Supreme Court Patriarchy Judgment: सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी को केरोसिन डालकर जिंदा जलाने वाले दोषी शंकर की उम्र कैद की सजा बरकरार रखते हुए देश की सामाजिक व्यवस्था में महिलाओं की दयनीय स्थिति और गहराई तक जड़ें जमाए पितृसत्तात्मक मानसिकता पर बेहद सख्त टिप्पणियां की हैं। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटेश्वर सिंह की पीठ ने यह ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि कानूनी और आर्थिक प्रगति तो बड़े स्तर पर दिखाई देती है, लेकिन पितृसत्ता अभी भी रोजमर्रा की जिंदगी में गहराई तक व्याप्त है।
राजस्थान का मामला: शादी को महीना भी नहीं हुआ था
यह मामला राजस्थान का है जहां शंकर नाम के व्यक्ति ने अपनी पत्नी को केरोसिन का तेल डालकर आग लगा दी थी। शादी को अभी एक महीना भी नहीं बीता था कि यह दिल दहला देने वाली घटना सामने आई। शंकर नशे का आदी था और अक्सर शराब पीकर अपनी पत्नी को मारता-पीटता था। घटना के दिन उसकी पत्नी अपने मायके गई हुई थी, जो पास में ही स्थित था। शंकर शराब के नशे में ससुराल पहुंचा और पत्नी से कहा कि वह घर आकर उसके लिए खाना बनाए क्योंकि उसे भूख लगी है।
पत्नी जल्दी से घर लौटी और खाना बनाने लगी। लेकिन इस बीच शंकर ने नशे में ही पहले उसे बेरहमी से पीटा और फिर उस पर केरोसिन डालकर आग लगा दी। मरने से पहले पीड़िता ने अपने मृत्युपूर्व बयान में यह सारी बातें बताई थीं। सुप्रीम कोर्ट ने इसी मृत्युपूर्व बयान को विश्वसनीय मानते हुए निचली अदालत और हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराया, जिसमें शंकर को उम्र कैद की सजा सुनाई गई थी।
Supreme Court Patriarchy Judgment: कोर्ट ने क्यों कहा ‘सब ठीक नहीं है’
सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस फैसले में सिर्फ एक अपराधी को सजा नहीं सुनाई, बल्कि पूरे देश की सामाजिक व्यवस्था पर आईना रख दिया। कोर्ट ने कहा कि यह अपराध 2011 में घटित हुआ था और तब तक देश को आजाद हुए 64 साल बीत चुके थे। हमारा संविधान समानता, लिंग के आधार पर भेदभाव न करने और जीवन व स्वतंत्रता के अधिकार सहित कई मौलिक अधिकारों का वादा करता है, लेकिन इस तरह के मामले दर्शाते हैं कि इतने वर्षों बाद भी संविधान में निहित अधिकार अभी भी कई लोगों की पहुंच से बाहर हैं।
पीठ ने कहा कि इन वर्षों के दौरान महिलाओं के उत्थान और उनके सामने आने वाली कठिनाइयों को दूर करने पर केंद्रित अनेक कानून बनाए गए, बहुत सी योजनाएं लागू की गईं और अदालतों ने भी ऐतिहासिक फैसले सुनाए। लेकिन ये कठिनाइयां मुख्य रूप से अंतर्निहित सामाजिक कलंक और गहरी जड़ें जमाए पितृसत्तात्मक रूढ़िवादी रीति-रिवाजों के कारण पैदा होती हैं।
दहेज निषेध से लेकर तीन तलाक तक: कानून बने, सोच नहीं बदली
कोर्ट ने फैसले में याद दिलाया कि समाज को महिलाओं के बारे में कलंकित सोच और धारणाओं से मुक्त करने की प्रक्रिया तो आजादी के तुरंत बाद शुरू हो गई थी। दहेज निषेध अधिनियम 1961 में आया, जिसका उद्देश्य दहेज को खत्म करना था। इसके बाद आईपीसी की धारा 498A लाई गई ताकि पतियों और रिश्तेदारों की क्रूरता से निपटा जा सके। फिर घरेलू हिंसा से महिलाओं को संरक्षण का कानून आया। कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकथाम कानून बना जिसमें सुप्रीम कोर्ट के विशाखा जजमेंट में तय दिशा-निर्देशों को संस्थागत रूप दिया गया।
कोर्ट ने तीन तलाक खत्म करने और एडल्टरी कानून समाप्त करने जैसे अपने ही ऐतिहासिक फैसलों का भी जिक्र किया। लेकिन इन सब प्रयासों के बावजूद आंकड़े बताते हैं कि स्थिति गंभीर बनी हुई है।
NCRB के आंकड़े: 4.48 लाख से ज्यादा अपराध दर्ज
सुप्रीम कोर्ट ने एनसीआरबी के 2023 के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि महिलाओं के खिलाफ 4,48,000 से ज्यादा अपराध दर्ज हुए। दहेज से जुड़ी हिंसा में हर साल 6,000 से ज्यादा लोगों की जान जाती है। इससे साफ पता चलता है कि जिन प्रथाओं को बहुत पहले गैरकानूनी घोषित कर दिया गया, वे अभी भी जिंदा हैं। राष्ट्रीय महिला आयोग के पास आने वाली शिकायतों में घरेलू हिंसा सबसे ज्यादा रिपोर्ट की जाने वाली शिकायत है।
कोर्ट ने कहा कि प्रगति और हिंसा का एक साथ होना एक विरोधाभास की ओर इशारा करता है। देश ने निश्चित तौर पर बहुत प्रगति की है, बहुत सारी चीजें बदली हैं, महिलाओं के उत्थान के लिए काम हुआ है, लेकिन नीचे अत्याचार के आंकड़े दिखा रहे हैं कि हकीकत नहीं बदली।
‘महिला कमाती भी हो तो भी घर का काम उसी की जिम्मेदारी’
Supreme Court Patriarchy Judgment में सबसे तीखी टिप्पणी पितृसत्तात्मक सोच को लेकर आई। कोर्ट ने कहा कि कई शहरी इलाकों में भले ही जेंडर बेस्ड रोल सख्ती से लागू न हो, लेकिन ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों यानी कस्बों और गांवों में पितृसत्ता आज भी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा है। घर-परिवार के भीतर अधिकार आज भी ज्यादातर पुरुषों के हाथों में है और महिलाओं की स्वायत्तता अक्सर शर्तों के अधीन और सीमित होती है।
कोर्ट ने कहा कि भले ही कोई महिला खुद कमाती हो, फिर भी उससे यही उम्मीद की जाती है कि वह काम पर जाने से पहले गृहस्ती का कामकाज निपटाकर जाए और काम से लौटने के बाद आकर खाना बनाए और घरेलू काम में व्यस्त रहे। यह अपेक्षा हमारे समाज की उस गहरी मानसिकता को उजागर करती है जिसमें महिलाओं को सिर्फ घर संभालने वाली के रूप में देखा जाता है।
‘महिलाओं के शरीर और जीवन पर नियंत्रण क्यों बना है?’
कोर्ट ने एक बेहद मार्मिक सवाल उठाया कि दशकों से कानूनों, योजनाओं, सुधारों और न्यायिक फैसलों के जरिए कार्यस्थल पर, घरों में, निजी संबंधों में और यहां तक कि सेना में भी महिलाओं को समानता की न्यायिक मान्यता दी गई है। इसके बावजूद समाज में महिलाओं के शरीर, उनकी पसंद और उनके जीवन पर नियंत्रण इतना गहरा क्यों बना है? कोर्ट ने कहा कि इस सवाल का जवाब “हम भारत के लोग” ही दे सकते हैं।
यह टिप्पणी बेहद गहरी और सार्थक है। न्यायपालिका अपनी सीमाओं से परिचित है। कानून बना सकती है, सजा सुना सकती है, लेकिन सोच बदलने का काम समाज को खुद करना होगा। जब तक हर घर में, हर गली में, हर परिवार में महिलाओं को बराबरी का दर्जा नहीं मिलता, तब तक संविधान के वादे कागज पर ही रहेंगे।
आगे की राह: बदलाव हमको और आपको मिलकर करना होगा
कल्याणकारी योजनाएं शिक्षा को बढ़ावा दे सकती हैं, लेकिन शादी और परिवार में महिलाओं की भूमिका के बारे में लंबे समय से चली आ रही मान्यताओं को नहीं बदल सकतीं। घरेलू हिंसा या पत्नी को जलाकर मार देने जैसे बेहद क्रूर अपराध किसी अपवाद के तौर पर नहीं बल्कि एक बीमार सामाजिक लक्षण के तौर पर कायम हैं। यह बात सुप्रीम कोर्ट ने अपने जजमेंट में लिखी है।
समाज कोई अलग इकाई नहीं है। यह हमसे और आपसे मिलकर बना है। इसलिए बदलाव भी हमको और आपको मिलकर करना होगा। जब तक हम अपनी सोच नहीं बदलेंगे, तब तक न कोई कानून, न कोई योजना और न कोई अदालती फैसला महिलाओं को सच्ची आजादी दिला सकता है।
मुख्य बातें (Key Points)
- सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी को जलाकर मारने वाले शंकर की उम्र कैद बरकरार रखी, मृत्युपूर्व बयान को विश्वसनीय माना।
- जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटेश्वर सिंह की पीठ ने महिलाओं पर अत्याचार को ‘बीमार सामाजिक व्यवस्था का लक्षण’ बताया।
- NCRB 2023 के अनुसार महिलाओं के खिलाफ 4.48 लाख से ज्यादा अपराध दर्ज, दहेज हिंसा में हर साल 6,000 से ज्यादा मौतें।
- कोर्ट ने कहा कि कानून और योजनाएं सोच नहीं बदल सकतीं, बदलाव “हम भारत के लोगों” को करना होगा।













