Bhojshala Temple Dispute: धार की धरती पर 11वीं शताब्दी में जब राजा भोज ने संस्कृत विद्या का वह भव्य केंद्र बनवाया था, तब किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि यह जगह सदियों बाद एक लंबे कानूनी संघर्ष का केंद्र बन जाएगी। 15 मई 2026 को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने जो फैसला सुनाया, उसने न सिर्फ इतिहास के पन्नों को पलटा, बल्कि विज्ञान, पुरातत्व और न्याय का एक अनूठा संगम पेश किया।
जस्टिस विनय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की पीठ ने 242 पन्नों के अपने निर्णय में स्पष्ट घोषित किया कि भोजशाला वास्तव में मां सरस्वती (वाग देवी) का मंदिर था, जिसे परमार राजवंश के महान शासक राजा भोज ने 1034 ईस्वी में बनवाया था। और बस यहीं से शुरू हुई असली कहानी – एक ऐसी कहानी जो 1034 से लेकर 2026 तक लगभग एक हजार साल के इतिहास को समेटे हुए है।
राजा भोज का सपना: जब धार बना ज्ञान का केंद्र
11वीं शताब्दी में मध्य प्रदेश का धार जिला परमार राजवंश की राजधानी हुआ करता था। यहां के शासक राजा भोज (1010-1055 ईस्वी) केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि एक ‘फिलॉसफर किंग’ थे। कला, विज्ञान, साहित्य, ज्योतिष, वास्तु, आयुर्वेद – हर क्षेत्र में उनकी महारत थी।
दिलचस्प बात यह है कि राजा भोज को कई संस्कृत ग्रंथों का लेखक माना जाता है। श्रृंगार प्रकाश, समरांगण सूत्रधार जैसी महत्वपूर्ण किताबें उन्हीं की देन हैं। ज्ञान के प्रति उनका प्रेम इतना गहरा था कि उन्होंने 1034 ईस्वी में धार नगर में एक विशाल संस्कृत पाठशाला और सरस्वती मंदिर का निर्माण कराया।
इस मंदिर को शारदा सदन भी कहा जाता था। वाग देवी मंदिर भी कहा जाता था। यहां भारत भर से विद्यार्थी और विद्वान संस्कृत, व्याकरण, ज्योतिष और दर्शन का ज्ञान लेने आते थे।
समझने वाली बात यह है कि यह केवल पाठशाला नहीं थी। यह विद्या और भक्ति दोनों का संगम था। धीरे-धीरे इस विद्यापीठ को “भोजशाला” नाम मिला।
मालवा की रानी: धार का वैभव और भोजशाला की महिमा
उस दौर में धार को ‘क्वीन ऑफ मालवा’ – मालवा की रानी कहा जाता था। पूरे नगर को ग्रिड पैटर्न में बसाया गया था, और भोजशाला ठीक केंद्र में थी। 84 चौराहों के बीचोंबीच स्थित यह परिसर शहर का आभूषण माना जाता था।
यहां के स्तंभों पर उकेरे गए शिलालेख इसकी विशेषता थे। सर्पाकार (नागकार) शिलालेख मिलते हैं जिनमें संस्कृत वर्णमाला और व्याकरण के नियमों को सांप की आकृति में दर्शाया गया है। कितना अद्भुत होगा वह दृश्य जब स्तंभों पर संस्कृत के दस काल (tenses) उकेरे गए हों!
एक पत्थर की शिला पर परिजात मंजरी नामक नाटक की पूरी रचना खुदी हुई मिली थी। इसे रॉयल ट्यूटर मदन (जिन्हें बाला सरस्वती भी कहा जाता था) ने लिखा था। शिलालेख के प्रस्तावना में साफ लिखा है कि यह नाटक सरस्वती मंदिर में प्रदर्शित किया जाता था।
तूफान से पहले की शांति: परमार वंश के बाद के शासक
राजा भोज के बाद उनके वंशज उदयादित्य, नरवर्मन और अर्जुनवर्मन ने इस संस्था को संरक्षण दिया। अर्जुनवर्मन के काल (1210-1215 ईस्वी) में यहां परिजात मंजरी नाटक का मंचन होता था। भोजशाला सांस्कृतिक केंद्र के रूप में फल-फूल रही थी।
लेकिन इतिहास का पहिया घूमने वाला था।
1305: अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण और विनाश की शुरुआत
1305 ईस्वी के आसपास अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा पर आक्रमण किया। उस समय धार में राजा महाकाल देव का शासन था। युद्ध में राजा और उनके सैनिकों का बलिदान हुआ।
हिंदू पक्ष का दावा है कि इस आक्रमण के दौरान भोजशाला में पढ़ाई कर रहे करीब 1200 छात्रों और विद्वानों को मार डाला गया क्योंकि उन्होंने इस्लाम स्वीकार करने से इनकार कर दिया था।
हालांकि मुस्लिम पक्ष इस नरसंहार के दावे को ऐतिहासिक रिकॉर्ड की कमी के कारण विवादित मानता है। लेकिन एक बात पर सभी की सहमति है – खिलजी के समय में ही मंदिर को मस्जिद में बदलने की प्रक्रिया शुरू हो गई थी।
मंदिर से मस्जिद तक का सफर: तीन शासकों का योगदान
अलाउद्दीन खिलजी के गवर्नर एन उल मुल्क मुल्तानी ने सबसे पहले यहां कमाल मौला की दरगाह बनवाई। दरअसल, उस समय धार में एक प्रसिद्ध चिश्ती सूफी संत कमाल अल दीन चिश्ती (जिन्हें कमाल मौला कहा जाता था) थे। उनकी याद में यह दरगाह बनाई गई।
इसके बाद 1401 में दिलावर खान गौरी मालवा का सुल्तान बना। उसने इस दरगाह के आसपास मस्जिद का निर्माण शुरू किया और उसका विस्तार किया।
फिर 1514 में महमूद शाह खिलजी ने मस्जिद में और बड़े बदलाव किए। इस तरह भोजशाला को पूरी तरह से कमाल मौला मस्जिद का रूप दे दिया गया।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि मंदिर की संरचना को पूरी तरह नष्ट नहीं किया गया, बल्कि उसी के ऊपर और उसी के पत्थरों से मस्जिद बना दी गई।
अंग्रेजों की दिलचस्पी: खजाने की खोज और लूट
19वीं शताब्दी में ब्रिटिश अधिकारियों की नजर धार के इन खंडहरों पर पड़ी। 1822 में जॉन मैल्कम (ब्रिटिश सेना अधिकारी और गवर्नर) ने धार का दौरा किया और यहां से कई शिलालेख एकत्र किए।
लेकिन सबसे बड़ा विवाद वाग देवी की मूर्ति को लेकर हुआ।
1875 में ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट विलियम किनकेड को यहां उत्खनन और सफाई का आदेश मिला। अंग्रेज समझ चुके थे कि यह ऐतिहासिक खजाने से भरी जगह है। उत्खनन के दौरान एक अत्यंत सुंदर मूर्ति मिली – वाग देवी की प्रतिमा।
किनकेड के परिवार ने इस मूर्ति को चोरी के खजाने की तरह 1886 से 1891 के बीच लंदन भेज दिया। आज भी यह मूर्ति ब्रिटिश म्यूजियम में रखी हुई है।
हिंदू याचिकाकर्ताओं का दावा है कि यह वही वाग देवी (मां सरस्वती) की मूर्ति है जो राजा भोज ने स्थापित की थी।
1902: KK लेले की खोज और भोजशाला की पहचान
1902 में एक महत्वपूर्ण घटना घटी। धार के शिक्षा अधीक्षक काशीनाथ कृष्ण लेले (KK Lele) ने कमाल मौला मस्जिद का दौरा किया। मस्जिद के फर्श पर उन्हें कुछ ढीली पत्थर की शिलाएं दिखीं।
जब उन शिलाओं को उठाया गया, तो नीचे संस्कृत में व्याकरण के चार्ट और श्लोक लिखे मिले। ये वही प्रसिद्ध नागकर्णिका (सर्पाकार) शिलालेख थे, जिन पर आज विद्वान शोध पत्र लिखते हैं।
लेले ने पहली बार इन शिलालेखों को राजा भोज की संस्कृत पाठशाला से जोड़ा और इस परिसर को “लॉस्ट भोजशाला” (खोई हुई भोजशाला) के रूप में पहचाना।
1902 में यह खुलासा हुआ और 1904 में ब्रिटिश सरकार ने इस पूरी जगह को Monument of National Importance (राष्ट्रीय महत्व का स्मारक) घोषित कर दिया।
1930-2003: सांप्रदायिक तनाव और मंगलवार-शुक्रवार का फॉर्मूला
1930 के दशक से सांप्रदायिक तनाव बढ़ने लगा। हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय यहां प्रार्थना करने का दावा करने लगे।
1930 के मध्य में धार राज्य के दीवान बहादुर के नटकर ने 13 जून 1935 को एक घोषणा जारी की। इस घोषणा में परिसर को मस्जिद घोषित किया गया और मुसलमानों को नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई। साथ ही “भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद” नाम का साइन बोर्ड लगाने की अनुमति मिली।
अगर गौर करें, तो 2026 की हाल की कार्यवाही में एडवोकेट जनरल प्रशांत सिंह ने यही तर्क दिया कि 1935 की घोषणा केवल एक प्रशासनिक आदेश था, और संविधान लागू होने के बाद इसकी कोई कानूनी वैधता नहीं रही क्योंकि यह मौलिक अधिकारों के खिलाफ था।
1947 में आजादी मिली। 1951 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल अधिनियम के तहत इसे अपने सीधे नियंत्रण में ले लिया।
1950 के दशक में कई प्रलेखित घटनाएं हुईं – 1952 में हिंदुओं ने भोज दिवस मनाया, 1953 में मुसलमानों ने उर्स मनाया। लेकिन रोजाना पूजा या नमाज की आधिकारिक अनुमति किसी को नहीं थी।
1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद भोजशाला मुद्दा फिर गर्म हो गया। हिंदू संगठनों ने भोजशाला की मुक्ति की मांग तेज कर दी।
2003 का टर्निंग पॉइंट:
बसंत पंचमी (सरस्वती पूजा) उस साल शुक्रवार को पड़ी। हिंदू पूरा दिन पूजा करना चाहते थे, मुसलमान जुम्मे की नमाज पढ़ना चाहते थे। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार भोजशाला पर करीब 1 लाख से ज्यादा लोगों की भीड़ जमा हो गई। तनाव इतना बढ़ा कि प्रशासन को सख्त कदम उठाने पड़े।
7 अप्रैल 2003 को ASI ने एक प्रशासनिक व्यवस्था बनाई:
| दिन | अनुमति | समय |
|---|---|---|
| मंगलवार (Tuesday) | हिंदू पूजा | सूर्योदय से सूर्यास्त |
| शुक्रवार (Friday) | मुस्लिम नमाज | 1:00 PM से 3:00 PM |
| अन्य दिन | पर्यटकों के लिए खुला | – |
यह “ट्यूसडे-फ्राइडे फॉर्मूला” लगभग दो दशक तक चला। एक अस्थिर शांति बनी रही, लेकिन दोनों पक्ष इससे पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे।
2022: PIL और नई कानूनी लड़ाई की शुरुआत
मई 2022 में Hindu Front for Justice नामक एक ट्रस्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में PIL (जनहित याचिका) दायर की। याचिका में ASI की 7 अप्रैल 2003 की व्यवस्था को चुनौती दी गई।
उनकी मांग थी:
- भोजशाला को मां वाग देवी मंदिर घोषित किया जाए
- हिंदुओं को रोजाना पूजा का अधिकार मिले
11 मार्च 2024: हाई कोर्ट का ऐतिहासिक निर्देश – ASI करे वैज्ञानिक सर्वेक्षण
11 मार्च 2024 को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने एक ऐतिहासिक आदेश दिया। कोर्ट ने ASI को भोजशाला-कमाल मौला परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने का आदेश दिया।
सर्वेक्षण के निर्देश:
- GPR (Ground Penetrating Radar), GPS, कार्बन डेटिंग जैसी नवीनतम तकनीकों का उपयोग
- केवल सतही और गैर-आक्रामक विधियां (non-invasive methods)
- संरचना को कोई क्षति नहीं पहुंचनी चाहिए
- खुदाई नहीं, केवल वैज्ञानिक अध्ययन
मुस्लिम पक्ष (मौला कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी) ने इस सर्वेक्षण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
1 अप्रैल 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने सर्वेक्षण रोकने से इनकार कर दिया, लेकिन दो महत्वपूर्ण निर्देश दिए:
- सर्वेक्षण परिणामों पर सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बिना कोई कार्रवाई नहीं होगी
- किसी भी प्रकार की खुदाई नहीं होगी जो संरचना को बदल दे
22 मार्च – 15 जुलाई 2024: 98 दिन का वैज्ञानिक सर्वेक्षण
22 मार्च 2024 से ASI की विशेष टीम ने काम शुरू किया। टीम में थे:
- पुरातत्वविद (Archaeologists)
- शिलालेख विशेषज्ञ (Epigraphists)
- संरचना इंजीनियर (Structural Engineers)
- वैज्ञानिक (Scientists)
भोजशाला परिसर और 50 से 500 मीटर तक के आसपास के क्षेत्र में 98 दिनों तक सर्वेक्षण चला। 15 जुलाई 2024 को ASI ने 2189 पन्नों की विस्तृत रिपोर्ट सौंपी।
ASI रिपोर्ट की बड़ी खोजें: विज्ञान ने खोला इतिहास का पिटारा
1. वास्तुकला संबंधी साक्ष्य:
रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया कि वर्तमान संरचना पुराने मंदिर के हिस्सों से बनाई गई है। मंदिर को तोड़कर उसके पत्थरों का उपयोग मस्जिद की दीवारों और फर्श में किया गया। यह काम बिना किसी समरूपता के किया गया।
2. मूर्तियां और शिल्पकला:
कुल 94 मूर्तियां और मूर्ति खंड मिले। इन्हें चीनी (छेनी) से काटा गया था, तोड़ा गया था, विकृत किया गया था।
मिली मूर्तियों में शामिल:
- भगवान गणेश (रिद्धि-सिद्धि के साथ)
- ब्रह्मा जी
- नरसिम्ह जी
- भैरव देव
- विष्णु जी
| खोज का प्रकार | संख्या/विवरण | महत्व |
|---|---|---|
| मूर्तियां | 94 (क्षतिग्रस्त) | मंदिर की पुष्टि |
| संस्कृत शिलालेख | कई दर्जन | फारसी/अरबी से पुराने |
| नागकर्णिका शिलालेख | 2+ | संस्कृत व्याकरण का अनूठा प्रदर्शन |
| परिजात मंजरी नाटक | 1 पूर्ण पाठ | सांस्कृतिक केंद्र का प्रमाण |
3. शिलालेख और व्याकरण:
- नागकर्णिका (सर्पाकार) शिलालेख मिले जो परमार काल के हैं
- संस्कृत के दस काल (tenses) दर्शाने वाला शिलालेख
- कूर्म अवतार (कछुआ अवतार) की प्रशंसा में प्राकृत श्लोक
- परिजात मंजरी नाटक का पूर्ण पाठ काले पत्थर पर उकेरा हुआ
- शिलालेख की प्रस्तावना में स्पष्ट उल्लेख कि यह नाटक सरस्वती मंदिर में प्रदर्शित होता था
4. महत्वपूर्ण निष्कर्ष:
देखा जाए तो ASI ने साफ शब्दों में कहा: “मस्जिद बनने से पहले यहां 11वीं शताब्दी का एक विशाल स्मारकीय मंदिर था।”
संस्कृत और प्राकृत शिलालेख फारसी और अरबी लेखों से बहुत पुराने हैं। यह साबित करता है कि यहां संस्कृत परंपरा का गहरा और प्राचीन प्रभाव था।
जनवरी 2026: सुप्रीम कोर्ट की भूमिका और बसंत पंचमी की व्यवस्था
जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए:
- हाई कोर्ट में चल रही भोजशाला याचिका को पुनर्जीवित करने की अनुमति दी
- ASI की सीलबंद रिपोर्ट को खोलकर सभी पक्षों के साथ साझा करने का निर्देश
- अंतिम सुनवाई के लिए हरी झंडी दी
- स्पष्ट निर्देश: संरचना में कोई बदलाव नहीं, यथास्थिति बनाए रखी जाए
उसी साल बसंत पंचमी फिर शुक्रवार को पड़ी। 2003 जैसी हिंसा से बचने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने विस्तृत व्यवस्था की:
- सूर्योदय से सूर्यास्त तक हिंदू पूजा और अनुष्ठान की अनुमति
- 1:00 PM से 3:00 PM तक जुम्मे की नमाज के लिए अलग निर्धारित क्षेत्र
- भारी सुरक्षा व्यवस्था और एंट्री लिस्ट के साथ नियंत्रित प्रवेश
15 मई 2026: 242 पन्नों का ऐतिहासिक फैसला
और फिर आया वह दिन। 15 मई 2026 को जस्टिस विनय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की पीठ ने 242 पन्नों का निर्णय सुनाया।
कोर्ट ने किन आधारों पर फैसला दिया?
- ASI की 2189 पन्नों की वैज्ञानिक रिपोर्ट
- ऐतिहासिक साहित्य और अभिलेख
- सभी साक्ष्यों का बारीकी से अध्ययन
- अयोध्या मामले के कानूनी दृष्टांत (Legal Precedent)
फैसले की मुख्य बातें:
✓ भोजशाला को वाग देवी (मां सरस्वती) मंदिर घोषित किया गया
✓ यह 1034 ईस्वी में राजा भोज द्वारा बनवाया गया था
✓ ASI की 7 अप्रैल 2003 की व्यवस्था को खारिज किया गया
✓ हिंदुओं को धार्मिक अनुष्ठानों का अधिकार दिया गया
✓ ASI को स्मारक का पूर्ण नियंत्रण दिया गया
मुस्लिम समुदाय के लिए कोर्ट का निर्देश:
चिंता का विषय नहीं है। कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार को निर्देश दिया:
- मुस्लिम समुदाय यदि आवेदन करे और सहमत हो
- तो धार जिले में ही एक उपयुक्त बड़ी जमीन आवंटित की जाए
- वहां नई मस्जिद निर्माण के लिए भूमि दी जाए
केंद्र सरकार को निर्देश:
हैरान करने वाली बात यह है कि कोर्ट ने यूनियन गवर्नमेंट (केंद्र सरकार) से कहा:
“लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी मां सरस्वती (वाग देवी) की प्रतिमा को वापस लाने के लिए राजनयिक प्रक्रिया शुरू करें।”
यह निर्देश प्रतीकात्मक और ऐतिहासिक दोनों है। यह मूर्ति 1886-91 में विलियम किनकेड के परिवार द्वारा चुराकर ले जाई गई थी।
फैसले का ऐतिहासिक महत्व क्या है?
सवाल उठता है कि यह निर्णय इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
वैज्ञानिक साक्ष्य आधारित: पहली बार किसी धार्मिक विवाद में इतने बड़े पैमाने पर GPR, कार्बन डेटिंग, संरचनात्मक विश्लेषण जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया गया।
ऐतिहासिक सत्य की स्थापना: विवादित आख्यानों को खारिज कर सीधे पुरातात्विक साक्ष्यों पर निर्भरता।
अयोध्या प्रीसीडेंट: अयोध्या फैसले की तरह यहां भी ASI सर्वेक्षण को आधार बनाया गया।
प्रतीकात्मक न्याय: मूर्ति वापसी का निर्देश औपनिवेशिक लूट को स्वीकार करता है।
आम लोगों पर क्या असर होगा?
राहत की बात यह है कि कोर्ट ने दोनों पक्षों की भावनाओं का सम्मान किया है।
हिंदू समुदाय के लिए:
- धार्मिक अधिकारों की बहाली
- ऐतिहासिक पहचान की मान्यता
- राजा भोज की विरासत का संरक्षण
मुस्लिम समुदाय के लिए:
- वैकल्पिक भूमि की व्यवस्था
- सम्मानजनक समाधान
- कोई जबरन विस्थापन नहीं
पर्यटन और शिक्षा:
- भोजशाला पुनः ज्ञान केंद्र बन सकती है
- पर्यटन में बढ़ोतरी
- संस्कृत अध्ययन को बढ़ावा
विवाद क्यों बना रहेगा?
दिलचस्प बात यह है कि मुस्लिम संगठन इस फैसले को चुनौती दे सकते हैं। कई कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा सकता है।
मुस्लिम पक्ष के तर्क:
- 1935 से मस्जिद के रूप में मान्यता
- 2003 से साझा व्यवस्था चल रही थी
- Places of Worship Act 1991 का उल्लंघन (हालांकि यह ASI द्वारा संरक्षित स्मारक है)
हिंदू पक्ष के तर्क:
- ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्य
- मूल संरचना मंदिर की थी
- जबरन रूपांतरण को मान्यता नहीं मिल सकती
भोजशाला का भविष्य: क्या होगा अब?
अभी तो यह शुरुआत है। फैसले के बाद क्या होगा?
- ASI का पूर्ण नियंत्रण: भोजशाला परिसर का रखरखाव, संरक्षण और प्रबंधन ASI के हाथ में
- धार्मिक अनुष्ठान: हिंदुओं को पूजा का अधिकार, लेकिन ASI के नियमों के तहत
- वाग देवी मूर्ति की वापसी: केंद्र सरकार को ब्रिटेन से बातचीत शुरू करनी होगी (यह एक लंबी प्रक्रिया हो सकती है)
- मुस्लिम समुदाय को वैकल्पिक भूमि: राज्य सरकार को उपयुक्त जमीन आवंटित करनी होगी
- आगे की कानूनी लड़ाई: संभावना है कि मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचे
रोम और काशी की तर्ज पर: धार की ऐतिहासिक विरासत
उम्मीद की किरण यह है कि भोजशाला फिर से ज्ञान का केंद्र बन सकती है। जिस तरह इटली का रोम और भारत की काशी (वाराणसी) को ‘Eternal Cities’ कहा जाता है, उसी तरह धार भी मालवा की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में पुनर्स्थापित हो सकता है।
राजा भोज का सपना था – विद्या और भक्ति का संगम। शायद 1000 साल बाद वह सपना फिर साकार हो।
मुख्य बातें (Key Points)
- मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भोजशाला को वाग देवी (मां सरस्वती) मंदिर घोषित किया
- 1034 ईस्वी में राजा भोज (परमार राजवंश) ने इसे बनवाया था
- ASI के 98 दिन के वैज्ञानिक सर्वेक्षण में 94 क्षतिग्रस्त मूर्तियां, संस्कृत शिलालेख और मंदिर के अवशेष मिले
- 2189 पन्नों की ASI रिपोर्ट के आधार पर 242 पन्नों का निर्णय
- 2003 की ASI व्यवस्था (Tuesday-Friday formula) को खारिज किया गया
- हिंदुओं को धार्मिक अनुष्ठानों का अधिकार दिया गया
- मुस्लिम समुदाय को धार जिले में वैकल्पिक भूमि देने का निर्देश
- केंद्र सरकार को ब्रिटिश म्यूजियम से वाग देवी मूर्ति वापस लाने का निर्देश
- 1305 में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के बाद क्रमिक रूप से मंदिर को मस्जिद में बदला गया था













