Cancer Medicines Price में हो रही इस ऐतिहासिक कटौती से देश भर के लाखों मरीजों के परिवारों को आर्थिक संजीवनी मिलने जा रही है। कैंसर जैसी जानलेवा और खर्चीली बीमारी से जूझ रहे मरीजों के लिए केंद्र सरकार ने एक बेहद बड़ा और राहत भरा कदम उठाया है। सरकार ने कैंसर की 110 गैर-अनुसूचित (Non-Scheduled) दवाओं के ट्रेड मार्जिन को अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के 30 प्रतिशत तक फिक्स (Cap) करने का सख्त फैसला लिया है। इससे बाजार में इन दवाओं के दाम 70% तक कम हो जाएंगे और मरीजों को हर साल करीब 500 करोड़ रुपये की बड़ी बचत होगी।
देखा जाए तो भारत में मेडिकल खर्च किसी भी मध्यमवर्गीय परिवार को रातों-रात गरीबी रेखा के नीचे धकेल सकता है। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा दवाओं का होता है। दिलचस्प बात यह है कि पिछले ही महीने सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर सरकार की कड़ी खिंचाई की थी। और बस यहीं से शुरू हुई असली कहानी: जब अदालत ने इसे ‘खुली लूट’ कहा, तो सरकार तुरंत एक्शन मोड में आ गई।
अगर गौर करें, तो इस फैसले का असर सिर्फ दवा की पर्ची तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह ‘Right to Health’ (स्वास्थ्य के अधिकार) की दिशा में उठाया गया एक बेहद कड़ा कदम है।
🔍 यह भी पढ़ें- CBI Probe Punjab पर सुप्रीम कोर्ट में बड़ा मोड़: जस्टिस नागू हुए अलग
‘दवाओं के दाम: कैसे रुकेगी लूट?’
समझने वाली बात यह है कि फार्मास्यूटिकल सेक्टर में मुनाफाखोरी का एक बड़ा खेल ट्रेड मार्जिन (Trade Margin) के जरिए खेला जाता है। नीचे दी गई टेबल से समझिए कि यह खेल कैसे काम करता था और अब कैसे बदलेगा:
| स्थिति (Condition) | ट्रेड मार्जिन का गणित (Trade Margin System) | असर (Impact) |
| पहले (Before) | फुटकर विक्रेता को जो दवा ₹2,700 में मिलती थी, उसकी MRP ₹27,000 रखी जाती थी (अत्यधिक मार्जिन)। | मरीजों की जेब पर भारी बोझ पड़ता था। |
| अब (Now) | सरकार ने ट्रेड मार्जिन को MRP के सिर्फ 30% तक फिक्स (Cap) कर दिया है। | 110 दवाओं के दाम 70% तक गिर जाएंगे। |
| दायरा (Scope) | ब्रांडेड, जेनेरिक, घरेलू, आयातित और 35 पेटेंट वाली दवाएं भी शामिल। | पूरे बाजार में मनमानी कीमत वसूली पर रोक। |
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि अक्सर कारोबारी उन दवाओं को ज्यादा बेचने पर जोर देते थे जिनमें उन्हें भारी कमीशन (मार्जिन) मिलता था। इस ‘ट्रेड मार्जिन रैशनलाइजेशन’ का मुख्य मकसद अनुचित तरीके से दवाएं बेचने की इस प्रथा को जड़ से उखाड़ना है।
‘सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी बनी वजह’
यह दर्शाता है कि भारत की न्यायपालिका कैसे सीधे आम आदमी के जीवन को प्रभावित करती है। पिछले महीने ही जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के सामने गंभीर चिंता जताई थी। कोर्ट ने स्पष्ट उदाहरण देकर बताया था कि कैसे 2700 रुपये की दवा पर 27 हजार की एमआरपी चिपकाकर गरीब मरीजों को लूटा जा रहा है। इसी फटकार ने सरकार को सख्त नियम बनाने पर मजबूर किया।
‘आम जनता पर क्या होगा असर?’
यह फैसला कैंसर से जूझ रहे उन लाखों परिवारों के लिए एक ‘उम्मीद की किरण’ है, जो इलाज के खौफनाक खर्च के चलते अपना घर और ज़मीन तक गिरवी रख देते हैं। इस महीने के अंत तक यह नियम लागू होने से न सिर्फ दवाएं सस्ती होंगी, बल्कि कालाबाजारी करने वाले मेडिकल माफियाओं पर भी नकेल कसेगी।
‘जानें पूरा मामला’
भारत में कैंसर की बहुत सी दवाएं ‘गैर-अनुसूचित’ (Non-Scheduled) श्रेणी में आती हैं, जिन पर सरकार का सीधा मूल्य नियंत्रण (Price Control) नहीं था। इसका फायदा उठाकर दवा कंपनियां और डिस्ट्रीब्यूटर 1000% तक का ट्रेड मार्जिन रखकर एमआरपी तय कर रहे थे। जब सुप्रीम कोर्ट ने इस ‘खुली लूट’ पर सवाल उठाए, तो केंद्र सरकार ने दवाओं के एमआरपी पर ट्रेड मार्जिन को 30% की सीमा में बांध दिया। इस आदेश के तहत करीब 110 कैंसर रोधी दवाएं (जिनमें 35 पेटेंटेड दवाएं भी हैं) कवर होंगी। उम्मीद है कि इसी महीने के अंत तक यह नई व्यवस्था पूरे देश में लागू हो जाएगी, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं में अत्यधिक मुनाफेखोरी खत्म होगी।
‘मुख्य बातें (Key Points)’
सरकार ने 110 गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं के ट्रेड मार्जिन को MRP के 30% तक फिक्स कर दिया है।
इस फैसले से कैंसर की 35 पेटेंट दवाओं सहित कुल जीवन रक्षक दवाएं 70% तक सस्ती हो जाएंगी।
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इसे ‘खुली लूट’ करार दिया था (2700 की दवा 27,000 में बेचने का उदाहरण दिया)।
इस नई नीति से देश भर के कैंसर मरीजों को हर साल करीब 500 करोड़ रुपये की बड़ी बचत होगी।













