Punjab-JK Water Dispute: पंजाब और जम्मू-कश्मीर के बीच पानी और बिजली को लेकर जंग एक बार फिर तेज हो गई है। मुद्दा है रणजीत सागर बांध और शाहपुर कंडी परियोजना। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अब अपने राज्य के हक के लिए मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने साफ कर दिया है कि वह जल्द ही पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान से मिलकर 1979 के समझौते को लागू करने की मांग करेंगे।
देखा जाए तो यह सिर्फ पानी और बिजली का मामला नहीं है। यह राज्यों के बीच संघीय ढांचे, पुराने समझौतों की पालना और राजनीतिक इच्छाशक्ति का सवाल है।
₹973 करोड़ का बिल
तकरार की शुरुआत तब हुई जब पंजाब ने जम्मू-कश्मीर को ₹973 करोड़ 44 लाख का बिल थमा दिया। पंजाब का दावा है कि यह इन परियोजनाओं के निर्माण में जम्मू-कश्मीर का बकाया हिस्सा है।
वहीं उमर अब्दुल्ला का कहना है कि जम्मू-कश्मीर को उसका जायज हक नहीं मिल रहा है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि पंजाब पैसा मांग रहा है और J&K कह रहा है कि हमें हमारा हक नहीं मिल रहा – दोनों अलग-अलग मुद्दे उठा रहे हैं।
1979 का समझौता: क्या था?
दोनों राज्यों के बीच 1979 में एक समझौता हुआ था। इसमें मुख्य प्रावधान थे:
1. बिजली का 20% हिस्सा: जम्मू-कश्मीर को इन प्रोजेक्ट्स से पैदा होने वाली कुल बिजली का 20% हिस्सा सस्ती दर पर मिलेगा।
2. नौकरियां: बांध से प्रभावित हुए जम्मू-कश्मीर के 800 से ज्यादा परिवारों को नौकरी देने का प्रावधान था।
3. मुआवजा: प्रभावितों के मुआवजे के लिए ₹85 करोड़ 48 लाख तय हुए थे। जिसमें से पंजाब ने अभी भी ₹14 करोड़ 32 लाख नहीं दिए हैं।
दिलचस्प बात यह है कि यह समझौता 45 साल पुराना है, लेकिन अभी तक पूरी तरह लागू नहीं हुआ।
उमर अब्दुल्ला का सख्त रुख
CM उमर अब्दुल्ला ने साफ किया कि जम्मू-कश्मीर के 20% हिस्से और पुनर्वास से जुड़ी प्रतिबद्धताओं की अनदेखी नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा, “जम्मू-कश्मीर पंजाब के साथ रणजीत सागर बांध से जुड़े अपने दावों को सक्रिय रूप से आगे बढ़ाएगा।”
उन्होंने साफ किया कि वह इस टॉपिक पर भगवंत मान से सीधे बात करेंगे। अगर गौर करें तो दो मुख्यमंत्रियों के बीच सीधी बात होना अच्छी बात है। लेकिन इसका मतलब यह भी है कि मामला सुलझ नहीं पाया है।
रणजीत सागर बांध परियोजना
रणजीत सागर बांध रावी नदी पर बना है और यह पंजाब-जम्मू-कश्मीर की संयुक्त परियोजना है। इससे बिजली उत्पादन होता है और सिंचाई के लिए पानी मिलता है। लेकिन समस्या यह है कि इसके लाभों का बंटवारा विवादित रहा है।
समझने वाली बात यह है कि जब बांध बना था, तो जम्मू-कश्मीर का हिस्सा डूब गया था। वहां के लोग विस्थापित हुए थे। उन्हें मुआवजा और पुनर्वास का वादा किया गया था, जो पूरा नहीं हुआ।
शाहपुर कंडी परियोजना
शाहपुर कंडी परियोजना भी इसी विवाद का हिस्सा है। यह भी रावी नदी पर है और पंजाब-जम्मू-कश्मीर दोनों को फायदा देने के लिए बनी थी। लेकिन यहां भी वही समस्या – बंटवारा सही नहीं हुआ।
पंजाब का पक्ष
पंजाब की भगवंत मान सरकार घिरी हुई दिखाई दे रही है। एक तरफ J&K का दबाव है, दूसरी तरफ केंद्र सरकार का। पंजाब अपने वित्तीय हितों की बात कर रहा है। उनका कहना है कि परियोजना में जितना खर्च हुआ है, उसमें J&K का भी हिस्सा है जो नहीं दिया गया।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि दोनों राज्यों की अपनी-अपनी वित्तीय समस्याएं हैं। दोनों चाहते हैं कि उन्हें उनका हक मिले।
पानी विवाद: भारत में आम समस्या
भारत में राज्यों के बीच पानी के विवाद आम हैं। कावेरी, कृष्णा, गोदावरी, रावी – हर नदी पर राज्यों के बीच झगड़े हैं। यह पंजाब-J&K विवाद भी उसी श्रृंखला का हिस्सा है।
दिलचस्प बात यह है कि संविधान में पानी को राज्य सूची में रखा गया है, लेकिन अंतरराज्यीय नदियों पर केंद्र का भी अधिकार है। यह द्वैत कभी-कभी समस्या बन जाता है।
केंद्र की भूमिका
इस मामले में केंद्र सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। चूंकि J&K अब केंद्र शासित प्रदेश है, तो केंद्र सीधे इसमें शामिल है। लेकिन अभी तक केंद्र ने बीच-बचाव की कोई पहल नहीं की है।
आगे क्या होगा?
अब देखना होगा कि यह पुराना समझौता सुलझेगा या दोनों के बीच तकरार और बढ़ेगी। उमर अब्दुल्ला और भगवंत मान की मीटिंग अहम होगी। अगर दोनों CM मिलकर बात करते हैं, तो शायद कोई रास्ता निकल सके।
लेकिन अगर गौर करें तो 45 साल पुराना मामला है और अभी तक नहीं सुलझा। तो उम्मीद कम है कि जल्द सुलझ जाएगा।
मुख्य बातें (Key Points)
• पंजाब-J&K के बीच रणजीत सागर बांध और शाहपुर कंडी परियोजना पर विवाद
• पंजाब ने J&K को ₹973 करोड़ 44 लाख का बिल भेजा
• 1979 के समझौते में J&K को 20% बिजली, नौकरियां और मुआवजा का वादा
• उमर अब्दुल्ला भगवंत मान से सीधे बात करेंगे
• ₹14 करोड़ 32 लाख का मुआवजा अभी तक नहीं दिया गया













