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The News Air - Breaking News - एमएसपी पर बहस – भाजपा के दोहरे रुख की निंदा करें

एमएसपी पर बहस – भाजपा के दोहरे रुख की निंदा करें

कानूनी रूप से सुनिश्चित खरीद की किसानों की मांग जायज है

The News Air Team by The News Air Team
शुक्रवार, 1 मार्च 2024
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एमएसपी गारंटी का मतलब यह नहीं है कि सरकार को सभी फसलें खरीदनी होंगी

स्रकार को कॉरपोरेट और किसान के बीच राजनीतिक चयन करना होगा

चंडीगढ़, 1 मार्च (The News Air) भारत सरकार केवल 23 फसलों के लिए एमएसपी प्रदान करती है और इस मूल्य पर खरीद की गारंटी नहीं करती है। गेहूं और धान के लिए पंजाब, हरियाणा, म.प्र. और उ.प्र. में कुछ मंडियां मौजूद हैं। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और अन्य राज्यों में धान की कुछ सरकारी खरीद होती। भारतीय कपास प्राधिकरण द्वारा विभिन्न प्रकार से कपास की खरीद की जाती है। सरकारी तौल केंद्रों के माध्यम से मिलों में बिक्री से गन्ने की कीमत का आश्वस्त की जाती है। नाफेद कुछ दालें खरीदता है। खरीद एक समान नहीं है, उदाहरण के लिए, सरकार अपने गेहूं का 70% केवल पंजाब और म.प्र. से खरीदती है, जो पंजाब के उत्पादन का 70% और म.प्र. के उत्पादन का 35% है, लेकिन उ.प्र. के उत्पादन का केवल 15% सरकारी द्वारा खरीदा जाता है।

इसका नतीजा यह हुआ कि धान का एमएसपी जो 2023 में 2183 रुपये प्रति क्विंटल था, बिहार और पूर्वी उ.प्र. में व्यवसाईयों द्वारा 1200 रुपये प्रति क्विंटल की कीमत तक खरीदा गया, क्योंकि वहां कोई सरकारी खरीद नहीं है। इसी तरह, 2023-24 के लिए गेहूं का एमएसपी 2125 रुपये था, और कई क्षेत्रों में 1800 रुपये प्रति क्विंटल पर खरीदा गया था। इसके अलावा 2 साल पहले मक्के का एमएसपी 1900 रुपये प्रति क्विंटल था और 1100 रुपये प्रति क्विंटल पर बिका। कीमत में यह गिरावट इसलिए आती है क्योंकि खरीद की कोई गारंटी नहीं है। एमएसपी बाजार में मौलिक दर निर्धारित कर देता है और कॉर्पोरेट व्यापारिक कंपनियों से जुड़े बिचौलिए बाजार पर राज करते हैं क्योंकि किसानों के पास रखने और भंडारण करने की क्षमता नहीं होती है, जिससे उन्हें संकटग्रस्त बिक्री करनी पड़ती है। बिहार से खरीदा गया धान पंजाब और हरियाणा में एमएसपी दर पर बेचे जाने और प्रति क्विंटल लगभग 800 रुपये से अधिक का लाभ मिलने की घटनाएं ज्ञात हैं। इसलिए सभी राज्यों में मंडियों की स्थापना की मांग की गयी है।

मंडियों में अधिकारियों द्वारा भ्रष्टाचार, 100 रुपये प्रति क्विंटल की वसूली और 40 रुपये प्रति क्विंटल का वजन शुल्क एक और मुद्दा है।

स्वामीनाथन फार्मूले के अनुसार सी – 2+50% का न्यूनतम समर्थन मूल्य:

भाजपा 2014 में किए गए अपने चुनावी वादे से पीछे हटकर किसानों को धोखा दे रही है। 2023-24 के लिए घोषित गेहूं और धान का एमएसपी 2125 रुपये प्रति क्विंटल और 2183 रुपये प्रति क्विंटल था। क्रमशः इसकी गणना ए – 2 + एफ एल लागत पर की गई थी। ए – 2 भुगतान लागत है, यानी, किसान बीज और सिंचाई सहित अन्य लागत के लिए कितना भुगतान करता है। एफ एल प्रति सीजन केवल 8 दिनों के काम के लिए पारिवारिक श्रम की अनुमानित लागत है। सी – 2, ये व्यापक लागत है जिसमें भूमि किराया, ट्रैक्टर सहित कृषि उपकरणों का मूल्यह्रास, पूर्ण श्रम लागत और निवेशित पूंजी पर ब्याज भी शामिल करता है। आम तौर पर कहें तो इससे लागत में लगभग 25-30% का इजाफा हो जाएगा। सी – 2+50% पर घोषित एमएसपी तदनुसार बढ़ जाएगा, यानी, गेहूं के लिए 2762 रुपये/क्विंटल और धान के लिए 2838 रुपये/क्विंटल।

भारत सरकार अब दुर्भावनापूर्वक तर्क दे रही है कि यह संभव नहीं है। लेकिन 2023 के राज्य चुनावों के दौरान छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्य प्रदेश और तेलंगाना के लोगों से भाजपा और कांग्रेस द्वारा किए गए वादों को देखें। भाजपा ने धान के लिए 3100 रुपये प्रति क्विंटल का वादा किया, जबकि कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ में 3200 रुपये और मध्य प्रदेश में चावल के लिए 2500 रुपये का वादा किया। भाजपा ने राजस्थान और म.प्र. में गेहूं के लिए 2700 रुपये प्रति क्विंटल का वादा किया था, जबकि कांग्रेस ने 2600 रुपये प्रति क्विंटल का वादा किया था। ये वादे किसानों की मांग के करीब हैं और उससे भी ज्यादा। स्पष्ट रूप से राजनीतिक दल जानते हैं कि सही एमएसपी क्या होना चाहिए, लेकिन भाजपा जानबूझकर किसानों को धोखा दे रही है और देश को बेवकूफ बना रही है।

सरकार झूठ बोल रही है कि अगर सभी फसलों के लिए एमएसपी दिया जाता है तो सरकारी खजाने पर भारी बोझ पड़ेगा

सरकार लोगों से स्पष्ट रूप से झूठ बोल रही है कि सुनिश्चित खरीद के साथ सभी फसलों के लिए एमएसपी के लिए उस पर बोझ लगभग 10 से 17 लाख करोड़ रुपये होगा। यदि सरकार सभी कृषि उपज की एकमात्र व्यापारी बन जाती है तो निश्चित तौर पर यह लागत बहुत अधिक होगी। सरकारी को सभी उपज नहीं खरीदना होगा, इतनी उपज खरीद कर यह करेगी क्या? सभी कृषि वस्तुओं का विशाल हिस्सा खुले बाजार में कारोबार किया जाता है, जिसका उपभोग कंपनियां लागत के रूप में या आम लोगों द्वारा उपभोग किया जाता है। लगभग 70% से अधिक गेहूं, चावल और अनाज खुले बाजार में बेचे जाते हैं, दालों और तिलहन के लिए यह 90% से अधिक है और अगर हम सहकारी व सरकारी मिलों को स्वतंत्र उद्यम मान लें तो गन्ना, सब्जियां, फल, डेयरी, मुर्गीपालन, मछली की बिक्री 100% के करीब है। इसलिए कृषि उपज का बड़ा हिस्सा बाजार में ही खपता है। एमएसपी गारंटी का मतलब यह नहीं है कि सरकार को सभी फसलें खरीदनी होंगी।

एमएसपी और गारंटीकृत खरीद की भूमिका कीमतों को स्थिर करना है

यदि बाजार मूल्य एमएसपी से ऊपर चला जाता है, तो सरकार पर कोई बोझ नहीं पड़ता है। यदि यह एमएसपी से नीचे आता है, तो यह कम मांग और अधिक आपूर्ति के कारण होता है। केवल ऐसे मामलों में सरकार को अतिरिक्त स्टॉक को तुरंत खरीदकर इस हद तक हस्तक्षेप करना होगा कि आपूर्ति मांग से नीचे आ जाए, उदाहरण के लिए, यदि कुल दालों की मांग 30 लाख टन है और आपूर्ति 35 लाख टन है, सरकार को बाजार मूल्य बढ़ाने के लिए एमएसपी पर केवल 7 लाख टन की खरीद करनी होगी। हाल के क्रिसिल द्वारा किये गये विश्लेषण में 2023 के लिए केवल 23 फसलों का आंकड़ा 21,000 करोड़ रुपये रखा है! भविष्य के कारोबार, ब्रांडिंग और कार्टेल गठन जैसे बाजार में हेरफेर के कारण मूल्य में गिरावट की स्थिति में, ऐसी गलत प्रथाओं को नियंत्रित और प्रतिबंधित करना सरकार की जिम्मेदारी है।

एक योग्य एमएसपी बाजार में मौलिक मूल्य को बढ़ा देता है और व्यापारिक बेईमानी को रोकता है। मुख्य घाटे में बड़े व्यापारी और कॉरपोरेट होंगे। जाहिर है, सरकार को कंपनियों और किसानों के बीच राजनीतिक चयन करना होगा।

सी 2+50% का एमएसपी से भोजन महंगा होने का तर्क गलत ह; राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम के खर्च का बोझ; लागत के मूल्य सस्ते करने से दिए खाद्य कीमतें घटेंगी।

खेती पर खर्च, लागत सामग्री, श्रम और सेवाओं की कीमत पर निर्भर करती है। बीज, उर्वरक, कीटनाशक, पंपिंग सेट, ट्रैक्टर/उपकरण, डीजल और बिजली बेचने वाली कंपनियां पूर्व निर्धारित कीमतों पर बेचकर अप्रत्याशित लाभ कमाती हैं। सरकार कृषि उपकरणों पर 28% का उच्चतम जीएसटी भी वसूलती है। यदि ये लागत कम हो जाती है तो किसानों और लोगों, दोनों को आसानी होगी और C – 2+50% मूल्य भी घट जाएगा। सरकार यह जानती है, इसीलिए 2023 में बीजेपी ने तेलंगाना के किसानों को 18,000 रुपये प्रति एकड़ उर्वरक सब्सिडी देने का वादा किया और कांग्रेस ने 15,000 रुपये प्रति एकड़ के साथ-साथ प्रत्येक भूमिहीन परिवार को 12,000 रुपये देने का वादा किया।

सस्ते भोजन का खाद्य सब्सिडी और राशन वितरण कल्याण योजना से भी गहरा संबंध है। 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक के इस खर्च को किसानों की सब्सिडी के रूप में गिनना गलत और शरारतपूर्ण है। यह उपभोक्ताओं के लिए खाद्य सब्सिडी है, किसानों के लिए नहीं। यह सामाजिक कल्याण आवश्यकताओं के साथ-साथ मजदूरों के वेतन को कम रखने की कॉर्पोरेट आवश्यकताओं को पूरा करता है। भोजन की ऊंची लागत से वेतन में भारी वृद्धि होगी। सरकार द्वारा आम लोगों को सस्ता भोजन उपलब्ध कराने की अपनी जिम्मेदारी पूरी न करना और इसकी जगह किसानों द्वारा उठायी जा रही लाभदायक उत्पादन की मांग कि विपरी तर्क देना बेहद अनुचित और दुर्भाग्यपूर्ण है। वह खाद्यान्न सस्ता रखने का बोझ किसानों पर नहीं डाल सकती।

एसकेएम लगातार लागत सामग्री के दाम घटाने, जीएसटी को समाप्त करने और खेती के लिए मुफ्त बिजली व ग्रामीण घरों और दुकानों के लिए 300 यूनिट मुफ्त बिजली के साथ-साथ प्री-पेड मीटर पर प्रतिबंध की मांग करता रहा है।

एमएसपी के खिलाफ कॉर्पोरेट समर्थक अर्थशास्त्रियों के पक्ष:

सरकारी निकायों ने तर्क दिया है कि एमएसपी से केवल 8.8% किसानों को लाभ होता है, इसलिए इसे बंद कर दिया जाना चाहिए। स्पष्टतः इस तर्क का अर्थ यह है कि एमएसपी को इसलिए समाप्त कर देना चाहिए क्योंकि 91.2% किसानों को इसका फायदा नहीं मिलता है, यानी अस्पतालों में सभी मुफ्त इलाज इसलिए बंद कर देना चाहिए क्योंकि ज्यादातर लोगों को यह नहीं मिल सकता है।

इसी तरह, उनका कहना है कि एमएसपी केवल 2 फसलों के लिए प्रभावी है, अन्य किसानों को इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है। वे गलत हैं। आज पूरा देश अपनी उपज के लिए एमएसपी की मांग कर रहा है।

उनका यह भी तर्क है कि जहां अनाज एमएसपी के साथ केवल 1 से 2% की दर से बढ़ रहा है, वहीं एमएसपी के बिना पूरे दुग्ध क्षेत्र की वृद्धि 5% से अधिक, मत्स्य पालन 7% से अधिक और मुर्गीपालन 8% से अधिक है। इसका मतलब यह नहीं है कि ये क्षेत्र किसानों के लिए लाभदायक हैं। अनाज भारी घाटे पर इसलिए भी उगाया जाता है क्योंकि भोजन का कोई विकल्प नहीं है। इन विशेषज्ञों का दृष्टिकोण खाद्य उत्पादन में कॉर्पोरेट मुनाफाखोरी का है।

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फसल विविधीकरण के लिए सरकार का प्रस्ताव:

हाल ही में सरकार ने कुछ पूर्व शर्तों के साथ 5 फसलों, उड़द, मसूर, अरहर, मक्का और कपास की गारंटीकृत खरीद के साथ फसल विविधीकरण का प्रस्ताव दिया है। पारिस्थितिकी को बचाने, पर्यावरण और कई क्षेत्रों में जल स्तर को सुरक्षित रखने के लिए फसल विविधीकरण एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। यह तभी सुनिश्चित किया जा सकता है जब सरकार वास्तव में सभी किसानों को समान स्तर पर कमाई करने में सक्षम बनाने के लिए सभी फसलों के लिए उचित एमएसपी की गारंटी दे। सरकार की सशर्त पेशकश और वह भी कुछ फसलों के लिए, समस्या का समाधान नहीं करती।

किसानों की आय बढ़ाना:

एमएसपी पर पूरी बहस किसानों की आय बढ़ाने और खेती करने वाले लोगों की क्रय शक्ति बढ़ाकर भारतीय बाजारों को फिर से जीवंत करने के बारे में है, जो खरीददारों का 50ः से अधिक है। शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और अन्य ऑनलाइन सेवाओं की बढ़ती लागत के कारण किसान और उनके बच्चे केवल कृषि आय पर जीवित नहीं रह सकते। 2.15 डॉलर प्रति व्यक्ति प्रति दिन (सितंबर 2022) की गरीबी रेखा के प्रति व्यक्ति अंतर्राष्ट्रीय व्यय मानकों पर, किसानों को प्रति व्यक्ति प्रति माह कम से कम 5,500 रुपये या प्रति परिवार 27,500 रुपये कमाना चाहिए।

इसलिए, किसानों को जीवित रहने के लिए कुछ अतिरिक्त आय का आश्वासन देना होगा। यह तभी आ सकता है जब सहकारी समितियों और सरकारी समर्थन संरचना द्वारा सभी कृषि वस्तुओं का प्रसंस्करण, भंडारण और विपणन किसानों के बच्चों द्वारा किया जा सके। यह वही मुख्य क्षेत्र है, जिसमें ‘‘कंपनियों द्वारा फसल कटाई परान्त निवेश’’ को सरकार लक्षित कर रही है और जिस पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बड़े निगमों की नजर है। वर्तमान में यह प्रति वर्ष 30,000 करोड़ रुपये का बाजार है, इसके कुछ वर्षों में 2.1 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ने की उम्मीद है। इस बाजार को निजी बड़ी कंपनियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों से बचाया जाना चाहिए। इससे खरीद पर सरकार का बोझ भी कम होगा। किसानों की बढ़ी हुई आय निश्चित रूप से भारतीय बाजारों का कायाकल्प करेगी।

संक्षेप में, सरकार को सभी फसलों के लिए ब्2़50ः पर एमएसपी घोषित करके और पूरे भारत में समान रूप से खरीद केंद्र स्थापित करके अपने किसानों का समर्थन करना चाहिए। दुनिया भर में सभी विकसित देश अपनी खेती पर भारी सब्सिडी देते हैं। और भारत में, जब सत्तारूढ़ दल चुनाव से पहले घोषणाएं कर रहे हैं, तो उन्हें जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।

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