Bhagat Singh Pakistan Controversy एक बार फिर दो देशों के बीच गहरी वैचारिक खाई को उजागर कर रही है। भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर 1907 को लायलपुर जिले के बंगा गांव में हुआ था, जो आज पाकिस्तान में है। 23 मार्च 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल में उन्हें राजगुरु और सुखदेव के साथ फांसी दी गई। भारत में वे शहीद-ए-आजम कहलाते हैं, पंजाब उन्हें अपनी माटी का सपूत मानता है, लेकिन पाकिस्तान में उनकी विरासत आज भी विवादों में घिरी हुई है। एक पाकिस्तानी रिटायर्ड मिलिट्री ऑफिसर ने तो उन्हें ‘क्रिमिनल’ और ‘टेररिस्ट’ तक करार दे दिया। सवाल यह है कि क्या भगत सिंह कभी भारत और पाकिस्तान दोनों के साझा नायक बन सकते हैं?
लाला लाजपत राय की मौत ने जलाई बगावत की चिंगारी
भगत सिंह सात भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर थे। उनके पिता और चाचा पहले से ही स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय थे और 1914-15 के गदर मूवमेंट का हिस्सा रहे। यानी बगावत उन्हें विरासत में मिली थी।
1928 में भारत की शासन व्यवस्था की समीक्षा के लिए साइमन कमीशन बनाया गया, जिसमें एक भी भारतीय सदस्य नहीं था। इसके विरोध में देशभर में प्रदर्शन हो रहे थे। 30 अक्टूबर 1928 को लाहौर में लाला लाजपत राय के नेतृत्व में एक बड़ा प्रदर्शन हुआ। ब्रिटिश पुलिस सुपरिंटेंडेंट जेम्स स्कॉट ने लाठी चार्ज का आदेश दिया, जिसमें लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हो गए और 17 नवंबर 1928 को उनकी मृत्यु हो गई।
इस घटना ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को अंदर तक झकझोर दिया। तीनों ने ठान लिया कि स्कॉट से बदला लेंगे। लेकिन पहचान की गलती हो गई और ब्रिटिश ऑफिसर जॉन सॉन्डर्स को स्कॉट समझकर मार दिया गया। यहीं से तीनों का विद्रोह पूरे देश की नजरों में आ गया और वे स्वतंत्रता संग्राम के नायक बन गए।
भगत सिंह के वो विचार जो आज भी राजनेताओं को असहज करते हैं
Bhagat Singh Pakistan Controversy को समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि भगत सिंह सिर्फ एक क्रांतिकारी नहीं थे, वे एक विचारक भी थे। बेहद कम उम्र में उन्होंने नौजवान भारत सभा की स्थापना की, जिसके जरिए पर्चों, पत्रिकाओं और अखबारों से अपने विचार फैलाए।
भगत सिंह की सोच के कई आयाम थे जो आज भी प्रासंगिक हैं। उनका सबसे बड़ा विचार तर्कवाद (Rationalism) था। वे अंधविश्वास के घोर विरोधी थे। उनका मानना था कि भारत की सबसे बड़ी समस्याएं गरीबी, अशिक्षा और अंधविश्वास हैं और भगवान ऊपर से आकर किसी को नहीं बचाएंगे, लोगों को अपनी रक्षा खुद करनी होगी।
वे समाजवाद (Socialism) के प्रबल समर्थक थे। उनकी सोच थी कि समाज में जो भी चीजें बनें, वे लोगों की जरूरतें पूरी करने के लिए बनें, न कि मुनाफा कमाने के लिए। वे मजदूरों और किसानों के नेतृत्व वाली व्यवस्था चाहते थे। धर्मनिरपेक्षता (Secularism) उनके विचारों का अभिन्न हिस्सा थी। वे धर्म आधारित राजनीति के सख्त खिलाफ थे। जाति भेदभाव का विरोध करते थे और सामाजिक-आर्थिक न्याय की बात करते थे।
1924 में उनका एक लेख है जिसमें उन्होंने लिखा: “एक ऐसी दुनिया जहां हम सब एक हों और कोई दूसरा न हो, जब दुनिया में कोई अजनबी नहीं होगा, वह सच में एक सुकून भरा वक्त होगा।”
प्रेस की भूमिका पर भगत सिंह ने 100 साल पहले क्या कहा था
भगत सिंह ने मीडिया की भूमिका पर जो बात कही थी, वह आज के दौर में और भी ज्यादा मायने रखती है। उन्होंने कहा था कि अखबारों का असली काम है लोगों को शिक्षित करना, उनकी सोच को संकीर्ण सांप्रदायिकता से बचाना, सांप्रदायिक भावनाओं को खत्म करना और साझी राष्ट्रीयता के विचार को बढ़ावा देना।
लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि इसके बजाय मीडिया का मुख्य उद्देश्य अज्ञानता फैलाना, संप्रदायवाद और उग्रवाद का प्रचार करना, लोगों के मन को सांप्रदायिक बनाना और साझी संस्कृति व विरासत को नष्ट करना हो गया है। आज सोशल मीडिया और 24 घंटे के न्यूज चैनलों के दौर में भगत सिंह की ये बातें और भी तीखी लगती हैं।
शादमान चौक विवाद: जब पाकिस्तान ने भगत सिंह का नाम ठुकराया
Bhagat Singh Pakistan Controversy का सबसे बड़ा प्रतीक शादमान चौक है। ‘शादमान’ का मतलब होता है ‘खुशी’। यह लाहौर के एक रिहायशी इलाके में है और यही वो जगह थी जहां भगत सिंह को फांसी दी गई थी। 1961 में पुरानी जेल तोड़ दी गई और चार साल बाद कोर्ट लखपत जेल खुली, जिसे बाद में लाहौर सेंट्रल जेल का नाम दिया गया।
2014 में पाकिस्तान में एक प्रस्ताव आया कि शादमान चौक का नाम बदलकर भगत सिंह के नाम पर रख दिया जाए। लेकिन इस प्रस्ताव को रद्द कर दिया गया। पाकिस्तान के एक रिटायर्ड मिलिट्री ऑफिसर रिटायर्ड कमोडोर तारिक मजीद ने एक रिपोर्ट दाखिल की, जिसे आधार बनाकर यह फैसला लिया गया।
तारिक मजीद की रिपोर्ट में दावा किया गया कि भगत सिंह कोई क्रांतिकारी नहीं बल्कि क्रिमिनल और टेररिस्ट थे, क्योंकि उन्होंने एक ब्रिटिश ऑफिसर की हत्या की थी। रिपोर्ट में यह भी लिखा गया कि इस्लाम में मूर्तियों (Statues) पर प्रतिबंध है और नास्तिकता (Atheism) को भी स्वीकार नहीं किया जाता। चूंकि भगत सिंह नास्तिक विचारों के थे, इसलिए उनका नाम पाकिस्तान की विचारधारा से मेल नहीं खाता।
भारत से इस पर तीखी प्रतिक्रिया आई। बीजेपी (BJP) और आम आदमी पार्टी (AAP) दोनों ने पाकिस्तान की आलोचना की।
हालांकि पाकिस्तान में सभी लोग भगत सिंह का विरोध नहीं करते। वहां भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन भी है, जिसके चेयरपर्सन इम्तियाज़ राशिद कुरैशी हैं। कुरैशी का मानना है कि भगत सिंह धर्म और सरहदों से परे हैं और वे चाहते थे कि शादमान चौक का नाम बदलकर भगत सिंह के नाम पर रखा जाए।
भारतीय राजनीति और भगत सिंह: सबको चाहिए नाम, विचार कोई नहीं अपनाता
Bhagat Singh Pakistan Controversy सिर्फ सरहद के उस पार तक सीमित नहीं है। भारत में भी भगत सिंह के साथ राजनीतिक दलों का रिश्ता बड़ा दिलचस्प और विरोधाभासी रहा है। हर पार्टी, हर विचारधारा भगत सिंह को अपना बताना चाहती है, उनके नाम से जुड़ना चाहती है, लेकिन उनके असली विचारों को अपनाने से कतराती है।
2009 में बीजेपी के नेतृत्व वाली हरियाणा सरकार ने चंडीगढ़ इंटरनेशनल एयरपोर्ट का नाम भगत सिंह एयरपोर्ट रखने का प्रस्ताव ठुकरा दिया था। लेकिन 2022 में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की कि चंडीगढ़ एयरपोर्ट का नाम शहीद भगत सिंह इंटरनेशनल एयरपोर्ट रखा जाएगा। एक ही पार्टी, दो अलग-अलग समय पर दो अलग-अलग फैसले।
2022-23 में कर्नाटक में बीजेपी सरकार पर एक और विवाद खड़ा हुआ। स्कूल की पाठ्यपुस्तकों से भगत सिंह पर एक अध्याय हटा दिया गया, जबकि आरएसएस (RSS) के संस्थापक के भाषण को बढ़ावा दिया गया। इस पर जमकर विरोध हुआ।
पंजाब में भी 2022 में जुलाई महीने में शिरोमणि अकाली दल के पूर्व सांसद सिमरनजीत सिंह मान ने भगत सिंह को ‘टेररिस्ट’ करार दे दिया। यानी भारत में भी भगत सिंह को लेकर एक सर्वसम्मति नहीं है।
असली सवाल: भगत सिंह को पोस्टर में रखा या उनके विचारों को दिल में
हर कोई भगत सिंह से जुड़ना चाहता है, उनकी तस्वीर अपने बैनर पर लगाना चाहता है, लेकिन उनके असली विचारों से कोई वास्ता नहीं रखना चाहता। नास्तिकता, पूंजीवाद विरोध, जाति विरोध, धर्म आधारित राजनीति का विरोध: ये सब भगत सिंह के मूल विचार थे। आज भारत के कितने राजनेता इन विचारों को खुलकर अपनाने की हिम्मत रखते हैं?
एक देश पाकिस्तान उन्हें स्वीकार करने से कतराता है, क्योंकि उनकी नास्तिक सोच और धर्मनिरपेक्ष विचारधारा पाकिस्तान के राष्ट्रीय आख्यान से मेल नहीं खाती। दूसरा देश भारत उन्हें सिर्फ पोस्टर में देखता है, शहीद कहता है, लेकिन उनके लिखे एक-एक शब्द से आंखें चुराता है।
भगत सिंह ने कहा था कि ब्रिटिश हुकूमत बम धमाके को सह सकती है, लेकिन उनकी लेखनी से डरती है। यही बात आज के आधुनिक राजनेताओं पर भी लागू होती है। भगत सिंह का असली खतरा उनकी बंदूक नहीं, उनकी कलम थी और उनके विचार आज भी उतने ही धारदार हैं।
क्या भगत सिंह कभी दो देशों के साझा नायक बन सकते हैं
भगत सिंह का जन्म उस धरती पर हुआ जो आज पाकिस्तान है। उन्हें फांसी भी उसी सरजमीं पर दी गई। भारत में हुसैनीवाला बॉर्डर पर उनका स्मारक है जो भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित है। उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ लड़ाई लड़ी, जिसने इस पूरे क्षेत्र को गुलाम बनाए रखा था। तर्क यह है कि भगत सिंह का संघर्ष किसी एक देश के लिए नहीं, बल्कि इस पूरी सरजमीं की आजादी के लिए था।
लेकिन जब तक पाकिस्तान में उनकी नास्तिक और धर्मनिरपेक्ष विचारधारा को राष्ट्रीय पहचान से टकराव माना जाता रहेगा और भारत में उनके विचारों को सुविधानुसार इस्तेमाल किया जाता रहेगा, तब तक भगत सिंह दो देशों के बीच बंटे हुए एक नायक ही रहेंगे। शायद सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिस इंसान ने विभाजन और संकीर्णता के खिलाफ आवाज उठाई, उसकी विरासत खुद विभाजन की शिकार है।
मुख्य बातें (Key Points)
- पाकिस्तान में 2014 में लाहौर के शादमान चौक का नाम भगत सिंह पर रखने का प्रस्ताव रद्द किया गया। रिटायर्ड कमोडोर तारिक मजीद ने रिपोर्ट में भगत सिंह को क्रिमिनल और टेररिस्ट बताया, उनकी नास्तिक सोच को पाकिस्तान की विचारधारा के विपरीत करार दिया।
- भारत में भी भगत सिंह को लेकर राजनीतिक विरोधाभास है। 2009 में BJP ने एयरपोर्ट नामकरण ठुकराया, 2022 में खुद मोदी ने घोषणा की; कर्नाटक में पाठ्यपुस्तक से अध्याय हटाया गया; पंजाब में पूर्व सांसद ने उन्हें टेररिस्ट कहा।
- भगत सिंह के मूल विचार: तर्कवाद, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, जाति विरोध और युवा क्रांति। हर पार्टी उनका नाम लेती है लेकिन उनके विचारों को अपनाने से कतराती है।
- भगत सिंह का जन्म और शहादत दोनों आज के पाकिस्तान की धरती पर हुए। उनका संघर्ष किसी एक देश के लिए नहीं, पूरे उपमहाद्वीप की आजादी के लिए था।







