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The News Air - Breaking News - Vajpayee One-Vote Defeat 1999: भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा राजनीतिक झटका

Vajpayee One-Vote Defeat 1999: भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा राजनीतिक झटका

17 अप्रैल 1999 को अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार मात्र एक वोट से गिरी, संसदीय इतिहास में पहली बार किसी प्रधानमंत्री को एक वोट की वजह से पद छोड़ना पड़ा

The News Air Team by The News Air Team
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Vajpayee One-Vote Defeat 1999
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Vajpayee One-Vote Defeat 1999: भारतीय संसदीय इतिहास का वह काला दिन जब देश के प्रधानमंत्री को महज एक वोट की वजह से अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी। 17 अप्रैल 1999 का वह दिन जब लोकसभा में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को विश्वास मत में 269-270 से हार का सामना करना पड़ा। एक ऐसा अध्याय जो पहली बार हुआ, उसके बाद कभी नहीं हुआ और शायद कोई भी राजनीतिक दल अपने बुरे सपने में भी नहीं चाहेगी कि उसके साथ ऐसा हो।

देखा जाए तो यह केवल एक राजनीतिक हार नहीं थी। यह जयललिता के ब्लैकमेल, मायावती के यू-टर्न, सैफुद्दीन सोज के विद्रोह और गिरिधर गमांग के विवादास्पद वोट की कहानी थी। एक ऐसी कहानी जिसमें भरोसा टूटा, धोखा मिला और अंत में एक प्रधानमंत्री को गरिमापूर्वक अपनी हार स्वीकार करनी पड़ी।

1990 के दशक: गठबंधन की राजनीति का दौर

समझने वाली बात यह है कि 1990 का पूरा दशक भारत में गठबंधन राजनीति का दौर था। किसी भी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिल रहा था। पार्टियों के बीच विश्वासघात लगातार हो रहा था। बैकडोर मीटिंग्स आम बात हो गई थीं।

इसी दौर में 1996 में लोकसभा चुनाव हुए। पहली बार वाजपेयी जी ने प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। लेकिन हैरान करने वाली बात यह थी कि उनकी पहली सरकार महज 13 दिन चल पाई। सबसे बड़ी वजह यही रही कि BJP बहुमत कभी साबित ही नहीं कर पाई।

इसके बाद यूनाइटेड फ्रंट की सरकारें आईं – देवेगौड़ा, फिर इंद्र कुमार गुजराल। ये सभी कांग्रेस के बाहरी समर्थन पर टिकी हुई थीं। लेकिन आंतरिक विरोधाभासों की वजह से ये सरकारें भी लंबे समय तक नहीं चल सकीं।

यह ध्यान देने वाली बात है कि इसी दौर ने एक बात साफ कर दी – बिना बड़े गठबंधन के सत्ता हासिल करना किसी के लिए भी आसान नहीं है।

NDA का जन्म और 1998 का चुनाव

इसी पृष्ठभूमि में BJP ने अपना पहला बड़ा प्री-पोल गठबंधन बनाया – नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (NDA)। मई 1998 में इसे आधिकारिक रूप से घोषित किया गया, लेकिन तैयारियां पहले से ही शुरू हो चुकी थीं।

फरवरी 1998 में एक बार फिर लोकसभा चुनाव हुए। इस बार NDA के साथ AIADMK, समता पार्टी, बीजू जनता दल, शिरोमणि अकाली दल जैसे क्षेत्रीय दल शामिल हो गए।

चुनाव परिणाम में NDA को 543 में से लगभग 269 सीटें मिलीं। बहुमत का आंकड़ा 273 था। अगर गौर करें तो BJP को अब अलग-अलग छोटी पार्टियों से संपर्क करना पड़ा। तेलुगु देशम पार्टी से 12 सीटें लीं, INLD से 4 सीटें मिलीं। कई छोटी पार्टियों और निर्दलीय उम्मीदवारों का समर्थन लेकर कुल संख्या 282 तक पहुंची।

इसी संख्या के सहारे अटल बिहारी वाजपेयी ने विश्वास मत जीता और मार्च 1998 में एक बार फिर प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।

जयललिता का किंगमेकर बनना

लेकिन इस पूरे चुनाव की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका थी जे जयललिता की। उनकी पार्टी AIADMK के 18 सांसद थे और पूरी सरकार का भविष्य उन्हीं पर टिका हुआ था।

राजनीतिक गलियारों में अक्सर चर्चा होती थी कि जयललिता समझ चुकी थीं कि दिल्ली की सरकार का अस्तित्व AIADMK के सांसदों पर निर्भर करता है। और इसी वजह से वे अपनी बार्गेनिंग पावर का पूरा इस्तेमाल कर रही थीं।

AIADMK को केंद्रीय कैबिनेट में लगभग 6 मंत्रालय दिए गए। उनका स्टेटस एक किंगमेकर का क्लियर हो गया था।

दिलचस्प बात यह है कि शुरुआत से ही यह गठबंधन – खासकर BJP और AIADMK का – डावांडोल स्थिति में रहा। वाजपेयी जी ने खुद बाद में अपने भाषणों में इस राजनीतिक जीवन के काल को अपनी सबसे पीड़ादायक अवधि बताया।

जयललिता की मांगें और वाजपेयी का इनकार

मीडिया रिपोर्ट्स और राजनीतिक गलियारों के मुताबिक, AIADMK की सबसे बड़ी मांगें दो थीं:

पहली – तमिलनाडु की उस समय की DMK सरकार को बर्खास्त करना।

दूसरी – जयललिता के खिलाफ चल रहे सभी भ्रष्टाचार मामलों और केंद्रीय जांच एजेंसियों की जांच को रोक देना।

वाजपेयी जी ने सार्वजनिक रैलियों में भी कई बार कहा – जो दर्ज है रिपोर्ट्स में – कि जयललिता चाहती थीं कि उनके खिलाफ सभी लंबित भ्रष्टाचार मामले वापस ले लिए जाएं और DMK सरकार को तुरंत हटा दिया जाए। लेकिन उन्होंने दोनों ही मांगों पर झुकने से इनकार कर दिया।

AIADMK बार-बार सरकार गिराने की धमकी देती रहती थी। 15 अगस्त के आसपास भी समर्थन वापस लेने की धमकी दी गई थी, लेकिन उस वक्त किसी तरह दोनों पार्टियों के बीच सुलह हो गई।

विपक्ष को मिला मौका

एक तरफ सरकार सत्ता में थी, दूसरी तरफ विपक्षी दलों को समझ आ रहा था कि कुछ न कुछ गड़बड़ अंदर चल रही है। प्रधानमंत्री बहुत परेशान हैं।

लेफ्ट पार्टियों और अन्य विपक्षी दलों ने अपना स्टैंड मजबूत करना शुरू कर दिया। वे कहने लगे कि यह एक अवसरवादी गठबंधन है, कभी भी टूट सकता है।

सवाल उठता है कि जब विपक्ष लगातार ऐसी बातें करता था तो पूरे देश में इसकी चर्चा होती थी। एक तरह से पूरे देश में माहौल बन गया था कि मध्यावधि चुनाव का सवाल कभी भी खड़ा हो सकता है।

वाजपेयी जी के लिए यह 13 महीने – प्रधानमंत्री पद पर – किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं थे। एक तरफ पोखरण-II परमाणु परीक्षण की वजह से अंतरराष्ट्रीय दबाव था, दूसरी तरफ अंदर से ही गठबंधन सहयोगियों की लगातार मांगें आ रही थीं।

BJP के संकट मोचक

इसलिए BJP के जो उस समय के ‘संकट मोचक’ कहे जाते थे – खासकर प्रमोद महाजन का नाम आता है – हर वक्त नंबर जोड़ने में लगे रहते थे। यहां से वहां मीटिंग्स करते रहना, गठबंधन को एक साथ रखने की कोशिश करना – यह सब इस दौर में आम था।

BJP ने अपनी छवि एक स्थिर, जिम्मेदार सरकार की तरह बनाने की कोशिश की। लेकिन गठबंधन के आंतरिक विरोधाभास जैसे-जैसे बढ़ते गए, सरकार का आधार धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा।

विपक्ष – खासकर कांग्रेस, लेफ्ट और कुछ क्षेत्रीय दल – इस बेचैनी को बारीकी से मॉनिटर कर रहे थे। वे एक बड़े मौके की तलाश में थे।

1999 में तनाव चरम पर

जब साल 1999 आया, AIADMK और BJP के बीच तनाव खुलकर सामने आने लगा। खासकर फरवरी और मार्च का महीना – यहां देखा गया कि जयललिता ने एक बार फिर से अपनी मांगें आक्रामक तरीके से उठानी शुरू कर दीं।

BJP की लीडरशिप इसे एक दबाव, एक ब्लैकमेल की तरह देख रही थी। विपक्ष भी यह समझ चुका था। अलग-अलग समूह सामने आने लगे।

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) जैसे समूहों ने खुलकर लिखना शुरू कर दिया कि यह BJP के नेतृत्व वाला गठबंधन अवसरवादी है। इसके गिरने पर एक विकल्प बनाना चाहिए।

अगर गौर करें तो पृष्ठभूमि में अगली सरकार का अंकगणित चुपचाप डिस्कस होने लगा था, जबकि पहली सरकार अभी भी सत्ता में थी।

जयललिता का समर्थन वापस लेना

अप्रैल का महीना आया। पहले हफ्ते में ही स्थिति इतनी बिगड़ चुकी थी कि AIADMK ने आधिकारिक रूप से BJP से अपना समर्थन वापस लेने का फैसला किया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, जयललिता ने राष्ट्रपति के आर नारायणन के पास जाकर औपचारिक रूप से अपना पत्र दिया और वाजपेयी सरकार से समर्थन वापस ले लिया।

इस औपचारिक सूचना के साथ ही यह स्पष्ट हो गया था कि NDA के नंबर खतरे में हैं। अब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को जिस संकट की उम्मीद थी, वह उनके सामने खड़ा हो चुका था।

AIADMK के 18 सांसद हटते ही NDA की स्थिति ऐसी थी मानो आप एक खाई के एकदम किनारे पर खड़े हैं। NDA की बहुमत बिल्कुल हेयरलाइन पर आ चुकी थी।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि अगर कुछ और छोटे समूह या क्रॉस वोटिंग हो जाती तो सरकार पूरी तरह से गिर सकती थी।

विश्वास मत का दिन: 17 अप्रैल 1999

राजनीतिक दबाव इतना बढ़ गया कि वाजपेयी जी को खुद लोकसभा में विश्वास मत के लिए आना पड़ा। यह साबित करने के लिए कि उनकी सरकार अभी भी बहुमत में है।

और फिर आया वह दिन – 17 अप्रैल 1999। यह वह दिन था जो इतिहास में दर्ज हो गया।

लोकसभा में अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी सरकार के लिए विश्वास प्रस्ताव रखा। दो दिन तक सदन में बहस चलती रही। गरमागरम बहस हुई।

सरकार ने – वाजपेयी सरकार ने, NDA ने – अपनी उपलब्धियां गिनवाईं। विपक्ष ने गठबंधन की विफलताएं गिनवाईं। AIADMK विवाद पर भी चर्चा हुई।

इस बहस के दौरान वाजपेयी जी ने अपने भाषण में कहा कि विपक्ष – खासकर कांग्रेस – का असली एजेंडा सिर्फ सरकार गिराना था, न कि कोई रचनात्मक विकल्प देना।

विपक्षी नेता – शरद पवार, लेफ्ट के कई नेता और क्षेत्रीय दलों के प्रतिनिधि – इस बात पर जोर दे रहे थे कि यह सरकार अपना नैतिक जनादेश पूरी तरह से खो चुकी है।

वोटिंग की सुबह: भागमभाग और तनाव

वोटिंग का दिन आया। सुबह से ही संसद के गलियारों में एक तरह से भागमभाग लगी हुई थी। यह ऐसा समय था जब सरकार आज गिर भी सकती थी, कोई नई सरकार खड़ी हो सकती थी।

संसद के गलियारे खचाखच भरे हुए थे। एक तनाव का माहौल हर जगह देखा जा सकता था। सरकार और विपक्ष दोनों के फ्लोर मैनेजर्स हर सांसद को गिन रहे थे – कौन आ गया है, कौन नहीं आया, किसने बहाना बनाया है, कौन बीमार है, कोई रास्ते में है तो कितना समय लगेगा।

इसी बीच सुबह लगभग 10:45 बजे बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने वाजपेयी जी को फोन किया। रिपोर्ट्स में बताया जाता है कि BSP प्रमुख मायावती की तरफ से यह आश्वासन दिया गया कि उनके सांसद सरकार को समर्थन करेंगे।

यह सुनते ही NDA कैंप में थोड़ी राहत की सांस ली गई। लेकिन राजनीति में सुबह से शाम तक बहुत कुछ बदल जाता है। और ऐसा होने वाला था।

मायावती का यू-टर्न: पहला झटका

जैसे ही सदन में अंतिम भाषण शुरू हुए, सबकी नजर उन पार्टियों पर थी जो आखिरी समय तक अपना रुख साफ नहीं कर रही थीं।

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बहस अंतिम चरण में थी। अचानक BSP नेता मायावती जी को बोलने का मौका मिला। सबको लग रहा था कि वे सरकार को सशर्त समर्थन देंगी या तटस्थ रुख की बात करेंगी।

लेकिन हैरान करने वाली बात यह हुई कि मायावती जी ने खड़े होते ही एक सपाट लहजे में कह दिया – “BSP इस सरकार का विरोध करेगी और वोट अगेंस्ट करेगी।”

यह BJP के लिए, NDA के लिए सन कर देने वाली बात थी। कई सांसद जो वहां मौजूद थे, विश्वास नहीं कर पा रहे थे कि क्या वाकई मायावती ने ऐसा कहा है।

मायावती के ऐसा बोलते ही BSP के अन्य सांसद – जिनमें आरिफ मोहम्मद खान और अकबर अहमद भी शामिल थे – ने भी खुलकर सरकार के खिलाफ अपना रुख साफ किया।

इससे यह संकेत चला गया कि BSP का ब्लॉक अब NDA के साथ नहीं है। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और NDA के सभी नेता यह समझ चुके थे कि BSP का समर्थन खो गया।

यह वह पल था जब NDA के लिए एक मनोवैज्ञानिक धक्का था। जो नंबर उन्होंने सोच रखे थे, वे रियल टाइम में स्लिप होते जा रहे थे।

सैफुद्दीन सोज का विद्रोह: दूसरा झटका

इस राजनीतिक खेल के बीच एक और अप्रत्याशित मोड़ आया। जम्मू एंड कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद सैफुद्दीन सोज के बारे में बताया जाता है कि उस वक्त वे अपनी पार्टी लाइन के खिलाफ गए।

नेशनल कॉन्फ्रेंस दरअसल आधिकारिक रूप से NDA सरकार को समर्थन कर रही थी। लेकिन सोज सामने आए और उन्होंने अपने विवेक का हवाला देकर विपक्ष की तरफ वोट दे दिया।

समझने वाली बात यह है कि एक पार्टी जो पूरी तरह से NDA को समर्थन करने वाली थी, उसके एक सांसद अचानक NDA को समर्थन से मना कर देते हैं। यह एक बहुत बड़ा झटका था।

बाद में इस पूरे घटनाक्रम पर सोज ने अपने इंटरव्यू में कहा है कि वे इस वोट को अपनी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट मानते हैं। उनका कहना था कि उन्होंने एक सांप्रदायिक सरकार को गिराने का नैतिक निर्णय लिया। इसके लिए उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया।

यह एक वोट BSP के यू-टर्न के साथ मिलकर NDA सरकार के लिए स्थिति और गंभीर बना रहा था।

गिरिधर गमांग का विवादास्पद वोट

अब तक आपको लग रहा होगा कि मायावती के BSP वोट या सैफुद्दीन सोज के वोट से चीजें बिगड़ी होंगी। लेकिन अभी एक और बहुत बड़ा ट्विस्ट आना बाकी था।

सबसे ज्यादा विवाद उड़ीसा के उस वक्त के मुख्यमंत्री गिरिधर गमांग के वोट को लेकर हुआ। गमांग पहले लोकसभा के कांग्रेस सांसद थे। कुछ हफ्ते पहले ही उन्हें उड़ीसा का मुख्यमंत्री बनाया गया था। लेकिन अभी तक उन्होंने अपनी लोकसभा सीट से औपचारिक इस्तीफा नहीं दिया था।

BJP ने इस वोट को गिनती में शामिल ही नहीं किया था। NDA ने यह नहीं सोचा था कि गिरिधर गमांग का वोट भी गिना जाएगा।

दिलचस्प बात यह है कि संविधान के मुताबिक उनके पास कुछ महीने की विंडो थी जिससे वे राज्य विधानसभा में सदस्य बन सकते थे और साथ ही तब तक तकनीकी रूप से लोकसभा के सदस्य भी रह सकते थे। और जब वे लोकसभा के सदस्य थे तो उन्हें वोट देने का अधिकार था।

17 अप्रैल 1999 के उस दिन जब दिल्ली में संसद में वोटिंग हो रही थी, गिरिधर गमांग उड़ीसा से दिल्ली आए, संसद में उपस्थित हुए और सभी जानते थे कि उनका वोट कहां जाने वाला है।

कांग्रेस लाइन को फॉलो करते हुए उन्होंने NDA सरकार के खिलाफ अपना वोट दिया। उनका यह एक वोट अंतिम गिनती में निर्णायक साबित हुआ।

269-270: एक वोट का फर्क

वोटिंग के बाद जब नंबर स्क्रीन पर आए तो यह पता चला:

वाजपेयी सरकार को: 269 वोट
विपक्ष कैंप को: 270 वोट

सिर्फ एक वोट का फर्क था। इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा था।

स्पीकर जीएमसी बालयोगी थे। उन्होंने घोषणा की कि प्रधानमंत्री द्वारा प्रस्तुत किया गया विश्वास प्रस्ताव पराजित हो चुका है। सरकार बहुमत साबित करने में असफल रही है।

अगर सोचें कि अगर वोट टाई हो जाते – 269-269 दोनों तरफ – तो ऐसी स्थिति में स्पीकर के पास कास्टिंग वोट होता है। इससे वे स्टेटस को के पक्ष में वोट देकर सरकार को बचा सकते थे।

लेकिन एक एक्स्ट्रा विपक्षी वोट ने यह संभावना पूरी तरह से खत्म कर दी। और शायद वह वोट सैफुद्दीन सोज का था या गिरिधर गमांग का। यह आज तक बहस का विषय बना हुआ है।

इस तरह भारत की संसदीय इतिहास में पहली बार एक सरकार एक वोट से गिर गई – जो आज तक सबसे संकीर्ण हार (Narrowest Defeat) माना जाता है।

परिणाम के बाद: सदन में अलग-अलग मूड

परिणाम आते ही सदन में अलग-अलग मनोदशाएं दिखने लगीं। एक तरफ विपक्षी बेंचों पर शरद पवार जैसे कांग्रेस नेता तुरंत मायावती के पास गए और उन्हें बधाई दी। उनके रुख ने सरकार गिराने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी।

दूसरी तरफ NDA के कैंप में एक सदमे की लहर थी। निराशा थी। लालकृष्ण आडवाणी ने रिपोर्टर्स से बाहर आते हुए कहा कि वोटिंग काफी हद तक हमारी अपेक्षित लाइनों पर ही हुई। लेकिन BSP और सैफुद्दीन सोज के वोटों को हम बैलेंस नहीं कर पाए। उनके वोटों ने संतुलन को पूरी तरह से पलट दिया।

वाजपेयी जी जब बाहर निकले तो उन्होंने अपनी हार को स्वीकार किया। उन्होंने घोषणा की कि वे तुरंत कैबिनेट बैठक बुलाएंगे और फिर राष्ट्रपति के आर नारायणन को अपना इस्तीफा पेश करेंगे।

राहत की बात यह है कि बाहर निकलने के बाद वाजपेयी जी को बहुत संयमित देखा गया। हालांकि कई लोग कहते हैं कि वे अपने कमरे में जाकर पहली बार रोए थे। यह हार उनके लिए बहुत व्यक्तिगत थी।

लेकिन उन्होंने संसद का बहुत सम्मान किया, लोकतांत्रिक प्रक्रिया को महत्व दिया। और इसी वजह से बाहर निकलकर उन्होंने पूरी गरिमा के साथ अपना परिणाम स्वीकार किया।

कांग्रेस का सरकार बनाने का प्रयास विफल

सरकार गिरते ही अगला सवाल था – अब किसे सरकार बनाने के लिए बुलाया जाए? राष्ट्रपति भवन की भूमिका अचानक केंद्र में आ गई।

विपक्ष में सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस थी। कांग्रेस का नेतृत्व सोनिया गांधी कर रही थीं। उन्होंने दावा किया कि वे 272 का आंकड़ा जोड़ सकती हैं। उन्हें बस थोड़ा समय चाहिए और वे वैकल्पिक सरकार बना सकती हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक सोनिया गांधी राष्ट्रपति से मिलकर यह कह चुकी थीं कि उनके पास समर्थन है। लेकिन जब तक व्यावहारिक स्तर पर क्षेत्रीय पार्टियां पूरी तरह से संतुलित होकर साथ नहीं आ जातीं, तब तक वे ठीक से नहीं बता सकतीं।

व्यावहारिक स्तर पर जो वास्तविकता थी, वह थोड़ी अलग थी। क्षेत्रीय दल जैसे मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी या आखिरी समय तक कई ऐसी पार्टियां जो अपना समर्थन कांग्रेस के साथ भी स्पष्ट नहीं कर रही थीं।

इन सबकी वजह से कांग्रेस का यह प्रयास विफल हो गया। राष्ट्रपति नारायणन ने स्थिति का ठीक से आकलन करने के बाद संसद को भंग करने और नए चुनाव बुलाने का अंतिम फैसला किया। मुख्य कारण यही था कि कोई भी स्थिर बहुमत स्पष्ट रूप से सामने नहीं आ रहा था।

कारगिल युद्ध और वाजपेयी की नेतृत्व क्षमता

इस राजनीतिक उथल-पुथल के कुछ ही हफ्तों बाद देश के अंदर एक और बड़ा संकट खड़ा हो गया। देश को अचानक पता चला कि पाकिस्तान ने कारगिल में घुसपैठ कर दी है।

एक तरफ प्रधानमंत्री कौन होगा, यह सवाल खड़ा था। दूसरी तरफ हमारे एक नाकारा पड़ोसी पाकिस्तान ने एक बार फिर विश्वासघात किया और घुसपैठ शुरू कर दी।

इसका परिणाम निकला – कारगिल युद्ध। हमने पाकिस्तान से शांति की मांग की थी। दिल्ली से लाहौर तक जो बस सेवा चलती थी, वाजपेयी जी ने वह बस 1999 में ही चलाई थी। लेकिन शांति वार्ता के बदले हमें क्या मिला? कारगिल का युद्ध।

चिंता का विषय यह था कि इस राजनीतिक उथल-पुथल के बीच कुछ ही हफ्तों के बाद कारगिल संघर्ष फूट पड़ा। जहां भारतीय सेना ने उस ऊंचाई वाली स्थिति पर पाकिस्तानी घुसपैठियों, आतंकवादियों और पाकिस्तानी सेना को पीछे धकेलना शुरू किया। और उन्हें हार का सामना कराया। पाकिस्तान की बहुत बड़ी हार इस युद्ध में हुई।

लेकिन यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि जब कारगिल युद्ध शुरू हुआ, वाजपेयी जी को कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में कार्यालय संभालना पड़ा क्योंकि देश पर एक राष्ट्रीय सुरक्षा संकट था।

कारगिल युद्ध के दौरान उनकी नेतृत्व शैली बेहद संयमित, दृढ़ और कूटनीतिक तरीके से मजबूत रही। जनता ने इसे दर्ज किया। लोगों ने देखा कि एक व्यक्ति जो अभी एक वोट से सरकार से जाने वाले थे, प्रधानमंत्री पद खो देते। लेकिन उन्होंने संकट की घड़ी में देश को कैसे बचाया।

कारगिल विजय से मिला राजनीतिक लाभ

कारगिल की जो विजय थी, उसने BJP खेमे को एक राष्ट्रवादी गति दी। जनता के सामने अब यह कहानी थी कि एक प्रधानमंत्री जिसे सिर्फ एक वोट से गिराया गया था, फिर भी युद्ध के समय नेतृत्व, परिपक्वता और गरिमापूर्ण तरीके से सामने आए।

इसलिए उन्हें एक और स्थिर जनादेश मिलना चाहिए। और इसके बाद इसी साल 1999 के सितंबर और अक्टूबर महीने में भारत ने एक बार फिर लोकसभा चुनाव देखे।

जब लोगों ने वोटिंग की, इस बार लोगों का मूड वोट करते समय कुछ अलग था। हाल ही में हमने कारगिल का युद्ध भी जीता था और कुछ महीनों पहले यह ऐतिहासिक हार – एक वोट से – भी हुई थी।

इस बार NDA को एक बहुत बड़ा बहुमत मिला। पहली बार 1984 के बाद किसी गठबंधन को इतना सीधा बहुमत मिला था।

13 अक्टूबर 1999 को अटल बिहारी वाजपेयी को एक बार फिर देश का प्रधानमंत्री बनाया गया। वे देश के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेते हैं। इस बार अपेक्षाकृत अधिक स्थिर गठबंधन के साथ। यह कार्यकाल उनका पहला कार्यकाल था जिसे उन्होंने पांच साल पूरे किए।

एक ऐसा अध्याय जो दोबारा नहीं दोहराया जा सकता

यह देश का एक ऐसा घटनाक्रम रहा है, एक ऐसा अध्याय रहा है जिसे कहा जाता है – “Once in a Blue Moon” किस्म की चीज। यह हर बार नहीं हो सकता।

और जब देश में यह हुआ तो लोग सन्न रह गए कि क्या ऐसा भी वाकई हो सकता है कि किसी प्रधानमंत्री को मात्र एक वोट की वजह से अपनी कुर्सी छोड़नी पड़े। और वह एक वोट भी इस तरह का हो कि आज तक तय नहीं हो पाया कि वह वोट असल में किसका था।

देखा जाए तो यह सिर्फ एक राजनीतिक घटना नहीं थी। यह भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता की परीक्षा थी। वाजपेयी जी ने जिस गरिमा से हार स्वीकार की, वह आज की राजनीति में दुर्लभ है।

अगर गौर करें तो आज के दौर में अक्सर हार के बाद आरोप-प्रत्यारोप, मीडिया के सामने चिल्लाना, एक-दूसरे पर दोषारोपण – यह सब आम है। लेकिन उस समय के राजनेता अलग थे। हर पार्टी के नेता अच्छे थे। उस समय अलग चीजें देखने को मिलती थीं।

मुख्य बातें (Key Points)

• 17 अप्रैल 1999 को अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार मात्र एक वोट (269-270) से गिर गई – भारतीय संसदीय इतिहास में यह पहली बार हुआ

• जयललिता की AIADMK ने अपने 18 सांसदों का समर्थन वापस लेकर संकट खड़ा किया, उनकी मांग थी DMK सरकार बर्खास्त करना और भ्रष्टाचार मामले वापस लेना

• BSP प्रमुख मायावती ने पहले समर्थन का आश्वासन दिया, लेकिन सदन में खड़े होकर सरकार के खिलाफ वोट किया – यह पहला बड़ा झटका था

• जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस के सैफुद्दीन सोज ने पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर विपक्ष को वोट दिया, इसके लिए उन्हें पार्टी से निकाला गया

• उड़ीसा के मुख्यमंत्री गिरिधर गमांग का वोट सबसे विवादास्पद रहा – वे अभी भी तकनीकी रूप से लोकसभा सदस्य थे और उन्होंने कांग्रेस लाइन पर वोट दिया

• सोनिया गांधी ने वैकल्पिक सरकार बनाने का प्रयास किया लेकिन क्षेत्रीय दलों के समर्थन में स्पष्टता न होने से विफल रहीं

• वाजपेयी जी ने कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में कारगिल युद्ध में नेतृत्व किया, जिससे उनकी छवि मजबूत हुई

• अक्टूबर 1999 के चुनावों में NDA को स्पष्ट बहुमत मिला और वाजपेयी जी ने पूरे पांच साल का कार्यकाल पूरा किया


FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: 1999 में वाजपेयी सरकार किस वोट अंतर से गिरी थी?
उत्तर: 17 अप्रैल 1999 को अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार मात्र एक वोट से गिरी। विश्वास मत में सरकार को 269 वोट मिले जबकि विपक्ष को 270 वोट मिले। यह भारतीय संसदीय इतिहास में पहली बार हुआ जब कोई सरकार सिर्फ एक वोट से गिरी।

प्रश्न 2: वह निर्णायक एक वोट किसका था जिससे सरकार गिरी?
उत्तर: यह आज तक बहस का विषय है। मुख्य रूप से तीन वोट विवादास्पद रहे – मायावती का BSP का यू-टर्न, सैफुद्दीन सोज का पार्टी लाइन के खिलाफ वोट, और उड़ीसा के मुख्यमंत्री गिरिधर गमांग का तकनीकी रूप से लोकसभा सदस्य होते हुए विपक्ष को दिया गया वोट। इनमें से किसी एक ने भी अंतिम परिणाम बदल दिया।

प्रश्न 3: 1999 में सरकार गिरने के बाद क्या हुआ?
उत्तर: सरकार गिरने के बाद कांग्रेस ने वैकल्पिक सरकार बनाने का प्रयास किया लेकिन विफल रही। राष्ट्रपति ने संसद भंग कर दी और मध्यावधि चुनाव बुलाए गए। इसी दौरान कारगिल युद्ध हुआ जिसमें वाजपेयी जी के नेतृत्व को सराहा गया। अक्टूबर 1999 के चुनावों में NDA को स्पष्ट बहुमत मिला और वाजपेयी जी फिर से प्रधानमंत्री बने।


 

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