Back Pain India में इन दिनों एक गंभीर सेहत समस्या के रूप में उभर रहा है। साल 2020 में पूरी दुनिया में लगभग 62 करोड़ लोग लोअर बैक पेन यानी कमर के निचले हिस्से के दर्द के साथ जी रहे थे। WHO के हिसाब से यह दुनिया में डिसेबिलिटी का सबसे बड़ा सिंगल कारण है, यह हार्ट डिजीज और डायबिटीज से भी बड़ा कारण है। अनुमान है कि 2050 तक यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 84 करोड़ हो जाएगा।
भारत की बात करें तो लॉन्गिट्यूडनल एजिंग स्टडी इन इंडिया (LASI) ने 2017-18 में 45 साल से ऊपर के लगभग 58,000 लोगों से बात की, जिनमें से 31.7% ने कमर दर्द की शिकायत की। महिलाओं में यह आंकड़ा और भी ज्यादा, करीब 36% रहा। भारत की अलग-अलग स्टडीज के मुताबिक जिंदगी में कभी न कभी कमर दर्द झेलने वाले लोगों का आंकड़ा 42% से लेकर 83% तक जाता है।
🔍 यह भी पढ़ें- Yograj Singh Court Setback: Court ने खारिज की अग्रिम जमानत, वेब सीरीज में विवादित टिप्पणी का मामला
सिर्फ कुर्सी पर बैठना अकेला कारण नहीं
चेन्नई में सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल्स पर हुई एक स्टडी में 69% लोगों ने कहा कि पिछले एक साल में उन्हें काम से जुड़ा मसल्स या जॉइंट का दर्द हुआ है, जबकि ये लोग दिन भर एसी ऑफिस में कुर्सी पर बैठते हैं। आम धारणा है कि कुर्सी पर बैठने से डिस्क स्लिप हो जाती है, लेकिन 2015 में अमेरिकन जर्नल ऑफ न्यूरोरेडियोलॉजी में छपी एक बड़ी रिव्यू में 3,110 ऐसे लोगों के स्पाइन स्कैन देखे गए, जिन्हें कोई कमर दर्द नहीं था। हैरान करने वाली बात यह रही कि 20 साल के लोगों में भी लगभग 30% की डिस्क में बल्ज पाया गया, जो 50 साल तक आते-आते 60% और 80 साल में लगभग 84% हो जाता है।
कनाडा के रिसर्चरों ने भी कई स्टडीज का रिव्यू किया और पाया कि ऑफिस में बैठने और कमर दर्द के बीच कोई मजबूत और लगातार संबंध नहीं मिलता।
डिस्क स्लिप नहीं, बल्ज या हर्निएशन होता है असली मामला
समझने वाली बात है कि जिसे हम “डिस्क स्लिप” कहते हैं, वह डिस्क असल में कहीं स्लिप नहीं होती। डिस्क हड्डियों के बीच मजबूती से जुड़ी होती है और अपनी जगह से खिसक कर कहीं भागती नहीं। होता यह है कि बाहर वाली रिंग में कमजोरी या दरार आ जाती है और अंदर की जेली थोड़ी बाहर उभर जाती है, जिसे डॉक्टर बल्ज या हर्निएशन कहते हैं।
WHO के मुताबिक लगभग 90% कमर दर्द के मामले नॉन-स्पेसिफिक होते हैं, यानी डॉक्टर को कोई खास स्ट्रक्चरल कारण नहीं मिलता। बहुत कम मामलों में ही सीरियस वजह जैसे फ्रैक्चर, इनफेक्शन या कैंसर होती है।
1995 की हेलसिंकी ट्रायल ने बदल दी सोच
फरवरी 1995 में न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में एक ट्रायल छपा, जिसमें फिनलैंड के हेलसिंकी शहर के 186 सरकारी कर्मचारियों को तीन ग्रुप में बांटा गया। पहले ग्रुप को 2 दिन बिस्तर पर आराम करने को कहा गया, दूसरे को खास बैक पेन एक्सरसाइज करने को कहा गया और तीसरे को सामान्य दिनचर्या जारी रखने को कहा गया।
| ग्रुप | छुट्टी के औसत दिन |
|---|---|
| नॉर्मल रूटीन ग्रुप | 4.7 दिन |
| एक्सरसाइज ग्रुप | 7.2 दिन |
| बेड रेस्ट ग्रुप | 9.2 दिन |
नतीजा हैरान करने वाला था: सामान्य दिनचर्या जारी रखने वाला ग्रुप सबसे जल्दी ठीक हुआ। यही इस पूरी रिसर्च का सबसे बड़ा निष्कर्ष है कि बेड रेस्ट सबसे धीमी रिकवरी वाली सलाह है।
चार असली वजहें जो डाटा में साबित हुईं
लैंसेट की 2023 वाली ग्लोबल एनालिसिस के मुताबिक कमर दर्द के कुल बोझ का कम से कम एक तिहाई हिस्सा तीन चीजों से जुड़ा था: काम की जगह के फैक्टर्स, स्मोकिंग और ज्यादा वजन उठाना। इसके अलावा शारीरिक गतिविधि की कमी भी बड़ी वजह है। 2024 में लैंसेट ग्लोबल हेल्थ में छपी स्टडी के मुताबिक 2022 में भारत के लगभग 50% एडल्ट्स जरूरी शारीरिक गतिविधि नहीं कर पा रहे थे, महिलाओं में यह आंकड़ा 57% तक था, जबकि साल 2000 में यह सिर्फ 22% था।
NFHS-5 के मुताबिक भारत में लगभग 24% महिलाएं और 23% पुरुष ओवरवेट या ओबीज हैं, शहरों में यह आंकड़ा 30% के आसपास पहुंच जाता है, और बढ़ता पेट सीधा कमर के निचले हिस्से पर दबाव डालता है। स्मोकिंग को भी ग्लोबल रिसर्च में बार-बार कमर दर्द के रिस्क फैक्टर में गिना गया है, और खराब नींद व स्ट्रेस भी इससे जुड़े पाए गए।
दर्द का डर ही बना देता है समस्या को लंबा
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि जब किसी को पहली बार कमर दर्द होता है और रिपोर्ट में डिस्क बल्ज लिखा आता है, तो उस इंसान का जीवन जीने का तरीका ही बदल जाता है। वह झुकना, वजन उठाना और चलना बंद कर देता है, जिससे मसल्स कमजोर होती जाती हैं और दर्द और बढ़ता जाता है। रिसर्च में बार-बार दिखा है कि जो लोग दर्द के डर से हिलना-डुलना बंद कर देते हैं, उनका दर्द लंबे समय तक टिकने के चांस ज्यादा होते हैं।
आम मिथ जो डाटा से मेल नहीं खाते
कई घरों में प्रचलित मिथकों की भी पोल खुलती है। 2020 में ब्रिटिश जर्नल ऑफ स्पोर्ट्स मेडिसिन के मुताबिक कोई एक परफेक्ट पोश्चर नहीं होता, एक ही पोजीशन में घंटों जमे रहना असल में खराब है। यूके की हेल्थ गाइडलाइन बॉडी NICE कहती है कि आम कमर दर्द में रूटीन इमेजिंग नहीं करानी चाहिए। बैक बेल्ट या कॉरसेट से भी कोई फायदा साबित नहीं हुआ, 2016 में जामा इंटरनल मेडिसिन की रिव्यू में 31,000 से ज्यादा लोगों पर यह साबित हुआ। वहीं डिस्क हर्निएशन के ज्यादातर मामलों में ऑपरेशन जरूरी नहीं होता, 2015 की स्टडी के मुताबिक सबसे बड़ी हर्निएशन भी लगभग 96% मामलों में अपने आप सिकुड़ जाती है।
जानें पूरा मामला
इस पूरे शोध से यह स्पष्ट होता है कि कमर दर्द से निपटने का सबसे असरदार तरीका गतिशील बने रहना है, न कि आराम करना। एक्सरसाइज और सही जानकारी मिलाने से अगले एक साल में कमर दर्द का एपिसोड होने का खतरा लगभग 45% तक कम हो जाता है। हालांकि अगर पेशाब-पॉटी पर कंट्रोल जाना, पैरों में कमजोरी बढ़ना, बुखार के साथ दर्द, बिना वजह वजन घटना या एक्सीडेंट के बाद दर्द शुरू होना जैसे लक्षण दिखें, तो यह रेड फ्लैग हैं और तुरंत डॉक्टर से मिलना जरूरी है।
विशेषज्ञ विश्लेषण
देखा जाए तो भारत में बढ़ता कमर दर्द सिर्फ एक शारीरिक समस्या नहीं, बल्कि बदलती जीवनशैली का आईना है। शारीरिक गतिविधि में भारी गिरावट, बढ़ता मोटापा और स्क्रीन पर बिताया जाने वाला समय, ये सभी मिलकर इस समस्या को बढ़ा रहे हैं। इससे साफ होता है कि इलाज से ज्यादा जरूरी रोकथाम है, और इसके लिए महंगे इलाज या बेल्ट की नहीं, बल्कि नियमित शारीरिक गतिविधि की जरूरत है, जो हर किसी के पास पहले से मौजूद है।
मुख्य बातें (Key Points)
- भारत में 45 साल से ऊपर के लगभग 31.7% लोगों को कमर दर्द की शिकायत है।
- डिस्क बल्ज बिना दर्द वाले लोगों में भी आम पाया गया, इसलिए हर रिपोर्ट से घबराने की जरूरत नहीं।
- हेलसिंकी ट्रायल में सामान्य दिनचर्या जारी रखने वाले लोग सबसे जल्दी ठीक हुए, बेड रेस्ट वाले सबसे धीमे।
- काम की जगह के फैक्टर, स्मोकिंग, मोटापा और शारीरिक गतिविधि की कमी कमर दर्द की मुख्य वजहें हैं।











