CJI BR Gavai Controversial Decisions. भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस बी आर गवई के विदाई भाषण से ठीक पहले आए तीन बड़े फैसलों पर देश के संवैधानिक गलियारों में हलचल मच गई है। एक ओर जहां बुलडोजर की कार्रवाई पर उनके ही फैसलों का उल्लंघन हुआ, वहीं राज्यपाल के विधेयक मंजूरी के अधिकार और चुनाव आयोग के SIR मामले पर कोर्ट के रुख ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
जस्टिस गवई ने अपने विदाई भाषण में कहा कि वह बौद्ध धर्म का पालन करते हैं, लेकिन उन्होंने किसी धर्म का गहन अध्ययन नहीं किया है। उन्होंने खुद को सच्चा धर्मनिरपेक्ष (Secular) बताया और कहा कि वह हिंदू, सिख, ईसाई, मुसलमान सभी धर्मों में विश्वास करते हैं। यह बयान ऐसे समय में आया है जब कुछ ही महीने पहले एक वकील ने उन पर ‘सनातन धर्म’ पर हमला करने और भगवान विष्णु का अपमान करने का आरोप लगाते हुए कोर्ट रूम में जूता फेंका था।
राज्यपाल की शक्ति पर फैसला
जस्टिस गवई की अध्यक्षता वाली पाँच जजों की पीठ ने एक ऐसा फैसला दिया, जिसने चुनी हुई राज्य सरकारों की चिंता बढ़ा दी है। इस बेंच ने फैसला सुनाया कि पारित विधेयक को मंजूरी देने के संबंध में राज्यपाल या राष्ट्रपति के लिए कोई समय सीमा तय नहीं की जा सकती है।
यह फैसला पहले के एक फैसले को बदलता है, जिसमें पूर्व चीफ जस्टिस संजीव खन्ना के कार्यकाल में मियाद तय करने की बात कही गई थी। इस फैसले से उन राज्यों को झटका लगा है, जहां गैर-बीजेपी शासित सरकारों के विधेयक राज्यपालों के पास लंबे समय से अटके हुए हैं।
बुलडोजर पर विरोधाभास
जस्टिस गवई ने अपने फैसलों में कहा था कि कानून का राज नहीं होने पर ही बुलडोजर चलता है, यानी बुलडोजर कानून के राज को खत्म करता है। लेकिन, विदाई भाषण के ठीक वक्त महाराष्ट्र के संभाजी नगर और जम्मू जैसे छह अलग-अलग मुस्लिम बहुल और एनडीपीएस (NDPS) कानून से संबंधित इलाकों में बुलडोजर चल रहे थे। यह विरोधाभास दिखाता है कि कोर्ट के फैसले भी मौजूदा सत्ता व्यवस्था के सामने कमजोर पड़ रहे हैं।
चुनाव आयोग के SIR मामले में देरी
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की भूमिका से जुड़ी एसआईआर (Special Investigation Report) पर सुनवाई करने में काफी वक्त लगाया। बिहार चुनाव से ऐन पहले यह मामला कोर्ट में आया था, लेकिन चुनाव खत्म होने तक इस पर कोई फैसला नहीं आया।
हालाँकि, केरल सरकार ने जब निकाय चुनावों में एसआईआर के कारण होने वाली परेशानी को लेकर आपत्ति दर्ज की, तब सुप्रीम कोर्ट ने आनन-फानन में चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया। एसआईआर का मामला अब अगले चीफ जस्टिस जस्टिस सूर्यकांत की बेंच के सामने जाएगा।
अरावली की पहाड़ियों पर आंशिक रोक
चीफ जस्टिस गवई ने दिल्ली से सटी अरावली की पहाड़ियों में खनन को लेकर भी फैसला सुनाया। उन्होंने अवैध खनन के बावजूद पूरी तरह से रोक लगाने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अगर पूरी तरह रोक लगा दी गई, तो लैंड माफिया माइनिंग शुरू कर देंगे, जिससे क्रिमिनलाइजेशन बढ़ेगा। इसलिए, केवल आंशिक रोक ही लगाई जाएगी।
क्या है पृष्ठभूमि
भारत के मुख्य न्यायाधीश का पद ‘मास्टर ऑफ रोस्टर’ होता है, जो यह तय करता है कि किस मामले की सुनवाई कौन सी बेंच करेगी। जस्टिस गवई के कार्यकाल में आए इन फैसलों ने संविधान की व्याख्या करने वाले सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर बहस तेज कर दी है। गवर्नर के अड़ंगे, अवैध खनन और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली जैसे महत्वपूर्ण मामलों पर कोर्ट के रुख ने संस्थानों की जवाबदेही और उनकी राजनीतिक प्रभाव से मुक्ति पर सवाल उठाए हैं।
मुख्य बातें (Key Points)
CJI गवई की विदाई के समय, उनके ही फैसलों का उल्लंघन करते हुए देश के छह स्थानों पर बुलडोजर चल रहे थे।
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति/राज्यपाल के लिए राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों को मंजूरी देने के लिए कोई समय सीमा निर्धारित करने से इनकार कर दिया।
चुनाव आयोग के SIR मामले पर कोर्ट में महीनों तक कोई निर्णायक फैसला नहीं आया, जिससे बिहार चुनाव जैसे महत्वपूर्ण मामलों में देरी हुई।
जस्टिस गवई ने अपने विदाई भाषण में खुद को ‘सच्चा धर्मनिरपेक्ष’ बताया, जबकि उनके कार्यकाल में कोर्ट में जूता फेंकने जैसी अभूतपूर्व घटना हुई थी।








