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The News Air - Breaking News - Sickle Cell & Thalassemia Crisis: भारत में हर साल 90,000 बच्चे जन्मजात रक्त रोग के साथ पैदा होते हैं, क्यों?

Sickle Cell & Thalassemia Crisis: भारत में हर साल 90,000 बच्चे जन्मजात रक्त रोग के साथ पैदा होते हैं, क्यों?

हर घंटे एक बच्चा थैलेसीमिया के साथ जन्म लेता है, 82,500 बच्चे सिकल सेल एनीमिया के साथ, लेकिन एक सिंपल ब्लड टेस्ट से इसे रोका जा सकता है—फिर भी क्यों नहीं रोक पा रहे?

Ajay Kumar by Ajay Kumar
गुरूवार, 13 अगस्त 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, हेल्थ
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Sickle Cell & Thalassemia Crisis
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Sickle Cell Disease & Thalassemia in India: भारत में हर साल लगभग 8,000 से 10,000 बच्चे थैलेसीमिया मेजर के साथ पैदा होते हैं। इसका मतलब है कि हर घंटे एक बच्चा ऐसी बीमारी के साथ जन्म लेता है जिसमें उसे जीवनभर हर 15-20 दिन में ब्लड ट्रांसफ्यूजन कराना पड़ेगा। इसके साथ ही उन्हें ऐसी दवाई दी जाती है जो ब्लड ट्रांसफ्यूजन से शरीर में जमा होने वाले आयरन को साफ करती है, क्योंकि यह आयरन धीरे-धीरे हृदय, लिवर और अन्य अंगों को क्षतिग्रस्त करता है।

अगर गौर करें, तो भारत में थैलेसीमिया के मरीजों की संख्या लगभग 2 लाख है। एक और गंभीर बीमारी है सिकल सेल एनीमिया। ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज के अनुमान के अनुसार, भारत में हर साल करीब 82,500 बच्चे सिकल सेल रोग के साथ पैदा होते हैं। देश में ऐसे मरीजों की कुल संख्या करीब 12 लाख बताई जाती है।

दिलचस्प बात यह है कि भारत की लगभग 3-4% आबादी थैलेसीमिया की कैरियर है। यानी 4 से 5 करोड़ लोगों को यह पता ही नहीं है कि वे इस जीन को लेकर घूम रहे हैं। वे बीमार नहीं हैं, सिर्फ कैरियर हैं।

समझने वाली बात यह है कि ये दोनों बीमारियां जेनेटिक हैं। ये मां-बाप से बच्चे में जाती हैं। इनका कोई वायरस नहीं है, कोई इंफेक्शन नहीं है। और सबसे बड़ी बात—इन्हें एक सिंपल ब्लड टेस्ट से बच्चे के पैदा होने से बहुत पहले रोका जा सकता है। तो फिर हम रोक क्यों नहीं पा रहे हैं?

🔍 यह भी पढ़ें- भारत में Genetic Testing ने बदली शादी की परंपरा, कुंडली की जगह अब DNA

शादी से पहले कुंडली मिलाते हैं, खून क्यों नहीं?

यहां एक कड़वी सच्चाई है। हमारे देश में शादी से पहले कुंडली मिलाई जाती है। बहुत ध्यान से सुनिए—गुण मिलाए जाते हैं, नाड़ी दोष देखा जाता है, मंगल देखा जाता है। कई बार दो परिवार महीनों लगा देते हैं पंडित जी से बार-बार पूछने में। अगर कुंडली नहीं मिली, तो रिश्ते टूटने तक की बात आ जाती है।

लेकिन उसी शादी में दो लोगों का ब्लड टेस्ट कभी भी मैच नहीं किया जाता। एक ऐसा टेस्ट जो एक घंटे में हो सकता है, जो बहुत सस्ता भी है, और जो बता सकता है कि उस जोड़े के बच्चे को जानलेवा बीमारी मिलेगी या नहीं—वो टेस्ट लगभग कभी नहीं कराया जाता।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि मैं किसी परंपरा का मजाक नहीं उड़ा रहा हूं। कुंडली बनाना लोगों की आस्था का हिस्सा है। लेकिन जो ध्यान हम कुंडली पर देते हैं, उसका एक छोटा सा हिस्सा अगर हम ब्लड टेस्ट पर भी दे दें, तो हर साल हजारों बच्चे बचाए जा सकते हैं।

कैसे होती हैं ये बीमारियां?

आपके खून में लाल रक्त कोशिकाएं (RBC) होती हैं। उनके अंदर एक प्रोटीन होता है जिसे हीमोग्लोबिन कहते हैं। इसका एक ही काम है: ऑक्सीजन को फेफड़ों से उठाकर पूरे शरीर में विभिन्न अंगों तक पहुंचाना। हीमोग्लोबिन बनने का कोड जीन में लिखा होता है।

💡 यह भी पढ़ें- Gold Silver Rate Today: सोने में ₹439 की उछाल, चांदी ₹1989 धड़ाम

हर इंसान को हर जीन की दो कॉपियां मिलती हैं:

  • एक कॉपी मां से
  • एक कॉपी पिता से

अब तीन स्थितियां बनती हैं:

1. दोनों कॉपियां सही हों:
तो व्यक्ति पूरी तरह स्वस्थ पैदा होगा। कोई दिक्कत नहीं।

2. एक कॉपी में खराबी, दूसरी सही:
ऐसे व्यक्ति को कैरियर कहते हैं। यह सबसे महत्वपूर्ण केस है। कैरियर होने का मतलब बीमार होना नहीं है। एक कैरियर बिल्कुल नॉर्मल जिंदगी जीता है। वह बीमार नहीं पड़ता, उसे दवाई की जरूरत नहीं होती। ज्यादातर लोगों को तो मृत्यु तक पता नहीं चलता कि वे कैरियर थे।

3. दोनों कॉपियों में खराबी:
तभी ये बीमारियां होती हैं—थैलेसीमिया या सिकल सेल एनीमिया।

जेनेटिक्स का गणित समझिए

अब पूरी कहानी समझिए:

अगर एक कैरियर की शादी एक सामान्य व्यक्ति से हो:
तो उनके बच्चे को बीमारी बिल्कुल नहीं होगी। बच्चा या तो पूरी तरह नॉर्मल होगा या कैरियर।

लेकिन अगर दो कैरियरों की आपस में शादी हो जाए:
तब हर गर्भावस्था में:

  • 25% संभावना: बच्चा पूरी तरह सामान्य होगा
  • 50% संभावना: बच्चा कैरियर होगा (स्वस्थ)
  • 25% संभावना: बच्चा बीमारी के साथ पैदा होगा

इसका मतलब साफ है: हर चार में से एक बच्चे के इस बीमारी के साथ पैदा होने का खतरा अगर दो कैरियरों की शादी हो।

यह बीमारी तब तक नहीं आती जब तक कि दो कैरियर एक-दूसरे से न मिलें। और उन्हें पता ही नहीं होता कि वे कैरियर हैं। दो बिल्कुल स्वस्थ लोग, दोनों की कोई शिकायत नहीं, दोनों की रिपोर्ट कभी खराब नहीं आई—और उनकी शादी से एक ऐसा बच्चा पैदा हो जाता है जिसे हर 20 दिन में खून चढ़ाना पड़ेगा।

चिंता का विषय यह है कि इसमें न तो मां की गलती है, न ही पिता की। उन्हें किसी ने बताया ही नहीं था।

ये बीमारियां कुछ इलाकों में ज्यादा क्यों?

इसके पीछे एक दिलचस्प वैज्ञानिक कारण है। जिन इलाकों में कई सदियों से मलेरिया बहुत ज्यादा रहा है, वहां एक विशेष बात हुई:

जो लोग कैरियर थे (यानी जिनके पास एक बदला हुआ जीन था), उनकी लाल रक्त कोशिकाएं मलेरिया के परजीवी के लिए थोड़ी मुश्किल हो जाती हैं। यानी कैरियरों को मलेरिया से मरने का खतरा थोड़ा कम था।

इसलिए, पीढ़ी दर पीढ़ी उन इलाकों में कैरियर ज्यादा बचते गए और उनके जीन धीरे-धीरे बढ़ते गए। यानी वह जीन वहां इसलिए फैला क्योंकि वह लोगों की जान बचा रहा था।

आज जब मलेरिया काफी कम हो गया है, तो उसी जीन की एक दूसरी समस्या बन गई है।

इसलिए सिकल सेल भारत के उन क्षेत्रों में ज्यादा मिलता है जो कभी मलेरिया वाले जंगल और पहाड़ी इलाके थे:

  • ओडिशा
  • छत्तीसगढ़
  • मध्य प्रदेश
  • महाराष्ट्र
  • गुजरात

थैलेसीमिया के कैरियर पूरे देश में हैं, लेकिन कुछ समुदायों में यह अनुपात 8-10% या उससे भी ज्यादा पाया गया है।

समझने वाली बात यह है कि यह किसी समुदाय की कमी नहीं है, बल्कि उनके इतिहास और भूगोल का प्रभाव है।

क्या इसे रोका जा सकता है?

जवाब एक शब्द में: हां। और यह सिर्फ थ्योरी नहीं, बल्कि कई देशों में हो भी चुका है।

साइप्रस (Cyprus):
कभी यहां थैलेसीमिया के कैरियर 16% थे—दुनिया में सबसे ज्यादा। उन्होंने शादी से पहले कैरियर टेस्टिंग को आम बना दिया। साथ ही काउंसलिंग भी दी। नतीजा? साइप्रस में थैलेसीमिया के नए मामले लगभग शून्य पर आ गए।

ईरान:
वहां भी प्रीमैरिटल स्क्रीनिंग प्रोग्राम चलाया गया। एक दशक के अंदर थैलेसीमिया के साथ पैदा होने वाले बच्चों की दर 90% से ज्यादा गिर गई।

इटली का सार्डिनिया:
जहां पहले 250 में से एक बच्चा थैलेसीमिया के साथ पैदा होता था, वह घटकर अब 4,000 में से एक पर आ गया है।

इससे साफ होता है कि यह दुनिया की उन चंद बीमारियों में से है जिसे मनुष्य ने सच में हरा दिया है। और वह भी किसी नई दवा या महंगी मशीन से नहीं, बस एक सिंपल ब्लड टेस्ट और सही वक्त पर।

भारत में क्या रुकावट है?

चार मुख्य कारण:

1. जानकारी का अभाव:
ज्यादातर भारतीयों ने “थैलेसीमिया कैरियर” या “सिकल सेल ट्रेट” जैसे शब्द कभी सुने ही नहीं हैं। जो चीज आप जानते ही नहीं, उसका टेस्ट करवाने का सवाल ही नहीं उठता।

2. शर्म और डर:
बहुत से परिवार यह टेस्ट इसलिए नहीं करवाते क्योंकि उन्हें डर है कि अगर रिपोर्ट में कुछ आ गया तो शायद रिश्ता टूट जाएगा या समाज में बात फैल जाएगी।

3. जांच की सुविधा नहीं:
गांवों और छोटी जगहों पर HPLC जैसी जांच की सुविधा अक्सर नहीं होती। अगर होती भी है, तो पहुंचना मुश्किल होता है।

4. कोई राष्ट्रीय नियम नहीं:
भारत में शादी से पहले इस जांच को लेकर कोई सरकारी पॉलिसी या कानून नहीं है। कुछ राज्य आगे हैं—गुजरात, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल—लेकिन पूरे देश के लिए एक जैसा ढांचा नहीं है।

राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन

एक अच्छी खबर यह है कि भारत ने एक बड़ा कदम उठाया है।

1 जुलाई 2023 को मध्य प्रदेश के शहडोल से National Sickle Cell Anaemia Elimination Mission शुरू किया गया।

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लक्ष्य:
2047 तक सिकल सेल एनीमिया को एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल के रूप में समाप्त करना।

रणनीति:

  • 17 राज्यों में 0 से 40 साल के 7 करोड़ लोगों की जांच
  • मुख्य रूप से उन इलाकों में जहां यह सबसे ज्यादा पाया जाता है
  • Point of Care Testing Kits से—छोटी किट जो गांव में ही तुरंत रिजल्ट दे दे

प्रगति:

  • 6 करोड़ लोग जांचे जा चुके हैं
  • 2,15,000 मरीज मिले
  • 16,700 कैरियर मिले
  • 2.6 करोड़ लोगों को हेल्थ कार्ड दिए गए जिसमें उनकी जेनेटिक स्क्रीनिंग का विवरण है

समझने वाली बात यह है कि इस मिशन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा जांच नहीं, बल्कि काउंसलिंग है। क्योंकि जांच का मतलब किसी को रोकना नहीं, बल्कि लोगों को सच बताना और फिर उन्हें कहना कि “अब आप फैसला लीजिए यह सच जानने के बाद।”

क्या सिर्फ जांच काफी है?

नहीं। कई विश्लेषकों ने यह सवाल उठाया है। 6 करोड़ लोगों की जांच एक बड़ी उपलब्धि है। लेकिन असली सवाल यह है:

  • उन 16,700 कैरियरों के आगे क्या हुआ?
  • उन्हें काउंसलिंग मिली या नहीं?
  • उन 2,15,000 मरीजों का इलाज मिल रहा है या नहीं?

अगर जांच के बाद काउंसलिंग और इलाज नहीं हो, तो यह सिर्फ एक नंबर की तरह रह जाएगा। इसलिए सलाह दी जा रही है कि इसे आयुष्मान भारत से जोड़ा जाए ताकि इलाज का खर्च भी कवर हो।

थैलेसीमिया के लिए ऐसा मिशन कहां है?

यह एक बड़ा सवाल है। सिकल सेल के लिए राष्ट्रीय मिशन है जो 2047 तक का लक्ष्य लेकर चल रहा है। लेकिन थैलेसीमिया, जिसके कैरियर 4 से 5 करोड़ हैं, उसके लिए उस पैमाने पर कोई मिशन नहीं है।

यह नेशनल हेल्थ मिशन की गाइडलाइंस का हिस्सा है, कुछ राज्य काम कर रहे हैं, बहुत सारे NGO काम कर रहे हैं। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर ठोस पहल की कमी है।

दिलचस्प बात यह है कि दोनों बीमारियों का समाधान एक ही है: शादी से पहले ब्लड टेस्ट।

मुख्य बातें (Key Points)
  • भारत में हर साल 8,000-10,000 बच्चे थैलेसीमिया और 82,500 बच्चे सिकल सेल एनीमिया के साथ पैदा होते हैं
  • 4-5 करोड़ लोग थैलेसीमिया के कैरियर हैं, लेकिन उन्हें पता नहीं
  • राष्ट्रीय सिकल सेल उन्मूलन मिशन 2023 से चल रहा है, लक्ष्य 2047 तक elimination
  • अब तक 6 करोड़ जांचे गए, 2.15 लाख मरीज और 16,700 कैरियर मिले
  • शादी से पहले सिंपल ब्लड टेस्ट से इन बीमारियों को रोका जा सकता है

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: थैलेसीमिया और सिकल सेल में क्या फर्क है?

दोनों ही जेनेटिक रक्त विकार हैं जो हीमोग्लोबिन को प्रभावित करते हैं। थैलेसीमिया में हीमोग्लोबिन कम बनता है, जबकि सिकल सेल में लाल रक्त कोशिकाएं सिकल (हंसिया) आकार की हो जाती हैं। दोनों में नियमित ब्लड ट्रांसफ्यूजन और विशेष इलाज की जरूरत होती है।

प्रश्न 2: शादी से पहले कौन सा टेस्ट करवाना चाहिए?

HPLC (High Performance Liquid Chromatography) या हीमोग्लोबिन इलेक्ट्रोफोरेसिस टेस्ट करवाना चाहिए। यह बताता है कि आप थैलेसीमिया या सिकल सेल के कैरियर हैं या नहीं। यह टेस्ट ज्यादातर अस्पतालों में उपलब्ध है और अपेक्षाकृत सस्ता है।

प्रश्न 3: अगर दोनों कैरियर हों तो क्या शादी नहीं हो सकती?

यह पूरी तरह व्यक्तिगत फैसला है। अगर दोनों कैरियर हैं, तो डॉक्टर से परामर्श लें। गर्भावस्था के दौरान प्रीनेटल टेस्टिंग (prenatal testing) से भ्रूण की जांच की जा सकती है। पूरी जानकारी के साथ सही फैसला लिया जा सकता है।

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Ajay Kumar

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पत्रकारिता में एक दशक से अधिक का ठोस अनुभव रखने वाले अजय कुमार 'शोर से ज़्यादा सार' की पत्रकारिता पर दृढ़ विश्वास करते हैं। वर्तमान में वे The News Air में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं, जहां वे समाचारों की रणनीति, लेखन, तथ्य-सत्यापन (Fact-Checking) और सटीक प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं।पत्रकारिता का सफर और अनुभव - अजय कुमार का करियर ग्राउंड ज़ीरो की रिपोर्टिंग से लेकर न्यूज़ डेस्क के कुशल प्रबंधन तक विस्तृत है। The News Air में पिछले 3 वर्षों से नेतृत्व करने से पहले, उन्होंने 'दैनिक जागरण' और 'सिटी न्यूज़' जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। पत्रकारिता में उनकी मजबूत शैक्षणिक पृष्ठभूमि ने उनके काम करने के तरीके को बेहद व्यावहारिक और तथ्य-आधारित बनाया है।विशेषज्ञता और कार्यक्षेत्र (Expertise & Beats) - वे जटिल राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को सरल भाषा, स्पष्ट तथ्यों और निष्पक्ष तरीके से पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं। उनकी पत्रकारिता की मुख्य विशेषज्ञता इन क्षेत्रों में है:राजनीतिक कवरेज: लोकसभा चुनावों और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की ग्राउंड और डेस्क रिपोर्टिंग।कानूनी और संसदीय खबरें: संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों की नियमित और रियल-टाइम कवरेज।खोजी पत्रकारिता: ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ रिपोर्टिंग के जरिए अंदरूनी खबरों की पड़ताल।विश्वसनीयता और डिजिटल योगदान (Trust & Authority) - सटीक और प्रामाणिक ख़बरों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें पाठकों के बीच एक विश्वसनीय पत्रकार बनाती है। डिजिटल न्यूज़ इकोसिस्टम को बेहतर बनाने और फेक न्यूज़ से लड़ने की दिशा में, अजय कुमार गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

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