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The News Air - Breaking News - Tamil Nadu Floor Test: AIADMK में बड़ा स्प्लिट, 24 विधायकों ने TVK को दिया समर्थन

Tamil Nadu Floor Test: AIADMK में बड़ा स्प्लिट, 24 विधायकों ने TVK को दिया समर्थन

विजय की सरकार को मिले 144 वोट, एडप्पादी पलनीस्वामी की पार्टी में खुला विद्रोह, अब लागू होगा एंटी-डिफेक्शन कानून?

The News Air Team by The News Air Team
गुरूवार, 14 मई 2026
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Tamil Nadu Floor Test
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Tamil Nadu Floor Test: तमिलनाडु की राजनीति में भूचाल आ गया है। बुधवार को विधानसभा में हुए फ्लोर टेस्ट के दौरान एक्टर से मुख्यमंत्री बने सी. जोसेफ विजय की TVK (तमिलगा वेट्री कलगम) सरकार को 144 सदस्यों का भारी समर्थन मिला, जबकि बहुमत के लिए सिर्फ 118 वोट चाहिए थे। लेकिन असली सनसनी तब मची जब AIADMK के 53 विधायकों में से 24 ने पार्टी के व्हिप को दरकिनार करते हुए खुलेआम विजय सरकार के पक्ष में वोट दे दिया।

यह तमिलनाडु की द्रविड़ राजनीति में एक ऐतिहासिक दरार है। एडप्पादी के. पलनीस्वामी (EPS) की पार्टी में खुला विद्रोह हो गया है, और अब सवाल यह है कि क्या ये 24 विधायक एंटी-डिफेक्शन कानून के तहत अपनी सीटें गंवाएंगे, या फिर स्पीकर की कुर्सी पर बैठे TVK के सदस्य इन्हें बचा लेंगे?

देखा जाए तो यह सिर्फ एक विश्वास मत नहीं, बल्कि तमिलनाडु की राजनीति की दिशा तय करने वाला निर्णायक क्षण था। और इस सबके बीच DMK ने वोटिंग से किनारा कर अपनी चाल चल दी।

फ्लोर टेस्ट होता क्या है और क्यों जरूरी था?

अगर गौर करें, तो फ्लोर टेस्ट हमारी संसदीय लोकतंत्र की रीढ़ है। चुनाव जीतना एक बात है, लेकिन विधानसभा के फर्श पर अपना बहुमत साबित करना बिल्कुल अलग। सुप्रीम कोर्ट के बोमई फैसले में साफ कहा गया है कि बहुमत का परीक्षण सदन के भीतर ही होना चाहिए।

तमिलनाडु विधानसभा में कुल 234 सीटें हैं। बहुमत के लिए 118 सदस्यों का समर्थन जरूरी था। चुनाव में TVK को 108 सीटें मिली थीं, जो स्पष्ट बहुमत से कम था। इसी वजह से राज्यपाल ने बार-बार विजय से नंबर्स दिखाने की मांग की थी।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि राज्यपाल की देरी को भी विवादास्पद माना गया। आमतौर पर सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने का पहला मौका मिलता है। लेकिन इस बार राज्यपाल ने काफी समय लिया, जिसे राजनीतिक विरोधियों ने “जानबूझकर की गई देरी” करार दिया।

144 का जादुई आंकड़ा कैसे बना?

समझने वाली बात यह है कि विजय के पास शुरुआत में सिर्फ 108 सीटें थीं, लेकिन फ्लोर टेस्ट में 144 वोट कैसे आए? आइए गणित समझते हैं।

पहली बात, विजय दो सीटों से चुनाव लड़े थे और दोनों जगह जीते। स्वाभाविक है कि उन्हें एक सीट छोड़नी पड़ी। तो 108 से यह 107 हो गया।

दूसरा, जीतने वाली पार्टी अपने ही किसी विधायक को स्पीकर बना देती है। TVK ने भी ऐसा ही किया। तो एक और सीट गई। अब 106 बचे।

तीसरा, TVK के एक विधायक सिर्फ एक वोट से जीते थे, जिसे कोर्ट में चुनौती दी गई। उनका वोट भी नहीं गिना गया। अब 105 रह गए।

इसके अलावा कांग्रेस और वामपंथी दलों के 15 विधायकों ने TVK को समर्थन दिया। यह संख्या 120 हो गई।

और बस यहीं से शुरू हुई असली कहानी। AIADMK के 53 विधायकों में से 24 ने पार्टी व्हिप की अवहेलना करते हुए विजय के पक्ष में वोट डाल दिया। 120 + 24 = 144 वोट।

AIADMK में विद्रोह क्यों हुआ?

यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है। आखिर 24 विधायकों ने अपनी पार्टी की व्हिप को नजरअंदाज क्यों किया?

दिलचस्प बात यह है कि जयललिता जी की मृत्यु के बाद से AIADMK में कोई मजबूत केंद्रीय नेतृत्व नहीं रहा। जयललिता का करिश्मा, उनकी व्यक्तित्व की ताकत, जनता से सीधा भावनात्मक जुड़ाव—यह सब खत्म हो गया।

उनके जाने के बाद पार्टी में गुटबाजी शुरू हो गई। पहले ओ. पनीरसेल्वम और एडप्पादी पलनीस्वामी के बीच सत्ता संघर्ष हुआ। फिर पनीरसेल्वम खुद DMK के साथ चले गए। अब EPS के नेतृत्व पर भी सवाल उठ रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कई विधायकों को यह लगने लगा है कि AIADMK डूबती नाव है। चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन लगातार गिर रहा है। दूसरी ओर, एक्टर विजय की TVK युवाओं, ग्रामीण मतदाताओं और फिल्म प्रेमियों में तेजी से लोकप्रिय हो रही है।

हैरान करने वाली बात यह है कि TVK का वोट बेस वही है जो कभी AIADMK का हुआ करता था। यानी विजय सीधे AIADMK के वोट काट रहे हैं, DMK के नहीं।

किसने किया विद्रोह? बड़े नाम शामिल

विद्रोही गुट का नेतृत्व एस.पी. वेलुमणि और सी.वी. शणमुगम जैसे वरिष्ठ नेताओं ने किया। ये दोनों AIADMK में काफी प्रभावशाली माने जाते थे।

वेलुमणि पूर्व मंत्री रह चुके हैं और कोयंबटूर क्षेत्र में उनका मजबूत आधार है। शणमुगम भी पार्टी के पुराने खिलाड़ी हैं। इन दोनों के साथ 22 अन्य विधायक भी शामिल हुए।

फ्लोर टेस्ट के दौरान जब वोटिंग हुई, तो ये 24 सदस्य खुलकर TVK के समर्थन में खड़े हो गए। यह कोई गुप्त सौदा नहीं था, बल्कि पूरी विधानसभा के सामने खुली बगावत थी।

DMK ने क्यों किया वोटिंग से परहेज?

अब यह भी एक दिलचस्प राजनीतिक चाल थी। DMK के पास 117 सीटें हैं। अगर वे चाहते तो विजय सरकार को गिराने में AIADMK का साथ दे सकते थे। लेकिन उन्होंने वोटिंग में भाग ही नहीं लिया।

क्यों? क्योंकि DMK नहीं चाहती थी कि जनता को यह लगे कि DMK और AIADMK एक साथ हो गए हैं। द्रविड़ राजनीति में ये दोनों दशकों से कट्टर प्रतिद्वंद्वी रहे हैं।

समझने वाली बात यह है कि DMK की रणनीति बहुत स्पष्ट है। वह चाहती है कि AIADMK धीरे-धीरे खत्म हो जाए। जितने ज्यादा विधायक AIADMK से टूटकर TVK में जाएंगे, उतना ही EPS कमजोर होंगे।

और अंततः तमिलनाडु की राजनीति में दो ध्रुव रह जाएंगे: DMK बनाम TVK। यह DMK के लिए बेहतर है, क्योंकि तीन-तरफा मुकाबले में वोट बंटते हैं।

यहां ध्यान देने वाली बात यह भी है कि अगर DMK ने TVK के खिलाफ वोट किया होता, तो यह विजय को “शहीद” बना सकता था। “सभी पुरानी पार्टियों ने मिलकर नए नेता को रोका”—यह narrative DMK नहीं चाहती थी।

एंटी-डिफेक्शन कानून का खेल

अब आता है सबसे रोमांचक हिस्सा। भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची में एंटी-डिफेक्शन कानून का प्रावधान है। इसके तहत अगर कोई विधायक:

  1. स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ दे, या
  2. पार्टी व्हिप का उल्लंघन करे

तो उसकी सदस्यता रद्द की जा सकती है।

AIADMK के 24 विधायकों ने साफतौर पर व्हिप का उल्लंघन किया है। EPS ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि सभी विधायक TVK के खिलाफ वोट करेंगे। लेकिन 24 ने विजय के पक्ष में वोट डाला।

सामान्य परिस्थितियों में इन 24 को अयोग्य घोषित कर देना चाहिए। लेकिन यहां एक पेच है।

2/3 का नियम और इसकी पेचीदगी

एंटी-डिफेक्शन कानून में एक प्रावधान है: अगर पार्टी के दो-तिहाई (2/3) सदस्य एकसाथ किसी दूसरी पार्टी में शामिल हो जाएं, तो उसे “विलय” (merger) माना जाता है और उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।

AIADMK के 53 विधायक हैं। इसका 2/3 यानी 36 होता है। लेकिन TVK में सिर्फ 24 गए हैं, जो 2/3 से कम है। इसलिए तकनीकी रूप से इन्हें disqualify किया जा सकता है।

यहां दिल्ली के राज्यसभा का उदाहरण देना जरूरी है। आम आदमी पार्टी के 10 राज्यसभा सदस्यों में से 7 (यानी 70%, जो 2/3 से ज्यादा) राघव चड्ढा के साथ निकल गए थे। इसलिए उन्हें disqualify नहीं किया गया।

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लेकिन तमिलनाडु में 24/53 = 45%, जो 2/3 से बहुत कम है।

स्पीकर के हाथ में सारी ताकत

अब असली खेल यहां से शुरू होता है। अयोग्यता का फैसला विधानसभा स्पीकर करता है। और तमिलनाडु का स्पीकर अब TVK का सदस्य है।

प्रक्रिया यह है:

  1. AIADMK स्पीकर के पास शिकायत दर्ज करेगी (वीडियो सबूत, वोटिंग रिकॉर्ड के साथ)
  2. स्पीकर 24 विधायकों को नोटिस जारी करेगा
  3. विद्रोही विधायक अपना पक्ष रख सकते हैं (जैसे: “व्हिप अवैध थी”, “नेतृत्व वैध नहीं”, “पार्टी हित में किया”)
  4. स्पीकर अंतिम निर्णय लेगा

सिद्धांत में स्पीकर को निष्पक्ष होना चाहिए। लेकिन भारतीय राजनीति की वास्तविकता अलग है।

चिंता का विषय यह है कि हमने देखा है—महाराष्ट्र, कर्नाटक, मणिपुर, मध्य प्रदेश—हर जगह स्पीकर ने सत्तारूढ़ पार्टी के पक्ष में फैसले दिए हैं। विद्रोही विधायकों को बचाने के लिए निर्णय महीनों तक लटकाए गए।

राहत की बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने हाल के फैसलों में स्पीकरों को चेताया है कि वे जल्द निर्णय लें। लेकिन व्यावहारिक रूप में, स्पीकर को दबाना मुश्किल है।

AIADMK ने क्या कदम उठाए?

EPS ने तुरंत कार्रवाई की है। सभी 24 विद्रोही विधायकों को पार्टी पदों से हटा दिया गया है। पार्टी ने आधिकारिक बयान जारी कर इन्हें “गद्दार” करार दिया है।

AIADMK के वरिष्ठ नेताओं ने कहा है कि ये विधायक “सत्ता के लालच” में आकर पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्त हो गए हैं। पार्टी जल्द ही स्पीकर के पास औपचारिक शिकायत दर्ज करेगी।

लेकिन सवाल उठता है: क्या EPS का नेतृत्व अब भी मजबूत है? अगर 53 में से 24 चले गए, तो यह लगभग आधे हैं। यह किसी भी नेता के लिए शर्मनाक स्थिति है।

विजय के लिए मनोवैज्ञानिक जीत

दिलचस्प बात यह है कि 144 वोट मिलना विजय के लिए सिर्फ बहुमत साबित करना नहीं था। यह एक मनोवैज्ञानिक जीत थी।

अगर उन्हें सिर्फ 118-120 वोट मिलते, तो हमेशा यह डर बना रहता कि “कभी भी सरकार गिर सकती है”। हर फैसले पर घबराहट होती।

लेकिन 144 वोट का मतलब है कि उनके पास 26 वोटों का सुरक्षा कवच है। यहां तक कि अगर 20 विधायक भी विद्रोह कर दें, तब भी सरकार सुरक्षित है।

यह आत्मविश्वास एक नए मुख्यमंत्री के लिए बेहद जरूरी है। अब विजय बिना डर के अपनी नीतियां लागू कर सकते हैं।

ज्योतिषी विवाद और त्वरित पीछे हटना

और बस यहीं से शुरू हुई असली कहानी। फ्लोर टेस्ट के तुरंत बाद विजय ने एक विवादास्पद कदम उठाया—उन्होंने अपने निजी ज्योतिषी को OSD (ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी) नियुक्त कर दिया।

यह द्रविड़ राजनीति में एक बड़ा धक्का था। तमिलनाडु की राजनीति ऐतिहासिक रूप से तर्कवाद (Rationalism) पर आधारित रही है। पेरियार की विचारधारा, जो अंधविश्वास और धार्मिक कर्मकांडों का विरोध करती है, यहां गहरी जड़ें जमाए हुए है।

DMK और अन्य द्रविड़ दल हमेशा ज्योतिष और अंधविश्वास को खारिज करते रहे हैं। ऐसे में जब विजय ने यह कदम उठाया, तो तुरंत आलोचना की बाढ़ आ गई।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि विरोध सिर्फ विपक्ष से नहीं आया। कांग्रेस, जो TVK का सहयोगी है, उसने भी असहमति जताई। पार्टी के भीतर से भी दबाव बना।

और विजय को 24 घंटे के भीतर यह फैसला वापस लेना पड़ा। यह दर्शाता है कि फिल्म और राजनीति के बीच बड़ा अंतर है। सिनेमा में आप नायक हो सकते हैं, लेकिन राजनीति में हर कदम पर जवाबदेही होती है।

अब आगे क्या होगा?

यह खबर यहीं खत्म नहीं होती। आगे कई संभावनाएं हैं:

पहली संभावना: स्पीकर 24 विधायकों को disqualify कर दे। फिर उन सीटों पर उपचुनाव हो। AIADMK उन सीटों पर फिर से चुनाव लड़े और जीत भी सकती है। लेकिन TVK का प्रभाव बढ़ता जा रहा है, तो नुकसान भी हो सकता है।

दूसरी संभावना: स्पीकर निर्णय को महीनों तक टालता रहे। मामला सुप्रीम कोर्ट जाए। वहां भी समय लगे। तब तक 2026 के विधानसभा चुनाव नजदीक आ जाएं। फिर यह मुद्दा अप्रासंगिक हो जाएगा।

तीसरी संभावना: AIADMK पूरी तरह टूट जाए। बचे हुए 29 विधायकों में से भी कुछ TVK में शामिल हो जाएं। फिर 2/3 का आंकड़ा पूरा हो जाए और आधिकारिक विलय हो जाए।

चौथी संभावना: EPS नया नेतृत्व खोजे। पार्टी को पुनर्गठित करे। 2026 में पुनरुत्थान की कोशिश करे। लेकिन यह बेहद मुश्किल लगता है।

2026 का राजनीतिक कैलेंडर

2026 में तमिलनाडु में फिर से विधानसभा चुनाव होंगे। अभी से ही राजनीतिक दल अपनी रणनीति बना रहे हैं।

DMK के लिए यह चुनौतीपूर्ण होगा। उन्होंने पिछले चुनावों में AIADMK के कमजोर होने का फायदा उठाया था। लेकिन अब TVK एक मजबूत प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभर रहा है।

विजय के पास युवा अपील है। फिल्मी ग्लैमर है। “बाहरी व्यक्ति” का टैग है, जो पुरानी राजनीति से नाराज मतदाताओं को आकर्षित करता है।

AIADMK के लिए यह अस्तित्व का संकट है। अगर वे अगले दो सालों में खुद को पुनर्जीवित नहीं कर पाए, तो 2026 में वे तीसरे या चौथे स्थान पर भी आ सकते हैं।

जयललिता युग का अंत?

कहीं न कहीं यह स्वीकार करना पड़ेगा कि जयललिता युग समाप्त हो चुका है। उनकी मृत्यु के बाद कोई नेता उनकी जगह नहीं ले सका।

EPS ने कोशिश की। लेकिन उनमें वह करिश्मा नहीं है। न ही जनता से वैसा जुड़ाव है। पनीरसेल्वम भी असफल रहे।

हैरान करने वाली बात यह है कि AIADMK जैसी पार्टी, जो कभी तमिलनाडु की सबसे संगठित और अनुशासित पार्टी मानी जाती थी, आज बिखर रही है।

यह द्रविड़ राजनीति में एक नए युग की शुरुआत है। फिल्म स्टार से राजनीति में आना तमिलनाडु में नया नहीं है। एमजीआर और जयललिता दोनों ही फिल्मी सितारे थे। लेकिन विजय की चुनौतियां अलग हैं। उन्हें सिर्फ जीतना नहीं, बल्कि शासन भी करना है।

मुख्य बातें (Key Points)
  • तमिलनाडु फ्लोर टेस्ट में एक्टर विजय की TVK सरकार को 144 वोट मिले, जो 118 के बहुमत से कहीं ज्यादा है
  • AIADMK के 53 विधायकों में से 24 ने पार्टी व्हिप की अवहेलना कर TVK को समर्थन दिया
  • एडप्पादी पलनीस्वामी के नेतृत्व पर सवाल, पार्टी में खुला विद्रोह
  • DMK ने रणनीतिक रूप से वोटिंग से परहेज किया, AIADMK के साथ दिखना नहीं चाहती
  • एंटी-डिफेक्शन कानून के तहत 24 विधायकों को अयोग्य घोषित किया जा सकता है, लेकिन 2/3 नियम लागू नहीं
  • TVK का स्पीकर अब निर्णय लेगा—यहीं असली राजनीतिक खेल शुरू होगा
  • विजय ने ज्योतिषी को OSD बनाने का विवादास्पद फैसला 24 घंटे में वापस लिया
  • 2026 के चुनाव में DMK vs TVK की मुख्य लड़ाई हो सकती है, AIADMK का भविष्य अंधकारमय

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. तमिलनाडु में फ्लोर टेस्ट में कितने वोट मिले विजय को?

विजय की TVK सरकार को फ्लोर टेस्ट में कुल 144 वोट मिले, जबकि बहुमत के लिए 118 की जरूरत थी। इनमें TVK के 105 विधायक, सहयोगी दलों के 15 और AIADMK के विद्रोही 24 विधायक शामिल हैं। DMK ने वोटिंग में भाग नहीं लिया। यह विजय के लिए एक मजबूत राजनीतिक जीत है।

2. AIADMK के कितने विधायकों ने विद्रोह किया?

AIADMK के कुल 53 विधायकों में से 24 ने पार्टी व्हिप की अवहेलना करते हुए TVK को समर्थन दिया। इस विद्रोही गुट का नेतृत्व एस.पी. वेलुमणि और सी.वी. शणमुगम जैसे वरिष्ठ नेताओं ने किया। EPS ने इन सभी को पार्टी पदों से हटा दिया है और स्पीकर के पास अयोग्यता की शिकायत दर्ज करने की तैयारी है।

3. क्या विद्रोही विधायक अयोग्य हो जाएंगे?

एंटी-डिफेक्शन कानून के तहत इन्हें अयोग्य घोषित किया जा सकता है क्योंकि इन्होंने पार्टी व्हिप का उल्लंघन किया। लेकिन 2/3 नियम (36 विधायक) पूरा नहीं हुआ, सिर्फ 24 गए हैं। अंतिम निर्णय विधानसभा स्पीकर करेगा, जो TVK का सदस्य है। इसलिए राजनीतिक विश्लेषकों को लगता है कि स्पीकर निर्णय टाल सकता है या विद्रोहियों के पक्ष में फैसला दे सकता है।

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