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The News Air - Breaking News - NEET Computer Based Exam का बड़ा फैसला! Normalisation से परेशान होंगे छात्र

NEET Computer Based Exam का बड़ा फैसला! Normalisation से परेशान होंगे छात्र

पेपर लीक रोकने के लिए NEET अब होगा ऑनलाइन, लेकिन Normalisation की प्रक्रिया लाएगी नई चुनौतियां

अभिनव कश्यप by अभिनव कश्यप
गुरूवार, 28 मई 2026
in Breaking News, NEWS-TICKER, राष्ट्रीय
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NEET Computer Based Exam
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NEET Computer Based Exam: पेपर लीक के बढ़ते मामलों को देखते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने एक बड़ा फैसला लिया है। अब NEET (National Eligibility cum Entrance Test) की परीक्षा कंप्यूटर बेस्ड एग्जामिनेशन (CBT) के रूप में कराई जाएगी। पारंपरिक पेन-पेपर मोड को अलविदा कहते हुए अब ऑनलाइन परीक्षा का दौर शुरू होने जा रहा है। लेकिन इस फैसले के साथ ही एक नया सिरदर्द भी आया है – नॉर्मलाइजेशन यानी मानकीकरण।

देखा जाए तो यह बदलाव पेपर लीक जैसी गंभीर समस्याओं का समाधान तो है, लेकिन साथ ही यह लाखों छात्रों के लिए नई चुनौतियां भी लेकर आ रहा है। खासकर नॉर्मलाइजेशन की प्रक्रिया को लेकर परीक्षार्थी हमेशा से परेशान रहे हैं। आज हम विस्तार से समझेंगे कि आखिर यह नॉर्मलाइजेशन है क्या और क्यों यह इतना विवादित मुद्दा बन जाता है।

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क्यों लिया गया NEET को ऑनलाइन करने का फैसला?

बीते कुछ सालों में NEET परीक्षा में पेपर लीक के मामले लगातार सामने आए हैं। इन घटनाओं ने न केवल परीक्षा की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए बल्कि NTA (National Testing Agency) की साख भी दांव पर लग गई। लाखों मेहनती छात्रों के सपने पेपर लीक की भेंट चढ़ते रहे।

ऐसे में कंप्यूटर बेस्ड एग्जामिनेशन को एक विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। सरकार का मानना है कि डिजिटल मोड अपनाने से कई समस्याओं पर काबू पाया जा सकता है। ओएमआर शीट की छेड़छाड़, पेपर के परिवहन के दौरान होने वाली गड़बड़ियां और संचालन संबंधी कमजोरियां – सब कुछ खत्म हो सकता है।

हालांकि 21 जून को फिर से परीक्षा होनी है उन छात्रों के लिए जिनका पेपर लीक हो गया था। लेकिन अगले साल से पूरी तरह कंप्यूटर बेस्ड एग्जाम होगा। यह बदलाव क्रांतिकारी तो है, पर चुनौतियों से भरा भी।

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पेन-पेपर मोड में कैसे होती थी परीक्षा?

पारंपरिक पेन-पेपर मेथड काफी सीधा-सरल था। सभी छात्रों को एक ही प्रश्न पत्र मिलता था। एक ही सत्र में पूरी परीक्षा संपन्न हो जाती थी। छात्रों को ओएमआर शीट दी जाती थी जिस पर वे अपने उत्तर काले या नीले पेन से भरते थे।

दिलचस्प बात यह है कि NEET की ओएमआर शीट के नीचे कार्बन कॉपी लगी होती है। परीक्षा खत्म होने के बाद यह कॉपी छात्रों को दे दी जाती है। फिर वे घर जाकर अपनी answer key से मिलान कर सकते हैं और अनुमानित स्कोर निकाल सकते हैं।

यह व्यवस्था पारदर्शी थी। सभी के लिए समान थी। लेकिन पेपर लीक और ओएमआर में हेराफेरी की घटनाओं ने इस पर सवाल खड़े कर दिए। इसी वजह से अब बदलाव की जरूरत महसूस हुई।

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कंप्यूटर बेस्ड एग्जामिनेशन कैसे काम करता है?

अब बात करते हैं CBT यानी Computer Based Test की। यहां चीजें थोड़ी जटिल हो जाती हैं। सबसे पहली बात – यह परीक्षा एक ही बार में नहीं होती। कई अलग-अलग सत्रों में, अलग-अलग दिनों में कराई जाती है।

और हर सत्र के लिए एक अलग प्रश्न पत्र होता है। सोचिए, 20 अलग सत्र मतलब 20 अलग प्रश्न पत्र। यहीं से असली समस्या शुरू होती है।

अगर गौर करें तो दो प्रश्न पत्र कभी भी बिल्कुल समान कठिनाई स्तर के नहीं हो सकते। एक सत्र का पेपर थोड़ा आसान हो सकता है तो दूसरे का मुश्किल। अब सवाल उठता है – कैसे तय होगा कि किस छात्र का प्रदर्शन बेहतर रहा?

यहीं पर आता है Normalisation यानी मानकीकरण का कॉन्सेप्ट। आपके वास्तविक अंक मायने नहीं रखते। जो मायने रखता है वह है आपका Percentile Score। और उसी के आधार पर आपकी रैंक तय होती है।

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24 लाख छात्रों की परीक्षा कैसे होगी ऑनलाइन?

यहां सबसे बड़ी चुनौती तकनीकी बुनियादी ढांचे की है। पिछली बार जब NEET हुआ था तो लगभग 24 लाख परीक्षार्थियों ने परीक्षा दी थी। यह संख्या बेहद विशाल है।

समझने वाली बात यह है कि भारत में अभी जो आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध है, उसमें एक बार में केवल 1.2 लाख छात्र ही कंप्यूटर बेस्ड एग्जाम दे सकते हैं। इससे ज्यादा की क्षमता नहीं है।

अब गणित लगाइए। 24 लाख छात्रों को 1.2 लाख की क्षमता में बांटें तो लगभग 20 सत्र लगेंगे। मतलब 20 अलग-अलग दिनों में, 20 अलग-अलग समय पर परीक्षा होगी। और हर बार एक नया प्रश्न पत्र।

विवरणसंख्या
कुल परीक्षार्थी24 लाख
प्रति सत्र क्षमता1.2 लाख
आवश्यक सत्रलगभग 20
प्रश्न पत्र20 अलग-अलग

यही है असली चुनौती। इतने बड़े पैमाने पर कंप्यूटर बेस्ड परीक्षा कराना और फिर सबको एक समान आधार पर परखना – यह कोई आसान काम नहीं है।

Normalisation यानी मानकीकरण क्या होता है?

चलिए अब विस्तार से समझते हैं कि यह नॉर्मलाइजेशन आखिर है क्या। जैसा कि मैंने बताया, अलग-अलग सत्रों में अलग-अलग कठिनाई स्तर के पेपर होते हैं। तो सबको एक बराबर तराजू पर कैसे तौला जाए?

इसी समस्या का समाधान है नॉर्मलाइजेशन। यह एक सांख्यिकीय प्रक्रिया है जो अलग-अलग प्रश्न पत्रों की कठिनाई के अंतर को समायोजित करती है।

पहला चरण – Percentile Score निकालना:

मान लीजिए आपने 150 अंक प्राप्त किए। अब यह देखा जाएगा कि आपके सत्र में कितने प्रतिशत छात्रों ने आपसे कम या बराबर अंक प्राप्त किए। अगर 85% छात्रों ने आपसे कम अंक लिए तो आपका percentile 85 होगा।

यह तुलना केवल आपके अपने सत्र के छात्रों से की जाती है, पूरे देश से नहीं। यह पहला स्तर है।

दूसरा चरण – सभी सत्रों को समान करना:

अब सभी 20 सत्रों के percentile scores को एक समान पैमाने पर लाया जाता है। एक जटिल सांख्यिकीय फॉर्मूला लगाया जाता है। इससे आपका अंतिम स्कोर बनता है जिसे NTA Score कहते हैं।

और यही NTA Score आपकी अंतिम रैंक तय करता है। यही देखा जाता है कि आप चयनित होंगे या नहीं।

Normalisation में क्या-क्या परेशानियां हैं?

अब आते हैं असली मुद्दे पर। यह नॉर्मलाइजेशन सुनने में तो बहुत वैज्ञानिक लगता है, लेकिन छात्रों के लिए यह बहुत बड़ा सिरदर्द है।

पहली समस्या – सत्यापन असंभव:

कोई भी छात्र स्वतंत्र रूप से यह verify नहीं कर सकता कि उसे जो percentile दिया गया, वह सही है या नहीं। NTA जो स्कोर बताता है, बस उसे मान लेना पड़ता है। कोई पारदर्शिता नहीं।

आप खुद से गणना नहीं कर सकते। फॉर्मूला सार्वजनिक नहीं है। पूरी प्रक्रिया एक ब्लैक बॉक्स की तरह है। यह विश्वास का बहुत बड़ा मुद्दा है।

दूसरी समस्या – अनिश्चितता:

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एक मार्क का भी अंतर हजारों रैंक का अंतर पैदा कर सकता है। मान लीजिए दो छात्र हैं। एक ने 710 अंक लिए किसी सत्र में और दूसरे ने 680 अंक दूसरे सत्र में।

ऐसा भी हो सकता है कि normalisation के बाद 680 वाला 710 वाले से ऊपर चला जाए। क्यों? क्योंकि हो सकता है पहले सत्र का पेपर आसान था और दूसरे का मुश्किल।

तो आपकी मेहनत से ज्यादा मायने रखता है कि आपको कौन सा पेपर मिला। यह लकी ड्रॉ जैसा हो जाता है। बहुत निराशाजनक।

तीसरी समस्या – पारदर्शिता का अभाव:

किस सत्र को कितना मुश्किल माना गया? किस फॉर्मूले का इस्तेमाल हुआ? ये सब बातें छात्रों को नहीं बताई जातीं। सब कुछ परदे के पीछे होता है।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि सांख्यिकीय स्पष्टता बिल्कुल नहीं है। कहीं कोई डेटा publish नहीं होता। छात्रों को अंधेरे में रखा जाता है।

JEE में तो Normalisation होता है, NEET में क्यों दिक्कत?

अब सवाल उठता है कि JEE (Joint Entrance Examination) तो पहले से ही कंप्यूटर बेस्ड है और वहां normalisation होता है। फिर NEET में क्या खास दिक्कत है?

दरअसल पैमाना बहुत अलग है। JEE में परीक्षार्थियों की संख्या NEET से कम होती है। इंफ्रास्ट्रक्चर बेहतर है। सत्रों की संख्या कम होती है।

लेकिन NEET में 24 लाख छात्र हैं। 20 सत्रों की जरूरत है। प्रत्येक सत्र के लिए अलग कठिनाई स्तर का पेपर तैयार करना बेहद मुश्किल है। थोड़ी सी भी गड़बड़ी हजारों छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ कर सकती है।

इसके अलावा NEET मेडिकल प्रवेश परीक्षा है। यहां प्रतिस्पर्धा बहुत तीव्र है। एक-एक अंक का महत्व बहुत ज्यादा है। इसलिए normalisation को लेकर चिंताएं भी ज्यादा हैं।

क्या फायदे हैं Computer Based Exam के?

हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। तो चलिए बात करते हैं कि CBT के क्या-क्या फायदे हो सकते हैं।

पेपर लीक पर रोक:

सबसे बड़ा फायदा यही है। एन्क्रिप्टेड डिजिटल सिस्टम से प्रश्न पत्र deliver होगा। कागज का कोई चक्कर नहीं। इससे लीक होने की संभावना बेहद कम हो जाती है।

ओएमआर छेड़छाड़ खत्म:

अब कोई ओएमआर शीट नहीं होगी तो उसमें छेड़छाड़ का सवाल ही नहीं। सब कुछ डिजिटल रूप से रिकॉर्ड होगा। केंद्रीकृत नियंत्रण होगा।

लॉजिस्टिक समस्याएं कम:

लाखों प्रश्न पत्र छापने, उन्हें सुरक्षित परिवहन करने, फिर ओएमआर शीट्स को वापस लाने – यह सब बहुत बड़ा लॉजिस्टिक काम है। CBT में यह सब खत्म।

डिजिटल सुरक्षा:

सारे सेंटर्स की डिजिटल रिकॉर्डिंग होगी। संचालन संबंधी सुरक्षा बेहतर होगी। चीजें ज्यादा सुरक्षित रहेंगी।

पहलूपेन-पेपरकंप्यूटर बेस्ड
पेपर लीक जोखिमउच्चनिम्न
ओएमआर छेड़छाड़संभवअसंभव
लॉजिस्टिकजटिलसरल
पारदर्शिताअधिककम (normalisation के कारण)
तकनीकी निर्भरतानहींपूर्ण
तकनीकी अवसंरचना की कमी

अब एक और बड़ा मुद्दा है – क्या भारत तैयार है इतने बड़े पैमाने पर CBT कराने के लिए? जवाब थोड़ा निराशाजनक है।

हमारे पास एक बार में केवल 1.2 लाख छात्रों को बिठाने की क्षमता है। 24 लाख के लिए 20 सत्र चाहिए। यह बहुत बड़ी चुनौती है।

छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में कंप्यूटर सेंटर्स की कमी है। बिजली की समस्या है। इंटरनेट कनेक्टिविटी का मुद्दा है। हर जगह समान सुविधाएं नहीं हैं।

यह भी देखने वाली बात है कि सभी छात्र कंप्यूटर से सहज नहीं हैं। खासकर ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों के लिए यह एक नई चुनौती होगी। उन्हें अतिरिक्त तैयारी की जरूरत होगी।

विश्वास का संकट

और शायद सबसे बड़ा मुद्दा है – विश्वास। NTA की साख पहले ही पेपर लीक मामलों में खराब हो चुकी है। अब अगर normalisation में भी कोई गड़बड़ी हुई तो?

छात्रों और अभिभावकों को यह भरोसा दिलाना होगा कि नई व्यवस्था पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी है। लेकिन अभी तक जो जानकारी आई है, वह बहुत आश्वस्त करने वाली नहीं है।

डिजिटल मोड भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। पहले भी ऑनलाइन परीक्षाओं में धोखाधड़ी के मामले सामने आए हैं। तो क्या गारंटी है कि NEET में ऐसा नहीं होगा?

आगे क्या होगा?

फिलहाल सरकार ने फैसला ले लिया है। अगले साल से NEET कंप्यूटर बेस्ड होगा। अब छात्रों को इसी के लिए तैयार रहना होगा।

लेकिन कुछ सवाल अभी भी अनुत्तरित हैं। Normalisation का फॉर्मूला क्या होगा? क्या इसे सार्वजनिक किया जाएगा? छात्र अपने स्कोर को कैसे verify कर सकेंगे?

तकनीकी अवसंरचना कैसे बढ़ाई जाएगी? 20 सत्रों में समान कठिनाई के पेपर कैसे सुनिश्चित होंगे? ग्रामीण छात्रों के लिए क्या विशेष व्यवस्था होगी?

ये सारे सवाल हैं जिनके जवाब जल्द मिलने चाहिए। वरना यह बदलाव समस्या का समाधान कम, नई समस्याओं का स्रोत ज्यादा बन जाएगा।

छात्रों के लिए सुझाव

इस पूरी स्थिति में छात्रों को क्या करना चाहिए? सबसे पहली बात – घबराएं नहीं। जो भी व्यवस्था हो, मेहनत का कोई विकल्प नहीं है।

कंप्यूटर बेस्ड परीक्षा की प्रैक्टिस शुरू कर दें। ऑनलाइन मॉक टेस्ट दें। समय प्रबंधन पर काम करें। स्क्रीन पर लंबे समय तक प्रश्न पढ़ने की आदत डालें।

Normalisation को लेकर ज्यादा चिंता न करें। आप इसे control नहीं कर सकते। बस अपनी तैयारी पर फोकस करें। जितने अच्छे अंक लाएंगे, percentile अपने आप अच्छा बनेगा।

और सबसे जरूरी – आवाज उठाएं। अगर normalisation प्रक्रिया में पारदर्शिता चाहिए तो मांग करें। छात्र संगठनों के माध्यम से सरकार पर दबाव बनाएं। यह आपका भविष्य है, आपको इसकी परवाह करनी ही चाहिए।


मुख्य बातें (Key Points)

• NEET परीक्षा अगले साल से Computer Based Exam के रूप में होगी, पेपर लीक रोकने के लिए

• 24 लाख छात्रों के लिए लगभग 20 अलग सत्रों की जरूरत होगी क्योंकि infrastructure सीमित है

• Normalisation प्रक्रिया से छात्रों का अंतिम स्कोर percentile के आधार पर तय होगा, न कि वास्तविक अंकों से

• सबसे बड़ी चुनौती पारदर्शिता की कमी है – छात्र स्वतंत्र रूप से अपना percentile verify नहीं कर सकते

• तकनीकी अवसंरचना की कमी और ग्रामीण क्षेत्रों में सुविधाओं का अभाव बड़ी समस्या है

• Computer Based Exam से पेपर लीक और ओएमआर छेड़छाड़ पर तो रोक लगेगी, लेकिन निष्पक्षता सुनिश्चित करना चुनौती होगी


FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: NEET Computer Based Exam कब से शुरू होगा?

उत्तर: केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने घोषणा की है कि अगले वर्ष यानी 2026 से NEET परीक्षा कंप्यूटर बेस्ड एग्जामिनेशन मोड में कराई जाएगी। हालांकि 21 जून 2025 को होने वाली री-एग्जाम अभी भी पेन-पेपर मोड में ही होगी। पूर्ण रूप से CBT मोड की शुरुआत 2026 की NEET परीक्षा से होगी।

प्रश्न 2: Normalisation में अगर किसी छात्र को कम अंक मिलें फिर भी रैंक अच्छी आ सकती है?

उत्तर: हां, बिल्कुल। Normalisation में आपके वास्तविक अंक नहीं बल्कि percentile मायने रखता है। अगर आपको मुश्किल पेपर मिला और आपने 680 अंक लिए, लेकिन आपके सत्र में सबने कम स्कोर किया, तो आपका percentile ऊंचा होगा। वहीं किसी ने आसान पेपर में 710 लिए तो उसका percentile कम हो सकता है। इसलिए कम अंकों में भी बेहतर रैंक संभव है।

प्रश्न 3: क्या Computer Based NEET में धोखाधड़ी नहीं हो सकती?

उत्तर: यह पूरी तरह सुरक्षित नहीं कहा जा सकता। हालांकि एन्क्रिप्टेड डिजिटल सिस्टम और केंद्रीकृत नियंत्रण से पेपर लीक की संभावना बहुत कम हो जाती है, लेकिन डिजिटल मोड में भी साइबर हमले, सर्वर हैकिंग या technical glitches की संभावना रहती है। इसलिए सरकार को बहुत मजबूत सुरक्षा व्यवस्था बनानी होगी। पूर्ण गारंटी तभी मिलेगी जब पहली परीक्षा सफलतापूर्वक संपन्न हो।

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अभिनव कश्यप

अभिनव कश्यप 'The News Air' के संस्थापक और मुख्य संपादक (Chief Editor) हैं। डिजिटल मीडिया में उनके अनुभव में ग्राउंड रिपोर्टिंग, न्यूज़ डेस्क ऑपरेशन और एडिटोरियल लीडरशिप शामिल है। वे हर खबर की फैक्ट-चेकिंग और संपादन की व्यक्तिगत रूप से निगरानी करते हैं। राजनीति, चुनाव विश्लेषण, सामाजिक मुद्दे और डिजिटल मीडिया ट्रेंड्स उनकी विशेषज्ञता के प्रमुख क्षेत्र हैं। अभिनव का संपादकीय सिद्धांत है "सनसनी नहीं, सच्चाई; तेज़ी नहीं, तथ्य।"

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