑफर सही नहीं हुआ तो इस त्यौहार के आसपास हमला होने की बात कही जा रही है। जिस समय प्रधानमंत्री मोदी इसराइल की संसद में भाषण दे रहे होंगे, उसी समय इसराइल के सैनिक अड्डों पर अमेरिका के F-22 लड़ाकू विमानों के बेड़े ईरान पर बमबारी की तैयारी में होंगे।
भारत ने ईरान में रहने वाले भारतीयों से कहा है कि वे ईरान छोड़ दें। क्या भारत अपने पारंपरिक मित्र ईरान को यही संदेश देना चाहता है कि वह उस पर होने वाले हमले को लेकर चिंतित नहीं है और उसने अपनी साइड चुन ली है?
हेक्सागन अलायंस — नेतन्याहू का नया खेल, भारत कहां फंस रहा है?
इसराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने एक नए गठबंधन का प्रस्ताव रखा है — हेक्सागन अलायंस। इस छह भुजाओं वाले गठबंधन में इसराइल, साइप्रस, ग्रीस, अफ्रीका के कुछ देशों और भारत को शामिल करने की अटकलें हैं। नेतन्याहू ने अपनी संसद में कहा कि यह ऐसा एक्सिस होगा जो “रेडिकल शिया और सुन्नी एक्सिस” की आंख में आंख मिलाकर देखेगा।
लेकिन हकीकत क्या है? यह गठबंधन अभी प्रस्तावित है, किसी भी देश ने सहमति नहीं दी। नेतन्याहू ने ग्रीस और साइप्रस का नाम लिया, लेकिन दोनों देश अंतरराष्ट्रीय क्रिमिनल कोर्ट (ICC) के सदस्य हैं — जिसने नेतन्याहू के खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट जारी किया हुआ है। अगर नेतन्याहू इन दोनों देशों में कदम रखें तो गिरफ्तार कर लिए जाएंगे।
अल जजीरा में छपे एक लेख में विश्लेषकों ने कहा कि नेतन्याहू के इस आइडिया में कोई दम नहीं — वे इसे नाटो जैसे गठबंधन के रूप में स्थापित करना चाहते हैं, मगर ऐसा करना संभव नहीं। अंतरराष्ट्रीय अखबारों में इसे लेकर कोई खास विश्लेषण ही नहीं मिला। फिर भी भारत के अखबार हेक्सागन अलायंस की खबरों से भर दिए जा रहे हैं।
गजा में 75,000 हत्याएं — क्या भारत इस नेता के नेतृत्व में जाएगा?
सवाल सीधा और कड़ा है — 2 साल में गजा में 75,000 लोगों की हत्या करने वाला इसराइल अपने आप को शांतिप्रिय देश कह रहा है। इसराइल के राजदूत रूजार ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा कि “दोनों देश पड़ोसी देशों की चुनौतियों से घिरे रहे, हमारा शांतिपूर्ण रवैया हमेशा कमजोरी के रूप में देखा गया।”
यह कैसी तुलना है? इसराइल ने 2025 में अपने पड़ोस के छह देशों पर हमला किया — फिलिस्तीन, ईरान, लेबनान, सीरिया, यमन। पांच अन्य देशों — इजिप्ट, तुर्की, सऊदी अरब, इराक और जॉर्डन — को धमकाया। गजा की जमीन पर कब्जा जमाने वाला देश उस भारत से अपनी तुलना कर रहा है जिसने दशकों तक अंग्रेजों से लड़कर अपनी जमीन आजाद कराई। वेस्ट बैंक में फिलिस्तीनियों के घरों पर बुलडोजर चलाकर हजारों परिवार बेघर कर दिए गए — इसराइल का अखबार हारेत्ज खुद इसे अपने पहले पन्ने पर छाप रहा है।
सऊदी अरब का सबक — वाहवाही और हकीकत में कितना फर्क है?
विदेश नीति की वाहवाही और जमीनी हकीकत में कितना फर्क है, इसका सबसे बड़ा उदाहरण सऊदी अरब है। प्रधानमंत्री मोदी तीन बार सऊदी अरब के दौरे पर जा चुके हैं — अप्रैल 2016, अक्टूबर 2019 और अप्रैल 2025 में। सऊदी अरब ने प्रधानमंत्री मोदी को अपने देश का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भी दिया।
लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के बाद क्या हुआ? जिस समय भारत पाकिस्तान को दुनिया की नजरों में आतंकवाद का समर्थक साबित करना चाहता था, उसी समय सितंबर 2025 में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच रणनीतिक समझौता हो गया — कि दोनों देश एक-दूसरे पर हमले को अपने ऊपर हमला मानेंगे। भारत इसे रोक नहीं पाया।
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत अकेला पड़ गया था — चीन खुलकर पाकिस्तान का साथ दे रहा था, राष्ट्रपति ट्रंप पाकिस्तान के सेना प्रमुख के साथ लंच कर रहे थे। भारत को 30 देशों में प्रतिनिधि भेजने पड़े, लेकिन किसी ने पाकिस्तान के साथ कड़ाई नहीं की। गले लगने और “माय फ्रेंड” कहने का कूटनीति में जीरो रोल होता है — 12 साल बाद यह बात सिद्ध हो गई है।
“अपना हित” के जुमले के पीछे क्या छिपा है?
आजकल विदेश नीति के हर विश्लेषण में एक जुमला चिपका दिया जाता है — “अपना हित।” जैसे मंदिरों के आगे “प्राचीन” लिख दिया जाता है, वैसे ही हर विदेश दौरे पर “अपने हित में” लिख दिया जाता है। लेकिन अगर “अपना हित” इतना ही प्रबल है तो कुछ सवालों का जवाब कौन देगा?
अपना हित छोड़कर रूस और ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया भारत ने। ईरान के चाबहार प्रोजेक्ट से निकल आने की तैयारी है। जनवरी में ईरान के विदेश मंत्री के भारत दौरे को टाल दिया गया। रूस और ईरान को लेकर पब्लिक में भारत बयान तक नहीं दे पाता। लेकिन 20 फरवरी को अमेरिका के नेतृत्व वाले पैक्स सिलिका गठबंधन में शामिल हो गया। यूरोप के कई देशों ने अमेरिकी टैरिफवाद की खुलकर निंदा की, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी का कोई बयान याद आता है? तो फिर किस तर्क से इसे “अपने हित में” बताया जाए?
आयरन डोम की चर्चा — वाहवाही में असलियत कहीं छिप न जाए
कुछ जगहों पर यह चर्चा आ रही है कि इसराइल भारत को अपना शक्तिशाली आयरन डोम सिस्टम की टेक्नोलॉजी दे देगा — जो आज तक किसी को नहीं दी गई — और इसका उत्पादन भारत में होगा। अगर ऐसा हुआ तो बड़ी बात होगी। लेकिन अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
न्यूयॉर्क टाइम्स में एक हालिया विश्लेषण में अमेरिका के ही एक्सपर्ट कह रहे हैं कि आयरन डोम से 80% मिसाइलें नष्ट करने के बाद भी ईरान ने इसराइल में अच्छा खासा नुकसान कर दिया था। ईरान ने इतनी हालत खराब कर दी कि इसराइल सोचने लगा कि बाकी इंटरसेप्टर किसी तरह बच जाएं। पिछले साल जून में इसराइल की मदद के लिए अमेरिका को आगे आना पड़ा।
असली सवाल — जो कभी नहीं पूछे जाते
भारत और इसराइल की दोस्ती से किसी को दिक्कत नहीं होनी चाहिए। विदेश संबंधों में जटिलताएं होती हैं, अधूरापन होता है, अनिश्चितता होती है। लेकिन 2014 के बाद विदेश नीति को लेकर जो माहौल बनाया गया, उसमें ढोंग बहुत ज्यादा है। कुछ होने से पहले ढोल बजाने लग जाते हैं।
इसराइल के संसद में भाषण देना अगर बहुत बड़ी बात है, तो नेपाल की संसद में जो भाषण हुआ उसका क्या रिजल्ट निकला? क्या भारत-नेपाल के संबंध बेहतर हुए या अविश्वास की खाई और गहरी हो गई? अमेरिका की संसद में भी प्रधानमंत्री का भाषण हुआ — लेकिन टैरिफ के कारण भारत एक साल से दबाव की स्थिति में है, सरेआम बोल तक नहीं पा रहा।
क्या प्रधानमंत्री मोदी इसराइल की संसद में गजा के नरसंहार की बात करेंगे? वेस्ट बैंक की बात करेंगे? ट्रंप के “Board of Peace” की बात करेंगे? ईरान की बात करेंगे? या फिर वाहवाही के शोर में ये सारे सवाल हवा हो जाएंगे?
मुख्य बातें (Key Points)
- कांग्रेस ने एप्सटीन फाइल्स के हवाले से दावा किया कि 2017 में मोदी की इसराइल यात्रा से पहले हरदीप सिंह पुरी, अनिल अंबानी और एप्सटीन के बीच ईमेल का सिलसिला चला — अनिल अंबानी ने एप्सटीन को “भारत का पूरा बाजार” देने का वादा किया और प्रधानमंत्री की यात्रा की तारीखें तक बताईं।
- ईरान पर हमले की तैयारी के बीच प्रधानमंत्री मोदी का इसराइल दौरा गंभीर सवाल खड़ा करता है — जिनेवा में बातचीत चल रही है, अमेरिका ने 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया है और 2 मार्च को प्यूरिम त्यौहार के आसपास हमले की आशंका जताई जा रही है।
- हेक्सागन अलायंस अभी प्रस्तावित है, किसी देश ने सहमति नहीं दी — अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक इसे नेतन्याहू की कोरी कल्पना मान रहे हैं, जबकि ग्रीस और साइप्रस ICC सदस्य हैं जहां नेतन्याहू गिरफ्तार हो सकते हैं।
- विदेश नीति में वाहवाही और हकीकत का फर्क — सऊदी अरब ने पाकिस्तान से रणनीतिक समझौता कर लिया, ऑपरेशन सिंदूर में भारत अकेला पड़ गया, और “अपने हित” के जुमले के बावजूद रूस-ईरान से किनारा और अमेरिका की हर बात मानना जारी है।








