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The News Air - Breaking News - NFHS-6 Report: हर तीसरा बच्चा कुपोषित! Anemia Data क्यों गायब?

NFHS-6 Report: हर तीसरा बच्चा कुपोषित! Anemia Data क्यों गायब?

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-6 में चौंकाने वाले आंकड़े, 33-35% बच्चे आज भी कुपोषित, लेकिन एनीमिया डाटा पूरी तरह गायब - सरकार पर सवाल

Ajay Kumar by Ajay Kumar
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in Breaking News, NEWS-TICKER, स्पेशल स्टोरी
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NFHS-6 Report: पिछले कुछ समय से आप अखबारों में, टीवी पर, सोशल मीडिया हैंडल्स पर एक बहुत बड़ी हेडलाइन देखते होंगे कि भारत दुनिया की छठी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। हम बात कर रहे हैं AI की, सेमीकंडक्टर्स की, बुलेट ट्रेंस की और डिजिटल इंडिया की।

लेकिन साथियों, इसी चमक-दमक के बीच में देश के नीतिगत गलियारों से एक ऐसी रिपोर्ट आई है जो रिपोर्ट इस पूरे विकास की कहानी पर एक बड़ा क्वेश्चन मार्क लगाती है।

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी किए गए NFHS-6 (नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-6) के शुरुआती आंकड़े आए हैं। और ये आंकड़े क्या कहते हैं? भारत का आज भी हर तीसरा बच्चा कुपोषित है।

🔍 यह भी पढ़ें- भारत में Genetic Testing ने बदली शादी की परंपरा, कुंडली की जगह अब DNA

क्या है NFHS?

अब जरा सोचिए, जिस देश में हर तीसरा बच्चा शारीरिक और मानसिक रूप से अपनी उम्र के हिसाब से विकसित ना हो पा रहा हो, क्या वह देश 2047 में वैश्विक महाशक्ति बनने का दावा कर सकता है?

यह कोई प्राइवेट एजेंसी का सर्वे तो नहीं है दोस्तों। बिल्कुल नहीं साथियों। यह पूरा का पूरा NFHS जो है, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत कराया जाने वाला इस देश का सबसे प्रामाणिक, सबसे बड़ा और एक विश्वस्तरीय सर्वेक्षण है।

इसके लिए नोडल एजेंसी बनाई गई है – IIPS (इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पॉपुलेशन साइंसेज) मुंबई में है ये।

NFHS का इतिहास:

  • 1992-93: NFHS-1
  • 1998-99: NFHS-2
  • 2005-06: NFHS-3
  • 2015-16: NFHS-4
  • 2019-21: NFHS-5
  • 2025-26: NFHS-6 (वर्तमान)
कुपोषण के तीन पैमाने

कुपोषण को नापने के तीन पैमाने होते हैं जिन्हें आपको नोट कर लेना चाहिए:

1. स्टंटिंग (Stunting): यानी बौनापन – उम्र के अनुसार ऊंचाई कम होना। यह दीर्घकालीन कुपोषण का संकेत होता है।

2. वेस्टिंग (Wasting): जहां पर उम्र के अनुपात में वजन कम होता है जो कि तीव्र कुपोषण का लक्षण है।

3. अंडरवेट (Underweight): यानी वजन कम होना – उम्र के अनुसार वजन का कम होना। यह मिश्रित कुपोषण की स्थिति को दर्शाता है।

कुपोषण के प्रकार और प्रभाव

पैमानामतलबप्रभावNFHS-6 डाटा
स्टंटिंगलंबाई कमदीर्घकालीन कुपोषण33-35% बच्चे
वेस्टिंगवजन कम (तीव्र)गंभीर पोषण कमीग्रामीण क्षेत्र में ज्यादा
अंडरवेटकुल वजन कममिश्रित कुपोषणलगभग 33%
NFHS-6 के चौंकाने वाले आंकड़े

NFHS-6 के शुरुआती ट्रेंड्स यह बताते हैं कि भारत के कई बड़े राज्यों, विशेषकर ग्रामीण इलाकों में आज भी 33 से 35% बच्चे अंडरवेट या स्टंटिंग के शिकार हैं।

साथियों, हम पूरी दुनिया में ढिंढोरा पीटते हैं कि हमारे पास डेमोग्राफिक डिविडेंड है, जनसंख्यकीय लाभांश है। हमारी 65% आबादी कार्यशील आयु वर्ग में आती है। हम युवाओं का देश हैं।

लेकिन जरा रुकिए और ठंडे दिमाग से सोचिएगा कि अगर इस युवा आबादी का 1/3 हिस्सा बचपन में कुपोषण का शिकार रहा हो, जिसके दिमाग में और जिसके शरीर में पूर्ण विकास ना हो पाया हो, तो क्या वो ग्लोबल मार्केट में चीन, अमेरिका और जापान के युवाओं का मुकाबला कर सकेगा?

🔍 यह भी पढ़ें- सावधान! Periods के दौरान Heavy Bleeding से हो सकती है ये बीमारी

सबसे बड़ा रहस्य – Anemia Data गायब

और कहानी में ट्विस्ट इतना ही नहीं है। ट्विस्ट इससे भी बड़ा है दोस्तों। तो इस रिपोर्ट में एक ऐसा खेल हुआ है जिसने पूरे देश के बुद्धिजीवियों को सक्ते में डाल दिया है।

इस बार की रिपोर्ट में एनीमिया यानी रक्त अल्पता का डाटा पूरी तरह से गायब है। वही एनीमिया जिसने पिछले NFHS-5 के समय सरकार की चिंताएं बढ़ा दी थीं।

दिलचस्प बात यह है कि जब NFHS-5 के आंकड़े आए थे (2019-21) तो सरकार के पसीने छूट गए थे। रिपोर्ट में कहा गया कि:

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  • 5 साल से कम उम्र के 67% बच्चे एनीमिया से पीड़ित थे
  • 57% महिलाएं एनीमिया से पीड़ित थीं

यानी देश की आधी से ज्यादा आबादी शरीर में खून की कमी से पीड़ित थी।

सरकार का पक्ष

सरकार का आधिकारिक पक्ष भी जान लीजिए इस बारे में। सरकार का कहना है कि:

पुरानी पद्धति में समस्या: एनीमिया को मापने की जो पुरानी पद्धति थी जिसको हम Capillary Blood कहते हैं – उंगली से खून की बूंद ली जाती थी – उसमें सरकार का कहना है कि एरर मार्जिन ज्यादा होता था।

नई पद्धति अपनाई: इसीलिए सरकार अब अधिक सटीक पद्धति यानी Venous Blood यानी नस से खून निकालने के लिए डाटा कलेक्ट कर रही है।

सत्यापन में समय: जिसका सत्यापन करने में समय लग रहा है और सरकार इसे Dietary Goals & Supplement Survey के तहत अब अलग से आंकड़े जारी करेगी।

विपक्ष और विशेषज्ञों की राय

लेकिन साथियों, सिक्के का दूसरा पहलू भी समझिएगा। विपक्ष और कई स्वतंत्र एक्सपर्ट्स का आरोप है कि:

डाटा छुपाना: क्योंकि यह डाटा विकसित भारत के चमकदार तस्वीर पर एक दाग की तरह दिखाई देता, इसीलिए इसे मुख्य रिपोर्ट से अलग कर दिया गया।

अंतर्राष्ट्रीय शर्मिंदगी: क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हम आलोचना से बच सकें।

समझने वाली बात यह है कि प्रक्रियात्मक देरी समझ में आती है। लेकिन डाटा ट्रांसपेरेंसी लोकतंत्र की पहली शर्त है। जब तक आप बीमारी को ही नहीं स्वीकार करेंगे तब तक आप उसका इलाज करेंगे कैसे?

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कुपोषण का दुष्टचक्र

कई लोग पूछते हैं कि सर सरकार तो मुफ्त अनाज दे रही है और राशन लगातार मिल रहा है कोविड के समय से। फिर कुपोषण क्यों है?

तो साथियों, यहां पर हमें समझना होगा कि विशियस साइकिल ऑफ मालन्यूट्रिशन (Vicious Cycle of Malnutrition) होता क्या है?

कुपोषण का चक्र:

  1. गरीबी → खराब पोषण
  2. खराब पोषण → कमजोर स्वास्थ्य
  3. कमजोर स्वास्थ्य → शिक्षा प्रभावित
  4. शिक्षा कमजोर → कम आय
  5. कम आय → फिर गरीबी

दोस्तों, यह चक्र पीढ़ी दर पीढ़ी चलता है। एक कुपोषित मां एक कमजोर बच्चे को जन्म देती है। वह बच्चा स्कूल में ध्यान नहीं लगा पाता क्योंकि उसका दिमाग उतना विकसित नहीं है।

केलोरी vs पोषण

इसीलिए नीति निर्माताओं को यह समझना होगा कि कुपोषण का इलाज सिर्फ गेहूं और चावल बांटने से नहीं होगा। कैलोरी और पोषण में जमीन आसमान का अंतर होता है।

पेट भर जाना एक अलग बात है और शरीर को आवश्यक विटामिंस, मिनरल्स और प्रोटीन मिलना बहुत आवश्यक है।

वैश्विक तुलना

अगर गौर करें तो ग्लोबल ट्रेंड देखिए। यूरोप के विकसित देशों की बात करें या जापान या साउथ कोरिया की बात करें तो:

  • वहां बाल कुपोषण दर सिंगल डिजिट में 1% से 3% के बीच है
  • वहां मानव विकास सूचकांक 0.9 से ऊपर है

यदि हम खुद को उस कतार में खड़ा होते देखना चाहते हैं तो हमें अपनी प्राथमिकताओं को बदलना होगा।

समाधान क्या है?

1. फूड फोर्टिफिकेशन: राशन में मिलने वाले गेहूं और चावल में आयरन, विटामिंस B12 और फोलिक एसिड अनिवार्य रूप से मिलाया जाना चाहिए।

2. आंगनबाड़ी 2.0: देश की आंगनबाड़ियों को केवल खाना बांटने के केंद्र के तौर पर ना डेवलप किया जाए। उन्हें अर्ली चाइल्डहुड केयर और हेल्थ ट्रेनिंग सेंटर्स में बदला जाना चाहिए।

3. मैटरनल हेल्थ: कुपोषण की शुरुआत वस्तुतः गर्भ से हो जाती है। इसीलिए गर्भवती महिलाओं और किशोरियों के पोषण पर फोकस।

4. डाटा पारदर्शिता: एनीमिया हो या स्टंटिंग हो, सरकार को बिना किसी हिचकिचाहट के हर महीने या हर तिमाही पर डाटा डैशबोर्ड लाइव करना चाहिए।

मुख्य बातें (Key Points)
  • NFHS-6 में हर तीसरा बच्चा (33-35%) आज भी कुपोषित
  • एनीमिया का डाटा पूरी तरह गायब, सरकार अलग सर्वे करेगी
  • कुपोषण का दुष्टचक्र पीढ़ी दर पीढ़ी चलता है
  • सिर्फ राशन बांटना काफी नहीं, पोषण युक्त भोजन जरूरी
  • विकसित भारत के लिए स्वस्थ बच्चे अनिवार्य

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: NFHS-6 में एनीमिया डाटा क्यों नहीं है?

सरकार का कहना है कि पुरानी पद्धति (Capillary Blood) में त्रुटि थी। अब नई पद्धति (Venous Blood) से डाटा एकत्र कर रहे हैं जो अलग सर्वे में जारी होगा।

प्रश्न 2: कुपोषण और भूख में क्या अंतर है?

भूख का मतलब कैलोरी की कमी है जबकि कुपोषण का मतलब विटामिन, मिनरल्स, प्रोटीन जैसे पोषक तत्वों की कमी है। पेट भरा हो सकता है लेकिन शरीर कुपोषित हो सकता है।

प्रश्न 3: क्या मुफ्त राशन से कुपोषण खत्म नहीं होगा?

नहीं, सिर्फ गेहूं-चावल से कुपोषण नहीं रुकेगा। फोर्टिफाइड अनाज, दालें, फल, सब्जियां, अंडे, दूध जैसे पोषक आहार जरूरी हैं।

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पत्रकारिता में एक दशक से अधिक का ठोस अनुभव रखने वाले अजय कुमार 'शोर से ज़्यादा सार' की पत्रकारिता पर दृढ़ विश्वास करते हैं। वर्तमान में वे The News Air में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं, जहां वे समाचारों की रणनीति, लेखन, तथ्य-सत्यापन (Fact-Checking) और सटीक प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं।पत्रकारिता का सफर और अनुभव - अजय कुमार का करियर ग्राउंड ज़ीरो की रिपोर्टिंग से लेकर न्यूज़ डेस्क के कुशल प्रबंधन तक विस्तृत है। The News Air में पिछले 3 वर्षों से नेतृत्व करने से पहले, उन्होंने 'दैनिक जागरण' और 'सिटी न्यूज़' जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। पत्रकारिता में उनकी मजबूत शैक्षणिक पृष्ठभूमि ने उनके काम करने के तरीके को बेहद व्यावहारिक और तथ्य-आधारित बनाया है।विशेषज्ञता और कार्यक्षेत्र (Expertise & Beats) - वे जटिल राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को सरल भाषा, स्पष्ट तथ्यों और निष्पक्ष तरीके से पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं। उनकी पत्रकारिता की मुख्य विशेषज्ञता इन क्षेत्रों में है:राजनीतिक कवरेज: लोकसभा चुनावों और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की ग्राउंड और डेस्क रिपोर्टिंग।कानूनी और संसदीय खबरें: संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों की नियमित और रियल-टाइम कवरेज।खोजी पत्रकारिता: ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ रिपोर्टिंग के जरिए अंदरूनी खबरों की पड़ताल।विश्वसनीयता और डिजिटल योगदान (Trust & Authority) - सटीक और प्रामाणिक ख़बरों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें पाठकों के बीच एक विश्वसनीय पत्रकार बनाती है। डिजिटल न्यूज़ इकोसिस्टम को बेहतर बनाने और फेक न्यूज़ से लड़ने की दिशा में, अजय कुमार गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

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