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The News Air - Breaking News - OSHO के जीवनकाल और मृत्यु के बारे में…….

OSHO के जीवनकाल और मृत्यु के बारे में…….

भगवान श्री रजनीश, ओशो रजनीश, या केवल रजनीश के नाम से जाना जाता है,

The News Air Team by The News Air Team
बुधवार, 24 जनवरी 2024
in Breaking News, NEWS-TICKER, स्पेशल स्टोरी
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OSHO

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24 जनवरी, (The News Air) – ओशो (मूल नाम रजनीश) श्री रजनीश (जन्म 11 दिसंबर, 1931, कुचवाड़ा, भारत – मृत्यु 19 जनवरी, 1990, पुणे) एक भारतीय आध्यात्मिक नेता थे जिन्होंने पूर्वी रहस्यवाद , व्यक्तिगत भक्ति और के एक उदार सिद्धांत का प्रचार किया। भगवान श्री रजनीश, ओशो रजनीश, या केवल रजनीश के नाम से जाना जाता है, एक भारतीय , विचारक, धर्मगुरु और रजनीश आंदोलन के प्रणेता-नेता थे। अपने संपूर्ण जीवनकाल में आचार्य रजनीश को एक विवादास्पद रहस्यदर्शी, गुरु और आध्यात्मिक शिक्षक के रूप में देखा गया। वे धार्मिक रूढ़िवादिता के बहुत कठोर आलोचक थे, जिसकी वजह से वह बहुत ही जल्दी विवादित हो गए और ताउम्र विवादित ही रहे। 1960 के दशक में उन्होंने पूरे भारत में एक सार्वजनिक वक्ता के रूप में यात्रा की और वे पूंजीवाद, व गांधी के कुछ विचारो , और हिंदू धार्मिक रूढ़िवाद के प्रखर आलोचक रहे। उन्होंने मानव कामुकता के प्रति एक ज्यादा खुले रवैया की वकालत की, जिसके कारण वे भारत तथा पश्चिमी देशों में भी आलोचना के पात्र रहे, हालाँकि बाद में उनका यह दृष्टिकोण अधिक स्वीकार्य हो गया।

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चन्द्र मोहन जैन का जन्म भारत के मध्य प्रदेश राज्य के नरसिंहपुर जिला के गाडरवारा शहर में शक्कर नदी के तट पर एक छोटे से घर में हुआ था। ओशो शब्द की मूल उत्पत्ति के सम्बन्ध में कई धारणायें हैं। एक मान्यता के अनुसार, खुद ओशो कहते है कि ओशो शब्द कवि विलयम जेम्स की एक कविता ‘ओशनिक एक्सपीरियंस’ के शब्द ‘ओशनिक’ से लिया गया है, जिसका अर्थ है ‘सागर में विलीन हो जाना। शब्द ‘ओशनिक’ अनुभव का वर्णन करता है, वे कहते हैं, लेकिन अनुभवकर्ता के बारे में क्या? इसके लिए हम ‘ओशो’ शब्द का प्रयोग करते हैं। अर्थात, ओशो मतलब- ‘सागर से एक हो जाने का अनुभव करने वाला’। 1960 के दशक में वे ‘आचार्य रजनीश’ के नाम से एवं 1970-80 के दशक में भगवान श्री रजनीश नाम से और 1989 के समय से ओशो के नाम से जाने गये। वे एक आध्यात्मिक गुरु थे, तथा भारत व विदेशों में जाकर उन्होने प्रवचन दिये। रजनीश ने अपने विचारों का प्रचार करना मुम्बई में शुरू किया, जिसके बाद, उन्होंने पुणे में अपना एक आश्रम स्थापित किया, जिसमें विभिन्न प्रकार के उपचारविधान पेश किये जाते थे. तत्कालीन भारत सरकार से कुछ मतभेद के बाद उन्होंने अपने आश्रम को ऑरगन, अमरीका में स्थानांतरित कर लिया। 1985 में एक खाद्य सम्बंधित दुर्घटना के बाद उन्हें संयुक्त राज्य से निर्वासित कर दिया गया और 21अन्य देशों से ठुकराया जाने के बाद वे वापस भारत लौटे और पुणे के अपने आश्रम में अपने जीवन के अंतिम दिन बिताये।

जीवन-बचपन एवं किशोरावस्था: ओशो का मूल नाम चन्द्र मोहन जैन था। वे अपने पिता की ग्यारह संतानो में सबसे बड़े थे। उनका जन्म मध्य प्रदेश में रायसेन जिले के अंतर्गत आने वाले कुचवाडा ग्राम में हुआ था। उनके माता पिता श्री बाबूलाल और सरस्वती जैन, जो कि तेैरापंथी दिगंबर जैन थे, ने उन्हें अपने ननिहाल में 7 वर्ष की उम्र तक रखा था। ओशो के स्वयं के अनुसार उनके विकास में इसका प्रमुख योगदान रहा क्योंकि उनकी नानी ने उन्हें संपूर्ण स्वतंत्रता, उन्मुक्तता तथा रुढ़िवादी शिक्षाओं से दूर रखा। जब वे 7 वर्ष के थे तब उनके नाना का निधन हो गया और वे गाडरवारा अपने माता पिता के साथ रहने चले गए। रजनीश बचपन से ही गंभीर व सरल स्वभाव के थे, वे शासकीय आदर्श उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में पढा करते थे। विद्यार्थी काल में रजनीश बगावती सोच के व्यक्ति हुआ करते थे, जिसे परंपरागत तरीके नहीं भाते थे। किशोरावस्था तक आते-आते रजनीश नास्तिक बन चुके थे। उन्हें ईश्वर और आस्तिकता में जरा भी विश्वास नहीं था। अपने विद्यार्थी काल में उन्होंने ने एक कुशल वक्ता और तर्कवादी के रूप में अपनी पहचान बना ली थी। किशोरावस्था में वे आज़ाद हिंद फ़ौज और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भी क्षणिक काल के लिए शामिल हुए थे।

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जीवनकाल: वर्ष 1957 में दर्शनशास्त्र के प्राध्यापक के तौर पर रजनीश रायपुर विश्वविद्यालय से जुड़े। लेकिन उनके गैर परंपरागत धारणाओं और जीवनयापन करने के तरीके को छात्रों के नैतिक आचरण के लिए घातक समझते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति ने उनका स्थानांतरण कर दिया। अगले ही वर्ष वे दर्शनशास्त्र के प्राध्यापक के रूप में जबलपुर विश्वविद्यालय में शामिल हुए। इस दौरान भारत के कोने-कोने में जाकर उन्होंने गांधीवाद और समाजवाद पर भाषण दिया; अब तक वह आचार्य रजनीश के नाम से अपनी पहचान स्थापित कर चुके थे। वे दर्शनशास्त्र के अध्यापक थे। उनके द्वारा समाजवाद, महात्मा गाँधी की विचारधारा तथा संस्थागत धर्म पर की गई अलोचनाओं ने उन्हें विवादास्पद बना दिया। वे मानव कामुकता के प्रति स्वतंत्र दृष्टिकोण के भी हिमायती थे जिसकी वजह से उन्हें कई भारतीय और फिर विदेशी पत्रिकाओ में “सेक्स गुरु” के नाम से भी संबोधित किया गया।

1970 के दशक की शुरुआत में सबसे पहले पश्चिमी लोग रजनीश के पास आए और 1974 में उनके आंदोलन का नया मुख्यालय पुणे में स्थापित किया गया। केंद्र में सिखाए जाने वाले बुनियादी अभ्यास को गतिशील ध्यान कहा जाता था, एक प्रक्रिया जिसे लोगों को दिव्य अनुभव करने की अनुमति देने के लिए डिज़ाइन किया गया था। केंद्र ने पश्चिम से अपनाए गए नए युग के उपचार का एक विविध कार्यक्रम भी विकसित किया। रजनीश कामुकता के प्रति अपने प्रगतिशील दृष्टिकोण के लिए प्रसिद्ध हो गए , जो कई अन्य भारतीय शिक्षकों द्वारा समर्थित सेक्स के त्याग के विपरीत था। 1981 में रजनीश संयुक्त राज्य अमेरिका चले गए और अगले वर्ष निगमित हो गएरजनीशपुरम, एक नया शहर जिसे उन्होंने एंटेलोप, ओरेगॉन के पास एक परित्यक्त खेत पर बनाने की योजना बनाई थी । अगले कुछ वर्षों के दौरान उनके कई सबसे भरोसेमंद सहयोगियों ने आंदोलन छोड़ दिया, जो आगजनी , हत्या के प्रयास, नशीली दवाओं की तस्करी और एंटेलोप में वोट धोखाधड़ी सहित कई गुंडागर्दी के लिए जांच के दायरे में आया। 1985 में रजनीश ने आप्रवासन धोखाधड़ी का दोषी ठहराया और उन्हें संयुक्त राज्य अमेरिका से निर्वासित कर दिया गया। पुणे लौटने से पहले उन्हें 21 देशों में प्रवेश से मना कर दिया गया , जहां उनकाआश्रम जल्द ही 15,000 सदस्यों तक बढ़ गया।

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मृत्यु: 1989 में रजनीश ने बौद्ध नाम ओशो अपना लिया। उनकी मृत्यु के बाद उनके शिष्यों को यह विश्वास हो गया कि वह सरकारी साज़िश का शिकार हो गए हैं, उन्होंने उनकी बेगुनाही पर विश्वास जताया और उनके द्वारा शुरू किए गए आंदोलन को जारी रखने की कसम खाई। 21वीं सदी की शुरुआत में इसके लगभग 750 केंद्र 60 से अधिक देशों में स्थित थे। ओशो की मृत्यु 19 जनवरी 1990 को, 58 वर्ष की आयु में, पुणे, भारत में आश्रम में हुई। मौत का आधिकारिक कारण हृदय गति रुकना था, लेकिन उनके कम्यून द्वारा जारी एक बयान में कहा गया है कि अमेरिकी जेलों में कथित जहर देने के बाद “शरीर में रहना नरक बन गया था” इसलिए उनकी मृत्यु हो गई। उनकी राख को पुणे के आश्रम में लाओ त्ज़ु हाउस में उनके नवनिर्मित बेडरूम में रखा गया था। ओशो की समाधि पर स्मृतिलेख है, ‘न जन्में न मरे – सिर्फ 11 दिसंबर, 1931 और 19 जनवरी, 1990 के बीच इस ग्रह पृथ्वी का दौरा किया’।

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ओशो की मौत अभी भी एक रहस्य बनी हुई है और जनवरी 2019 में ‘द क्विंट’ के एक लेख में कुछ प्रमुख प्रश्न पूछे गए हैं जैसे “क्या ओशो की हत्या पैसे के लिए की गई थी? क्या उनकी वसीयत नकली है? क्या विदेशी भारत के खजाने को लूट रहे हैं?

 

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