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BrahMos Missile Deal: इंडोनेशिया ने भारत से $350 मिलियन में ब्रह्मोस खरीदने का किया सौदा

फिलीपींस के बाद इंडोनेशिया बना दूसरा देश जिसने ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने का समझौता किया, साउथ चाइना सी में चीन को मिलेगी कड़ी चुनौती

अभिनव कश्यप by अभिनव कश्यप
मंगलवार, 10 मार्च 2026
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BrahMos Missile Deal
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BrahMos Missile Deal Indonesia: भारत के डिफेंस एक्सपोर्ट को एक और बड़ी कामयाबी मिली है। इंडोनेशिया ने भारत के साथ दुनिया की सबसे तेज ऑपरेशनल क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस खरीदने का समझौता कर लिया है। रॉयटर्स की खबर के मुताबिक यह डील $200 मिलियन से लेकर $350 मिलियन के बीच बताई जा रही है। फिलीपींस के बाद इंडोनेशिया दक्षिण-पूर्व एशिया का दूसरा देश बन गया है जो ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम को ऑपरेट करेगा। खासतौर पर ऑपरेशन सिंदूर की सफलता के बाद ब्रह्मोस की ग्लोबल डिमांड में जबरदस्त उछाल देखने को मिल रही है।

इंडोनेशिया ने क्यों चुना ब्रह्मोस, क्या है पूरी डील

BrahMos Missile Deal के तहत इंडोनेशिया ने भारत के साथ एक औपचारिक समझौते पर दस्तखत किए हैं। यह डील इंडोनेशिया की उस कोशिश का हिस्सा है जिसके तहत वह अपनी सैन्य क्षमताओं को और मजबूत करना चाहता है। काफी लंबे समय से कयास लगाए जा रहे थे कि भारत को ब्रह्मोस के लिए और भी देशों से ऑर्डर मिलेंगे और अब इंडोनेशिया ने यह कदम उठाकर इन अनुमानों को सच कर दिया है।

यह डील फिलीपींस की 2022 वाली $375 मिलियन की डील के बराबर ही मानी जा रही है। फिलीपींस ने भी ब्रह्मोस को साउथ चाइना सी में चीनी दबाव से निपटने के लिए खरीदा था और अब इंडोनेशिया भी ठीक उसी रास्ते पर चल रहा है। भारत के बढ़ते डिफेंस एक्सपोर्ट के लिए यह एक बड़ा माइलस्टोन है।

ब्रह्मोस मिसाइल: दुनिया की सबसे तेज ऑपरेशनल क्रूज मिसाइल

BrahMos Missile Deal को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि आखिर ब्रह्मोस इतनी खास क्यों मानी जाती है। ब्रह्मोस एक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है जो ध्वनि की गति से तीन गुना तेज यानी मैक 2.8 से मैक 3 की रफ्तार से उड़ती है। इसे भारत के DRDO और रूस ने मिलकर विकसित किया है।

इस मिसाइल का नाम भारत की ब्रह्मपुत्र नदी और रूस की मॉस्कवा नदी के नाम पर रखा गया है। इसके उत्पादन के लिए भारत में ब्रह्मोस एयरोस्पेस नाम की एक ज्वाइंट वेंचर कंपनी बनाई गई है। इसकी टेक्निकल स्पेसिफिकेशंस पर नजर डालें तो एक्सपोर्ट वर्जन की रेंज 290 किलोमीटर है, जो MTCR (मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम) के नियमों के तहत तय की गई है। हालांकि भारत ने खुद के लिए जो लेटेस्ट वर्जन बनाया है उसकी रेंज 450 किलोमीटर से 800 किलोमीटर तक है।

इसमें 200 से 300 किलोग्राम का वॉरहेड लगाया जा सकता है और इसमें इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम तथा सेटेलाइट नेविगेशन के जरिए गाइडेंस सिस्टम लगा है जो इसे बिल्कुल सटीक निशाने पर ले जाता है।

ब्रह्मोस को इंटरसेप्ट करना लगभग नामुमकिन, जानें क्यों

BrahMos Missile Deal में इंडोनेशिया की इतनी दिलचस्पी की सबसे बड़ी वजह ब्रह्मोस की वो खूबियां हैं जो इसे दुनिया की बाकी क्रूज मिसाइलों से बिल्कुल अलग बनाती हैं। दुनिया की ज्यादातर क्रूज मिसाइलें सबसोनिक होती हैं यानी ध्वनि की गति से कम रफ्तार से चलती हैं। अमेरिका की टॉमहॉक क्रूज मिसाइल हो या हार्पून मिसाइल, ये सब सबसोनिक कैटेगरी में आती हैं। लेकिन ब्रह्मोस मैक 3 की रफ्तार से चलती है जो इसे इंटरसेप्ट करना बेहद मुश्किल बना देता है।

इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह क्रूज मिसाइल समुद्र की सतह से सिर्फ 3 से 10 मीटर की ऊंचाई पर उड़ सकती है। इतनी कम ऊंचाई पर उड़ने की वजह से दुश्मन का रडार इसे ट्रैक ही नहीं कर पाता। जब तक दुश्मन को पता चलता है, तब तक मिसाइल निशाने पर पहुंच चुकी होती है। रिएक्शन टाइम इतना कम मिलता है कि दुश्मन कुछ कर ही नहीं पाता।

इसके अलावा इतनी तेज रफ्तार से टारगेट पर टकराने की वजह से इसमें हाई काइनेटिक एनर्जी इंपैक्ट होता है। मतलब भले ही वॉरहेड छोटा हो, लेकिन रफ्तार इतनी ज्यादा होती है कि टकराने पर विनाश बहुत भयंकर होता है।

ब्रह्मोस को हर तरह के प्लेटफॉर्म से लॉन्च किया जा सकता है। चाहे जमीन पर मोबाइल लॉन्चर हो, नौसेना के युद्धपोत हों, पनडुब्बी हो या फिर सुखोई-30MKI जैसे लड़ाकू विमान हों, हर जगह से ब्रह्मोस दागी जा सकती है।

चीन से टकराव: इंडोनेशिया को ब्रह्मोस की जरूरत क्यों पड़ी

BrahMos Missile Deal के पीछे इंडोनेशिया का सबसे बड़ा मोटिवेशन चीन के साथ चल रहा समुद्री विवाद है। इंडोनेशिया 17,000 से ज्यादा द्वीपों वाला देश है जिसके पास विशाल समुद्री क्षेत्र और स्ट्रैटेजिक सी रूट्स हैं। Strait of Malacca से लेकर साउथ चाइना सी तक, इंडोनेशिया ग्लोबल ट्रेड के लिहाज से बेहद अहम स्थान पर बैठा है।

मुख्य विवाद नटूना द्वीपसमूह (Natuna Islands) को लेकर है। इंडोनेशिया का दावा है कि नटूना सी उसके एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन (EEZ) में आती है। लेकिन चीन अपनी कुख्यात नाइन-डैश लाइन के जरिए पूरे साउथ चाइना सी पर दावा करता है और यह लाइन इंडोनेशिया के EEZ से ओवरलैप करती है। इसी वजह से चीनी कोस्ट गार्ड शिप्स और फिशिंग फ्लीट्स बार-बार इंडोनेशिया के समुद्री क्षेत्र में घुसपैठ करते रहते हैं।

इसी चीनी दबाव से निपटने के लिए इंडोनेशिया अपनी एंटी-शिप कैपेबिलिटी और कोस्टल डिफेंस सिस्टम को मजबूत करना चाहता है। और ब्रह्मोस इस भूमिका में बिल्कुल सटीक बैठती है। जब चीन को पता होगा कि इंडोनेशिया के पास ब्रह्मोस जैसी घातक मिसाइल है तो वह अपने किसी भी कदम से पहले दस बार सोचेगा।

इंडोनेशिया कैसे करेगा ब्रह्मोस का इस्तेमाल

BrahMos Missile Deal के तहत मिलने वाली मिसाइलों को इंडोनेशिया सबसे ज्यादा संभावना के मुताबिक कोस्टल डिफेंस बैटरीज के रूप में तैनात करेगा। ठीक वैसे ही जैसे फिलीपींस ने किया है। मोबाइल लॉन्च व्हीकल्स को तटीय क्षेत्रों में ले जाकर तैनात किया जाएगा, साथ में रडार सिस्टम और कमांड कंट्रोल यूनिट्स भी लगाई जाएंगी।

इसका मकसद साफ है कि अगर कोई भी दुश्मन जहाज इंडोनेशिया के समुद्री क्षेत्र में घुसने की कोशिश करे तो ब्रह्मोस मिसाइल के जरिए उसे तुरंत नष्ट किया जा सके या कम से कम इतनी मजबूत डिटरेंस खड़ी हो कि कोई घुसने की हिम्मत ही न करे। इंडोनेशिया के 17,000 से ज्यादा द्वीपों और विशाल समुद्री सीमाओं की सुरक्षा के लिए ब्रह्मोस एक गेम-चेंजर साबित हो सकती है।

भारत के डिफेंस एक्सपोर्ट के लिए बड़ा माइलस्टोन

BrahMos Missile Deal भारत के डिफेंस एक्सपोर्ट सेक्टर के लिए एक और बड़ी उपलब्धि है। पिछले एक दशक में भारत का डिफेंस एक्सपोर्ट लगातार बढ़ता जा रहा है। DRDO, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) और ब्रह्मोस एयरोस्पेस भारत की प्रमुख डिफेंस एक्सपोर्ट संस्थाएं हैं।

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भारत जो पहले सिर्फ हथियार खरीदने वाला देश माना जाता था, अब धीरे-धीरे हथियार बेचने वाले देश के रूप में अपनी पहचान बना रहा है। फिलीपींस की $375 मिलियन की डील के बाद अब इंडोनेशिया की यह $350 मिलियन की डील साबित करती है कि ब्रह्मोस की ग्लोबल डिमांड लगातार बढ़ रही है।

ब्रह्मोस में और भी कई देशों ने दिलचस्पी दिखाई है। वियतनाम, ब्राजील, साउथ अफ्रीका और यूनाइटेड अरब एमिरेट्स (UAE) जैसे देश भी ब्रह्मोस खरीदने पर विचार कर रहे हैं। अगर UAE के पास आज ब्रह्मोस होता तो मिडिल ईस्ट में चल रहे मौजूदा संकट में वह अपनी डिफेंस के मामले में कहीं ज्यादा मजबूत स्थिति में होता और पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।

इंडो-पैसिफिक स्ट्रैटेजी को मिलेगी मजबूती

BrahMos Missile Deal सिर्फ एक हथियारों की बिक्री नहीं है, बल्कि यह भारत की इंडो-पैसिफिक स्ट्रैटेजी का अहम हिस्सा है। भारत का स्ट्रैटेजिक डॉक्ट्रिन यही कहता है कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग बढ़ाया जाए, समुद्री मार्गों को सुरक्षित किया जाए और चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित किया जाए।

चीन साउथ चाइना सी में लगातार अपना विस्तार कर रहा है। एयरक्राफ्ट कैरियर्स, नेवल बेसेज और कृत्रिम द्वीप बनाकर वह इस पूरे क्षेत्र पर अपना दबदबा कायम करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन अब जब साउथ-ईस्ट एशिया के देशों के पास ब्रह्मोस जैसी घातक एंटी-शिप मिसाइल होगी तो चीन के नौसैनिक विस्तार को एक मजबूत काउंटर मिलेगा।

इंडोनेशिया आसियान (ASEAN) के सबसे महत्वपूर्ण देशों में से एक है। भारत का इंडोनेशिया के साथ यह डिफेंस पार्टनरशिप मजबूत करना इस बात का संकेत है कि भारत एशियाई देशों के साथ अपने सामरिक संबंधों को नई ऊंचाई पर ले जाना चाहता है।

ब्रह्मोस-2 आ रहा है: हाइपरसोनिक स्पीड, दुगुने से ज्यादा तेज

भारत सिर्फ मौजूदा ब्रह्मोस तक सीमित नहीं रहना चाहता। BrahMos Missile Deal की सफलता के साथ-साथ भारत अगली पीढ़ी का वर्जन ब्रह्मोस-2 विकसित कर रहा है। यह हाइपरसोनिक मिसाइल होगी जिसकी रफ्तार मैक 7 से ज्यादा यानी ध्वनि की गति से सात गुना तेज होगी। मौजूदा ब्रह्मोस जो मैक 3 पर चलती है, उसके मुकाबले यह दुगुने से भी ज्यादा तेज होगी।

ब्रह्मोस-2 की रेंज भी बेहतर होगी, इसमें स्टेल्थ कैपेबिलिटी और इंप्रूव की जाएगी और अगर यह सफल रहा तो यह दुनिया की सबसे तेज क्रूज मिसाइलों में से एक बन जाएगी। डिफेंस टेक्नोलॉजी में लगातार सुधार करना इसलिए जरूरी है क्योंकि आज जो टेक्नोलॉजी सबसे आगे है, कल वही पुरानी पड़ सकती है। भारत इस बात को समझता है और इसीलिए ब्रह्मोस-2 पर तेजी से काम कर रहा है।

ताकत ही सम्मान दिलाती है: यही है असल सबक

BrahMos Missile Deal एक बार फिर यह साबित करती है कि दुनिया में सम्मान उसी को मिलता है जिसके पास ताकत होती है। चाहे मिडिल ईस्ट का युद्ध देख लीजिए या साउथ चाइना सी का तनाव, हर जगह यही दिखता है कि जिस देश के पास डिफेंस कैपेबिलिटी नहीं है, वह बेबस खड़ा रहता है। शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च होना बेहद जरूरी है, लेकिन अगर देश ही सुरक्षित नहीं रहेगा तो बाकी सब बेमानी हो जाएगा। भारत जैसे देश के लिए जहां एक तरफ चीन और दूसरी तरफ पाकिस्तान जैसे पड़ोसी हैं, डिफेंस पर निवेश कोई विकल्प नहीं बल्कि जरूरत है। और अब जब भारत का बनाया हथियार दूसरे देश अपनी सुरक्षा के लिए खरीद रहे हैं तो यह भारत की बढ़ती ताकत और साख दोनों का प्रमाण है।


मुख्य बातें (Key Points)
  • इंडोनेशिया ने भारत से ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने के लिए $200-350 मिलियन का समझौता किया है, जो फिलीपींस के बाद दूसरी बड़ी BrahMos Missile Deal है।
  • ब्रह्मोस मैक 3 की रफ्तार से उड़ने वाली दुनिया की सबसे तेज ऑपरेशनल क्रूज मिसाइल है जो समुद्र की सतह से सिर्फ 3-10 मीटर ऊपर उड़ती है, जिससे इसे इंटरसेप्ट करना लगभग नामुमकिन है।
  • इंडोनेशिया यह मिसाइल नटूना द्वीपसमूह पर चीन के साथ चल रहे समुद्री विवाद से निपटने और अपनी कोस्टल डिफेंस मजबूत करने के लिए खरीद रहा है।
  • भारत ब्रह्मोस-2 विकसित कर रहा है जो मैक 7 से ज्यादा हाइपरसोनिक स्पीड वाली होगी और दुनिया की सबसे तेज क्रूज मिसाइलों में शुमार होगी।

FAQ: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Q1. इंडोनेशिया ने भारत से ब्रह्मोस मिसाइल क्यों खरीदी?

इंडोनेशिया का साउथ चाइना सी में नटूना द्वीपसमूह को लेकर चीन के साथ समुद्री विवाद चल रहा है। चीनी जहाज बार-बार इंडोनेशिया के समुद्री क्षेत्र में घुसपैठ करते हैं। इससे निपटने के लिए इंडोनेशिया अपनी एंटी-शिप कैपेबिलिटी और कोस्टल डिफेंस को मजबूत करना चाहता है और ब्रह्मोस इस भूमिका में सबसे उपयुक्त मिसाइल है।

Q2. BrahMos Missile Deal में भारत कौन सा वर्जन एक्सपोर्ट करता है?

भारत MTCR (मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम) के नियमों का पालन करता है, इसलिए एक्सपोर्ट वर्जन की रेंज 290 किलोमीटर तक सीमित रखी जाती है। भारत के अपने लेटेस्ट वर्जन की रेंज 450-800 किलोमीटर है लेकिन वह एक्सपोर्ट नहीं किया जाता।

Q3. ब्रह्मोस के अलावा और कौन से देश इस मिसाइल में रुचि दिखा रहे हैं?

फिलीपींस पहले ही ब्रह्मोस खरीद चुका है। इसके अलावा वियतनाम, ब्राजील, साउथ अफ्रीका और यूनाइटेड अरब एमिरेट्स (UAE) जैसे देशों ने भी ब्रह्मोस खरीदने में दिलचस्पी दिखाई है।

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अभिनव कश्यप

अभिनव कश्यप 'The News Air' के संस्थापक और मुख्य संपादक (Chief Editor) हैं। डिजिटल मीडिया में उनके अनुभव में ग्राउंड रिपोर्टिंग, न्यूज़ डेस्क ऑपरेशन और एडिटोरियल लीडरशिप शामिल है। वे हर खबर की फैक्ट-चेकिंग और संपादन की व्यक्तिगत रूप से निगरानी करते हैं। राजनीति, चुनाव विश्लेषण, सामाजिक मुद्दे और डिजिटल मीडिया ट्रेंड्स उनकी विशेषज्ञता के प्रमुख क्षेत्र हैं। अभिनव का संपादकीय सिद्धांत है "सनसनी नहीं, सच्चाई; तेज़ी नहीं, तथ्य।"

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