ISRO Scientists Migration को लेकर भारत के प्रीमियम स्पेस ऑर्गेनाइजेशन इसरो में एक ग्रेट स्पेस माइग्रेशन चल रहा है जिसने देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम की नींव हिला दी है। पिछले कुछ दिनों में जो सुर्खियां आईं वे किसी भी देशभक्त भारतीय को चिंतित कर सकती हैं – इसरो से 100 से ज्यादा वैज्ञानिकों ने इस्तीफा दे दिया और उन्होंने स्पेस सेक्टर में ही प्राइवेट कंपनियों को ज्वाइन कर लिया।
देखा जाए तो यह संख्या 100 से 120 का आंकड़ा बेहद अलार्मिंग है। दिलचस्प बात यह है कि इतने साइंटिस्ट ने सालों के दरमियान नहीं बल्कि एक ही साल के भीतर रिजाइन किया है। यह इसरो को एक बहुत बड़ी भारी भरकम चोट है।
अब इस अलार्मिंग स्थिति के लिए केंद्र ने क्या ऑर्डर जारी किया? सरकार ने निर्देश दिया कि जितने भी क्रिटिकल प्रोजेक्ट चल रहे हैं स्पेस सेक्टर में, उनमें काम करने वाले साइंटिस्ट का रिजाइनेशन इसरो नहीं बल्कि केंद्र खुद देखेगा।
🔍 यह भी पढ़ें- India Splitting into Two Parts: Shocking Research से बड़ा खुलासा, Indian Plate में हो रही है Tearing
क्या है इसरो की असली समस्या?
समझने वाली बात यह है कि इसरो के बीच चल रही प्रॉब्लम्स के लिए यह सरकारी आदेश सिर्फ एक बैंडेड का काम करेगा। आप जबरदस्ती किसी को बांधकर काम कराएंगे तो कितने दिन करवा पाएंगे?
अगर गौर करें तो हमारे इसरो में अभी जो क्रिटिकल प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं, खासकर चंद्रयान-3 की बात करें तो इसके लिए अभी तक 25 टेराबाइट डेटा इकट्ठा हो चुका है जो कि लगभग 1 लाख टेस्ट करने के बाद इकट्ठा हुआ है।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इनसे यूजफुल नॉलेज निकालना किसी सामान्य साइंटिस्ट का काम नहीं है। इसके लिए एक्सपीरियंस्ड, नॉलेजेबल माइंड चाहिए।
🔍 यह भी पढ़ें- Indian Belly Fat Mystery: Evolution, H. Pylori Bacteria और Modern Diet की खतरनाक Collision
गगनयान मिशन में भी देरी
इसके साथ-साथ ध्यान रखिए कि गगनयान मिशन – जिस पर भारत सरकार और पूरा देश गर्व करता है और जो भारत के स्पेस स्टेशन के लिए एक प्रीकर्सर मिशन है – उसमें भी डिले देखे जा रहे हैं क्योंकि इतने रिजाइनेशन के बाद जो भारी भरकम क्रिटिकल प्रोजेक्ट्स हैं वो स्लो डाउन हो चुके हैं।
दिलचस्प बात यह है कि भारतीय सरकार की 2020 से स्पेस पॉलिसी में स्पष्ट रूप पर लिखा है कि हम प्राइवेट सेक्टर को प्रमोट करते हैं। जितनी भी प्राइवेट कंपनियां स्पेस सेक्टर में आकर इन्वेस्ट करना चाहती हैं, काम करना चाहती हैं, हम उनका वेलकम करेंगे।
🔍 यह भी पढ़ें- H-1B Visa Crisis: ’60 दिन में नौकरी खोजो या अमेरिका छोड़ो’, भारतीय टेक प्रोफेशनल्स पर संकट के बादल
IN-SPACe: Private Sector को बढ़ावा देने का मंच
इसके लिए स्पेसिफिकली IN-SPACe नाम से ऑर्गेनाइजेशन भी बनाया गया है। मतलब भारतीय सरकार की तरफ से ही एक बॉडी को सेटअप किया गया है ताकि वो प्राइवेट सेक्टर को प्रमोट करें।
अब दूसरी तरफ देखिए हम प्राइवेट सेक्टर में – अभी हाल फिलहाल में इसी महीने में Skyroot Space बहुत ज्यादा सुर्खियों में था। इन्होंने 2022 में पहला रॉकेट लॉन्च करके भी दिखाया था जो कि स्पेस सेक्टर में किसी भी इंडियन प्राइवेट कंपनी द्वारा पहली बार था।
इसी महीने में इन्होंने मल्टीस्टेज रॉकेट, जिसको उन्होंने खुद डेवलप और डिजाइन किया है, इसको लॉन्च करके भी दिखाया। ऐसा करने वाली भारत की पहली प्राइवेट कंपनी बनी है।
Agnikul Cosmos का कमाल
अब दूसरी तरफ देखिए, वर्ल्ड लेवल पर सबसे पहला 3D प्रिंटेड रॉकेट इंजन बनाने वाली Agnikul Cosmos कंपनी भी एक प्राइवेट स्पेस सेक्टर में काम करने वाली कंपनी है।
तो इसका मतलब, स्पेस सेक्टर में – सवाल यह उठता है कि क्या ये प्राइवेट कंपनियां हमारे स्पेस सेक्टर को आगे लेकर जा रही हैं या पीछे धकेल रही हैं? सिंपल सी बात है – चीजों को और बेहतर तरीके से आगे लेकर जाया जा रहा है।
प्राइवेट सेक्टर का आकर्षण
अब एक और चीज देखिए। जितने लोग काम करते हैं इसरो में, उनको एक फिक्स्ड गवर्नमेंट टेम्पलेट के अंडर काम करना है। आपकी जो प्रमोशन होगी, आपकी लीडरशिप होगी, वो धीरे-धीरे सीनियॉरिटी बेसिस पर होगी।
लेकिन प्राइवेट सेक्टर में आप जितने नॉलेजफुल हैं, जितने टैलेंटेड हैं, उतनी ज्यादा ही आपको पे मिलेगी, प्रोजेक्ट की कमांड मिलेगी और सबसे इंपॉर्टेंट चीज – डिसीजन मेकिंग पावर मिलेगी।
समझने वाली बात यह है कि किसी भी टैलेंटेड पर्सन को अगर अपने टैलेंट के हिसाब से काम करने की अनुमति मिले, लीडरशिप रोल मिले, डिसीजन मेकिंग पावर मिले तो वो कभी भी ऐसी ऑपर्च्युनिटी को नहीं छोड़ना चाहेगा जहां पर उसके टैलेंट की सही कदर, सही पहचान मिले।
पूर्व ISRO चेयरमैन भी गए Private Sector में
यहां पर दिलचस्प बात यह है कि इसरो के प्रीवियस चेयरमैन जो कि एस सोमनाथ हैं, इन्होंने खुद रिजाइन होने के बाद Agnikul Cosmos को ज्वाइन कर लिया।
अब इन सारी स्थितियों में भारतीय सरकार का जो ऑर्डर है वो बैंडेड से बढ़कर कुछ नहीं है। कुछ दिन तक लोगों को रोक लोगे लेकिन लोग कब तक काम करेंगे? और अगर आप किसी को जबरदस्ती रोककर रखोगे तो वो कितनी एंथूसियाज्म, कितनी मोटिवेशन से आपका काम करके देगा?
वैकेंसीज की समस्या और भी गंभीर
और इस रिजाइनेशन से आप ऑलरेडी चल रही वैकेंसीज – क्योंकि 18,000 से ज्यादा सैंक्शंड जॉब रोल्स हैं इसरो के अंडर, जिसमें लगभग ढाई हजार से ज्यादा इस वक्त वैकेंसीज हैं।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इस सरकारी फरमान से आप इन वैकेंसीज को नहीं भर पाओगे बल्कि आपको रिजाइनेशन के लिए और प्रेशर आना शुरू हो जाएगा।
NASA का मॉडल: एक सबक
अब दूसरी तरफ देखिए कि वर्ल्ड लेवल पर हम बड़ी-बड़ी एजेंसियों को देखते हैं, खासकर जब NASA की बात होती है तो उनके पास भी ऐसी स्थिति आ चुकी है। बिल्कुल आई है। तो उन्होंने क्या किया था?
अगर गौर करें तो NASA ने इस स्थिति को देखने के लिए 40 साल पहले ही अपने आप को तैयार कर लिया था। जो प्रॉब्लम हमें आज देखने को मिल रही है, NASA ने इसके लिए कानून भी US Government ने पास कर रखा है।
जहां पर वो प्राइवेट कंपनियों को पार्टनर्स इन स्पेस समझते हैं। वो अपना दुश्मन नहीं समझते। वो समझते हैं कि यही हमारे पार्टनर्स हैं, यही हमारा काम करके देंगे।
NASA का Fixed Price Model
यहां पर ध्यान से देखिए। जहां पर हम बात करते हैं कि NASA को जब यह स्थिति देखनी पड़ी कि स्पेस सेक्टर की डेवलपमेंट के लिए, रिसर्च के लिए जब प्राइवेट ऑर्गेनाइजेशन भी आगे आ रहे हैं तो उनके साथ कैसे डील करना है।
तो यहां पर सिंपल सी बात उन्होंने आगे रखी कि जितने भी मैन्युफैक्चरिंग के काम हैं, अगर आपको कंपनी से और ज्यादा एफिशिएंट ऑपरेशन चाहिए, स्पेस के ऑपरेशन को और बेहतरीन करना है तो प्राइवेट सेक्टर को लेकर आइए।
अब जब प्राइवेट सेक्टर आता है तो एक फिक्स्ड प्राइस मॉडल पर। मतलब प्रोजेक्ट है, NASA प्रोजेक्ट की कॉस्ट एस्टिमेट कर लेता है और उस कॉस्ट को एक फिक्स्ड ब्रैकेट में लेकर आया जाता है कि जो प्राइवेट कंपनी इसको इस फिक्स्ड प्राइस में एग्जीक्यूट कर सकती है वो आगे आए।
Seed Capital और Investor Model
दिलचस्प बात यह है कि NASA एक इन्वेस्टर मॉडल को भी फॉलो कर रहा है क्योंकि प्राइवेट सेक्टर जो स्पेस में एंटर कर रहा है, उसको शायद इस बात पर भरोसा नहीं होता कि मेरा कितना पैसा लग जाएगा।
तो NASA एक सीड कैपिटल पहले खुद डाल देता है। मतलब जब हम खेतीबाड़ी करते हैं, एक सीड डालना होता है, बोना – जिसके बाद फसल निकलेगी। तो यहां पर NASA खुद कुछ कैपिटल पहले प्रोवाइड कर देगा, उस कैपिटल के फॉलो अप में प्राइवेट सेक्टर आता है, पूरे के पूरे मिशन को एग्जीक्यूट करता है।
समझने वाली बात यह है कि इस पूरे मॉडल में अगर हम देखें, NASA की फंडिंग में से – जो कि अगर हम मान लें ₹100 की फंडिंग है – ₹85 वो प्राइवेट सेक्टर के साथ कॉन्ट्रैक्ट्स में स्पेंड करते हैं।
Shared Personnel Model
अब बात आती है पर्सनल की जो कि हमने देखा कि साइंटिस्ट ने रिजाइन कर दिया इसरो से। यहां पर वो शेयर्ड पर्सनल मॉडल को फॉलो करते हैं। मतलब वहां पर रिस्ट्रिक्शन नहीं है।
आप प्रोजेक्ट बेसिस पर भी प्राइवेट कंपनी में जाकर काम करके वापस आ सकते हो। और सिमिलरली प्राइवेट कंपनी से जो उनके पर्सनल हैं वो काम करने के लिए प्रोजेक्ट बेस पर NASA जा सकते हैं और वापस भी आ सकते हैं।
अगर गौर करें तो इस शेयर्ड मॉडल के चलते NASA वर्ल्ड लेवल का एक प्रीमियम स्पेस ऑर्गेनाइजेशन है जिसको सभी के सभी देशों के स्पेस ऑर्गेनाइजेशन, इंक्लूडिंग इसरो, एक रोल मॉडल की तरह देखते हैं।
NASA का रिकॉर्ड
दुनिया में हर साल सबसे ज्यादा स्पेस लॉन्चेस NASA करता है – 190 के आसपास की फ्रीक्वेंसी है इनकी हर साल लॉन्च करने की। मतलब इनका मॉडल जो कि 40 साल से चला रहे हैं, यह कामयाब है।
इसरो के लिए आगे का रास्ता
यहां पर जब हम टैलेंट की बात करते हैं, टैलेंट को आप जबरदस्ती बांधकर नहीं रख सकते। तो इसरो को प्राइवेट कंपनियों के साथ कोएग्जिस्ट करना है। आपको उनकी रिक्वायर्ड जो सैलरीज हैं, उनके लीडरशिप रूल्स हैं, उनको वापस देखना पड़ेगा।
क्योंकि जो ब्यूरोक्रेटिक स्ट्रक्चर यहां पर बनाया गया है वो इसरो में नहीं चल पाएगा। रिसर्च और टैलेंट ऑर्गेनाइजेशन में वी कैन नॉट फॉलो हायरार्की फॉर लॉन्ग। इसको हमें ब्रेक करना पड़ेगा। हमें टैलेंट बेस्ड रेकग्निशन देना ही पड़ेगा।
फंडिंग बढ़ाना जरूरी
यहां पर देखिए, इंपॉर्टेंट है कि जो कैपिटल इसरो को दी जाती है, जो पैसा पहुंचाया जाता है, आपको उससे ज्यादा देना पड़ेगा। अगर आपको इसरो को इस लेवल से ऊपर उठाना है तो आपको इसरो की फंडिंग बजट बढ़ाना पड़ेगा और उस बजट में से साइंटिस्ट को दिए जाने वाली सैलरी, कंपेनसेशन को और ज्यादा बढ़ाना पड़ेगा।
तभी आप उनके रिजाइनेशन को ऑटोमेटिकली रोक सकते हैं। इसके लिए आपको पाबंदी नहीं लगानी पड़ेगी।
मल्टीपल Launch Sites की जरूरत
जितने भी लॉन्चेस हैं सैटेलाइट्स के, रॉकेट्स के, भारत के – वो सभी के सभी इसरो की सैटेलाइट लॉन्च साइट से होते हैं। मतलब यहां पर प्राइवेट सेक्टर के पास खुद की कोई लॉन्च साइट्स नहीं हैं।
इसके लिए सरकार को अनुमति भी देनी पड़ेगी और मल्टीपल लॉन्च साइट्स भी लेकर आने पड़ेंगे। क्योंकि यहां पर हम कंजेशन नहीं चाहते। हम वो ब्यूरोक्रेटिक रेड टेपिज्म नहीं चाहते जहां पर एक प्राइवेट सेक्टर का प्रोजेक्ट तैयार है, पैसा लगा हुआ है और उनको सालों-महीनों वेट करना पड़े परमिशन टू लॉन्च के लिए।
Enabler बनो, Operator नहीं
दिलचस्प बात यह है कि जिस तरीके से NASA काम करता है कि “How” पर काम नहीं, “What” पर करिए। “How” की जिम्मेदारी आप प्राइवेट सेक्टर पर छोड़ दें। यू जस्ट बिकम द इनेबलर, नॉट द ऑपरेटर।
हमें वो लैंडलॉर्ड मॉडल पर शिफ्ट करना पड़ेगा। सो इसरो नीड्स अ स्ट्रक्चरल ओवरहॉल हियर।
इसरो की मोनोपॉली नहीं, इकोसिस्टम चाहिए
समझने वाली बात यह है कि अब हमें इसरो की मोनोपॉली नहीं, इसरो के द्वारा बनाया गया इकोसिस्टम चाहिए। जहां पर 400 से ज्यादा प्राइवेट कंपनियां ऑपरेट कर रही हैं और इसका नंबर बढ़ना चाहिए क्योंकि इसका नंबर बढ़ेगा तो भारत का स्पेस सेक्टर ग्रो करेगा।
हमारा मोटिव इसरो का ग्रोथ नहीं है। हमारा मोटिव भारत के स्पेस सेक्टर का ग्रोथ है। उसमें इनोवेशन है, उसकी एक्सप्लोरेशन है – वो चाहते हैं हम।
मुख्य बातें (Key Points)
- एक साल में ISRO से 100+ वैज्ञानिकों ने इस्तीफा देकर प्राइवेट कंपनियां ज्वाइन कीं
- चंद्रयान-3 के 25 TB डेटा और गगनयान मिशन में देरी का खतरा
- ISRO में 18,000+ posts में 2,500+ vacancies पहले से मौजूद
- केंद्र ने critical projects में काम करने वाले वैज्ञानिकों का resignation सीधे देखने का फैसला लिया
- NASA का मॉडल: Fixed price contracts, seed capital, shared personnel model
- भारत में IN-SPACe के जरिए प्राइवेट सेक्टर को बढ़ावा
- Skyroot Space और Agnikul Cosmos जैसी कंपनियों ने बड़ी उपलब्धियां हासिल कीं
- NASA अपनी funding का 85% प्राइवेट सेक्टर के साथ contracts में खर्च करता है
- ISRO को structural overhaul, बेहतर सैलरी और multiple launch sites की जरूरत











