Monsoon Session Bills 2026: नई दिल्ली में आज से शुरू हुए पार्लियामेंट के मानसून सेशन में केंद्र सरकार पांच नए बड़े विधेयक लेकर आने वाली है। इन बिल्स में विदेशी चंदे पर सख्ती, टैक्स सुधार, एमएसएमई को बढ़ावा और सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने जैसे अहम मुद्दे शामिल हैं। देखा जाए तो यह सेशन हाल के वर्षों में सबसे महत्वपूर्ण विधायी सत्रों में से एक साबित हो सकता है।
20 जुलाई 2026 को शुरू हुए इस सेशन को लेकर सरकार और विपक्ष दोनों की तैयारियां चरम पर हैं। जहां एक ओर सत्तापक्ष अपने प्रमुख सुधारों को कानूनी रूप देने के लिए तैयार है, वहीं विपक्ष कई मुद्दों पर सरकार को घेरने की योजना बना रहा है।
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विदेशी फंडिंग पर होगी सख्ती
इस सेशन का सबसे विवादास्पद विधेयक है Foreign Contribution Regulation Amendment Bill 2026 यानी विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक। समझने वाली बात यह है कि अगर कोई भी व्यक्ति या संगठन विदेश से पैसा, सुरक्षा संबंधी सामग्री या कोई अन्य योगदान भारत में मंगाता है तो वह ‘विदेशी अंशदान’ की श्रेणी में आता है। चाहे यह किसी विदेशी सरकार से हो, विदेशी नागरिक से हो, विदेशी कंपनी से हो या किसी अंतरराष्ट्रीय चैरिटी संगठन से।
दिलचस्प बात यह है कि इस कानून की शुरुआत 1976 में आपातकाल के दौरान हुई थी। उस समय का मुख्य उद्देश्य था भारतीय लोकतंत्र में विदेशी हस्तक्षेप को रोकना। फिर 2010 में इसे नए सिरे से बनाया गया और 2020 में एनडीए सरकार ने इसमें बड़े बदलाव किए।
अब सरकार फिर से इसमें संशोधन ला रही है क्योंकि उसका मानना है कि देश में अभी भी बहुत सारे ‘शेल एनजीओ’ हैं जो दिखाते तो कुछ और हैं, करते कुछ और हैं। नए बदलावों में एनजीओ को और अधिक पारदर्शिता दिखानी होगी, ऑडिट मजबूत होगा और हर पैसे की डिजिटल ट्रैकिंग होगी।
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छोटे एनजीओ क्यों परेशान हैं
हालांकि कई संगठनों का कहना है कि यह नियम बहुत सख्त हैं। छोटे एनजीओ के लिए इतनी औपचारिकताएं पूरी करना मुश्किल होगा। शोध संस्थान, विश्वविद्यालय और थिंक टैंक जो विदेश से फंडिंग लेते हैं, वे भी प्रभावित होंगे। राहत कार्य करने वाले मानवीय संगठनों पर भी असर पड़ सकता है।
विपक्ष का आरोप है कि यह ‘संगठन बनाने की स्वतंत्रता’ का उल्लंघन है। लेकिन 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने नोएल हार्पर बनाम भारत संघ मामले में साफ कह दिया था कि एनजीओ बनाना तो मौलिक अधिकार है, लेकिन विदेशी अंशदान लेना मौलिक अधिकार नहीं है। देश की सुरक्षा और अखंडता को देखते हुए सरकार इसे नियंत्रित कर सकती है।
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टैक्स कानून होंगे आसान
दूसरा बड़ा बिल है Income Tax Amendment Bill 2026। अभी तक यह अध्यादेश के रूप में लागू था, लेकिन अध्यादेश की एक सीमा होती है—अगर इसे कानून में नहीं बदला गया तो यह खत्म हो जाता है। इसलिए सरकार अब इसे स्थायी कानून बनाने जा रही है।
इस बिल का मुख्य उद्देश्य है टैक्स कानूनों को सरल बनाना। आप जानते हैं कि भारत का टैक्स सिस्टम पिछले कई दशकों में बहुत विकसित हुआ है। कई संशोधन हुए हैं, कई छूट दी गई हैं। अब सरकार इन सबको एक जगह लाकर एक बेहतर और स्पष्ट कानून बनाना चाहती है।
इससे टैक्सपेयर्स को क्या फायदा होगा? टैक्स फाइलिंग आसान हो जाएगी। विवाद कम होंगे। स्पष्टता मिलेगी कि क्या करना है और क्या नहीं। सरकार के लिए भी राजस्व बेहतर हो सकता है और डिजिटल निगरानी मजबूत होगी।
एमएसएमई को मिलेगा बढ़ावा
तीसरा विधेयक है MSME Development Amendment Bill। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि एमएसएमई यानी सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। रोजगार, विनिर्माण, निर्यात और नवाचार—सब कुछ इन पर निर्भर है।
लेकिन इन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। समय पर कर्ज नहीं मिलता, भुगतान में देरी होती है, तकनीकी अंतराल हैं। इस नए संशोधन के जरिए सरकार चाहती है कि छोटे व्यवसाय सरकारी सहायता के बिना भी बढ़ सकें। कई बार ऐसा होता है कि सरकार उतना सपोर्ट नहीं दे पाती, तो भी एमएसएमई फेल नहीं होनी चाहिए।
भुगतान तंत्र को बेहतर किया जाएगा। बड़ी कंपनियां जो छोटी कंपनियों से सेवाएं लेती हैं, वे कई बार पेमेंट में देरी कर देती हैं—यह नहीं होना चाहिए। कर्ज आसान मिलना चाहिए। मुद्रा योजना और अन्य पहलों के साथ यह मिलकर काम करेगा। औपचारिकताएं कम होंगी।
जन्म-मृत्यु का डिजिटल रिकॉर्ड
चौथा बिल है Registration of Births and Deaths Amendment Bill। भारत में 1969 से एक कानून है जो जन्म और मृत्यु के पंजीकरण को अनिवार्य बनाता है। यह इसलिए जरूरी है क्योंकि जन्म प्रमाणपत्र के बिना स्कूल में दाखिला नहीं मिलता, पासपोर्ट नहीं बनता, आधार कार्ड नहीं मिलता, वोटिंग नहीं हो सकती। मृत्यु प्रमाणपत्र के बिना संपत्ति का उत्तराधिकार और बीमा का दावा नहीं मिलता।
अब सरकार इस पूरे सिस्टम को डिजिटल बनाने जा रही है। पूरे देश भर में हर जन्म और मृत्यु का डिजिटल रिकॉर्ड होगा। इससे शासन के लिए डेटाबेस मजबूत होगा। जनसांख्यिकीय जानकारी सटीक मिलेगी। सरकार को बार-बार सर्वेक्षण नहीं कराने पड़ेंगे। पता रहेगा कि कितने लोग हैं, किस उम्र के हैं, कहां हैं।
सुप्रीम कोर्ट में बढ़ेंगे जज
पांचवां और बहुत महत्वपूर्ण बिल है Supreme Court (Number of Judges) Amendment Bill। अगर गौर करें तो भारत में विश्व का सबसे बड़ा न्यायिक मामलों का बोझ है। मुख्य न्यायाधीश समेत अभी सुप्रीम कोर्ट में 34 न्यायाधीश हैं। सरकार इस संख्या को बढ़ाकर 38 करने जा रही है।
संवैधानिक मामले, आपराधिक अपील, वाणिज्यिक विवाद—बहुत कुछ है। जिस तरह से मामलों की संख्या बढ़ रही है, उसी अनुपात में न्यायाधीशों की संख्या भी बढ़ानी जरूरी हो गई है। इससे न्यायालय की क्षमता बढ़ेगी, नियुक्तियां होंगी, बुनियादी ढांचा सुधरेगा।
शिक्षा में भी सुधार की तैयारी
छठा विधेयक है Viksit Bharat Shiksha Adhisthan Bill। सरकार का कहना है कि प्राथमिक शिक्षा को तो हम नई शिक्षा नीति के तहत बेहतर कर पा रहे हैं, लेकिन उच्च शिक्षा पर भी विशेष ध्यान देने की जरूरत है। इसलिए उच्च शिक्षा में शासन को बेहतर बनाने के लिए यह विशेष बिल लाया जा रहा है।
हालांकि अभी इस बिल के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है क्योंकि जब सरकार इसे संसद में पेश करेगी तभी सभी प्रावधान स्पष्ट होंगे।
मानसून सेशन क्यों खास है
समझने वाली बात यह है कि साल में संसद के तीन सत्र होते हैं—बजट सत्र (जनवरी-अप्रैल), मानसून सत्र (जुलाई-अगस्त) और शीतकालीन सत्र (नवंबर-दिसंबर)। हालांकि संविधान में इन सत्रों का उल्लेख नहीं है। संविधान का अनुच्छेद 85 सिर्फ इतना कहता है कि राष्ट्रपति संसद को बुलाते हैं। लेकिन एक शर्त है—दो सत्रों के बीच 6 महीने से ज्यादा का अंतर नहीं होना चाहिए।
इस बार का मानसून सत्र इसलिए महत्वपूर्ण बताया जा रहा है क्योंकि सरकार अपने बड़े सुधारों को पूरा करना चाहती है। विपक्ष कई मुद्दों पर बहस करना चाहता है। कई अध्यादेशों को अधिनियम में बदला जाएगा। शासन सुधार जो लंबित हैं, उन पर फोकस होगा।
NEET और प्रदर्शन भी मुद्दा
इस बीच राजनीतिक माहौल भी गर्म है। NEET परीक्षा विवाद, सोनम वांगचुक का अनशन, राम मंदिर में चोरी की कथित घटना—ये सब मुद्दे संसद में उठाए जा रहे हैं। आज सुबह 11 बजे जब सत्र शुरू हुआ, कुछ ही देर बाद स्थगित कर दिया गया। फिर दोपहर 12 बजे वापस स्थगित हो गया। सत्र ठीक से चल ही नहीं पा रहा है।
सोनम वांगचुक इस समय सफदरजंग अस्पताल में हैं। उनका कहना है कि कोई उनसे आकर मिले और आश्वासन दे कि संसद में लद्दाख और शिक्षा के मुद्दों पर चर्चा होगी, तो वे अपनी भूख हड़ताल समाप्त कर देंगे। वहीं कॉकरोच जनता पार्टी से जुड़े सौरव दास का कहना है कि सरकार ने उनसे संपर्क किया है और गृह मंत्री जेपी नड्डा उनसे मिलने वाले हैं।
क्यों होगा विवाद
देखा जाए तो इन सभी विधेयकों पर संसद में गर्मागर्म बहस होने की पूरी संभावना है। विदेशी फंडिंग वाला बिल तो खासतौर पर विवादास्पद है क्योंकि कई एनजीओ, शोध संस्थान और नागरिक समाज संगठन इससे चिंतित हैं। उनका कहना है कि यह उनकी स्वतंत्रता पर अंकुश है।
वहीं सरकार का तर्क है कि देश की सुरक्षा सर्वोपरि है और विदेशी हस्तक्षेप को रोकना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट भी सरकार के पक्ष में फैसला दे चुका है।
इनकम टैक्स बिल पर शायद ज्यादा विवाद न हो क्योंकि यह करदाताओं के हित में है। एमएसएमई बिल का भी स्वागत किया जा सकता है। लेकिन शिक्षा और न्यायपालिका से जुड़े बिलों पर भी विपक्ष अपनी राय रख सकता है।
यह सेशन तब तक चलेगा जब तक सभी जरूरी विधेयक पारित नहीं हो जाते। आने वाले दिनों में देखना होगा कि सरकार और विपक्ष के बीच कितनी बातचीत होती है और कितना टकराव होता है।
मुख्य बातें (Key Points)
• मानसून सत्र 2026 में सरकार पांच बड़े विधेयक लेकर आई है जो एनजीओ फंडिंग, टैक्स, एमएसएमई, जन्म-मृत्यु पंजीकरण और सुप्रीम कोर्ट से जुड़े हैं
• विदेशी अंशदान नियमन संशोधन बिल में एनजीओ को अधिक पारदर्शिता दिखानी होगी और हर पैसे की डिजिटल ट्रैकिंग होगी
• सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या 34 से बढ़ाकर 38 की जाएगी ताकि मामलों के बोझ को कम किया जा सके
• जन्म और मृत्यु का पूरी तरह से डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा जिससे सरकार को सटीक जनसांख्यिकीय डेटा मिलेगा













