Tobacco Industry Hidden Strategies – यह सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि एक सुनियोजित षड्यंत्र है जिसमें आपके पसंदीदा सेलिब्रिटी से लेकर राजनेता तक शामिल हैं। और सबसे बड़ी बात – यह सब कानून के दायरे में रहकर हो रहा है।
देखिए, हम सबको पहले से पता है कि एक इंसान के लिए तंबाकू कितनी खराब चीज है। हर साल 1.35 मिलियन लोग सिर्फ इस तंबाकू को यूज करने की वजह से अपनी जान गवा देते हैं। मतलब कि हर दिन 3,699 और हर घंटे 154 लोग।
अब यह जो आप पढ़ रहे हैं, यह खबर खत्म होते-होते 60 लोग भारत के अंदर तंबाकू यूज करने की वजह से अपनी जान गवा चुके होंगे।
सबसे बड़ा सवाल: जब सबको पता है तो फिर क्यों?
देखिए, तंबाकू का जो नुकसान है वो हर किसी को पता है। लेकिन उसके बाद भी 30% आबादी यानी कि 199.4 मिलियन लोग तंबाकू कंज्यूम कर रहे हैं।
इनफैक्ट स्मोकलेस तंबाकू जो है वो भारत के अंदर बैन है। लेकिन उसके बाद भी 21.4% वयस्क स्मोकलेस तंबाकू यूज कर रहे हैं। और 2 लाख से ज्यादा लोगों की तो जान चली गई है इसी की वजह से।
अब इसमें आप यह कहेंगे कि एक चीज जो बैन है वो लोगों तक पहुंच कैसे जा रही है? और इस लेवल तक पहुंच जा रही है कि लाखों में लोगों की जान चली जा रही है।
1986-2003: कानून बने, पर खेल जारी रहा
पहले क्या होता था कि यह जो बड़े-बड़े सेलिब्रिटीज हैं, ये टीवी पर खुलेआम तंबाकू, अल्कोहल इन सबके एडवर्टाइजमेंट करते थे। लेकिन ईयर 1986 और 1990 में WHO ने एक रेजोल्यूशन पास किया।
जिसमें यह था कि सारे देशों को तंबाकू के खिलाफ में एक्शन लेना होगा। अलग-अलग स्टेप करने होंगे। तो इसमें भारत ने भी साइन किया था।
तो भारत ने क्या किया कि भारत के अंदर Cable Television Network Regulation Act 1995 को लेकर आ गया। इसमें भारतीय केबल नेटवर्क्स जो पहले धड़ल्ले से अल्कोहल और सिगरेट वगैरह का ऐड कर लेते थे, वो बैन हो गया।
लेकिन उसके बाद भी छोटे-मोटे तरीके से स्पोर्ट्स इवेंट वगैरह जो होते थे, उसके थ्रू ऐड चल रहे थे।
पैसिव स्मोकिंग: वो जो खुद नहीं पीते, फिर भी मर रहे
अब जो सिगरेट पी रहे थे, उनकी तो बात ही छोड़ो। वो तो संख्या उनकी बढ़ ही रही थी। लेकिन 1.3 मिलियन लोग उस टाइम की स्टडी पर यह पता चला कि पैसिव स्मोकर थे। उनकी जान जा रही थी हर साल।
और 24 मिलियन लोग ऐसे थे जो डिसेबल हो गए थे। वो पी नहीं रहे थे, बस सिगरेट पीने वालों के साथ में थे। पैसिव स्मोकर थे। और यह बहुत ही बड़ा नंबर था।
तो इससे यह समझ में आ गया था भारतीय सरकार को कि और स्टेप्स लेने पड़ेंगे।
2003 का COTPA: गेम चेंजर कानून
और फिर 2003 में आया Cigarettes and Other Tobacco Products Act (COTPA) नाम से। और इसके आने के बाद जो रूल्स थे, उनमें मेजर चेंजेस आए:
• पब्लिक प्लेस पर स्मोक करना बैन कर दिया गया (क्योंकि पैसिव स्मोकिंग की वजह से भी डेथ हो रही थी)
• एजुकेशनल इंस्टीट्यूट्स के 100 यार्ड के एरिया के पास नहीं बेच सकते कोई भी तंबाकू प्रोडक्ट
• 18 साल से कम उम्र के लोगों को अलाउ नहीं किया गया यूज करने के लिए
देखा जाए तो इस एक्ट के आने के बाद सबसे बड़ा झटका यह लगा कि यह जो छोटे-मोटे ऐड चल रहे थे अलग-अलग तरीके से, उसको पूरी तरीके से बैन कर दिया गया।
सिर्फ दो जगह बचीं विज्ञापन के लिए
बेसिकली इस एक्ट के आने के बाद एडवर्टाइजमेंट के लिए कंपनी के पास दो ही ऑप्शन बचे थे:
- तंबाकू की पैकेजिंग के ऊपर ऐड कर सकती थी
- पॉइंट ऑफ सेल – मतलब कि जहां से कस्टमर खरीदकर पेमेंट कर रहा है, उस जगह पर ऐड कर सकती थी
बस यह दो जगह ही ऐड कर सकती थी। बाकी सारे रास्ते जो थे वो बंद हो गए थे। तो यह जो एक्ट आया था, इसमें कोई भी प्रोडक्ट बैन नहीं हुआ था। बस एडवर्टाइजमेंट को लेकर और अलग-अलग रूल्स बनाए गए थे।
2011: गुटखा बैन, पर असली खेल शुरू हुआ
अब इसके बाद ईयर आता है 2011 और इसमें एक प्रोडक्ट बैन हुआ। और वो कैसे बैन हुआ, उसको समझाने के लिए मुझे थोड़ा सा आपको पान मसाला का जो स्ट्रक्चर है वो समझाना पड़ेगा।
तो देखिए, पान जो है वो भारत के कल्चर का हिस्सा बहुत पहले से रहा है। पान के अंदर नॉर्मल सुपारी, गुलकंद, इलायची वगैरह डालकर लोग बहुत पहले से खाते आए हैं।
अब इसके बाद जब टेक्नोलॉजी आई तो इस पान को क्या किया? डिहाइड्रेट करके यानी कि सुखा लिया गया और एक पैकेट में बंद करके बेचा जाने लगा, जिसको बोला गया पान मसाला।
गुटखा: 40 से ज्यादा कैंसरकारी तत्व
और फिर जब पान मसाला अच्छी तरीके से बिकने लगा, तो इसकी आदत लगाने के लिए इसके अंदर प्रोसेस्ड तंबाकू यूज किया गया। और उस चीज को बोला गया गुटखा (कहीं-कहीं पर पूरी भी बोलते हैं, कहीं पर पुड़की भी बोलते हैं)।
और यह जो गुटखे का पैकेट था, यह ज्यादा टाइम तक चले, खराब न हो – इसके अंदर बहुत अलग-अलग केमिकल्स मिलाए गए। आदत लगे, उसके लिए मैग्नीशियम वगैरह बहुत सारी चीजें डाली गईं इसके अंदर।
40 से भी ज्यादा सब्सटेंस इसमें ऐसे मिले जो कैंसर के लिए जिम्मेदार होते हैं। और सिगरेट के कम्पेरेटिवली यह ज्यादा डेंजरस इसलिए हो रहा था क्योंकि गुटखा जो था वो डायरेक्ट मुंह में जा रहा था।
तो जो कैंसर वाले सब्सटेंस थे वो डायरेक्ट आपके पेट में जा रहे थे।
90% ओरल कैंसर की वजह गुटखा
तो ओरल कैंसर जो था वो भारत के अंदर रिकॉर्ड तोड़ते आगे बढ़ने लगा। मतलब जितने भी भारत के अंदर ओरल कैंसर हो रहे थे, उसमें से 90% गुटखे की वजह से हो रहे थे।
तो इसको देखकर सरकार ने The Federal Food Safety and Regulation Act लेकर आई। तो इस एक्ट के हिसाब से जो तंबाकू है, अब वो किसी भी फूड आइटम में नहीं यूज किया जाएगा।
तो एक तरह से गुटखा बैन हो गया। क्योंकि गुटखा बनता था तंबाकू को पान मसाला में मिलाकर। लेकिन पान मसाला जो था वो FSSAI में एज अ फूड रजिस्टर्ड था।
और उसको जो लाइसेंस मिला था वो भी एज अ फूड मिला था। तो इस एक्ट के आने के बाद से पान मसाला तो बिक सकता था, लेकिन तंबाकू मिलाकर जो गुटखा बेचा जाता था वो बैन हो गया था।
शरद पवार का व्यक्तिगत संघर्ष
तो कहने का मतलब यह है कि 2011 में भारत के अंदर 24 स्टेट्स और तीन यूनियन टेरिटरी में गुटखा बैन हो गया था। Sharad Pawar जो फॉर्मर CM थे महाराष्ट्र के, उनका बहुत इंपॉर्टेंट रोल रहा था इसको बैन कराने में।
क्योंकि उनको खुद गुटखा खाने की वजह से कैंसर हो गया था और उनके मुंह की सर्जरी भी हुई थी। उन्होंने इसके बाद इसको बैन करने के लिए संसद तक में बात उठाई।
₹43,410 करोड़ के बाजार के लिए कानून नहीं चलता
रूल तो आ गया था भारत के अंदर, लेकिन इन तंबाकू कंपनियों का जो मार्केट है वो 2022 का अगर मैं बताऊं आपको तो ₹43,410.2 करोड़ का था। और इतने पैसे वालों के लिए रूल्स होते नहीं हैं।
इन्होंने दुनिया के बेस्ट माइंड्स को बुलाकर अलग-अलग ट्रिक्स लगाईं।
ट्रिक नंबर 1: पॉलिटिकल फंडिंग और घुसपैठ
पहली चीज इन्होंने यह की कि जितने भी पॉलिसी मेकर्स थे और सरकार के ऑफिशियल थे, उसमें घुसना चालू किया। क्योंकि इनको पता था कि बिना सरकार के लोगों को साथ में लिए इसका सॉल्यूशन नहीं निकाला जा सकता।
इन्होंने पॉलिटिकल पार्टीज को करोड़ों में पार्टी फंडिंग की। इनफैक्ट जो तंबाकू कंपनियां थीं, उसके अंदर सरकार के ही शेयर्स निकले।
ट्रिक नंबर 2: Twin Pack Strategy – कानून का सबसे बड़ा मजाक
तो यह जो एक्ट आया था, इसके खिलाफ में पहले तो यह सारी तंबाकू कंपनियां जो थीं, ये कोर्ट में अपील करने गईं। फिर जब बात बनी नहीं तो इन्होंने एक अलग तरीका निकाला।
इन्होंने पान मसाला और प्रोसेस्ड तंबाकू का एक ट्विन पैक निकाला। मतलब कि पान मसाला अलग और तंबाकू अलग – और बेचना स्टार्ट कर दिया।
मतलब कि जो पहले गुटखा खाने वाला था, वो एक पैकेट जो है वो पान मसाला का खरीदेगा। फिर प्रोसेस्ड तंबाकू का खरीदेगा। और फिर दोनों को मिलाकर वही प्रोडक्ट बना लेगा जो ऑलरेडी बैन है।
समझने वाली बात यह है कि यह कानून का खुला उल्लंघन था, लेकिन तकनीकी रूप से कानूनी था।
उदाहरण: Maruti, Shikhar और सब ब्रांड्स ने किया Split
फॉर एग्जांपल, जो Maruti गुटखा पहले मिलता था, अब वो Maruti पान मसाला और उसके साथ-साथ Maruti तंबाकू या जर्दा नाम से दो पैकेट में मिलने लगा। पहले एक पैकेट में मिलता था। अब उसके दो पैकेट आने लगे।
और लोग जो थे वो दोनों को मिलाकर खाने लगे। और ऐसे करके हर कंपनी ने अपने ब्रांड को स्प्लिट किया। जैसे आपको शिखर गुटखा मिलेगा, शिखर पान मसाला मिलेगा, शिखर फिल्टर खैनी भी मिलेगी, शिखर नॉर्मल तंबाकू भी मिलेगा।
इस तरीके से जो ब्रांड था, उसने अपने प्रोडक्ट को स्प्लिट कर दिया।
ट्रिक नंबर 3: Surrogate Advertising – असली धोखा
तो जो प्रोडक्ट बैन हो चुका था यानी कि गुटखा जो बैन हो रखा था, उसको बेचने का तो तरीका इन्होंने निकाल लिया था। लेकिन एडवर्टाइजमेंट का तरीका इनको और निकालना था।
क्योंकि जब तक एडवर्टाइजमेंट नहीं होगा, प्रोडक्ट लोगों तक पहुंचेगा ही नहीं तो बिकेगा कैसे? तो इसके सॉल्यूशन में ये लोग लेकर आए Surrogate Advertisement का कॉन्सेप्ट।
तो इसमें इन्होंने क्या किया कि गुटखा, सिगरेट, अल्कोहल वगैरह जो थे, ये तो बैन थे। तो इन्होंने सेम गुटखे जैसी पैकेजिंग, कलर, स्टाइल रेडी किया। बस गुटखे की जगह सुपारी लिख दिया या फिर इलायची लिखना स्टार्ट कर दिया।
Imperial Blue Music CD: क्या कभी किसी ने खरीदी?
ऐसे ही अल्कोहल कंपनियां जो थीं, उन्होंने भी देखादेखी में सेम नाम से सोडा वगैरह निकालना स्टार्ट किया और एडवर्टाइजमेंट स्टार्ट कर दिया। कुछ नहीं तो म्यूजिक CD निकालना भी शुरू कर दिया।
आपने वो ऐड देखा होगा। बहुत ही फेमस ऐड है – “Men will be men. Imperial Blue Music CD.”
किसी ने आज तक खरीदी है वो सीडी क्या? या किसी ने उस सीडी के गाने सुने हैं क्या?
दिलचस्प बात यह है कि एक्चुअल में वो CDs वगैरह कहीं दिख ही नहीं रही थीं। कोई खरीद नहीं पा रहा था। बस वो ऐड हो रहे थे उसके, ताकि जो मेन प्रोडक्ट है उसको लाइमलाइट में लाया जा सके।
आज भी आप देखेंगे Flipkart, Amazon – इन सब पर “Sold Out” लगा हुआ है। इमेज लगी हुई है। आप खरीद नहीं सकते। क्योंकि एक्चुअल में इनको अनसेड कम्युनिकेशन में अपना अल्कोहल का जो ऐड है वो करना है। वो प्रोडक्ट कभी कोई खरीद ही नहीं पाता है।
और भी उदाहरण: 502 पटाखा चाय, Aristocrat Apple Juice
ऐसे ही 502 पटाखा जो एक बहुत ही पॉपुलर बीड़ी ब्रांड है, उसने अपने आप को 502 पटाखा चाय से एंडोर्स करना शुरू कर दिया।
ऐसे ही Jagatjit Industries जो थी, उसने Aristocrat Whisky जो बनाते थे, यह लोग उसकी जगह पर Aristocrat Apple Juice के नाम से ऐड करना चालू कर दिया।
तो Aristocrat Whisky तो सबको याद है, लेकिन वो जो जूस है Aristocrat, वो आज तक किसी ने नहीं पिया।
करोड़ों की एडवर्टाइजिंग उस प्रोडक्ट पर जो एक्सिस्ट ही नहीं करता
तो ऐसे करोड़ों रुपए लगाकर इन्होंने एड्स किए और वो भी ऐसे प्रोडक्ट के ऐड किए जो एक्जिस्ट ही नहीं करता था। यह मार्केट में अवेलेबल ही नहीं था।
और यह सारी चीज इसलिए की गई जो उनका मेन तंबाकू है, जो अल्कोहल है, वो प्रमोट हो सके। और जब अल्कोहल शॉप पर जब कोई जाए तो उसके मुंह से Imperial Blue या फिर Aristocrat – यह सारे नाम निकलें।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि यह पूरा खेल इतना व्यवस्थित है कि कानून को तकनीकी रूप से तोड़ा नहीं जा रहा, बल्कि उसे चकमा दिया जा रहा है।
सेलिब्रिटीज और सरकार: सब शामिल हैं खेल में
और यह सारी चीजें इसलिए की गईं क्योंकि इस पूरे खेल में – आपके पसंदीदा एक्टर से लेकर पॉलिटिशियन्स तक – सब इनवॉल्व्ड हैं। करोड़ों की पॉलिटिकल फंडिंग, सरकारी कंपनियों में शेयर्स, और सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट्स – यह सब एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है।
मुख्य बातें (Key Points)
• 1.35 मिलियन भारतीयों की सालाना मौत तंबाकू से, हर घंटे 154 लोगों की जान जा रही है
• गुटखा 2011 में बैन हुआ लेकिन Twin Pack Strategy से अलग-अलग पैकेट में पान मसाला और तंबाकू बेचा जा रहा है
• Surrogate Advertising के नाम पर Imperial Blue Music CD, Aristocrat Apple Juice जैसे फर्जी प्रोडक्ट्स के ऐड, जो कभी बाजार में मिलते ही नहीं
• 90% ओरल कैंसर गुटखे की वजह से हो रहे थे, जिसमें 40 से ज्यादा कैंसरकारी तत्व होते हैं
• तंबाकू उद्योग का ₹43,410 करोड़ का बाजार और करोड़ों की पॉलिटिकल फंडिंग से कानून को चकमा दिया जा रहा
• COTPA 2003 ने एडवर्टाइजमेंट पर रोक लगाई लेकिन कंपनियों ने ब्रांड स्प्लिटिंग से रास्ता निकाल लिया












