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The News Air - Breaking News - E20 Petrol से गाड़ियों का बड़ा नुकसान! सुप्रीम कोर्ट में हुआ बड़ा खुलासा

E20 Petrol से गाड़ियों का बड़ा नुकसान! सुप्रीम कोर्ट में हुआ बड़ा खुलासा

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में माना कि E20 पेट्रोल अभी प्रयोग के दौर में है, लेकिन एक्सपेरिमेंट आम लोगों की गाड़ियों पर हो रहा है—इंश्योरेंस कंपनियां भी हो रही हैं मुंह मोड़

Ajay Kumar by Ajay Kumar
सोमवार, 6 जुलाई 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, काम की बातें, राष्ट्रीय
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E20 Petrol
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E20 Petrol Engine Damage: सुप्रीम कोर्ट में एक केस की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के वकील ने एक ऐसा बयान दिया जिसने पूरे देश में हलचल मचा दी। वकील ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि E20 पेट्रोल प्रोग्राम अभी एक्सपेरिमेंट के तौर पर चल रहा है। देखा जाए तो यह बात अपने आप में चौंकाने वाली है क्योंकि आम तौर पर कोई भी दवा या उत्पाद पहले चूहों या लैब में टेस्ट किया जाता है, लेकिन यहां एक्सपेरिमेंट सीधे आम जनता की गाड़ियों पर किया जा रहा है। यह कहना गलत नहीं होगा कि गाड़ी मालिक अनजाने में एक बड़े प्रयोग का हिस्सा बन गए हैं।

हालांकि बाद में जब यह बयान मीडिया में छाया और हर न्यूज़पेपर में सुर्खियां बनी, तो सरकार और उसके वकील ने इससे मुंह मोड़ लिया। कहा गया कि यह रिकॉर्डिंग गलत है और ऐसा कुछ नहीं कहा गया। लेकिन सवाल यह उठता है कि अगर सब कुछ ठीक है, तो जब-जब रिसर्च रिपोर्ट मांगी जाती है, सरकार क्यों चुप हो जाती है?

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क्या है E20 पेट्रोल और कैसे हुई शुरुआत?

E20 पेट्रोल का मतलब है ऐसा पेट्रोल जिसमें 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाया गया है। सरकार का मकसद है कि पेट्रोल के आयात पर निर्भरता कम हो और देश में उगाई जाने वाली गन्ने से बने एथेनॉल का इस्तेमाल बढ़े। यह पर्यावरण के लिए भी बेहतर माना जाता है। अहम बात यह है कि अन्य देशों जैसे ब्राजील, अमेरिका और थाईलैंड में भी एथेनॉल ब्लेंडिंग होती है।

पर दिलचस्प बात यह है कि उन देशों में यह प्रक्रिया धीरे-धीरे अपनाई गई। पहले E5 आया, फिर कई साल बाद E10, और फिर E15 या E20। लेकिन भारत में 2020 से सीधे E20 की तरफ तेजी से कदम बढ़ाए गए, और अब सरकार अगले साल E30 लाने की योजना बना रही है। यह रैपिड ट्रांजिशन ही असली समस्या बन गया है।

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66% पुरानी गाड़ियों की माइलेज में 10-25% की गिरावट

आम लोगों और कई सर्वे डेटा के अनुसार, 2023 से पहले की गाड़ियों (BS4 और BS6 Phase 1) की माइलेज में 10 से 25 प्रतिशत तक की कमी आई है। अगर गौर करें तो करीब 66 प्रतिशत पुरानी गाड़ियों के मालिकों ने इसकी शिकायत की है। वहीं, 2023 के बाद की गाड़ियों में लगभग 10 प्रतिशत के आसपास का फर्क देखा गया है।

समझने वाली बात यह है कि जो गाड़ी पहले 15 किमी प्रति लीटर देती थी, अब वह 12-13 किमी में सिमट गई है। इसका मतलब साफ है—आम आदमी की जेब पर सीधा असर पड़ रहा है। रोजाना पेट्रोल भरवाने वाला व्यक्ति खुद महसूस कर रहा है कि पहले जितने पैसे में पूरा हफ्ता चलता था, अब वही रकम तीन-चार दिन में खत्म हो रही है।

लेकिन जब सरकार से पूछा गया, तो जवाब आया—नहीं, हमारी स्टडी के अनुसार केवल 6 प्रतिशत तक का ही अंतर है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि यह “स्टडी” कौन सी है, कहां हुई, किसके द्वारा की गई—इसका कोई रिकॉर्ड सार्वजनिक नहीं किया गया।

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इंजन खराब हो रहे हैं, फ्यूल टैंक में जंग लग रहा है

सर्वे में करीब 55 प्रतिशत पुरानी गाड़ियों के मालिकों ने बताया कि उनकी गाड़ियों की टूट-फूट और मेंटेनेंस कॉस्ट बढ़ गई है। इंजन चोक हो रहे हैं, इंजेक्टर खराब हो रहे हैं, गैसकेट फेल हो रही है और फ्यूल टैंक में जंग लग रही है।

ऐसा क्यों हो रहा है? तकनीकी कारण यह है कि एथेनॉल की एक खासियत है—यह पानी को आसानी से सोख लेता है। जब ईंधन में नमी मिल जाती है, तो यह धातु के पुर्जों को नुकसान पहुंचाती है। पुरानी गाड़ियों के इंजन E20 के लिए डिजाइन ही नहीं किए गए थे। उनमें E5 या E10 तक ही सुरक्षित माना गया था।

और बस यहीं से शुरू हुई असली कहानी। गाड़ी मालिक मैकेनिक के पास पहुंचे। उन्हें बताया गया कि आपको E20 Kit लगवानी पड़ेगी जो 4,000 से 6,000 रुपये में आती है। यानी अपने पैसे से गाड़ी खरीदी, और अब सरकार के फैसले के चलते फिर से जेब ढीली करो। यह किसी को भी नाइंसाफी लगेगी।

इंश्योरेंस कंपनियों ने कहा—हम कवर नहीं करेंगे

सबसे चिंता का विषय यह है कि कई इंश्योरेंस कंपनियों ने साफ कर दिया है कि E20 पेट्रोल के कारण होने वाले नुकसान को वे अपनी पॉलिसी में कवर नहीं करेंगी। उनका तर्क है कि यह लॉन्ग-टर्म डैमेज है, जो धीरे-धीरे दिखता है, और यह “मैकेनिकल ब्रेकडाउन” की श्रेणी में नहीं आता।

अब सोचिए, एक व्यक्ति गाड़ी की सुरक्षा के लिए हर साल बीमा करवाता है। लेकिन जब असल में जरूरत पड़े, तो कंपनी कह दे—”Sorry, E20 के कारण हुआ नुकसान हमारी पॉलिसी में शामिल नहीं।” यह राहत की बात नहीं, चिंता की बात है।

सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर केस चल रहा है। हैरान करने वाली बात यह है कि एक तरफ सरकार कहती है कि कोई नुकसान नहीं है, दूसरी तरफ इंश्योरेंस कंपनियां पॉलिसी से हाथ खींच रही हैं। आखिर सच क्या है?

सरकार का पक्ष: सब कुछ सुरक्षित है

सरकार का कहना है कि E20 पेट्रोल पूरी तरह सुरक्षित है। उनके अनुसार प्रॉपर रिसर्च और स्टडी की गई है। लेकिन जब रिकॉर्ड या रिपोर्ट की मांग होती है, तो कोई जवाब नहीं मिलता। यह ऐसे ही है जैसे किसी ने कहा कि बाहर मूसलाधार बारिश हो रही है, लेकिन जब आप खिड़की से देखें तो धूप चमक रही हो।

सरकार का यह भी कहना है कि भारत पहला देश नहीं है जो एथेनॉल ब्लेंडिंग कर रहा है। ब्राजील, अमेरिका और थाईलैंड में भी यह प्रचलित है। यह बात सही है, लेकिन वहां इसे चरणबद्ध तरीके से लागू किया गया, न कि एकदम से।

इसके अलावा, सरकार ने यह भी कहा कि 2023 के बाद की गाड़ियां (BS6 Phase 2) E20 के लिए तैयार हैं और उनमें कोई समस्या नहीं होगी। लेकिन सवाल उठता है—जिनके पास पुरानी गाड़ियां हैं, उनका क्या?

क्यों नहीं मिल रहा अलग पेट्रोल का विकल्प?

अगर 2023 से पहले की गाड़ियां E20 के लिए नहीं बनी थीं, तो सरकार को पेट्रोल पंपों पर विकल्प देना चाहिए था। यानी E5, E10 और E20—तीनों तरह का पेट्रोल उपलब्ध हो। जिसकी गाड़ी में जो सेट हो, वह वही भरवाए।

लेकिन हुआ उलटा। E20 को सस्ता करने की बजाय, कम एथेनॉल वाला पेट्रोल ज्यादा महंगा कर दिया जाता है। यानी अगर आप पुरानी गाड़ी रखना चाहते हैं, तो हर बार ज्यादा पैसे चुकाइए। यह व्यवस्था उचित नहीं लगती।

दूसरी ओर, जिन गाड़ियों में E20 चल सकता है, उनके लिए इसे सस्ता करना चाहिए था ताकि लोग खुद ही इसे अपनाएं। लेकिन सरकारी नीति इसके ठीक विपरीत दिखाई देती है।

लॉन्ग-टर्म इंपैक्ट अभी पता नहीं चला

सबसे बड़ी समस्या यह है कि लॉन्ग-टर्म इंपैक्ट अभी तक वैज्ञानिक रूप से रिकॉर्ड नहीं किया गया। सरकार के वकील ने खुद कहा कि यह प्रयोग चल रहा है। इसका मतलब है कि अगर कोई गाड़ी E20 पर पांच साल चले, तो उसका असर क्या होगा, यह अभी पता नहीं है।

E20 तो 2025 में आया, और अभी 2026 चल रहा है। यानी सिर्फ एक-डेढ़ साल का डेटा है। अब अगर तीन-चार साल बाद बड़े पैमाने पर इंजन फेल होने लगें, तब क्या होगा? उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

यहां ध्यान देने वाली बात यह भी है कि अगले साल सरकार E30 लाने की तैयारी में है। यानी जिन लोगों ने दो साल पहले गाड़ी खरीदी, उनके लिए यह और भी घातक हो सकता है क्योंकि उनकी गाड़ियां E30 के लिए बिल्कुल भी नहीं बनाई गईं।

क्या है समाधान?

विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए:

  • पेट्रोल पंपों पर E5, E10, E20 और E30—सभी विकल्प उपलब्ध कराए जाएं।
  • कम एथेनॉल वाले पेट्रोल को महंगा करने की बजाय सस्ता या समान रखा जाए।
  • पुरानी गाड़ियों के लिए E20 Kit की लागत सरकार वहन करे या सब्सिडी दे।
  • लॉन्ग-टर्म इंपैक्ट स्टडी पहले पूरी की जाए, फिर E30 लागू हो।
  • रिसर्च रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
  • इंश्योरेंस कंपनियों को निर्देश दिया जाए कि वे E20 से होने वाले नुकसान को पॉलिसी में शामिल करें।

यह सिर्फ ईंधन का सवाल नहीं है, बल्कि करोड़ों गाड़ी मालिकों के विश्वास और जेब का सवाल है। अगर सरकार सच में पर्यावरण और आत्मनिर्भरता की दिशा में काम कर रही है, तो इसे धीरे-धीरे और पारदर्शिता के साथ करना होगा।


मुख्य बातें (Key Points)

  • सुप्रीम कोर्ट में बड़ा खुलासा: केंद्र सरकार के वकील ने माना कि E20 पेट्रोल अभी एक्सपेरिमेंट स्टेज में है, बाद में इनकार किया।
  • 66% पुरानी गाड़ियों की माइलेज में 10-25% गिरावट: 2023 से पहले की गाड़ियों को सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है।
  • इंजन और पार्ट्स खराब हो रहे: फ्यूल टैंक में जंग, इंजेक्टर फेल, गैसकेट डैमेज जैसी शिकायतें आम हो गईं।
  • इंश्योरेंस कंपनियों ने किया इनकार: कई बीमा कंपनियां E20 से होने वाले नुकसान को पॉलिसी में कवर नहीं कर रहीं।
  • कोई वैज्ञानिक रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं: सरकार रिसर्च की बात करती है लेकिन रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई।
  • अगले साल E30 आने की तैयारी: तेजी से बढ़ रही एथेनॉल ब्लेंडिंग से गाड़ी मालिकों में चिंता बढ़ी।

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: E20 पेट्रोल से गाड़ियों को कितना नुकसान हो रहा है?

सर्वे के अनुसार 2023 से पहले की गाड़ियों की माइलेज में 10 से 25 प्रतिशत तक की कमी आई है। इसके अलावा इंजन, फ्यूल टैंक और इंजेक्टर में खराबी की शिकायतें भी बढ़ी हैं। सरकार कहती है कि केवल 6 प्रतिशत का अंतर है, लेकिन वैज्ञानिक रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई।

प्रश्न 2: क्या पुरानी गाड़ियों में E20 पेट्रोल सुरक्षित है?

नहीं, 2023 से पहले की अधिकांश गाड़ियां (BS4 और BS6 Phase 1) केवल E5 या E10 के लिए डिजाइन की गई थीं। इनमें E20 डालने से लॉन्ग-टर्म डैमेज हो सकता है। कुछ कंपनियां E20 Kit (4000-6000 रुपये) लगाने की सलाह देती हैं।

प्रश्न 3: क्या इंश्योरेंस कंपनियां E20 से हुए नुकसान को कवर करती हैं?

नहीं, कई इंश्योरेंस कंपनियों ने स्पष्ट किया है कि E20 पेट्रोल के कारण होने वाला नुकसान उनकी पॉलिसी में कवर नहीं होगा। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में भी चल रहा है।

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पत्रकारिता में एक दशक से अधिक का ठोस अनुभव रखने वाले अजय कुमार 'शोर से ज़्यादा सार' की पत्रकारिता पर दृढ़ विश्वास करते हैं। वर्तमान में वे The News Air में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं, जहां वे समाचारों की रणनीति, लेखन, तथ्य-सत्यापन (Fact-Checking) और सटीक प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं।पत्रकारिता का सफर और अनुभव - अजय कुमार का करियर ग्राउंड ज़ीरो की रिपोर्टिंग से लेकर न्यूज़ डेस्क के कुशल प्रबंधन तक विस्तृत है। The News Air में पिछले 3 वर्षों से नेतृत्व करने से पहले, उन्होंने 'दैनिक जागरण' और 'सिटी न्यूज़' जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। पत्रकारिता में उनकी मजबूत शैक्षणिक पृष्ठभूमि ने उनके काम करने के तरीके को बेहद व्यावहारिक और तथ्य-आधारित बनाया है।विशेषज्ञता और कार्यक्षेत्र (Expertise & Beats) - वे जटिल राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को सरल भाषा, स्पष्ट तथ्यों और निष्पक्ष तरीके से पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं। उनकी पत्रकारिता की मुख्य विशेषज्ञता इन क्षेत्रों में है:राजनीतिक कवरेज: लोकसभा चुनावों और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की ग्राउंड और डेस्क रिपोर्टिंग।कानूनी और संसदीय खबरें: संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों की नियमित और रियल-टाइम कवरेज।खोजी पत्रकारिता: ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ रिपोर्टिंग के जरिए अंदरूनी खबरों की पड़ताल।विश्वसनीयता और डिजिटल योगदान (Trust & Authority) - सटीक और प्रामाणिक ख़बरों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें पाठकों के बीच एक विश्वसनीय पत्रकार बनाती है। डिजिटल न्यूज़ इकोसिस्टम को बेहतर बनाने और फेक न्यूज़ से लड़ने की दिशा में, अजय कुमार गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

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