Iran America Talks: दुनिया भर में शांति की उम्मीद लगाए बैठे लोगों के लिए यह खबर निराशाजनक है। ईरान ने साफ-साफ कह दिया है कि वह इस्लामाबाद में होने वाली बातचीत के लिए कोई टीम नहीं भेजेगा। पाकिस्तान की तमाम कोशिशों के बावजूद Iran America Talks अब पूरी तरह अधर में लटक गई है।
देखा जाए तो यह सिर्फ एक कूटनीतिक झटका नहीं है। यह उस पूरी प्रक्रिया का ठहराव है जिस पर दुनिया की निगाहें टिकी थीं। 22 अप्रैल को सीजफायर खत्म होने वाला है, और अब सवाल यह है कि डोनाल्ड ट्रंप क्या करेंगे – फिर से युद्ध या फिर एक और सीजफायर?
ईरान का साफ इनकार: इस्लामाबाद में नहीं पहुंची कोई टीम
ईरान के विदेश मंत्रालय ने बिना किसी लाग-लपेट के स्पष्ट कर दिया है कि बातचीत में शामिल होने की उसकी कोई योजना नहीं है। ईरान के स्टेट मीडिया ने ट्वीट किया कि देश का कोई भी प्राथमिक, द्वितीयक या फॉलोअप कूटनीतिक मिशन इस्लामाबाद के लिए रवाना नहीं हुआ है।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ लगातार अपील करते रहे कि ईरान बातचीत की मेज पर आए। लेकिन तेहरान ने हर अपील को नजरअंदाज कर दिया। यह सिर्फ एक नकारात्मक जवाब नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संदेश भी है।
दिलचस्प बात यह है कि जिस अब्बास अराकची ने 17 अप्रैल को होरमुस जलडमरूमध्य खोलने का ट्वीट किया था, वे उसके बाद से पूरी तरह शांत हैं। न कोई बयान, न कोई ट्वीट। उनकी जगह अब IRGC से जुड़े न्यूज पोर्टल तसनीम न्यूज उनके बयान जारी कर रहा है।
ट्रंप की बोरियत: जब कमांडर इन चीफ खुद थक जाए
अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump अब युद्ध से ऊबते नजर आ रहे हैं। जिस शख्स ने 52 दिन पहले इस जंग की शुरुआत की थी, वही अब बोरियत का शिकार है। उनके बयानों से अब कोई सनसनी पैदा नहीं होती। लोगों को पता है कि वे किसी भी वक्त अपनी बात पलट सकते हैं।
समझने वाली बात यह है कि जिस देश की सेना युद्ध में हो, उसके कमांडर इन चीफ का इस तरह बोर होना खतरनाक संकेत है। ट्रंप चाहते थे कि वे युद्ध से बाहर निकलें, लेकिन ईरान के इस इनकार ने उनका निकलना और भी मुश्किल कर दिया है।
अगर गौर करें तो ट्रंप के पास अब विकल्प बहुत कम बचे हैं। वे न तो पूरी तरह जंग कर पा रहे हैं, न ही बातचीत को सफल बना पा रहे हैं। और सबसे बड़ी बात – अमेरिकी जनता भी उनसे ऊब चुकी है।
वाशिंगटन में फूटा गुस्सा: रिटायर्ड सैनिकों का विरोध
20 अप्रैल को वाशिंगटन में एक बड़ा विरोध प्रदर्शन हुआ। सेना से रिटायर हो चुके सैनिक और उनके परिवार के लोग कांग्रेस की कैनन हाउस ऑफिस इमारत पहुंच गए। उनकी टी-शर्ट पर लिखा था “Vets Against Fascism” – यानी रिटायर्ड सैनिक फासीवाद का विरोध करते हैं।
इनके हाथों में ट्यूलिप के फूल थे जो उन ईरानी नागरिकों की याद में थे जिन्हें अमेरिकी हमलों में मारा गया। काले पोस्टर पर साफ लिखा था – “युद्ध को खत्म कीजिए, हम एक और युद्ध अफोर्ड नहीं कर सकते।”
60 से अधिक वेटरन्स को गिरफ्तार किया गया। यह दर्शाता है कि अमेरिका के भीतर ही युद्ध को लेकर तीव्र असंतोष है। 300 से अधिक पत्रकारों ने भी एक पत्र लिखकर अपने साथियों से अपील की कि वे व्हाइट हाउस के डिनर में ट्रंप के सामने ही युद्ध की निंदा करें।
ईरान के भीतर क्या हो रहा है: IRGC बनाम सरकार?
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि क्या ईरान के भीतर IRGC (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स) और सरकार के बीच मतभेद उभर रहे हैं? अली खामेनी की मृत्यु के बाद नए सुप्रीम लीडर मुजतबा खामेनी अभी तक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए हैं।
अराकची की अचानक गायबी भी संदेह पैदा करती है। वह ऑडियो टेप किसने लीक किया जिसमें उन्हें “इडियट” कहा गया था? क्या IRGC ने खुद यह टेप लीक किया? दुनिया भर में ईरान का चेहरा बन चुके अराकची अचानक क्यों चुप हो गए?
तसनीम न्यूज ने दावा किया है कि ईरान की सरकार, मोहम्मद बाकर कालीबाफ और IRGC के बीच कोई मतभेद नहीं है। लेकिन सच्चाई क्या है, यह साफ नहीं है।
कहने का मतलब साफ है – ईरान के भीतर या तो एक गहरा भ्रम है या फिर वे जानबूझकर भ्रम फैला रहे हैं। IRGC का मानना लगता है कि जंग जारी रहनी चाहिए, जबकि सरकार का एक हिस्सा बातचीत चाहता है।
युद्ध के मैदान की हकीकत: 415 घायल, 13 मौतें
पेंटागन से आई खबर के मुताबिक अब तक की लड़ाई में 415 अमेरिकी सैनिक घायल हो चुके हैं। इनमें 271 सेना से, 63 नौसेना से, 62 वायु सेना से और 19 मरीन कॉर्प्स से हैं। कुल 13 सैनिकों की मौत हो चुकी है।
यह आंकड़े सूखे नंबर नहीं हैं। हर संख्या के पीछे एक परिवार है, एक कहानी है। जिन हजारों सैनिकों को अमेरिका से ईरान की सीमा पर लाया गया था, वे अब क्या कर रहे हैं?
खबरें आ रही हैं कि जहाजों पर तैनात सैनिकों को खाने की कमी हो रही है। घरों से भेजा गया खाना रास्ते में फंसा हुआ है। मोर्चे से कोई ताजा रिपोर्टिंग नहीं आ रही। न तस्वीरें, न कहानियां।
इतिहास गवाह है: जंग में 99% बोरियत होती है
मशहूर मिलिट्री इतिहासकार जॉन कीगन की एक मशहूर लाइन है – “युद्ध में 99% बोरियत है और 1% आतंक है।” जब सैनिक युद्ध से बोर हो जाते हैं, तब वे दूसरे काम करने लगते हैं।
प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिश सैनिकों ने खाइयों से अखबार निकाले। व्यंग्य छापा, कविताएं लिखीं। वियतनाम युद्ध में अमेरिकी सैनिकों ने नई-नई रेसिपी बनाईं। बकायदा “चार्ली रेशन कुक बुक” प्रकाशित हुई।
1914 की क्रिसमस की पूर्व संध्या पर फ्रांस-बेल्जियम सीमा पर जर्मन और ब्रिटिश सैनिक अपनी-अपनी खाइयों से निकलकर “मेरी क्रिसमस” कहने लगे थे। उन्होंने हाथ मिलाया, चॉकलेट बांटी। लेकिन कमांडरों को डर था कि कहीं इन सैनिकों में मानवता न पनप जाए, इसलिए अगली क्रिसमस पर बैन लगा दिया गया।
IRGC का आर्थिक साम्राज्य: हुरमुस पर पकड़
ईरान में IRGC सिर्फ एक सैन्य संगठन नहीं है। यह एक विशाल आर्थिक साम्राज्य है। विश्लेषक इसे “बंदूकों वाला बिजनेस कॉन्ग्लोमरेट” कहते हैं। ईरान की जीडीपी के एक-तिहाई से लेकर दो-तिहाई हिस्से में IRGC का हिस्सा माना जाता है।
होरमुज जलडमरूमध्य पर IRGC का पूरा नियंत्रण है। अगर जहाजों पर कोई फीस लगती है, तो वह पैसा सीधे IRGC के खजाने में जाता है, ईरान की सरकार के पास नहीं। इसलिए IRGC हुरमुस पर एक इंच भी पीछे नहीं हटना चाहता।
2004 में तेहरान के इमाम खुमैनी एयरपोर्ट पर एक तुर्की-ऑस्ट्रियाई कंपनी को काम दिया गया था। लेकिन एयरपोर्ट खुलने के दिन IRGC के गार्ड्स ने रनवे को ब्लॉक कर दिया और एयरपोर्ट ही बंद कर दिया।
JD Vance कहां हैं: इस्लामाबाद पहुंचेंगे या नहीं?
21 अप्रैल की दोपहर खबर आई थी कि अमेरिका के उपराष्ट्रपति JD Vance इस्लामाबाद के लिए रवाना होने वाले हैं। लेकिन अभी तक कोई पुष्टि नहीं हुई। इतनी खबरें छप चुकी हैं कि अगर वे पहुंच भी जाएंगे तो लोगों को यकीन नहीं होगा।
ट्रंप की लेट नाइट ट्वीटिंग भी जारी है। जिस शाम वे कहते हैं कि इस्लामाबाद में डील हो सकती है, उसी रात 11:30 बजे वे जून 2025 को याद करते हुए लिख देते हैं – “ऑपरेशन मिडनाइट हैमर ने ईरान की न्यूक्लियर डस्ट को पूरी तरह खत्म कर दिया।”
उनकी हालत देखकर ऐसा लगता है कि उनका बस चलता तो सीधे अंतरिक्ष में चले जाते। ईरान से छुटकारा भी मिल जाता।
पाकिस्तान की अपनी चालें: कर्ज चुकाने का मौका
Pakistan भी समझ रहा है कि समझौता हो या न हो, पहले अपना हिसाब-किताब पूरा कर लो। सऊदी अरब के बाद अब वह कतर के साथ समझौता करने लगा है। अपने कर्ज चुकाने के लिए कभी अमेरिका से तो कभी सऊदी से बिलियन डॉलर ले रहा है।
तमाम पत्रिकाओं में पाकिस्तान की वाहवाही हो रही थी कि वह बातचीत करवा रहा है। लेकिन अब वह भी थकने लगा है। इस्लामाबाद टॉक्स की मध्यस्थता के बहाने पाकिस्तान ने अपना काम निकाल लिया।
22 अप्रैल के बाद क्या: फिर से युद्ध या एक और विराम?
22 अप्रैल को सीजफायर खत्म हो जाएगा। अब सवाल यह है कि ट्रंप क्या करेंगे? क्या वे फिर से हमला करेंगे या एक और युद्ध विराम की घोषणा कर देंगे?
अगर तीव्रता के साथ अमेरिका ने हमला किया तो अगले 52 दिन भी खप जाएंगे। पीछे हटने का दबाव अमेरिका पर ज्यादा है। जंग रोकने का विरोध भी वहीं ज्यादा है।
यूरोप के नेताओं ने भी बोलना बंद कर दिया है। दुनिया इस उलझन से बेफिक्र नजर आती है। जो जंग एक हफ्ते में खत्म होने वाली थी, वह अपने 52वें दिन में रेंगने लगी है, ऊंघने लगी है।
फिलिस्तीन की बच्चियां: माफी का इंतजार
मिनाब की बच्चियों पर अमेरिका ने बमबारी की थी। अभी तक माफी नहीं मांगी। उनके माता-पिता संयुक्त राष्ट्र को पत्र लिख रहे हैं। क्या जंग के कायदे का अब कोई मतलब नहीं रहा? कभी भी बमबारी हो सकती है और कहीं भी।
अब जंग में ट्रेंच की जरूरत नहीं पड़ती। अब तो स्कूल, अस्पताल – हर जगह बम गिरा दिए जाते हैं।
क्या है असली खेल: भ्रम या रणनीति?
सवाल यह है कि क्या ईरान एक रणनीति की तरह भ्रम फैला रहा है या वाकई वहां भ्रम है? ईरान के सांसद मोहम्मद रजा मोहसिनी सानी ने कहा है कि मौजूदा हालात में बातचीत असंभव है।
सरकार के प्रवक्ता कह रहे हैं कि ईरान चुप्पी पसंद करेगा। ट्रंप के बड़बोलेपन के सामने चुप रहना चाहता है। लेकिन यह चुप्पी रणनीतिक है या मजबूरी?
IRGC को लगता है कि हुरमुस पर एस्केलेशन जितना बढ़ेगा, उसका फायदा उतना ही होगा। इसलिए वह बातचीत से ज्यादा दबाव बनाने में यकीन करता है।
बोरियत का इतिहास: जब सैनिक थक जाते हैं
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सैनिक जॉन ने अपनी प्रेमिका बेटी को पत्र लिखा – “कहीं तुमने शादी तो नहीं कर ली? अगर ऐसा किया तो मुझे बुरा लगेगा। और अगर कर लिया है तो मुझे मत बताना।”
बेटी ने जवाब लिखा – “तुम्हारी चिट्ठी पढ़कर बहुत अच्छा लगा। मुझे तो लगा तुम मुझे भूल गए होगे। मुझे नहीं लगता किसी के लिए इतना मिस करना संभव है।”
ऐसे पत्रों पर किताबें लिखी गई हैं, म्यूजियम में लगाए गए हैं। 1961 में भारत में बनी फिल्म “उसने कहा था” में शायर मखदूम मोहिउद्दीन का लिखा गाना है – “जाने वाले सिपाही से पूछो वो कहां जा रहा है…”
अमेरिकी मीडिया का दबाव: ट्रंप के खिलाफ खड़े पत्रकार
व्हाइट हाउस को कवर करने वाले पत्रकारों के डिनर में ट्रंप जाने वाले हैं। ट्रंप ने मीडिया के साथ पारंपरिक डिनर बंद कर दिया था, लेकिन इस बार आ रहे हैं। 300 पत्रकारों ने लिखा है कि जो पत्रकार डिनर में जाएंगे, वे सभी युद्ध का विरोध करें और ट्रंप के सामने ही उनकी निंदा करें।
दबाव सीनियर पत्रकारों पर भी है। टकर कार्लसन जैसे पत्रकार अब अफसोस जता रहे हैं कि गलत आदमी का प्रचार कर दिया, सत्ता में ले आए।
फॉग ऑफ पीस: शांति की धुंध
फाइनेंशियल टाइम्स में गिडन रिचमैन ने लिखा है कि फॉग ऑफ वॉर (युद्ध की धुंध) से तो सब परिचित हैं, लेकिन इस समय जो हो रहा है वह “फॉग ऑफ पीस” (शांति की धुंध) है।
जैसे युद्ध के समय धुंध छा जाती है और कुछ पता नहीं चलता, उसी तरह शांति के प्रयासों को लेकर धुंध नजर आ रही है। कुछ भी साफ-साफ पता नहीं चल रहा कि किस बात का क्या मतलब है और क्या हो रहा है।
जनता की थकान: हेडलाइन्स में भी नहीं आते ट्रंप
52 दिन हो गए। आपने नोट किया होगा – हर तरफ ट्रंप ही ट्रंप थे। बेंजामिन नेतन्याहू को भी हेडलाइनों में कम जगह मिली। अली खामेनी की मृत्यु को 2 महीने पूरे होने जा रहे हैं, अभी तक उनका अंतिम संस्कार नहीं हुआ।
जो लोग ट्रंप को सबसे पहले जानते थे, वे अब इस बात के लिए अफसोस जता रहे हैं। सनकी लगने के बाद भी जिस ट्रंप की बातों से सनसनी पैदा होती थी, अब उन्हें देखते ही लोगों को जमहाई आने लगी है।
खाड़ी की अर्थव्यवस्था: ठप पड़ा कारोबार
खाड़ी के देशों में कारोबार ठप है। उनकी अर्थव्यवस्था प्रभावित है। दुनिया प्रभावित है। इसलिए जंग का रुकना और बातचीत का फाइनल होना दोनों बेहद जरूरी हैं।
अगर यह उलझन बमबारी को रोक रही है तो यह भी बड़ी बात है। ऐसी उलझनें बनी रहें। अगर सभी पक्ष बमबारी और बातचीत से बोर हो गए हैं तब भी बहुत अच्छा है। कम से कम किसी की जान तो नहीं जा रही।
जंग या शांति: नेतन्याहू के पास है जवाब
21 अप्रैल गुजर रहा है। बातचीत की टीम पहुंची नहीं। 22 अप्रैल को ट्रंप क्या करेंगे?
इसका जवाब शायद नेतन्याहू के पास है। वही जानते होंगे कि अगला कदम क्या होगा। क्या फिर से हमले होंगे या एक और विराम की घोषणा?
फिलहाल तो यही लगता है कि यह जंग – जो एक हफ्ते में खत्म होने वाली थी – अपने 52वें दिन में रेंगती रहेगी। और शायद यही सबसे अच्छा है। क्योंकि जंग की तुलना में बोरियत हजार गुना बेहतर है।
मुख्य बातें (Key Points)
• ईरान ने इस्लामाबाद बातचीत के लिए कोई टीम नहीं भेजी, पाकिस्तान की तमाम अपीलों को ठुकरा दिया
• अब्बास अराकची 17 अप्रैल के बाद से पूरी तरह शांत हैं, IRGC से जुड़े तसनीम न्यूज उनके बयान जारी कर रहा है
• अमेरिका के 415 सैनिक घायल हुए हैं (271 सेना, 63 नौसेना, 62 वायु सेना, 19 मरीन), कुल 13 की मौत
• वाशिंगटन में 60 से अधिक रिटायर्ड सैनिकों ने युद्ध के खिलाफ प्रदर्शन किया, गिरफ्तार हुए
• IRGC का ईरान की जीडीपी के एक-तिहाई से दो-तिहाई हिस्से पर नियंत्रण माना जाता है
• 22 अप्रैल को सीजफायर खत्म होने वाला है, लेकिन बातचीत की कोई संभावना नहीं दिख रही
• ट्रंप और ईरान दोनों ही युद्ध से बोर नजर आ रहे हैं, लेकिन कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं











