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The News Air - Breaking News - BJP का बढ़ता प्रभुत्व: क्या भारत बन रहा One-Party Nation? पश्चिम बंगाल जीत से बड़ा सवाल

BJP का बढ़ता प्रभुत्व: क्या भारत बन रहा One-Party Nation? पश्चिम बंगाल जीत से बड़ा सवाल

West Bengal में ऐतिहासिक जीत के बाद भारत का राजनीतिक नक्शा हुआ भगवा, राज्यसभा से लेकर न्यायपालिका तक संस्थाओं की भूमिका पर सवाल, विपक्ष की कमजोरी और SIRE विवाद

The News Air Team by The News Air Team
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in Breaking News, NEWS-TICKER, राष्ट्रीय, सियासत, स्पेशल स्टोरी
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One-Party Nation
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BJP One-Party Dominance को लेकर एक बड़ी बहस छिड़ गई है। कल हमारे देश की राजनीति में बहुत बड़ा दिन रहा है। स्टेट असेंबली इलेक्शन्स के रिजल्ट्स आए जिसमें बंगाल के चुनावों में बहुत बड़ा उलटफेर हुआ है।

BJP has come to power in West Bengal for the first time in history. उसी के साथ-साथ असम में उन्होंने अपनी सरकार, अपनी टर्म को रिपीट किया है और NDA अलायंस ने पुडुचेरी में भी अपना झंडा फहरा दिया है।

यह जो चुनाव परिणाम आए हैं, इसको हम न सिर्फ यह समझें कि बीजेपी का फुटप्रिंट इंडिया में और एक्सपैंड कर रहा है। जहां उन्होंने वन ऑफ द मेजर अपोजिशन लीडर ममता बनर्जी को उनकी सीट से, उनके गढ़ से उखाड़ फेंका है। बल्कि इसी के साथ-साथ हम ये देखें कि इन चुनावों का आने वाले जो बीजेपी के गढ़ रहे हैं, खासकर गुजरात और उत्तर प्रदेश की बात करूं, उनके ऊपर भी असर देखा जाएगा।

Indian Express का राजनीतिक मानचित्र: पूरा भारत भगवा

इन चुनाव परिणामों को देखते हुए बंगाल की सफलता को देखते हुए आज Indian Express ने अपनी वेबसाइट पर यह पॉलिटिकल मैप ऑफ इंडिया जारी किया। हां बिल्कुल, जहां आप देख सकते हैं कि आपको सैफरन कलर मुख्य रूप से इंडिया में दिख रहा है।

जहां आपको ब्लू, डार्क ब्लू जो कि विपक्ष या येलो की बात करूं – उनके द्वारा शासित राज्य बहुत कम हैं। इस मैप को देखकर एक चीज जरूर ज़हन में आती है – क्या आज का भारत One-Party System या One-Party State बन चुका है?

One-Party System क्या है? भारत में संभव है?

क्योंकि One-Party System को जब हम देखते हैं तो हमारे जहन में कुछ ऐसे देशों के नाम आते हैं जिसमें सबसे पहले जुबान पर नाम आता है चीन का। One-Party System वास्तव में एक कानूनी रूप से या संवैधानिक रूप से चलाया जाने वाला सिस्टम है, जो भारत में नहीं है।

जहां एक देश में सिर्फ एक ही पार्टी का प्रचार होगा, एक ही पार्टी शासन करेगी। उसके उम्मीदवार बदलते रहते हैं। ऐसा कुछ भारत में कानूनी या संवैधानिक रूप से नहीं है। चीन ने तो संवैधानिक रूप से कर दिया इसको। भारत में नहीं है।

लेकिन क्या नरेंद्र मोदी द्वारा शासित सरकार One-Party Rule स्थापित कर रही है इंडिया में? खासकर हम जब ऐसे पॉलिटिकल मैप को देखते हैं।

इतिहास में इंदिरा गांधी का दौर: “India is Indira, Indira is India”

ऐसा नहीं है कि आज की बीजेपी ऐसा कुछ फुटप्रिंट जमाने की ट्राई कर रही है या जमा पाई है। जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो कांग्रेस लीडर, मोस्ट फेमस लीडर इंदिरा गांधी जी की सरकार के समय पर भी कुछ ऐसा ही सोचा जाता था।

जहां कहा जाता था “India is Indira and Indira is India”। इतने मजबूत नेता के समय पर भी ऐसा ही कुछ विज़नाइज़ किया जाता था। जहां हम देखते हैं कि उनकी कुछ विवादास्पद कदम, जो कि 1975 की इमरजेंसी को लेकर थे, उनका शासन, उनकी सरकार गिर जाती है।

और बहुत सारे फेरबदल आ जाते हैं और वो मुमकिन नहीं हो पाता, जो शायद आज की बीजेपी सरकार might be able to establish in its 12 year term at the Center as well.

तीन स्तरों पर विश्लेषण जरूरी: समाज, संस्थाएं और नेतृत्व

यहां जब हम इतने बड़े पैमाने पर किसी चीज को एनालाइज कर रहे हैं तो सिर्फ चुनाव परिणाम देखकर या केंद्रीय सरकार को देखकर हम किसी निर्णय को पास नहीं कर सकते। इसके लिए हमें कुछ चीजों को तोड़-मरोड़ कर देखना पड़ेगा।

जब आपको किसी बड़े पैमाने की चीज को एनालाइज करना हो तो उसको बेसिक तीन तत्वों में तोड़कर देखिए:

1. समाज स्तर (Society Level): लोगों के स्तर पर, समाज के स्तर पर वो चीज कैसे पूरी हो पाई है

2. संस्थाएं (Institutions): भारत में विधायिका, न्यायपालिका या कार्यपालिका की बात करें – उन संस्थाओं ने किस तरीके से इस चीज को रिस्पॉन्ड किया है

3. नेतृत्व (Leadership): जो हम किसी भी बड़े स्केल प्रोजेक्ट को अंजाम देना चाहते हैं

राज्यसभा की गुत्थी: 65 से 113 तक का सफर

लोगों के हाथ में वोट डालने की पावर है। लोगों के हाथ में सरकार को रिजेक्ट या चूज़ करने की पावर है। उस चीज को हम चुनाव परिणामों के रूप में देखते हैं।

पर अब ये जो संस्थाएं हैं और लीडर्स हैं – लीडर्स को हम सभी बखूबी जानते हैं। उनकी जीवनियां पढ़ते हैं। उनके द्वारा दिए गए भाषण को सुनते हैं। लेकिन संस्थाओं ने सबसे पहले हम देखेंगे कि किस तरीके से रेसिस्ट या असिस्ट किया है इस One-Party Rule की विज़न को देखते हुए।

जिसमें मैं सबसे पहले विधायिका की बात करने वाला हूं। और जब भी बीजेपी और संसद या विधायिका की बात होती है तो सबसे पहले दिमाग में ज़हन में आता है राज्यसभा।

क्योंकि बीजेपी के पास लोकसभा में नंबर्स रहे हैं – जब से उन्होंने केंद्र में सरकार बनाई, जो कि 2014 की बात है। लेकिन राज्यसभा उनके रास्ते का एक कांटा बना रहा है।

खासकर जब 2014 में बीजेपी-NDA के जरिए सरकार बनाती है तो राज्यसभा में 245 सदस्यों में से मात्र 65 थे उनके पास। मतलब अगर मैं केंद्र में सरकार बनाकर बैठा हूं तो ऐसा जरूरी नहीं है कि मैं कोई कानून पास करवा सकूं। क्यों? कांग्रेस के पास उनके UPA अलायंस के पास 102 नंबर्स थे वहां पर।

तो लोकसभा से तो शायद आप बिल पास करवा सकते हैं। लेकिन राज्यसभा से आपके पास सदस्य नहीं थे, न नंबर्स थे। तो ये नंबर्स लगभग 4 साल बाद 88 पर पहुंचते हैं। और आज की अगर मैं बात करूं तो NDA के पास, बीजेपी के पास खुद 113 नंबर्स हैं राज्यसभा में 245 में से।

यहां ध्यान देने वाली बात है – तो यह धीरे-धीरे राज्यसभा की जो गुत्थी है, उसको सुलझाने में स्टेट इलेक्शन्स का बहुत-बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण हाथ रहा है। क्योंकि राज्यसभा के सदस्यों को चुनने का हक राज्य के MLA को होता है।

इस बात का आभास बीजेपी को बहुत पहले ही हो गया था – केंद्र पर रहते हुए भी हम राज्यों में अपना होल्ड बनाए बिना हम कुछ सरकार के जरिए पास नहीं कर सकते, खासकर जब हम राज्यसभा, संसद की बात कर रहे हैं।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल: आधार केस से शिवसेना तक

जब इस संस्था को, विधायिका को बीजेपी ने इस गुत्थी को सुलझाया राज्य चुनावों के जरिए, तो एक और हमारे पास बहुत ही महत्वपूर्ण संस्था है जो कि न्यायपालिका – जो आए दिन न्यूज़ में बनी रहती है कि कोर्ट में ये निर्णय दिया, वो निर्णय दिया।

लेकिन क्या न्यायपालिका पिछले 10 सालों में इस चीज को देखते हुए कि बीजेपी का जो होल्ड है, जो मजबूत होल्ड है, वो बढ़ता जा रहा है – क्या न्यायपालिका का रुख भी बदला है? क्या न्यायपालिका कमिटेड जुडिशियरी तो नहीं हो गई है जो सरकार के विरुद्ध नहीं जाना चाहती?

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अब जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो बहुत ही शुरुआती समय पर 2016 में आधार केस – जो कि आधार कार्ड इसको पास करने के लिए आधार बिल बनाया गया था, उसको मनी बिल की तरह पास किया गया था। जबकि उसमें कोई भी ऐसे फीचर्स नहीं दिख रहे थे कि यह मनी बिल को पूरी तरह से संतुष्ट करें।

मानते हैं चलिए लोकसभा स्पीकर जो है, बहुमत लोकसभा से आता है तो वो जो सत्ताधारी सरकार है उसी की हां में हां मिलाएगा। लेकिन न्यायपालिका ने भी जब 4:1 से इसको ओके कर दिया तो एक सवाल उठा था – क्या न्यायपालिका भी सरकार का साथ तो नहीं दे रही है? क्या न्यायपालिका अपना स्वतंत्र विचार तो नहीं रख पा रही है?

यहां पर 4:1 निर्णय में जो एक विपरीत निर्णय था वो जस्टिस चंद्रचूड़ का था। उन्होंने बोला भी कि ये जो सरकार है, ये जो हो रही इस वक्त गतिविधियां हैं, “This is not constitutional.”

रंजन गोगोई से शिवसेना विभाजन तक: राजनीतिक संबंध

और यहां आप देख सकते हैं कि किस तरीके से न्यायिक नियुक्तियों में हमें राजनीतिक संबंध दिखते शुरू हो जाते हैं। आप बोलेंगे ये बहुत बड़ा आरोप है या बहुत बड़ा सवाल है कि न्यायिक नियुक्तियों में हमें राजनीतिक या पार्टी संबंध कैसे दिख रहे हैं?

आप जरूर देख सकते हैं – हमारे पूर्व रहे CJI यहां पर रंजन गोगोई साहब किस तरीके से उनको राज्यसभा की MP सीट दे दी जाती है, just after his retirement। ऐसा नहीं है कि बीजेपी पहली पार्टी है जिसने चीफ जस्टिस को संसद में सीट दी। पहले भी ऐसा हुआ है। लेकिन इस चीज की तादाद, इस चीज की घटनाएं और ज्यादा बढ़ गई हैं।

इनफैक्ट रंजन साहब के MP टेन्योर के दौरान पूरे छह साल में इन्होंने सिर्फ एक डिबेट में अपना पार्ट रखा था। अपनी चीज, अपना पॉइंट ऑफ व्यू आगे रखा था। इसके अलावा किसी में भी उनका कोई रोल नहीं था। सरकार के खिलाफ एक प्रश्न नहीं उठाया इन्होंने 6 साल में राज्यसभा में रहते हुए।

और इसी में एक मैं सत्ता से जुड़ी हुई बात जरूर आगे रखूंगा। 2023 में जो शिवसेना में इतना बड़ा हंगामा हुआ कि ओरिजिनल पार्टी कौन सी है – जहां ठाकरे साहब के विरुद्ध शिंदे साहब खड़े हो जाते हैं।

तो स्पीकर ने तो चलिए ठीक है, उन्होंने शिंदे साहब के हक में निर्णय दिया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा जब हम देखते हैं संविधान की व्याख्या की जाती है, संविधान को समझा जाता है, पढ़ा जाता है तो वो किस तरीके से मैनिपुलेशन होते हुए शिंदे साहब के हक में बात कर दी जाती है। और वहीं से बीजेपी की धमाकेदार एंट्री होती है महाराष्ट्र में।

जिस बीजेपी को कभी महाराष्ट्र में बहुमत तो बहुत दूर की बात है, बहुमत के आसपास का नंबर नहीं मिल पाता था – वो शिंदे साहब के साथ मिलकर सरकार बना देते हैं।

कानूनी तंत्र का उपयोग: जम्मू-कश्मीर धारा 370

इनफैक्ट आप जरूर देख सकते हैं कि यह जो कानूनी मशीनरी है, कानूनी प्रक्रिया है, इस सरकार ने उसका कैसे इस्तेमाल किया। मैं इसको यह नहीं बोलूंगा यह दुरुपयोग है या अच्छा उपयोग है। यह आप जरूर तय कर सकते हैं।

2019 में जब J&K को एक राज्य से UT बनाया गया तो बहुत लोगों ने इसको मास्टर स्ट्रोक बोला। लेकिन बीजेपी ने किस तरीके से इस कानूनी लूपहोल को एक्सप्लॉइट करते हुए – मतलब राष्ट्रपति के द्वारा अनुरोधित धारा 370 को कमजोर करने के लिए, 370 को हटाने के लिए – वहां पर विधानसभा मौजूद नहीं है।

उनकी अनुपस्थिति में गवर्नर बैठे हैं क्योंकि राष्ट्रपति शासन लगा है। और राष्ट्रपति शासन के दौरान धारा 356 क्या कहती है कि गवर्नर को राष्ट्रपति की बात सुननी पड़ेगी।

तो राष्ट्रपति की बात सुनते हुए – मतलब जो नोट राष्ट्रपति ने राज्य विधानसभा को भेजा 370 हटाने के लिए, वो वापस राष्ट्रपति के पास ही आ जाता है उसको ओके करने के लिए। यह है कानूनी लूपहोल।

SIRE विवाद: बंगाल में 96 लाख वोटर्स डिलीट

और इसी के साथ बहुत न्यूज़ में बना हुआ है SIRE (Special Intensive Revision Exercise) – जो कि चुनाव आयोग ऑफ इंडिया द्वारा शुरू किया गया पिछले साल की एक एक्सरसाइज है कि जितने भी वोटर्स की छंटाई होगी, जो वोटर्स सही मायने में वहां पर वोट डालने के लिए पात्र हैं उनको रखा जाएगा। बाकी जितने भी जो लोग नहीं रहे हैं, वो लोग माइग्रेट कर गए, उनको हटा दिया जाएगा।

ये जो पूरे दो साल निकले – 2025 और 26 की बात करूं, 27 में भी यह SIRE का बहुत बड़ा रोल है। बंगाल के चुनावों में लगभग 90 लाख, टू बी एग्जैक्ट 96 लाख वोटर्स को “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” कहकर इस वोटर लिस्ट से हटा दिया गया था। जिसने बंगाल चुनावों में बहुत बड़ा रोल निभाया।

आप यहां देख सकते हैं कि ये लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी को ठीक करते-करते वो नंबर फिर भी 25 लाख तक आकर रुक गया था। जहां पश्चिम बंगाल में हम बोलते हैं लैंडस्लाइड विक्ट्री मिली है बीजेपी को, वहां पर इस एक्सरसाइज का बहुत बड़ा रोल है।

जहां केंद्रीय सरकार ने अपने द्वारा, उनके हाथ में जो मशीनरी है, उसका इस्तेमाल किया। इनफैक्ट 2023 में डीलिमिटेशन एक्सरसाइज की गई थी असम में। जहां पर विपक्ष ने बहुत बड़ा सवाल उठाया था कि आपने मुस्लिम डोमिनेटेड निर्वाचन क्षेत्रों का जो नंबर है वो 35 से 22 तक ला के छोड़ दिया और हिंदू बहुमत वाले निर्वाचन क्षेत्र बढ़ा दिए गए हैं।

चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर उंगली

तो ये जो रणनीति है, ये जो कानूनी मशीनरी का उपयोग है – मतलब नेता ऊपर बैठे हैं, संस्थाओं का उपयोग किया जा रहा है ताकि लोगों के जरिए जो हम वोट डाल रहे हैं, जो लोगों के जरिए हम उनको हिस्सा बना रहे हैं – जो लोग, जो वोटर के आसपास की हम दीवारें खींच रहे हैं, हम उन दीवारों को चेंज कर दें।

इसी के बीच में जब चुनावों की बात हो रही है तो चुनाव आयोग ऑफ इंडिया को तो हम नहीं भूल सकते। चुनाव आयोग संवैधानिक रूप से एक स्वतंत्र निकाय है। लेकिन इसके जो सदस्य होते हैं – तीन सदस्यीय निकाय को नॉमिनेट किया जाता है। इनको चुना जाता है और जिसमें जो चुनने वाली निकाय है, इट्स अ थ्री मेंबर बॉडी और उसमें भी सरकार की बहुमत रहती है। मतलब जो दो लोग हैं वो सरकार के रहेंगे।

आप देख सकते हैं किस तरीके से विपक्ष ने वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त को – ये फोटो जारी की है हार पहनाते हुए कि “कांग्रेचुलेशंस बंगाल, आप जीत गए हैं।” जबकि वो राजनीतिक व्यक्ति नहीं है। मतलब ऐसे कुछ आरोप-प्रत्यारोप चुनाव आयोग पर बहुत अरसे से डाले जाते रहे हैं।

जैसे कि फॉर एग्जांपल EVM मशीन का मालफंक्शन करना या उसको कैप्चर कर लेना। और इस बार तो खासकर जब मैं SIRE की बात कर रहा हूं तो SIRE चुनाव आयोग ने उसी समय पर ट्रिगर किया, उसी समय पर शुरू किया जब स्टेट असेंबली चुनाव थे।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट के बार-बार कहे जाने पर कि आपकी ये एक्सरसाइज, ये छंटाई लोगों को हटाने के लिए नहीं, लोगों को शामिल करने के लिए इस्तेमाल होनी चाहिए – जिन लोगों का नाम नहीं है वोटर लिस्ट में। जबकि इसमें ज्यादातर छंटाई में, बंगाल में खासकर लोगों को हटाया गया।

वाशिंग मशीन और मोदी का वाशिंग पाउडर

अब 2024 लोकसभा चुनाव हुए थे जिसमें नरेंद्र मोदी फिर से तीसरे कार्यकाल के रूप में PM की शुरुआत की थी। शायद कुछ लोगों ने फॉलो किया हो – उससे पहले दो चुनाव आयुक्तों ने, तीन सदस्यीय निकाय में से दो ने, कुछ महीनों बाद इस्तीफा दे दिया था।

हम नहीं जानते क्या यह दबाव है संस्थाओं के ऊपर सरकार का या यह व्यक्तिगत चॉइस रही है।

और इसी को देखते हुए पिछले 10 दिन की कहानी जिसने सोशल मीडिया को घेरा हुआ था कल के चुनाव परिणाम आने से पहले – “बीजेपी की वाशिंग मशीन और मोदी का वाशिंग पाउडर” – जिसमें संस्थाएं लाइक ED (Enforcement Directorate), CBI (Central Bureau of Investigation) का नाम शामिल होता है।

और आपको पता है किस तरीके से लोग, MP बीजेपी में शामिल होते हैं। तो आप बोलेंगे कि यह तो बहुत ही बड़े आरोप-प्रत्यारोप हैं। लेकिन ये मैं नहीं – ये देश का मीडिया, देश के लोग, देश की संस्थाओं द्वारा किए जाने वाले जो कार्य हैं, उनकी बात कर रहे हैं हम यहां पर।

कि किस तरीके से ये जो आपको सैफरन कलर दिख रहा है, ये साम दाम दंड भेद की बात कर रहा हूं मैं यहां पर।

विपक्ष मर चुकी है? INDIA गठबंधन का हाल

तो अब ये सब कुछ देखते हुए एक चीज तो आती है दिमाग में – क्या विपक्ष मर चुकी है? क्या वी डोंट हैव एन ऑपोज़िशन? आर वी रियली One-Party Rule, One-Party System इन इंडिया?

तो ये सवाल तो हर भारतीय के ज़हन में आता है – क्या विपक्ष खत्म हो चुकी है क्या? इस मैप को देखते हुए, पॉलिटिकल मैप को देखते हुए तो दिख रहा है कि विपक्ष शायद डेड है। It is as good as dead. क्योंकि तुम्हारे नंबर्स जो हैं वो कितने नीचे गिर चुके हैं, वो हमें परिणाम दिखा रहे हैं। और हमें नहीं पता यह और कितनी गिरावट में शामिल होने वाले हैं।

और बीजेपी के द्वारा तो यही कहा गया है कि जो INDIA अलायंस 2024 चुनाव से पहले बनी थी, उसका कोई भविष्य नहीं है। इनफैक्ट यह अलायंस चुनाव लड़ने से पहले ही टूट गई थी। जो कि हम बीजेपी के जरिए आप देख सकते हैं कि कैसे तेलंगाना में और बिहार में यह अलायंस टूटती हुई दिख रही थी हमें।

बीजेपी की रणनीति: विविधता में एकता

अब जब हम आगे देखते हैं तो एक तो चीज होती है कि विपक्ष की मजबूती हो रही है। लेकिन बीजेपी ने विपक्ष द्वारा शासित राज्य जो कि 20 साल, 15 साल, 25 साल से चल रहे राज्य जहां बीजेपी सरकार नहीं बना पा रही थी – उनको स्वीपिंग विक्ट्री से हासिल किया है।

जिसमें दिल्ली का जरूर नाम आता है, जहां उन्होंने नए CM, नई सरकार बनाई है 27 साल बाद। और यह कोई छोटी-मोटी बात नहीं है। यह बीजेपी के धुरंधर लीडर भी नहीं कर पाए थे इससे पहले।

और आप देखिए किस तरीके से बिहार में 20 साल से चल रही नीतीश सरकार के साथ उन्होंने यह नहीं कि उनके खिलाफ लड़ना है। कई बार दुश्मन को दोस्त बनाना पड़ता है। दुश्मनी कर ली। कुछ हासिल नहीं हुआ। दोनों को नुकसान है। आइए दोस्ती करते हैं।

और इसमें जब हम देखते हैं कि बीजेपी की जो एक रणनीति है – बहुत सारी नीतियों के अंदर मैं एक नीति की बात करूंगा कि ये One-Party, One Ideology को इन्होंने नहीं रखा है। इनको जब दिख रहा है कि भारत में इतनी बड़ी विविधता है – जब पटेल्स ऑफ गुजरात से हमें अहोम्स ऑफ असम तक जाना है, हमें जब जम्मू-कश्मीर से साउथ तक जाना है तो हमें एक आइडियोलॉजी से काम नहीं होगा।

तो बीजेपी ने अपनी आइडियोलॉजी, अपनी रणनीति में बहुत सारी स्पेस बनाई है जहां दूसरों की आइडियोलॉजी को भी शामिल किया जा सकता है।

तो मैं क्या कहना चाह रहा हूं कि यह जो भगवा रंग है, यह भगवा रंग यह एक रंग से नहीं रंगा है। इसमें बहुत सारे रंगों को मिलाया गया है ताकि किसी को भी ऐसा महसूस न हो कि मैं छूट गया हूं या मेरी पहचान छूट गई है या मुझे कहीं से किसी से किसी भी आइडियोलॉजी से खतरा है यहां पर।

निष्कर्ष: लेफ्ट बनाम राइट से राइट बनाम राइट की ओर

तो इस चीज को देखते हुए जब आप किसी सिविल सर्विस एग्जाम की तैयारी कर रहे हैं – और ये जो मैप है, अंतत: जिससे हम शुरुआत कर रहे हैं, वहीं पर हम आकर देखते हैं कि ये साम दाम दंड भेद द्वारा बनाई गई जो नीतियां हैं, द्वारा बनाई गई जो संस्थाएं हैं, नेतृत्व है – जिससे लोगों के ऊपर प्रभाव जरूर आया है। और लोगों ने आपके सामने है परिणाम जो हैं, वो किस तरीके से दिख रहे हैं।

इस पर मैं आपको यह नहीं कहता कि “This is a very good political party” या “This is a very bad political party” – वो आपका अनुभव है, वो आपका विचार है।

मैं आपको यह दिखा रहा हूं कि इस चुनाव परिणामों के जो एक पर्व बन गया है हमारे देश में आज – कि इस चुनाव परिणाम से अगर हम पीछे जाकर देखते हैं तो पिछले 12 साल की ये जो यात्रा रही है, क्या ये भारत को One-Party State या One-Party System के रूप में हम देख सकते हैं इसको?

तो एक बात तो तय है कि अब यह लेफ्ट बनाम राइट की जो एक राजनीतिक युद्ध है या राजनीतिक प्रतिस्पर्धा है, उसमें लेफ्ट तो हमें बहुत पीछे छिटकता हुआ दिख रहा है। तो अब ये जो नैरेटिव है, ये जो एक सोच है, अब इसको राइट बनाम राइट के कॉन्टेक्स्ट में ही आगे बढ़ाया जा सकता है।

क्योंकि लेफ्ट बनाम राइट में शायद भारत ने राइट को चुन लिया है, अपना लिया है। अब इसमें आगे की जो यात्रा है, आगे का जो कॉन्टेस्ट है – क्योंकि हम देखते हैं इसके बाद क्या होगा। अगर प्रधानमंत्री मोदी जी जब चले जाएंगे सत्ता से, जब वो राजनीति छोड़ देंगे, इसके बाद क्या होगा?

तो यह राइट बनाम राइट की एक प्रतिस्पर्धा के रूप में ही निखर कर आ सकता है। क्योंकि लेफ्ट का जो शासन है वो सिकुड़ता हुआ दिख रहा है – खासकर ममता बनर्जी के बंगाल से बाहर होने के बाद।


मुख्य बातें (Key Points)

• पश्चिम बंगाल में पहली बार बीजेपी की सरकार, ममता बनर्जी 15 साल बाद सत्ता से बाहर

• Indian Express के राजनीतिक मानचित्र में पूरा भारत भगवा, विपक्षी राज्य गिनती के

• राज्यसभा में बीजेपी की संख्या 2014 में 65 से बढ़कर अब 113 हुई

• SIRE के तहत बंगाल में 96 लाख वोटर्स डिलीट, असम में डीलिमिटेशन से मुस्लिम सीटें 35 से घटकर 22

• न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल – आधार केस 4:1, शिवसेना विभाजन, जम्मू-कश्मीर धारा 370 का कानूनी लूपहोल


FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: क्या भारत वास्तव में One-Party System बन रहा है?

उत्तर: संवैधानिक रूप से भारत में One-Party System नहीं है जैसा चीन में है। लेकिन राजनीतिक रूप से बीजेपी का प्रभुत्व बढ़ रहा है। 2026 के राज्य चुनावों में पश्चिम बंगाल, असम, पुडुचेरी में जीत के बाद Indian Express के मानचित्र में अधिकांश राज्य भगवा हो गए हैं। राज्यसभा में बीजेपी की संख्या 2014 में 65 से बढ़कर 113 हो गई है। विपक्ष कमजोर हो रहा है और INDIA गठबंधन टूट चुका है।

प्रश्न 2: SIRE (Special Intensive Revision Exercise) क्या है और इसका चुनाव पर क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर: SIRE चुनाव आयोग द्वारा वोटर लिस्ट अपडेट करने की प्रक्रिया है जिसमें मृत, स्थानांतरित या डुप्लिकेट वोटर्स हटाए जाते हैं। पश्चिम बंगाल में SIRE के तहत 96 लाख वोटर्स “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” के नाम पर डिलीट किए गए। विपक्ष का आरोप है कि यह बीजेपी को फायदा पहुंचाने के लिए किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि SIRE लोगों को जोड़ने के लिए हो, हटाने के लिए नहीं।

प्रश्न 3: क्या न्यायपालिका और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता प्रभावित हुई है?

उत्तर: इस पर सवाल उठते रहे हैं। 2016 में आधार बिल को मनी बिल के रूप में 4:1 से पास किया गया। पूर्व CJI रंजन गोगोई को रिटायरमेंट के तुरंत बाद राज्यसभा सीट मिली (हालांकि 6 साल में उन्होंने सरकार के खिलाफ कोई सवाल नहीं उठाया)। 2023 में शिवसेना विभाजन पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय शिंदे गुट के पक्ष में आया। चुनाव आयोग की तीन सदस्यीय निकाय में दो सरकार के होते हैं। 2024 लोकसभा चुनाव से पहले दो चुनाव आयुक्तों ने इस्तीफा दे दिया था।

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