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Home Breaking News

पहली बार 1985 में आया था सीएए, अब तक 5 बार किया जा चुका है बदलाव

The News Air Team by The News Air Team
गुरूवार, 14 मार्च 2024
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पहली बार 1985 में आया था सीएए, अब तक 5 बार किया जा चुका है बदलाव
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नई दिल्ली,14 मार्च (The News Air) सरकार की तरफ से एक बार फिर से सीएए को लेकर नोटिफिकेशन जारी किया गया है, जिसमें 3 देशों से आने वाले 6 धर्म के लोगों को भारतीय नागरिकता देने की बात कही गई है. इसको लेकर काफी बवाल मचा हुआ है. लेकिन लोगों को शायद इस बारे में जानकारी नहीं है देश में पहली बार सीएए नहीं आया है. केंद्र सरकार इससे पहले भी 5 बार नागरिक अधिनियम में संशोधन कर चुकी है. पहली बार 1985 में सिटीजनशिप अमेंडमेंट एक्ट आया था. प्रिंसिपल एक्ट में संशोधन करके 1985, 1986, 1992, 2003 और 2005 में इसको लाया गया था. 2019 में एक बार फिर से संशोधन किया गया.

नागरिक संशोधन अधिनियम के तहत अभी तक जितने भी बदलाव हुए हैं, उसको 1955 के प्रिंसिपल एक्ट में बदलाव करके लाया गया है. इसके लिए सरकार नए एक्ट जोड़ने के लिए सदन में उनको पारित कराती है और उनको इसमें जोड़ दिया जाता है. संसद के पास किसी भी एक्ट को पूरी तरह से खत्म करने की शक्ति भी होती है और नए को लागू करने की भी, लेकिन आमतौर पर जब बहुत छोटे बदलाव हो तो सरकार संशोधन एक्ट लेकर आती हैं. जब सरकार को कोई बड़ा बदलाव करना होता है तो वह नए एक्ट बनाती हैं और उसी में एक लाइन लिखा जाता है कि पहला वाला एक्ट इसके पारित होते ही समाप्त हो जाएगा. दोनों सदन से एक्ट को पारित कराया जाता है और इसके बाद यह कानून की शक्ल ले लेते हैं.

1985 में पहली बार आया CAA : 1985 में असम में पहली बार सीएए लागू किया गया और सेक्शन 6A को जोड़ा गया. इसमें वह सारी बात लिखी गई, जोकि असम अकॉर्ड के क्लॉज नंबर 5 में लिखी हुई थी.

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1: इसमें 1966 तक आए प्रवासियों को भारतीय नागरिकता देने पर पर सहमति हुई थी. ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि पाकिस्तान के साथ 1965 का युद्ध हुआ था और उसके एक साल तक प्रवासी लोग भारत आते रहे. इसके लिए 1967 की मतदाता सूची को आधार बनाया गया.

2: इसमें 1.1.1966 के बाद और 25.3.1971 के बीच देश में आए तो उनके लिए भी कुछ नियम बनाए गए. इसमें विदेशी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1939 के तहत अपना रजिस्ट्रेशन भारत सरकार के पास करवाना होगा और ऐसे व्यक्तियों का नाम 10 साल के लिए वोटर लिस्ट से हटा दिया जाएगा. वैसे उनको नागरिक के तौर पर हर सुविधा दी जाएगी और भारत का पासपोर्ट भी दिया जाएगा. 10 साल के बाद फिर से वोटर लिस्ट में शामिल किया जाएगा. यह 10 साल तब से लागू होंगे जब से वह रजिस्ट्रेशन कराएंगे.

3: 25.3.1971 के बाद भारत में आने वाले लोगों को तीन डी के तहत डिटेन, डिलीट और डिपोर्ट किया जाएगा. भारत ने बांग्लादेश से समझौता किया हुआ था कि 25.3.1971 के बाद जो लोगा भारत आए हैं, उनको वापस भेजा जाएगा.

1987 में किया गया सेक्शन 3 में बदलाव : केंद्र सरकार की तरफ से 1986 में एक बार फिर एक्ट लाया गया और इसमें सेक्शन 3 में बदलाव किया गया. सेक्शन 3 का संबंध जन्म से नागरिकता से लेकर है, जिसमें कहा गया था कि अगर कोई बच्चा भारत में पैदा होता है तो उसे भारतीय नागरिकता दी जाएगी, लेकिन इस बार इसमें बदलाव किया गया. सरकार की तरफ से कहा गया कि भारत में 1949 से लेकर 1 जुलाई 1987 तक जो भी बच्चा भारत में पैदा हुआ, वह भारत का नागरिक हो सकता है. लेकिन 1 जुलाई 1987 को इस एक्ट के पास होने के साथ ही इसमें कहा गया कि इस तारीख के बाद से पैदा होने वाले बच्चे के माता या पिता में से कोई एक भारत का नागरिक होना चाहिए, उसके बाद ही उस बच्चे को भारतीय नागरिकता दी जाएगी. उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और राजीव गांधी की देखरेख में यह हुआ.

1992 में सेक्शन 4 में किया गया बदलाव : 1992 में एक बार फिर नागरिकता अधिनियम में संशोधन किया गया. 1992 में भारत में राष्ट्रीय महिला आयोग बना. नागरिकता अधिनियम एक्ट के सेक्शन 4 में कहा गया था कि भारत का कोई व्यक्ति अगर विदेश में रहता है और वहां पर उसके बच्चे का जन्म होता है तो वह एक साल के भीतर वहां की एम्बेसी में उसका रजिस्ट्रेशन करा सकता है. उसके बच्चे को भारतीय नागरिकता मिल जाएगी. लेकिन अगर बच्चे की माता भारतीय हो और वह किसी विदेशी से शादी कर लेती है, इसके बाद उनका कोई बच्चा होता है और महिला चाहती है कि उसका बच्चा भारत का नागरिक हो तो उसे यह अधिकार नहीं था. इसको 1992 में संशोधित किया गया और पुरुष और महिला दोनों में से किसी एक के भी भारत के नागरिक होने पर उसके बच्चे को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान किया गया.

2003 में अटल सरकार ने किया संशोधन : 1998 में केंद्र में एनडीए के नेतृत्व में अटल सरकार बनी, जिसमें असम गण परिषद भी शामिल हुई. इसी एनडीए सरकार के दौरान पहली बार साल 2000 में पासपोर्ट एक्ट में संशोधन किया गया. 2003 सिटीजनशिप एक्ट में आजतक का सबसे बड़ा संशोधन किया गया, जोकि 2004 में लागू हुआ. इसी समय में सिटीजनशिप के रूल्स बनाए गए जिनके तहत एनआरसी और एनपीआर होता है. इन्हीं रूल्स में एनआरसी और एनपीआर के बारे में भी लिखा है. इसके साथ ही 2004 में अटल सरकार ने जाते-जाते फॉरनर्स एक्ट 1946 में भी संशोधन किया.

पासपोर्ट एक्ट संशोधन 2000 : देश में दो पासपोर्ट एक्ट हैं, एक 1967 और दूसरा 1920. जब आप अपना पासपोर्ट बनवाते हैं तो वह पासपोर्ट एक्ट 1967 के तहत बनता है, लेकिन दूसरा पासपोर्ट (एंट्री इन टू इंडिया) एक्ट 1920 के तहत बनता है. इसमें बताया गया है कि जब भी कोई व्यक्ति भारत में आएगा तो उसके पास पासपोर्ट होना चाहिए. इसके साथ ही इसमें यह भी बताया गया कि किस-किस व्यक्ति की भारत में क्या जिम्मेदारी होगी पासपोर्ट को चेक करने की. पासपोर्ट एक्ट 1920 में पहले था कि अगर कोई व्यक्ति बिना पासपोर्ट के भारत में आ गया या कोई ऐसा अधिकारी जिसकी पासपोर्ट को चेक करने की जिम्मेदारी थी, इसमें 3 महीने की सजा का प्रावधान था. पर इसमें संशोधन करके भारत सरकार ने सजा के प्रावधान को 5 साल कर दिया.

2004 में एनडीए सरकार ने किया? :

1: 2004 में एनडीए सरकार ने जाने से पहले संशोधन किया. सिटीजनशिप एक्ट के सेक्शन दो में डेफिनेशन और इंटरप्रिटेशन के बारे जानकारी होती है, जिसका मतलब होता है कि इस एक्ट में जिन शब्दों का प्रयोग किया गया, उसका मतलब क्या-क्या होगा. इसमें सबसे पहले अवैध अप्रवासी शब्द को परिभाषित किया गया. इसमें कहा गया कि जिस व्यक्ति के पास वीजा इत्यादी की परमिशन नहीं है, लेकिन परमिशन खत्म होने के बाद भी वह देश में है उसको अवैध अप्रवासी कहेंगे.

2: इसी से जुड़ा दूसरा संशोधन करते हुए एनडीए सरकार ने सेक्शन 3 बदलाव करते हुए कहा कि 2004 के बाद से भारत में जन्में उसी बच्चे को नागरिकता की मान्यता मिलेगी जिसके दोनों पैरेंट्स भारत के नागरिक हो या एक परिजन भारत का नागरिक हो और दूसरा अवैध अप्रवासी ना हो. वह चाहे रिफ्यूजी हो, विदेशी हो और वीजा पर भारत आया हो तो उसको भी मान्यता दी जाएगी. इस एक्ट का समर्थन उस समय कांग्रेस और सीपीएम ने भी किया था.

3: सेक्शन 5 में रजिस्ट्रेशन से नागरिकता और सेक्शन 6 में नेचुरलाइजेशन से नागरिकता लेने की बात कही गई है. इन दोनों सेक्शन में यह मेंशन कर दिया गया कि अवैध अप्रवासी को यह नागरिकता किसी भी तरह से नहीं मिलेगी. चाहे वह देश में 6+1 कुल 7 साल या 11+1 कुल 12 साल रह ले, उसको रजिस्ट्रेशन या नेचुरलाइजेशन के माध्यम से नागरिकता नहीं दी जाएगी.

4: इसके साथ ही इन्होंने सेक्शन 7 में A,B,C,D को जोड़ दिए गए, जिसमें ओसीआई के संबंध में जो भी नियम बनाए गए थे उनको इनमें जोड़ दिया गया.

5: इसमें 14A नाम से एक अन्य सेक्शन जोड़ा, जिसमें एनआरसी का जिक्र है. इसमें कहा गया है कि केंद्र सरकार को यह शक्ति होगी कि वह नागरिकों का अनिवार्य पंजीकरण कर सके. उनको नेशनल आईडी कार्ड जारी किया जा सके और उनका रजिस्टर बनाकर उनके लिए रूल व रेग्यूलेशन को डिफाइन कर सके. यह सभी बातें इसमें लिखी हुई हैं.

सिटीजनशिप रूल्स 2003 का नाम सिटीजनशिप (रजिस्ट्रेशन ऑफ सिटीजंस एंड इश्यू) नेशनल आइडेंटिटी कार्ड है. इन रूल्स में सबसे पहली बार एनआरसी और एनपीआर में क्या होगा, कैसे होगा वह सबकुछ लिखा हुआ है. इसमें ही बताया गया है कि एनपीआर के माध्यम से ही एनआरसी होगा और जनगणना के साथ एनपीआर का लिंक क्या है.

इसमें एक आखरी संशोधन किया गया विदेशी अधिनियम एक्ट 1946 में. जिसके तहत लाल बहादुर शास्त्री ने विदेशियों को बाहर निकलने को लेकर जो रूल्स बनाए थे, उनमें बदलाव किया गया. पहले गलत तरीके, रिस्ट्रिक्टेड एरिया में प्रवेश करने वालों को सजा का प्रावधान 3 महीने या 6 महीने था जिनको बढ़ाकर कहीं 5 साल और कहीं दो से आठ साल कर दिया गया. इसके साथ इसमें यह भी लिख दिया कि यदि कोई व्यक्ति किसी विदेशी व्यक्ति को भारत में अवैध रूप से रहने में मदद करता तो उसको भी इतनी सजा देने का प्रावधान कर दिया. सबसे मजेदार बात यह है कि इस संशोधन का कांग्रेस और लेफ्ट दोनों ने बीजेपी को समर्थन किया था.

2005 में ओवरसीज सिटिजन ऑफ इंडिया में बदलाव : एक नागरिकता संशोधन अधिनियम 2005 में भी आया. हालांकि उस समय इसमें कोई बदलाव नहीं किया गया, केवल यह ओवरसीज सिटिजन ऑफ इंडिया को लेकर था. 2003 में एनडीए सरकार ने आईओसी कार्ड धारकों को जो सुविधाएं दी थी, उन सुविधाओं को यूपीए सरकार ने थोड़ा और बढ़ा दिया ताकि उनके लिए प्रक्रिया आसान हो जाए. इसपर कोई विवाद नहीं था और आसानी से सभी लोग सहमत थे.

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