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The News Air - Breaking News - Graduate Unemployment Crisis: नीति आयोग की चौंकाने वाली रिपोर्ट, डिग्री होते भी नहीं मिल रही नौकरी

Graduate Unemployment Crisis: नीति आयोग की चौंकाने वाली रिपोर्ट, डिग्री होते भी नहीं मिल रही नौकरी

नीति आयोग की नई रिपोर्ट में खुलासा: ग्रेजुएट बेरोजगारी राष्ट्रीय दर से चार गुना अधिक, महिला ग्रेजुएट्स में 20% से ज्यादा बेरोजगारी, केवल 8.25% को मिल रही है अपनी योग्यता अनुसार नौकरी

Ajay Kumar by Ajay Kumar
सोमवार, 31 अगस्त 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, राष्ट्रीय
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Graduate Unemployment Crisis
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Graduate Unemployment Crisis India: भारत की शिक्षा व्यवस्था पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा हो गया है। नीति आयोग ने अपनी नई रिपोर्ट “रीइमेजिनिंग स्किलिंग फॉर विकसित भारत 2047” में ऐसे चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए हैं जो देश के युवाओं के भविष्य पर गंभीर सवाल उठाते हैं। देश में ग्रेजुएट बेरोजगारी की दर राष्ट्रीय बेरोजगारी दर से चार गुना अधिक है और सबसे चिंताजनक बात यह है कि केवल 8.25% ग्रेजुएट्स को ही अपनी योग्यता के अनुसार नौकरी मिल पा रही है।

देखा जाए तो यह आंकड़े सिर्फ संख्याएं नहीं हैं—ये लाखों युवाओं के टूटे हुए सपनों की कहानी है। यह उन परिवारों की कहानी है जिन्होंने अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए अपनी जमीन बेची, कर्ज लिया, और सपने देखे कि डिग्री मिलते ही बेटा या बेटी की जिंदगी संवर जाएगी। लेकिन हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।

🔍 यह भी पढ़ें- India Unemployment Crisis: 1.1 करोड़ Graduates बेरोजगार, बड़ा खुलासा

13% ग्रेजुएट बेरोजगार, राष्ट्रीय दर से चार गुना अधिक

नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कुल बेरोजगारी दर 3.2% है। लेकिन अगर गौर करें तो ग्रेजुएट्स में यह दर 13% तक पहुंच जाती है। मतलब साफ है—जितनी ज्यादा पढ़ाई, उतनी ज्यादा बेरोजगारी। यह विरोधाभास समझने वाली बात है।

दिलचस्प बात यह है कि जिन लोगों ने औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की है, वे कृषि मजदूर, निर्माण कार्य, घरेलू काम या अनौपचारिक क्षेत्र में कहीं न कहीं काम कर लेते हैं। लेकिन ग्रेजुएट युवा एक निश्चित स्तर की नौकरी की उम्मीद रखते हैं—एयर कंडीशन ऑफिस, सम्मानजनक पद, अच्छी सैलरी। जब ये अपेक्षाएं पूरी नहीं होतीं, तो बेरोजगारी का आंकड़ा बढ़ता जाता है।

🔍 यह भी पढ़ें- Gen-Z Protest: आधी रात PM Modi को Reel बनानी पड़ी, Paper Leak पर सख्त कानून का ऐलान

महिला ग्रेजुएट्स के लिए स्थिति और भी गंभीर
श्रेणीबेरोजगारी दर
राष्ट्रीय औसत3.2%
ग्रेजुएट (कुल)13%
महिला ग्रेजुएट20%+
प्राइमरी स्तर शिक्षितलगभग 2.9%

महिला ग्रेजुएट्स में बेरोजगारी 20% से भी ज्यादा है। यहां ध्यान देने वाली बात है कि महिलाओं को अतिरिक्त बाधाओं का सामना करना पड़ता है—सुरक्षा चिंताएं, सामाजिक मानदंड, गतिशीलता की कमी, अवैतनिक देखभाल कार्य, और बाल देखभाल सुविधाओं की कमी।

समझने वाली बात यह है कि शिक्षित महिलाओं का बेरोजगार रहना न केवल व्यक्तिगत नुकसान है, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी बड़ा झटका है।

सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा: केवल 8.25% को योग्यता अनुसार नौकरी

नीति आयोग का सबसे बड़ा खुलासा यह है कि केवल 8.25% ग्रेजुएट्स को ही उनकी योग्यता के अनुसार नौकरी मिल पाती है। मतलब 100 में से सिर्फ 8 लोगों को ही वह काम मिलता है जिसके लिए उन्होंने पढ़ाई की है।

आप देख सकते हो—किसी ने BA Economics किया, लेकिन सेल्स एग्जीक्यूटिव की नौकरी कर रहा है। किसी ने B.Com किया, लेकिन कस्टमर सपोर्ट में काम कर रहा है। किसी ने B.Sc किया, लेकिन एडमिनिस्ट्रेटिव वर्क में लगा है। किसी ने Engineering की, लेकिन नॉन-टेक्निकल रोल में काम कर रहा है।

जेनेरिक डिग्रियों की समस्या

नीति आयोग ने स्पष्ट किया है कि BA, B.Sc, B.Com जैसी जेनेरिक डिग्रियों का जॉब लिंकेज बहुत कमजोर है। ये डिग्रियां एक फाउंडेशन तो देती हैं, लेकिन सीधा रोजगार नहीं।

अगर गौर करें तो MBBS करने वाला डॉक्टर बनता है। B.Ed करने वाला शिक्षक बनता है। B.Tech करने वाला इंजीनियर बनता है। लेकिन BA करने वाला क्या बनेगा? यह सवाल महत्वपूर्ण है।

दिलचस्प बात यह है कि भारत में लोग जेनेरिक डिग्री इसलिए लेते हैं क्योंकि उनका अंतिम लक्ष्य सरकारी नौकरी है। UPSC, SSC, Railway जैसे competitive exams के लिए किसी भी stream की graduation चाहिए होती है। तो लोग सोचते हैं—कोई भी डिग्री ले लो, अंत में सरकारी नौकरी की तैयारी करनी है।

सरकारी नौकरी का सपना और कड़वी सच्चाई

2024 नवंबर से जुलाई 2025 के बीच केवल 55,000 सरकारी पदों के लिए 1.86 करोड़ आवेदन आए थे। यह आंकड़ा खुद ब्खुद बता देता है कि कितना कठिन है सरकारी नौकरी पाना।

सरकारी नौकरी इतनी आकर्षक क्यों है? जॉब सिक्योरिटी, पेंशन, अनुमानित सैलरी, काम का दबाव कम, सामाजिक प्रतिष्ठा, और आर्थिक संकट में भी नौकरी पक्की। लेकिन जब लाखों लोग इसके पीछे भागते हैं, तो अवसर की लागत (opportunity cost) भी बहुत बड़ी होती है।

कल्पना करिए—3 साल ग्रेजुएशन, फिर 2-4 साल competitive exams की तैयारी। कुल मिलाकर 7-8 साल, कई मामलों में 10 साल तक। यह वह समय है जब युवा सबसे ज्यादा ऊर्जावान और उत्पादक होते हैं। यह समय अगर skill development और practical experience में लगे तो देश की GDP में योगदान होगा।

8.7 करोड़ युवा NEET श्रेणी में
विवरणसंख्या
NEET युवा (15-29 वर्ष)8.7 करोड़
अंडर ग्रेजुएट स्टूडेंट्स3.4 करोड़
BA, B.Sc, B.Com एनरोलमेंट2 करोड़+

NEET का मतलब यहां परीक्षा नहीं है—NEET यानी Not in Education, Employment or Training। यानी वे युवा जो न तो पढ़ाई कर रहे हैं, न नौकरी में हैं, न किसी ट्रेनिंग में हैं। यह डेमोग्राफिक डिविडेंड को डेमोग्राफिक बर्डन में बदल सकता है।

स्किल गैप: शिक्षा और उद्योग के बीच की खाई

नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय ग्रेजुएट्स में तीन मुख्य कमियां हैं:

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1. Communication Skills की कमी: ग्रेजुएट होने के बाद भी युवा अपने विचारों को प्रभावी तरीके से संप्रेषित नहीं कर पाते। व्यावसायिक रूप से लिखना, इंटरव्यू में भाग लेना, रिपोर्ट तैयार करना—इन सब में कमजोरी।

2. Applied Problem Solving: थ्योरी में Accounting पता है, लेकिन वास्तविक व्यवसाय के लिए accounts maintain नहीं कर सकते। यह व्यावहारिक अनुभव की कमी है।

3. Practical Experience की कमी: 80% उच्च शिक्षा छात्रों को practical experience नहीं मिलता। 47% formal workers को नौकरी चाहिए तो experience मांगा जाता है, लेकिन experience आएगा कहां से अगर पहली नौकरी ही नहीं मिली?

यह एक दुष्चक्र है—नौकरी के लिए अनुभव चाहिए, अनुभव के लिए नौकरी चाहिए।

सैलरी में भी बड़ा अंतर
श्रेणीऔसत सैलरी
जेनेरिक ग्रेजुएट₹22,000/माह
स्किल्ड ग्रेजुएट₹30,000+/माह

यह साफ है कि सिर्फ डिग्री से काम नहीं चलेगा। स्किल डेवलपमेंट बेहद जरूरी है।

नीति आयोग के सुझाव और समाधान

नीति आयोग ने कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं:

1. Employability Education जल्दी शुरू करें: Class 9 से ही communication, functional English, digital basics, financial literacy सिखाई जाए।

2. Vocational Education को बढ़ावा: हर जिले में block level पर vocational schools खोले जाएं जो industry demand के अनुसार training दें।

3. Strong Industry Participation: सरकारी स्कूलों से काम नहीं चलेगा। Public-Private Partnership चाहिए। Industry बताएगी कि क्या skill चाहिए और उसी के अनुसार apprenticeship, internship, equipment, trainers की व्यवस्था होगी।

4. Apprenticeship को अनिवार्य बनाएं: ग्रेजुएशन के दौरान ही practical experience मिलना चाहिए।

5. Outcome-Linked Financing: Input पर नहीं, बल्कि output पर फोकस हो। कितने students ने course complete किया, कितनों को job मिली, salary कितनी मिली, retention कैसा रहा—इन पर ध्यान दें।

6. Digital Skill Passport: हर student का digital record हो कि उसने कौन-कौन से skills सीखे हैं, किसमें training ली है।

डेमोग्राफिक डिविडेंड या डेमोग्राफिक बर्डन?

भारत की युवा आबादी तभी फायदेमंद होगी जब यह chain complete हो: Population → Education → Skill → Employment → Productivity → Income → Investment → Growth → GDP increase।

अगर Education और Skill वाली कड़ी टूट गई, तो Employment नहीं होगा, Productivity नहीं बढ़ेगी, Income नहीं बढ़ेगा और GDP growth रुक जाएगी। तब Demographic Dividend, Demographic Burden बन जाएगा।

यहां सवाल उठता है कि क्या हमारी education system वाकई job-ready graduates तैयार कर रही है? क्या सिर्फ degree बांटना काफी है? नीति आयोग की रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि नहीं, बिल्कुल नहीं।

करिकुलम में बदलाव की जरूरत

हमारी शिक्षा व्यवस्था:

  • Theoretical है
  • Classroom-based है
  • Outdated है
  • Workplace से disconnected है

जबकि आज की दुनिया में AI, Automation, Cloud Computing, EV, Green Technology तेजी से बदल रही है। एक बच्चा 10-12 साल पढ़ाई करता है, जब बाहर निकलता है तो दुनिया ही अलग होती है।

मुख्य बातें (Key Points)
  • भारत में ग्रेजुएट बेरोजगारी दर 13%, राष्ट्रीय दर (3.2%) से चार गुना अधिक
  • महिला ग्रेजुएट्स में 20% से अधिक बेरोजगारी
  • केवल 8.25% ग्रेजुएट्स को योग्यता अनुसार नौकरी मिलती है
  • 8.7 करोड़ युवा NEET श्रेणी में (Not in Education, Employment, Training)
  • नीति आयोग ने skill development, vocational education, industry partnership पर जोर दिया
  • Demographic Dividend को Demographic Burden बनने से रोकना जरूरी

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: ग्रेजुएट बेरोजगारी राष्ट्रीय बेरोजगारी से ज्यादा क्यों है?

उत्तर: शिक्षित युवाओं की अपेक्षाएं अधिक होती हैं। वे सम्मानजनक, अच्छी सैलरी वाली नौकरी चाहते हैं, जबकि अशिक्षित या कम शिक्षित लोग किसी भी प्रकार का काम कर लेते हैं। साथ ही, education system job-ready skills नहीं सिखाता।

प्रश्न 2: BA, B.Sc, B.Com जैसी डिग्रियां बेकार हैं क्या?

उत्तर: नहीं, ये डिग्रियां बेकार नहीं हैं। ये एक अच्छा foundation देती हैं, लेकिन सीधा employment link नहीं होता। इसलिए इनके साथ skill development और practical experience जरूरी है।

प्रश्न 3: युवा बेरोजगारी का समाधान क्या है?

उत्तर: Early employability education, vocational training, industry-academia partnership, apprenticeship programs, outcome-based learning, और digital skill passport जैसे कदम उठाने होंगे। साथ ही, entrepreneurship को बढ़ावा देना भी जरूरी है।

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पत्रकारिता में एक दशक से अधिक का ठोस अनुभव रखने वाले अजय कुमार 'शोर से ज़्यादा सार' की पत्रकारिता पर दृढ़ विश्वास करते हैं। वर्तमान में वे The News Air में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं, जहां वे समाचारों की रणनीति, लेखन, तथ्य-सत्यापन (Fact-Checking) और सटीक प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं।पत्रकारिता का सफर और अनुभव - अजय कुमार का करियर ग्राउंड ज़ीरो की रिपोर्टिंग से लेकर न्यूज़ डेस्क के कुशल प्रबंधन तक विस्तृत है। The News Air में पिछले 3 वर्षों से नेतृत्व करने से पहले, उन्होंने 'दैनिक जागरण' और 'सिटी न्यूज़' जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। पत्रकारिता में उनकी मजबूत शैक्षणिक पृष्ठभूमि ने उनके काम करने के तरीके को बेहद व्यावहारिक और तथ्य-आधारित बनाया है।विशेषज्ञता और कार्यक्षेत्र (Expertise & Beats) - वे जटिल राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को सरल भाषा, स्पष्ट तथ्यों और निष्पक्ष तरीके से पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं। उनकी पत्रकारिता की मुख्य विशेषज्ञता इन क्षेत्रों में है:राजनीतिक कवरेज: लोकसभा चुनावों और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की ग्राउंड और डेस्क रिपोर्टिंग।कानूनी और संसदीय खबरें: संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों की नियमित और रियल-टाइम कवरेज।खोजी पत्रकारिता: ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ रिपोर्टिंग के जरिए अंदरूनी खबरों की पड़ताल।विश्वसनीयता और डिजिटल योगदान (Trust & Authority) - सटीक और प्रामाणिक ख़बरों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें पाठकों के बीच एक विश्वसनीय पत्रकार बनाती है। डिजिटल न्यूज़ इकोसिस्टम को बेहतर बनाने और फेक न्यूज़ से लड़ने की दिशा में, अजय कुमार गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

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