Voter List Update देश के नौ राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में चल रहे मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) ने बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLOs) की जिंदगी को एक कड़वे संघर्ष में बदल दिया है। 4 नवंबर से शुरू हुए इस अभियान का दूसरा चरण अभी 22 दिन ही पूरा कर पाया है, लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस दौरान छह राज्यों में कम से कम 15 बीएलओ की मौत हो चुकी है। हालांकि, इन मौतों का सीधा कारण काम का दबाव बताया नहीं गया है, लेकिन परिजनों के आरोप और कम समय में करोड़ों वोटर्स को कवर करने का लक्ष्य, बीएलओ के तनाव की कहानी खुद-ब-खुद बयां कर रहा है।
ये मौतें सिर्फ एक आंकड़ा नहीं हैं, बल्कि उस जमीनी हकीकत का एक भयावह चेहरा हैं, जिससे चुनाव आयोग के 53 लाख से ज्यादा बीएलओ हर दिन जूझ रहे हैं। 18-18 घंटे काम, घर-परिवार से दूरी, वोटर्स की अनदेखी और अधिकारियों का दबाव—यही एक आम बीएलओ का मौजूदा जीवन बन चुका है।
‘क्या है एसआईआर और बीएलओ का रोल’
एसआईआर यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन, वोटर लिस्ट को अपडेट करने की एक गहन प्रक्रिया है। इसका दूसरा चरण 4 नवंबर को शुरू हुआ था और 4 दिसंबर तक सभी फॉर्म्स जमा करने का लक्ष्य है, ताकि 9 दिसंबर को ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी की जा सके।
इस महाअभियान में चुनाव आयोग ने 5,320,000 से ज्यादा बीएलओ को तैनात किया है। बीएलओ ही वह अहम कड़ी हैं जो नए वोटर जोड़ने, नाम हटाने या शिफ्ट करने का काम करते हैं। 18 साल की उम्र पार कर चुके हर पात्र व्यक्ति को वोटर लिस्ट में शामिल करने की जिम्मेदारी इन्हीं के कंधों पर है।
बीएलओ के रूप में टीचर्स, आंगनबाड़ी वर्कर्स, पटवारी, लेखपाल, पंचायत सेक्रेटरी, हेल्थ वर्कर्स, पोस्टमैन और यहां तक कि मिड-डे मील वर्कर्स जैसे विभिन्न सरकारी व अर्ध-सरकारी कर्मचारी काम कर रहे हैं।
‘बीएलओ की 10 बड़ी परेशानियां’
जमीनी हकीकत जानने के लिए जब कुछ बीएलओ से बात की गई, तो उनकी दिक्कतों का अंबार सामने आया। ये हैं वो 10 प्रमुख परेशानियां जो उनकी जान पर भारी पड़ रही हैं:
फॉर्म मिलने में देरी: 4 नवंबर को अभियान शुरू हुआ, लेकिन कई जगहों पर बीएलओ को फॉर्म हफ्ते भर बाद मिले। देरी से शुरुआत होने के बावजूद काम समय पर पूरा करने का दबाव उन पर है।
हर वोटर तक पहुंचना मुश्किल: लोग काम के चलते सुबह जल्दी निकल जाते हैं और देर रात लौटते हैं। बीएलओ को एक ही घर के कई चक्कर लगाने पड़ते हैं, कभी फॉर्म देने के लिए तो कभी कलेक्ट करने के लिए।
बाहर रहने वाले वोटर्स से संपर्क: कई वोटर्स दूसरे राज्यों में हैं या घूमने गए हैं। पड़ोसी और रिश्तेदार जानकारी देने या फोन नंबर साझा करने में सहयोग नहीं करते।
ट्रेनिंग और जिम्मेदारी का बोझ: सारी ट्रेनिंग सिर्फ बीएलओ को दी गई है, सहायक कर्मचारियों को नहीं। पूरी जिम्मेदारी अकेले बीएलओ पर होने से तनाव बढ़ता है, जिससे कई बार उनकी तबीयत बिगड़ जाती है।
वोटर्स का असहयोग और भ्रम: कई वोटर्स फॉर्म लेने से डरते हैं कि कहीं नाम न कट जाए। कुछ लोग फॉर्म लेकर भूल जाते हैं। पुरानी जानकारी (जैसे 2003 का रिकॉर्ड) न मिलने पर फॉर्म भरने में आनाकानी करते हैं।
फॉर्म भरने और अपलोड करने में समय: एक फॉर्म भरने में 15-20 मिनट लगते हैं। एक दिन में 100 फॉर्म्स की ऑनलाइन फीडिंग का लक्ष्य पूरा करना बेहद मुश्किल है। कई वोटर्स खुद भी फॉर्म भरने में गलतियां करते हैं।
स्थानीय जानकारी की कमी: नए या ट्रांसफर होकर आए बीएलओ को अपने पोलिंग एरिया के लोगों की जानकारी नहीं होती, जिससे काम और चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
जवाबदेही सिर्फ बीएलओ की: सहयोगी कर्मचारियों की कोई जवाबदेही नहीं है, जबकि निलंबन का डर सिर्फ बीएलओ को दिखाया जाता है। ज्यादा वोटर वाले एरिया में भी एक्स्ट्रा मदद नहीं मिलती।
शादीशुदा महिलाओं की जानकारी: कई महिलाएं पिता की जगह ससुर का नाम लिख देती हैं। उनकी पुरानी जानकारी जुटाने के लिए बीएलओ को खुद उनके मायके से संपर्क करना पड़ता है।
ऑनलाइन सिस्टम और टेक्नोलॉजी की दिक्कतें: धीमा इंटरनेट, सर्वर डाउन होना और कई बीएलओ का टेक्नोलॉजी फ्रेंडली न होना, ऑनलाइन फीडिंग को एक बड़ी बाधा बना देता है।
‘महिला बीएलओ की दोहरी चुनौती’
महिला बीएलओ के लिए यह काम दोहरी चुनौती है। उन्हें घर, बच्चों, बुजुर्गों की देखभाल और यहां तक कि पीरियड्स के दर्द के बीच भी यह थका देने वाला काम करना पड़ रहा है। जो लोग ग्राम पंचायत और विधानसभा दोनों जगह बीएलओ हैं, उनके लिए तो अपना मूल काम (जैसे पढ़ाना) करना भी मुश्किल हो गया है।
‘बीएलओ की कोशिशें और समाधान की उम्मीद’
तमाम दिक्कतों के बावजूद, बीएलओ अपने काम को अंजाम देने के लिए नए तरीके भी अपना रहे हैं। वे व्हाट्सएप ग्रुप्स का सहारा ले रहे हैं, यूट्यूब पर वीडियो बनाकर वोटर्स के सवालों के जवाब दे रहे हैं, और गलतियों से बचने के लिए पेंसिल से फॉर्म भरवा रहे हैं।
बीएलओ का कहना है कि काम के लिए और समय मिलना चाहिए था और प्रक्रिया चरणबद्ध होनी चाहिए थी। वे चुनाव आयोग और वोटर्स दोनों से सहयोग की अपील कर रहे हैं।








