Canada India Relations में एक ऐतिहासिक मोड़ आ चुका है। जिस कनाडा ने सालों तक खालिस्तानी चरमपंथियों को अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर खुली छूट दी थी, आज वही देश उन्हें अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मान रहा है। Mark Carney की नई सरकार ने हाल ही में जारी आधिकारिक सुरक्षा रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा है कि खालिस्तानी एक्सट्रीमिस्ट नेटवर्क अब कनाडा के अंदर एक गंभीर आंतरिक खतरा बन चुके हैं। यह वही बात है जो भारत पिछले एक दशक से कह रहा था, लेकिन Justin Trudeau के दौर में लगातार नजरअंदाज की गई थी।
देखा जाए तो यह केवल एक कूटनीतिक यू-टर्न नहीं है। यह उस भस्मासुर को पहचानने की मजबूरी है जिसे कनाडा ने खुद पाला और अब उसकी तपिश खुद झेलनी पड़ रही है।
आतंकवाद का स्वभाव: भस्मासुर और रक्तबीज का मिश्रण
आतंकवाद और कट्टरपंथ की कोई सीमा नहीं होती। भारतीय पुराणों में भस्मासुर और रक्तबीज की कथाएं हैं—जो अपने पालने वाले को भी नहीं छोड़ते और बार-बार नए रूपों में उभरते हैं। अगर पाकिस्तान में आतंकवादी पाले जा रहे हैं, तो वह केवल पाकिस्तान की समस्या नहीं रहती। यही हाल कनाडा का भी है।
भारत ने Justin Trudeau के कार्यकाल में बार-बार चेताया था कि खालिस्तानी केवल भारत के लिए नहीं, बल्कि कनाडा की अपनी सुरक्षा के लिए भी खतरा हैं। लेकिन उस दौर में कनाडा वोट बैंक की राजनीति में इतना उलझा था कि उसे सात समुद्र पार की समस्या लग रही थी।
अब करवट बदली है। आज कनाडा की आधिकारिक सुरक्षा रिपोर्ट खुद स्वीकार कर रही है कि जो नेटवर्क कभी भारत के लिए चिंता का विषय थे, अब वे कनाडा की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आंतरिक खतरा बन चुके हैं।
Trudeau Era: कूटनीति पर वोट बैंक की राजनीति हावी
पिछले पांच-छह साल Canada India Relations के इतिहास का सबसे बुरा दौर रहा। भारत का स्टैंड हमेशा जीरो टॉलरेंस का रहा। नई दिल्ली ने बार-बार सबूत दिए, डोजियर सौंपे। लेकिन कनाडा की जमीन का इस्तेमाल भारत के खिलाफ फंडिंग और प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए होता रहा।
ट्रूडो सरकार ने इसे लगातार नजरअंदाज किया और उल्टा भारत पर आरोप लगाए कि भारत वहां हत्याएं करवा रहा है। Hardeep Singh Nijjar की हत्या के बाद तो रिश्तों में सबसे बड़ी दरार आ गई थी।
दिलचस्प बात यह है कि कट्टरपंथ की प्रकृति एक्सपोनेंशियल होती है। जब किसी को दूसरे को नुकसान पहुंचाने की खुली छूट मिलती है, तो वह धीरे-धीरे आपकी अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं और कानून व्यवस्था को खोखला करना शुरू कर देती है। यही वह बिंदु है जहां कनाडा के नए नेतृत्व को हकीकत नजर आने लगी है।
1985 का कनिष्क कांड: जो सबक नहीं सीखा गया
इस पूरे मामले को गहराई से समझने के लिए हमें 1985 के एयर इंडिया फ्लाइट 182 बमबारी को याद करना होगा, जिसे कनिष्क कांड के नाम से जाना जाता है। दुनिया इसे अक्सर भारत पर हुआ हमला मानती है, लेकिन कड़वा सच यह है कि इसमें मारे गए ज्यादातर लोग कनाडाई नागरिक थे।
यह कनाडा के इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी थी, जिसे वहां की राजनीति ने दशकों तक एक “विदेशी समस्या” की तरह पेश किया।
समझने वाली बात यह है कि आज की रिपोर्ट में जो “एक्सट्रीमिस्ट नेटवर्क” और “नेशनल सिक्योरिटी थ्रेट” जैसे शब्द इस्तेमाल किए गए हैं, वे दरअसल अपनी उसी पुरानी गलती को परोक्ष रूप से स्वीकार करना है।
अब कनाडा की एजेंसियां समझ पा रही हैं कि अगर 1985 जैसा नेटवर्क आज भी सक्रिय है, तो यह कनाडा की संप्रभुता पर सीधा चैलेंज है।
कनाडा में क्या हो रहा है: घर में ही लग गई आग
अब सवाल उठता है—आखिर कनाडा को अचानक यह एहसास कैसे हुआ? असल में वहां की जमीन पर कुछ ऐसी घटनाएं हुई हैं जिन्होंने कनाडाई नेतृत्व की नींद उड़ा दी।
पहला—पैरेलल गवर्नेंस और गैंग वार: British Columbia और Ontario जैसे प्रांतों में अब यह केवल विचारधारा की लड़ाई नहीं रही। चरमपंथी नेटवर्क का जुड़ाव ऑर्गनाइज्ड क्राइम और लोकल गैंग्स के साथ हो चुका है। Surrey और Brampton जैसे शहरों में सरेआम गोलीबारी, जबरन वसूली, ड्रग्स सिंडिकेट का प्रभाव इतना बढ़ गया है कि स्थानीय नागरिकों की सुरक्षा खतरे में पड़ गई है।
कनाडा की पुलिस अब मानती है कि ये ग्रुप्स पैरेलल सिस्टम चला रहे हैं, जो कनाडा के कानून को सीधी चुनौती दे रहे हैं।
दूसरा—संस्थानों में घुसपैठ: कनाडा की इंटेलिजेंस रिपोर्ट्स यह संकेत देती हैं कि इन चरमपंथी समूहों ने स्थानीय स्कूलों, गुरुद्वारा कमेटियों और यहां तक कि राजनीति के निचले स्तरों पर अपनी पकड़ बना ली है। वे पब्लिक ओपिनियन मैनिपुलेट कर रहे हैं और सरकार व समाज दोनों को प्रभावित कर रहे हैं।
तीसरा—युवाओं में रेडिकलाइजेशन: कनाडा लंबे समय तक इसे फ्री स्पीच मानता रहा। लेकिन अब युवाओं में कट्टरपंथ का स्तर इतना बढ़ गया है कि सिविल अनरेस्ट की स्थिति बनने लगी है। हाल के महीनों में विभिन्न समुदायों के बीच हिंसक झड़पें और मंदिर परिसरों में घटनाओं ने कनाडाई समाज को दो गुटों में बांट दिया है।
सरल शब्दों में कहें तो जिस भस्मासुर को कनाडा सात समुद्र पार भारत को डराने के लिए पाल रहा था, आज उसकी तपिश कनाडा के अपने घर में महसूस हो रही है। और जब घर में आग लगती है, तो कूटनीति नहीं, नेशनल सर्वाइवल की चिंता सर्वोपरि हो जाती है।
जियोपॉलिटिक्स: हार्ड पावर की भाषा
Canada India Relations में बदलाव की दूसरी बड़ी वजह जियोपॉलिटिक्स है। भावनाएं और वोट बैंक से अंतरराष्ट्रीय संबंध नहीं चलते—वे चलते हैं हार्ड पावर से।
कनाडा आज एक बड़े आर्थिक संकट और कॉस्ट ऑफ लिविंग क्राइसिस से गुजर रहा है। वहीं, भारत 2026 में दुनिया की सबसे तेज बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और अब पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है।
हां, कनाडा रिसोर्स-रिच जरूर है। उसके पास वो संसाधन हैं जिनकी भारत को जरूरत है—जैसे यूरेनियम। लेकिन भारत के पास वो विशाल बाजार है जिसकी कनाडा को अपने सर्वाइवल के लिए सख्त जरूरत है।
Indo-Pacific Strategy में भी बिना भारत के कनाडा कोई प्रभावी भूमिका नहीं निभा सकता। कनाडा की नई सरकार को यह क्लियरली समझ आ रहा है कि एक काल्पनिक नैरेटिव के लिए दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था से रिश्ते तोड़ना बेहद खराब निर्णय होगा।
CEPA और यूरेनियम डील: आर्थिक रीसेट की शुरुआत
अब रिश्तों में सुधार के ठोस संकेत भी दिखने लगे हैं। CEPA (Comprehensive Economic Partnership Agreement) यानी मुक्त व्यापार समझौता की वार्ता फिर से शुरू हो गई है।
इसके अलावा, कनाडा ने भारत को 10 साल की यूरेनियम आपूर्ति का समझौता भी ऑफर किया है। यह भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों और परमाणु ऊर्जा क्षमता को देखते हुए एक बड़ा कदम है।
दोनों देश अब 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 50 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रख रहे हैं। यह महज एक आंकड़ा नहीं, बल्कि आर्थिक सहयोग के प्रति नई सोच का परिचायक है।
भारत की स्ट्रैटेजिक पेशेंस की जीत
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि जब ट्रूडो सरकार सार्वजनिक तौर पर आरोप लगा रही थी और रिश्ते तोड़ रही थी, तब भी भारत सरकार का स्टैंड बेहद क्लियर और फर्म था। भारत ने घुटने नहीं टेके। भारत ने साफ कहा—रिश्ते बराबरी और सम्मान के साथ ही होंगे।
भारत ने यह साबित किया कि अगर कोई देश आपकी सुरक्षा चिंताओं का सम्मान नहीं करता, तो आप भी बिजनेस एज यूजुअल नहीं रख सकते।
और बस यहीं से शुरू हुई असली कहानी। आज जब कनाडा की रिपोर्ट भारत के पुराने स्टैंड को वैलिडेट कर रही है, तो इसे भारत की स्ट्रैटेजिक पेशेंस की जीत माना जा सकता है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी बात मनवाने के लिए आर्थिक और रणनीतिक दबाव का बेहतरीन इस्तेमाल किया है।
जैसा कि विदेश मंत्री S. Jaishankar अक्सर कहते हैं—”भरोसा रातोंरात नहीं बनता।” यह एक कॉशस रिसेट है।
क्या सच में बदल गया है कनाडा?
अगर गौर करें, तो असली बदलाव तब माना जाएगा जब:
- कनाडा इन नेटवर्क्स की फंडिंग और गतिविधियों को ग्राउंड लेवल पर रोकने के लिए ठोस कार्रवाई करे।
- वहां की संसद और राजनीति में भारत विरोधी तत्वों को मिलने वाला पॉलिटिकल स्पेस पूरी तरह खत्म हो।
- खालिस्तानी चरमपंथियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई तेज हो और उनकी गतिविधियों पर सख्त निगरानी शुरू हो।
फिलहाल यह एक शुरुआत है—एक कूटनीतिक संकेत। लेकिन ट्रैक रिकॉर्ड देखकर ही भरोसा किया जा सकता है।
ट्रंप फैक्टर और ग्लोबल रीअलाइनमेंट
एक और दिलचस्प पहलू यह भी है कि Donald Trump की वापसी और उनकी “America First” नीति ने कनाडा को अलग-थलग कर दिया है। ट्रंप ने कनाडा और यूरोप के प्रति जिस तरह का रवैया अपनाया है, उससे इन देशों के पास विकल्पों की कमी होती जा रही है।
ऐसे में कनाडा को एक Middle Power Alliance की जरूरत महसूस हो रही है—और भारत उसमें सबसे अहम भागीदार हो सकता है। यह भी एक जियोपॉलिटिकल दबाव है जिसने कनाडा को भारत की तरफ लौटने पर मजबूर किया है।
क्या भारत को फिर से भरोसा करना चाहिए?
यह एक बड़ा सवाल है। भारत की नीति हमेशा संयम और सतर्कता की रही है। जैसा कि जयशंकर साहब कहते हैं—भरोसा कार्रवाइयों से बनता है, बयानों से नहीं।
भारत को अब देखना होगा कि:
- क्या कनाडा Khalistan Referendum जैसी गतिविधियों पर रोक लगाता है?
- क्या Gurpatwant Singh Pannun जैसे चरमपंथियों पर कार्रवाई होती है?
- क्या वहां के गुरुद्वारों और संस्थानों में चल रहे कट्टरपंथी प्रचार को रोका जाता है?
अगर ये सब होता है, तो Canada India Relations में नई सुबह की उम्मीद की जा सकती है। वरना यह महज एक कूटनीतिक नौटंकी साबित होगी।
मुख्य बातें (Key Points)
✔ कनाडा ने पहली बार खालिस्तानी एक्सट्रीमिस्ट नेटवर्क को राष्ट्रीय सुरक्षा खतरा माना
✔ Mark Carney की सरकार ने Trudeau युग की गलतियों को सुधारने की शुरुआत की
✔ CEPA Free Trade Agreement की बातचीत फिर से शुरू, 2030 तक $50 बिलियन व्यापार का लक्ष्य
✔ 10 साल के यूरेनियम सप्लाई डील पर चर्चा जारी
✔ कनाडा में गैंग वार, हिंसा और रेडिकलाइजेशन ने मजबूर किया नीति बदलने पर
✔ भारत की स्ट्रैटेजिक पेशेंस और फर्म स्टैंड की जीत













