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The News Air - Breaking News - 29 सीटों पर मतपेटियों को लूटने से मचा कोहराम तब भारत में आई ईवीएम,

29 सीटों पर मतपेटियों को लूटने से मचा कोहराम तब भारत में आई ईवीएम,

अमेरिका-इंग्लैंड आज भी नहीं जुटा पाए हिम्मत

The News Air Team by The News Air Team
शनिवार, 27 अप्रैल 2024
in Breaking News, NEWS-TICKER, राष्ट्रीय, सियासत
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ईवीएम
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नई दिल्ली, 27 अप्रैल (The News Air): अमेरिका को आजाद हुए 235 साल हो गए और आज उसे दुनिया का सबसे शक्तिशाली लोकतंत्र माना जाता है। वहीं, ब्रिटेन की तो एक समय पूरी दुनिया में हुकूमत चलती थी और आज वह भी लोकतांत्रिक और विकसित देश है। इन देशों में आज भी पुराने तरीके से ही चुनाव कराए जाते हैं। इन देशों में आज भी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग की कोई व्यवस्था नहीं बन पाई। ये देश तकनीकी रूप से इतने ताकतवर और सक्षम हैं, फिर भी वो भारत जैसी हिम्मत नहीं जुटा पाए। भारत जैसे विशाल देश में आज पूरी तरह इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) से चुनाव कराए जाते हैं।

हाल ही में ईवीएम मशीनों की विश्वसनीयता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। याचिकाओं में ईवीएम के बजाय बैलेट पेपर से मतदान कराए जाने की अपील की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने ईवीएम और वोटर वेरिफिएबल पेपर ऑडिल ट्रेल यानी वीवीपैट के 100 फीसदी मिलान की मांग करने वाली सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया। कोर्ट ने यह भी कहा कि ईवीएम के सोर्स कोड का खुलासा नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे दुरुपयोग की आशंका बनी सकती है।

अमेरिका-इंग्लैंड में बैलेट पेपर से होता है मतदान

अमेरिका और इंग्लैंड में बैलट पेपर से वोटिंग कराने का चलन है। वहां के नागरिकों को ये संदेह है कि ईवीएम की हैकिंग की जा सकती है। अमेरिका पोस्टल बैलेट के अलावा ई-वोटिंग का सिस्टम है जो ई-मेल या फैक्स से होता है। तकनीकी रूप से वोटर को एक बैलेट फॉर्म भेजा जाता है। वह उसे भरकर ई-मेल या फैक्स से लौटा देता है। इसमें वह बैलेट पर अपनी पसंद के प्रत्याशी को मार्क करता है और उसकी डिजिटल फोटो को ई-मेल या फैक्स से भेज देता है।

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दुनिया के इन देशों में होता है ईवीएम का इस्तेमाल

ईवीएम को लेकर दुनिया कई हिस्सों में बंटी हुई है। यूरोप और उत्तरी अमेरिका में जहां ईवीएम से मतदान नहीं कराए जाते हैं, वहीं दक्षिण अमेरिका और एशिया में ईवीएम से चुनाव कराने में भरोसा बढ़ा है। अनुमानित रूप से दुनिया के 31 देश ऐसे हैं, जहां ईवीएम का इस्तेमाल होता है या ईवीएम से चुनाव कराने को लेकर अध्ययन हो रहा है। केवल 4 देश ऐसे हैं, जहां ईवीएम का इस्तेमाल राष्ट्रीय स्तर पर होता है। 11 देश ऐसे हैं, जहां ईवीएम का इस्तेमाल कुछ हिस्सों में ही होता है। 5 देशों में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में ईवीएम का इस्तेमाल कर रहे हैं। 3 देशों में इसे बंद कर दिया गया है। 11 देश ऐसे हैं, जहां पायलट प्रोजेक्ट के रूप में ईवीएम का इस्तेमाल किया गया था, उन्होंने इसका इस्तेमाल बंद कर दिया है।

दुनिया के बड़े लोकतांत्रिक और विकसित देशों में ईवीएम पर भरोसा नहीं

सुरक्षा, सटीकता, विश्वसनीयता और प्रमाणिकता के बारे में गभीर संदेह होने की वजह से दुनिया के कई विकसित और लोकतांत्रिक देशों में ईवीएम अपना भरोसा नहीं जीत पाई है। जैसे कि अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, नार्वे और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में या तो ईवीएम पूरी तरह से बैन है या सीमित इस्तेमाल है। अक्टूबर, 2006 में नीदरलैंड और 2009 में आयरलैंड और इटली ने ईवीएम के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी। 2009 में ही जर्मनी के सुप्रीम कोर्ट ने ईवीएम से चुनाव कराने को असंवैधानिक ठहरा दिया था। कोर्ट का मानना था कि चुनाव में पारदर्शिता लोगों का संवैधानिक अधिकार है।

राष्ट्रीय स्तर पर ईवीएम का इस्तेमाल बस 4 देशों में

भारत, भूटान, ब्राजील और वेनेजुएला जैसे देशों में ईवीएम का इस्तेमाल राष्ट्रीय स्तर पर किया जाता है। इसके अलावा, बेल्जियम, एस्टोनिया, यूनाइटेड अरब अमीरात,जॉर्डन, मालदीव, नामीबिया, मिस्र, नेपाल में इसका इस्तेमाल होता है। ब्राजील में 1995 से तो भूटान में 2017 से ईवीएम का इस्तेमाल शुरू हुआ। वहीं, वेनेजुएला में 2004 से यह शुरू हुआ।

इन देशों में कुछ हिस्सों में ईवीएम का प्रयोग

अमेरिका, फ्रांस, अमेरिका, कनाडा, मेक्सिको, पेरू, अर्जेंटीना और जापान जैसे देशों में ईवीएम का सीमित प्रयोग होता है, वह भी महज कुछ हिस्सों में ही। वहीं, रूस, मंगोलिया, बांग्लादेश, इंडोनेशिया और इक्वाडोर जैसे देशों में ईवीएम का इस्तेमाल पायलट प्रोजेक्ट के रूप में किया जाता है। जापान में पहले ईवीएम का इस्तेमाल होता है, मगर 2018 से इस पर बैन लगा दिया गया।

इन देशों में ईवीएम पूरी तरह बैन

जर्मनी, नीदरलैंड और पराग्वे में ईवीएम के इस्तेमाल पर पूर्ण रूप से पाबंदी है। वहीं, कुछ देशों ने पहले पायलट प्रोजेक्ट चलाया और फिर ईवीएम पर पाबंदी लगा दी। ये देश हैं फिलीपींस,ऑस्ट्रेलिया, ग्वाटेमाला, आयरलैंड, इटली, कजाखिस्तान, नॉर्वे और ब्रिटेन। कुछ संदेहों और शिकायतों के बाद इन देशों में इसके इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी गई।

भारत में आपातकाल के बाद 1977 से शुरू हुआ ईवीएम का सफर

1977 में आम चुनाव हुए, जिसमें देश के करीब 29 लोकसभा सीटों पर जबरन बूथ कैप्चरिंग की गई और मतपेटियों को लूट लिया गया। पूरा देश हैरान रह गया। तब चुनाव आयोग ने पहली बार हैदराबाद में इलेक्ट्रॉनिक कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड(ECIL) से वोटिंग मशीन का एक प्रोटोटाइप डेवलप करने को कहा। उस वक्त के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे शकधर ने सरकार से चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक मशीनों के इस्तेमाल पर बात की। 1980 में ECIL ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का पहला प्रोटोटाइप बनाकर चुनाव आयोग को सौंप दिया। उस वक्त इस इलेक्ट्रॉनिक मशीन में 6 बटन लगे थे, जो 6 चिप से जुड़े थे। हरेक बटन एक चुनाव उम्मीदवार से संबंधित था। हालांकि, इस मशीन में प्रत्याशियों के नाम सीमित ही दर्ज हो पाते थे। तब चुनाव आयोग ने भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) से वोटिंग मशीन बनाने को कहा, जिसमें एकसाथ 64 प्रत्याशियों के नाम दर्ज रहते थे। अप्रैल, 1981 में चुनाव आयोग के सामने इस मशीन का प्रदर्शन इतना बेहतरीन रहा कि आयोग ने BEL को ऐसी मशीनों को बनाने की मंजूरी दे दी।

भारत में पहली बार 50 बूथों पर ईवीएम का इस्तेमाल, आज 55 लाख ईवीएम चुनाव मैदान में

केरल की एक विधानसभा सीट थी पेरावायुर, जिसने तब मीडिया का ध्यान अपनी ओर खींचा। यहां मई, 1982 में चुनाव कराए गए। इसके 123 पोलिंग बूथों में से 50 पर परंपरागत बैलेट पेपर की जगह इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) का इस्तेमाल किया गया। यहां मतदान बेहद शांतिपूर्ण और ईवीएम का ट्रायल पूरी तरह सफल रहा। इस ट्रायल के बाद 10 और उपचुनावों में ईवीएम का इस्तेमाल हुआ। इसी के साथ चुनावों में ईवीएम मशीन के सफर की शुरुआत हो गई। चुनाव में पहली बार नगालैंड की नोकसेन विधानसभा सीट पर 4 सितंबर, 2013 को हुए उपचुनाव में वीवीपैट का इस्तेमाल हुआ।

अभी जो ईवीएम मशीन, उसमें अधिकतम 2000 वोट रिकॉर्ड

भारत में जो ईवीएम इस्तेमाल की जा रही है, उसमें एक बार में अधिकतम 2000 वोट रिकॉर्ड किए जा सकते हैं। इलेक्शन कमीशन की टेक्निकल एक्सपर्ट कमेटी और दो सरकारी कंपनियों भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, बेंगलूरू और इलेक्ट्रॉनिक कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, हैदराबाद ने ईवीएम को खास तरह से डिजाइन किया है। ईवीएम की सबसे अच्छी बात यह है कि इसे चलाने के लिए बिजली की जरूरत नहीं है। क्योंकि इसमें पहले से ही बैटरी लगी होती है, जो इसे बैकअप देतीहै। यही वजह है कि इन ईवीएम से वहां भी चुनाव कराए जा सकते हैं, जहां बिजली की व्यवस्था नहीं है।

एकसाथ 384 प्रत्याशियों के लिए कराया जा सकता है मतदान

ईवीएम की 1 बैलेट यूनिट में 16 प्रत्याशियों का प्रावधान होता है। अगर प्रत्याशियों की संख्या 16 से ज्यादा है तो एकसाथ ज्यादा बैलेट यूनिट्स इसमें लगाए जा सकते हैं। पहले 4 बैलेट यूनिट्स जोड़कर अधिकतम 64 प्रत्याशियों को एकसाथ जोड़ा जा सकता था। मगर, अब ऐसी 24 बैलेटिंग यूनिट एकसाथ जोड़ी जा सकती हैं, जिससे नोटा समेत अधिकतम 384 उम्मीदवारों के लिए मतदान करवाया जा सकता है।

करीब 35 हजार रुपए तक की लागत आती है एक ईवीएम मशीन की

वोटिंग मशीन के तीन मुख्य हिस्से होते हैं- कंट्रोल यूनिट (CU), बैलेटिंग यूनिट (BU) और वीवीपैट। सरकार की प्राइस नेगोसिएशन कमेटी ने इन हिस्सों के दाम तय करती है। चुनाव आयोग के मुताबिक, BU की कीमत है 7991 रुपए, CU की कीमत 9,812 रुपए और सबसे महंगा वीवीपैट, जिसका दाम 16,132 रुपए। एक वीवीपैट समेत एक ईवीएम मशीन की कुल लागत करीब 35 हजार रुपए बैठती है। एक ईवीएम कम से कम 15 साल तक चलती है। इससे चुनाव प्रक्रिया के सस्ता होने का भी दावा किया जाता है।

भारत में 2009 में पहली बार उठे थे ईवीएम पर सवाल

भारत में 2009 में पहली बार ईवीएम पर सवाल उठाए गए थे। सुब्रमण्यम स्वामी ने इस पर आपत्ति जताई थी। हालांकि राजनीतिक पार्टियों के ईवीएम बैन करने की मांग पर बाद में उन्होंने इस मुद्दे से किनारा कर लिया। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में जो याचिकाएं लगी थीं, उनमें भी बैलेट पेपर से वोटिंग कराए जाने की बात कही गई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। कोर्ट ने यह कहा कि यह चुनाव सुधार से पीछे लौटने जैसा होगा।

क्या ईवीएम को हैक या उसकी रीप्रोग्रामिंग की जा सकती है

चुनाव आयोग के अनुसार, ईवीएम चिप आधारित मशीन है, जिसे बस एक बार प्रोग्राम किया जा सकता है। उसी प्रोग्राम से तमाम डेटा स्टोर किए जा सकते हैं। इन डेटा की कहीं से किसी तरह की कनेक्टिविटी नहीं है। ऐसे में ईवीएम में किसी तरह की हैकिंग या रीप्रोग्रामिंग मुमकिन ही नहीं है। यह पूरी तरह सुरक्षित है। ईवीएम में वोट सीरियल नंबर से स्टोर होता है। यह पार्टी के आधार पर स्टोर नहीं किया जाता है।

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