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The News Air - Breaking News - 3.5 करोड़ साल पुराना राज: Ganga Dolphin Moon Behavior का नया खुलासा

3.5 करोड़ साल पुराना राज: Ganga Dolphin Moon Behavior का नया खुलासा

भारतीय वन्य जीव अनुसंधान संस्थान ने खोजा कि पूरी तरह अंधी गंगा डॉल्फिन पूर्णिमा और अमावस्या के अनुसार अपना व्यवहार बदल लेती है।

The News Air Team by The News Air Team
शनिवार, 17 अक्टूबर 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, धर्म
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Ganga Dolphin Moon Behavi
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Ganga Dolphin Moon Behavior को लेकर हुई यह खोज विज्ञान जगत में हलचल मचा रही है। फिल्मों में अक्सर दिखाया जाता है कि चांद और पूर्णिमा के आने पर कुछ जीव अपना बर्ताव बदल लेते हैं, जिसे अक्सर पैरानॉर्मल एक्टिविटी से जोड़ा जाता है। पर दिलचस्प बात यह है कि वैज्ञानिकों, खासकर भूगोलविदों ने अब यह साबित कर दिया है कि गंगा नदी में पाई जाने वाली डॉल्फिन का व्यवहार वाकई चांद की गति से सीधा प्रभावित होता है।

हैरान करने वाली बात यह है कि गंगा डॉल्फिन पूरी तरह अंधी होती है, फिर भी पूर्णिमा और अमावस्या के समय उसका व्यवहार पूरी तरह बदल जाता है।

🔍 यह भी पढ़ें- MV Ganga Vilas: दुनिया के सबसे लंबे River Cruise की पूरी कहानी, टिकट प्राइस से रूट तक

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जमीन पर रहने वाला शिकारी कैसे बना जल-जीव

समझने वाली बात है कि डॉल्फिन या ब्लू व्हेल जैसे समुद्री स्तनधारी जीव शुरुआत में जमीन पर रहने वाले चार पैरों वाले जीव थे, जिनका आकार आज के कुत्ते या भेड़िए जैसा था। डॉल्फिन के पूर्वज भारतीय उपमहाद्वीप में, आज के पाकिस्तान और हिमालयी क्षेत्र के नीचे, जमीन पर रहने वाले शिकारी थे। भोजन की तलाश में धीरे-धीरे ये जीव पानी की ओर बढ़े और लाखों साल के उद्विकास यानी इवोल्यूशन के बाद पूरी तरह जलीय जीव बन गए। यह प्रक्रिया आज से करीब 3.5 करोड़ साल पहले पूरी हुई थी।

खारे पानी से मीठे पानी तक का सफर

अब सवाल उठता है कि जो जीव खारे सागर में रहने के लिए विकसित हुआ, वह मीठे पानी की नदियों में कैसे पहुंचा। इसका जवाब प्लेट टेक्टोनिक थ्योरी में छिपा है। भारत कभी अफ्रीका और गोंडवाना लैंड का हिस्सा था। अलग होकर यह यूरेशियन प्लेट से टकराया, जिससे हिमालय का निर्माण हुआ। इस टकराव से पहले वहां टेथिस भूसन्नति नाम का एक उथला सागर मौजूद था, जहां डॉल्फिन के पूर्वजों ने सबसे पहले प्रवेश किया। समय के साथ यह सागर सूखता गया और उसकी जगह बड़ी नदियों ने ले ली। इसी सूखते सागर में फंसे जीव नदियों में जीवित रह गए, और इन्हीं से आज की गंगा डॉल्फिन का विकास हुआ।

पूरी तरह अंधी क्यों होती है गंगा डॉल्फिन

सागर में रहने वाली सामान्य डॉल्फिन की आंखों में अच्छा विजन होता है, लेकिन गंगा डॉल्फिन की आंखों में लेंस तक नहीं होता। इसका मुख्य कारण है कि हिमालयी क्षेत्र से आने वाला पानी तेज बहाव के साथ भारी मात्रा में अवसाद (सेडिमेंट) लेकर आता है, जिससे पानी बेहद मटमैला हो जाता है। ऐसे पानी में आंखों की कोई जरूरत ही नहीं रह जाती। यही वजह है कि गंगा डॉल्फिन करवट लेकर तिरछी तैरती है और दिशा जानने के लिए सबसे एडवांस सोनार नेविगेशन सिस्टम का इस्तेमाल करती है।

पूर्णिमा-अमावस्या पर कैसे बदलता है व्यवहार

यह अध्ययन वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने पश्चिम बंगाल की रूपनारायण नदी में किया, जो गंगा की एक सहायक नदी है। यहां एक विशेष डिवाइस पानी में डाली गई, जिसका काम था गंगा डॉल्फिन द्वारा निकाली जाने वाली सोनार तरंगों का अध्ययन करना।

चंद्र चरणडॉल्फिन व्यवहार
शुक्ल पक्ष (अमावस्या से पूर्णिमा)गतिविधि धीरे-धीरे बढ़ती है
पूर्णिमासबसे ज्यादा सक्रिय और सतह पर दिखाई देती है
कृष्ण पक्ष (पूर्णिमा से अमावस्या)गतिविधि घटने लगती है
अमावस्यालगभग गायब, गहराई में छिप जाती है
रोशनी और भोजन का सीधा कनेक्शन

इसका मुख्य कारण चांद की रोशनी और नदी के सूक्ष्म जीवों के बीच का रिश्ता है। जब चांदनी तेज होती है, तो पानी में मौजूद फाइटोप्लैंकटन और जूप्लैंकटन सतह की ओर आने लगते हैं। इन्हें खाने के लिए छोटी मछलियां सतह पर आती हैं, और इन मछलियों का शिकार करने के लिए गंगा डॉल्फिन भी सतह की ओर आ जाती है। इससे साफ होता है कि अमावस्या के अंधेरे में जब रोशनी गायब होती है, तो ये सूक्ष्म जीव बिखरे और नीचे रहते हैं, मछलियां एक जगह इकट्ठा नहीं होतीं और डॉल्फिन की गतिविधि अपने आप धीमी पड़ जाती है।

ज्वार-भाटा भी निभाता है बड़ी भूमिका

जहां नदी समुद्र से मिलती है, वहां गंगा डॉल्फिन का व्यवहार भोजन से नहीं, बल्कि तरंगों से तय होता है। पूर्णिमा और अमावस्या के समय आने वाले हाई टाइड यानी स्प्रिंग टाइड में पानी में ज्यादा उछाल आता है, जो नदी में भी असर डालता है। करीब 4 मीटर तक के जलस्तर अंतर के कारण इस दौरान गंगा डॉल्फिन ज्यादा गहराई में चली जाती है और अपनी गतिविधियां रोक लेती है, ताकि वह सुरक्षित क्षेत्र में बनी रहे।

दिन-रात के चक्र का भी असर

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि गंगा डॉल्फिन का व्यवहार सिर्फ चांद से नहीं, बल्कि दिन-रात के चक्र से भी बदलता है। सुबह 4 से 6 बजे के बीच यह सबसे ज्यादा सक्रिय होकर शिकार पर निकलती है, क्योंकि इसी समय सूक्ष्म जीव भी सक्रिय रहते हैं। दोपहर के समय तापमान बढ़ने पर इसकी गतिविधि फिर धीमी हो जाती है, लेकिन शाम 6 से 8 बजे के बीच यह दोबारा सक्रिय हो उठती है।

मुख्य बातें (Key Points)
  • गंगा डॉल्फिन पूरी तरह अंधी होती है, उसकी आंखों में लेंस नहीं होता।
  • यह 3.5 करोड़ साल पहले जमीनी जीव से जलीय जीव में विकसित हुई।
  • वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने रूपनारायण नदी में इसका अध्ययन किया।
  • पूर्णिमा पर सक्रिय और अमावस्या पर लगभग गायब हो जाती है गंगा डॉल्फिन।
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